पिछले लेख में बात शुरू हुई थी जनभाषा से और फ़िर वह सरकायी , धकेली जाती हुयी हिन्दी, संस्कृति, अंग्रेजी , मैकाले, फ़ैकाले होते हुये बरास्ते संस्कृति और विनम्रता आदि होते हुये हिन्दी दिवस पर जाकर खड़ी हो गयी। इसी सिलसिले में मुझे श्रीलाल शुक्लजी का एक लेख याद आया जो हिन्दी पर दो टिप्पणियां के नाम से है। उसमें से एक टिप्पणी मैं यहां पेश कर रहा हूं। देखें कि भाषा के संबंध में क्या कहना है श्रीलालजी का।
आज देबाशीष का जन्मदिन था। इस मौके पर देबू का एक बार फ़िर से बधाई। देबू के बारे में पहले लिखे लेख आप यहां , यहां , यहां ,यहां , यहां , यहां पढ़ सकते हैं। इन लेखों में देबाशीष के बारे में उनके दोस्तों की राय भी है।
हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल
रैब्ले की प्रसिद्ध व्यंग्य-कृति ’गर्गण्टुआ और पैंटाग्रुएल’ में पैंटाग्रुएल को एक बार पेरिस के बाहर टहलते हुये एक नौजवान विद्वान मिला। उससे पूछा गया,” मित्र, इस समय कहां से आ रहे हो?” फ़्रांसीसी भाषा में विद्वान का जबाब, उसी वजन की हिन्दी में कुछ इस प्रकार का था, ” ये उस विशिष्टित, प्रतिषठायित, गरिमामंडित संस्थान से आ रहा हूं जिसे ल्यूटेशिया अभिधानित किया जाता है।”
तब पैंट्राग्रुएल ने अपने एक साथी से पूछा,” यह क्या बक रहा है?”
साथी ने जबाब दिया,”कहता है कि पेरिस से आ रहा हूं।”
इसके बाद नौजवान विद्वान ने जिस चमत्कारपूर्ण भाषा में प्रवचन दिया उसका अनुवाद किसी भाषा में सम्भव नहीं है। पर पैंटाग्रुएल को समझने में यह देर न लगी कि यह आदमी फ़्रांसीसी की नकल करने की कोशिश में उस भाषा की हत्या कर रहा है! जब पैंटाग्रुएल ने उसकी गरदन दबाकर उसे झटका दिया तो वह तुरन्त अपनी क्षेत्रीय बोली पर उतर आया। बहुत दिन बाद आक्टेबियन आगस्टस का यह सिद्धान्त उसकी समझ में आया कि दुरूह शब्दों के प्रयोग से हमें उसे उसी तरह बचना चाहिये जैसे जहाजों के सतर्क नाविक समुद्र में चट्टानों से बचते चलते हैं।
हिन्दी की सड़कों पर आजकल इसी तरह के विद्वानों का हुजूम है। उनकी मुठभेड़ पैंटाग्रुएल से नहीं होती , और न होने की जरूरत है।
पर अंग्रेजी के शब्दों, मुहावरों, वाक्यांशों को यथावत उतारकर जब वे हिन्दी को समृद्ध बनाने की कोशिश करते हैं तो उसमें शक नहीं कि वे हिंदी का अंग-भंग भी करते चलते हैं। कुछ नमूने देखिये:
“इस अराजकता के सार्थक प्रतिकार के लिये ,अर्थ के निश्चित अनुभव को फ़िर से प्राप्त करने के लिये अस्तित्व के प्रति एक अतिरिक्त चिन्ता और चेतना विक्सित की जाती है और इस प्रक्रिया में भाषा का अनुभव भी अधिकाधिक आन्तरिक होता जाता है।” (—रमेशचन्द्र शाह ,’छायावाद की प्रासंगिकता’में) “सम्बन्धों की नियति जिन जटिलताओं को उत्पन्न करती है, उन्हें बृहत्तर परिवेश में अर्थहीन विरूप प्रयोंगों तथा पूर्ण निस्संगता से वितर्तित किया जा सकना असम्भव नहीं है।” ( श्याम परमार, अकविता और कला-संदर्भ में) स्व-अस्तित्व, पर अस्तित्व , मुत्यु परमितता, अजनबीयत, आत्म-प्रपंच, व्यग्रता, हतासा आदि तत्वों का निरूपण कृति को सार्वत्रिक बनाता है।”(मधुसूदन बख्शी-’साहित्य सृजन और कुछ विचारधारायें’ में ) ” “विज्ञान के नवीनतम आविष्कारों ने हमारे आगे एक ऐसी प्रलम्बित अनिश्चितता का उद्घाटन किया है ….।” (शनंजय वर्मा ’आस्वाद के धरातल’ में। )
यह मन्तव्य नहीं कि ये उद्धरण निरथक हैं; ये नमूने सिर्फ़ इतना बताते हैं कि इस तरह के हिन्दी गद्य को समझने के लिये अंग्रेजी की जानकारी अनिवार्य है। केवल हिन्दी की जानकारी के सहारे इन्हें पढ़ा जाये तो ये सचमुच ही निर्रथक दीखने लगेंगे।
यह शर्त, कि हिन्दी-गद्य समझने के लिये अंग्रेजी की जानकारी हो, हमारे गद्य की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। समस्या सिर्फ़ उधार ली हुई भाषा की नहीं , समस्या यह कि इस प्रकार की भाषा क्या किसी प्रकार के स्वतंत्र चिन्तन का माध्यम बनने के लिये , उसके विश्लेषण के लिये समर्थ मानी जा सकती है।
वास्तव में आजकल हिन्दी का अधिकांश गद्य अंग्रेजीदां लोगों का है अंग्रेजीदां लोगों के लिये लिखा जा रहा है। प्राय: उसे समझने के लिये उसका पहले मन-ही-मन अंग्रेजी अनुवाद करना पड़ता है। कुछ समय पहले ऐसे गद्य के अनूठे उदाहरण ’कल्पना’ में ’अनमोल बोल’ स्तम्भ के अन्तर्गत छ्पते थे, ’सरिता’ भी कभी-कभी उन्हें ’यह किस देश की भाषा है?’
1939 के आसपास कृष्ण शंकर शुक्ल ने ’आधुनिक हिन्दी का इतिहास’ में वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यास ’कुंडली चक्र’ के उद्धरण देकर उनकी इस प्रवृत्ति पर एतराज किया था कि कहीं-कहीं अंग्रेजी मुहावरों के अनुवाद प्रयुक्त करते हैं। उस समय ’रत के हृदय में कहीं तो एक ललित कोना होगा’ या ’भुजबल पांव के नीचे घास नहीं उगने देता था ’ जैसे प्रयोग एक नई प्रवृत्ति की शुरुआत भर थे जो द्विवेदी युग में लिखे गये गद्य की परिष्कृत मानसिकता से मेल न खाते थे। कृष्ण शंकर शुक्ल ने तब कल्पना भी न की होगी कि अंग्रेजों के देश से बाहर जाते ही यह प्रवृत्ति इतनी व्यापक हो जायेगी कि अधिकांश गद्य अंग्रेजी वाक्यांशों का अनुवाद-भर रह जायेगा।
ऐसा होना ही था। आरम्भ के हिन्दी गद्य लेखकों में बहुत से अंग्रेजी नहीं जानते थे, पर वे संस्कृत और उर्दू-फ़ारसी के जानकार थे। जो अंग्रेजी जानते थे यह भी जानते थे कि उनका पाठक-वर्ग कौन सा है! बहरहाल, अधिकांश लेखकों की संस्कृतज्ञता के कारण हिन्दी में विशेषण बहुलता की बीमारी जरूर आई पर अपनी बात को तर्कनिष्ठ ढंग से कहने की प्रवृत्ति भी विकसित हुई! उर्दू की जानकारी के सहारे तत्कालीन लेखकों ने हिन्दी के चुस्त और ओर परिनिष्ठित रूप को निखारा।
धीरे-धीरे अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दी लेखक अल्पसंख्यकों की कोटि में आ गये। अब तो वे सिर्फ़ गिने-चुने रह गये हैं और ऐसे लेखकों की संख्या बढ़ रही है। अंग्रेजी ज्यादा और हिन्दी कम जानते हैं। दोनों भाषाओं पर सन्तुलित अधिकार रखने वाले लेखक बिरले ही हैं। तथा अंग्रेजी के प्रचुर ज्ञान और हिन्दी के कामचलाऊ ज्ञानवाले लेखकों की एक नई भाषा विकसित हो रही है जिसमें ’साहसिक’ का अर्थ पारम्परिक रूप से समुद्री डाकू या लुटेरा नहीं बल्कि ’साहसपूर्ण’ है, ’कारुणिक’ का अर्थ ’करुणामय’ नहीं बल्कि ’कारुण्य उत्पादक’ है; ’निर्भर है’ के बजाय ’निर्भर करता है’ लिखा जाने लगा और ’शाप’, ’नरक’ और ’विरूप’ जैसे शब्दों को ’श्राप’, ’नर्क’ और ’विद्रूप’ बना लिया गया है। अजीब बात नहीं कि कुछ वर्षों बाद इस भाषा में ’कृपया’ को ’ कृप्या’ लिखा जाने लगे।
इसी के साथ अंग्रेजी का वाक्य विन्यास , उसके शब्द और मुहावरे , उसके विशिष्ट अभिव्यक्ति-प्रयोग सभी हिन्दी में उतरने लगे हैं जो हिन्दी-पाठक को आतंकित करते हैं और केवल हिन्दी जानने वाले लेखक को निरुत्साह बनाकर छोड़ देते हैं। केवल हिन्दी जानने वाला लेखक अपने ही साहित्य-क्षेत्र में बेगाना हो गया है। सनेही, मैथिलीशरण गुप्त, शान्तिप्रिय द्विवेदी आदि के दिन गये- इस माहौल में रेणु और शैलेश मटियानी अपवाद की तरह दीख पड़ते हैं! अंग्रेजी-परस्त हिन्दी का यह नकचढ़ा (हाईब्राऊ) रवैया उन लेखकों को बहिष्कृत करता जा रहा है जिनसे सहज गद्य की सहज आशा की जा सकती है।
नतीजा यह है कि केवल हिन्दी जानने वाला लेखक भी अब जैसे ही लिखना शुरू करता है, वह अनजाने ही इस प्रतिस्पर्धा का शिकार हो जाता है कि हम क्या किसी से कम हैं। तभी वह ’संदर्भ’ , ’आयाम’, ’परिप्रेक्ष्य’ , ’नकारात्मक साक्षात्कार’, ’सम्पृक्ति के सूत्र’ जैसे सिक्कों को खुलकर उछालता चलता है ताकि उसकी शब्द-सम्पदा पर किसी को शुबहा न रहे; और इस प्रवृत्ति से उलझकर वह उलझानेवाले गद्य की परम्परा को मजबूत करता है, और अपने पात्रों को ’ढीले सिरे’ से लटकाये रखता है।
प्रत्येक देश और समाज के मुहावरे उसकी सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक-भौगोलिक स्थिति की उपज हैं। पर अंग्रेजी की नकल में हमें इसका भी ध्यान नहीं रहता। तभी हम ’कोल्ड रिसेप्शन’ ’वार्म हार्टेड’ का भी शाब्दिक अनुवाद रखने की कोशिश करते हैं। भारत जैसे गर्म देश में किसी से मिलकर ठंडक का अनुभव करना स्नेह और सौहार्द का लक्षण हो सकता है (तुमहिं देखि सीतल भइ
छाती)। पर इंग्लैंड जैसे देश कें उपेक्षापूर्ण और स्नेहहीन आचरण के लिये ’कोल्ड बिहेवियर’ का प्रयोग होगा। वहां सौहार्दपूर्ण व्यक्ति के लिये ’वार्महार्टेड’ का प्रयोग उतना ही स्वाभाविक है जितना भारत में नाराजगी के लिये गर्म होना का प्रयोग!
इस तरह के अनेक उदाहरणों से देखा जा सकता है कि अंग्रेजी शब्द समूह का हूबहू हिन्दी अनुवाद निरर्थक ही नहीं, विपरीत अर्थ सृजित करने वाला भी हो सकता है। वास्तव में भाषा का विकास ऐसे कृत्तिम उपायों से नहीं , संस्कृति और चिंतन के विकास के अनुरूप ही होता है। तभी अभिव्यक्ति की नई मांगों के समाधान के लिये भाषा अपने लचीलेपन की सारी सम्भावनाओं को निचोड़ती है और नई अभिव्यंजनाओं की सृष्टि करती है। सन्तोष का यही विषय है कि भाषा का विकास इस सहज आधार पर भी कहीं-कहीं एक-दूसरे के समान्तर स्तर पर होता जा रहा है।
तो बकौल, अंग्रेजी कहावत के शाब्दिक अनुवाद के , काले बादलों में वही एक रुपहली लकीर है। मनीषियों का एक समुदाय गद्य की उसी स्थिति के बारे में पूर्णतया सजग है। इस प्रसंग में रामस्वरूप चतुर्वेदी का ’गद्य की सत्ता’ नामक एक लेख कुछ समय पहले आलोचना(२७) में छपा था। उन्होंने बहस की शुरुआत इसी स्थिति से की थी कि’ हिन्दी में अच्छा गद्य या कहें ,गद्य लेखक विरले हैं।’ इसके अन्य कारणों के साथ उन्होंने भी अनुभव किया किया है कि “अंग्रेजी शब्द समूह , वाक्य विन्यास आदि के क्षेत्रों में तरह-तरह की घुसपैठ कर रही है। ” उनका कहना है कि “मैकाले ने अभी तक काले साहब के शरीर की रचना की थी, उनका दिमाग असल में अब बन रहा है। ऐसी स्थिति में हिन्दी का स्वायत्त विकास निश्चय ही कठिनतर होता जा रहा है।
इस स्थिति से बचत के दो रास्ते हैं। एक यह कि प्रत्येक हिन्दी लेखक अपने लिये वह अनुशासन स्वीकार करके चले कि उसका कथ्य ऐसे पाठक के लिये है जो अंग्रेजी नहीं जानता। वह यह ध्यान रखे कि वह अपनी भाषा द्वारा अपने पाठक को अंग्रेजी की जटिल शब्द श्रंखला का उपहार नहीं दे रहा, बल्कि उसे उस भाषा के माध्यम से अपनी संवेदना और चिंतन का भागी बना रहा है।
दूसरे रास्ते का सम्बन्ध भाषा के बाह्य स्वरूप से नहीं , बल्कि माध्यम के रूप में उसकी मूलभूत उपयोगिता से है। जबतक हम उधार या चोरी का माल हिन्दी में भरते रहेंगे तब तक उस स्थिति की यह अनिवार्यता रहेगी कि हम उधार या चोरी को छिपाने के लिये एक उधार ली हुई, जानबूझकर जटिल बनाई गयी भाषा का प्रयोग करें जिसका उद्देश्य विचार या संवेदना का उद्घाटन नहीं, बल्कि संगोपन होगा। पर हमारी अपनी संवेदना और अपना चिन्तन सम्प्रेषण के लिये उधार की भाषा को अपने आप-छोड़ता चलेगा और बार-बार अपनी अभिव्यक्ति के लिये एक वास्तविक, समर्थ माध्यम की मांग करेगा।
–श्रीलाल शुक्ल
जहालत के पचास साल से साभार।






श्रीलाल शुक्ल जी के विचार हिन्दी के प्रति सजग और समर्पित सभी व्यक्तियों को अपनाने चाहिए। उन्होंने बहुत अच्छा विवेचन किया है।
पढ़वाने का आभार।
अतीत की घटना-दुर्घटनाएँ वर्तमान में कुछ देती ही हैं। हम तो इस आलेख को पढ़ कर निहाल हो गए। शुक्ल जी वो सब कह गए जो हि्न्दी के लिए हम कहना चाहते हैं।
सच है ऐसे शब्द किस काम के जो आप के विचार और आप के मन की बात पाठक तक न पहुंचा सकें। ऐसे शब्द आप को आत्म संतुष्टि दे सकते हैं गर्वित भी कर सकते हैं लेकिन आप की बात दूसरे तक नहीं पहुंचा सकते।
दैया रे! श्रीलाल शुक्ल?
आपकी टीम में तो बड़े-बड़े खिलाड़ी हैं, रियल मैड्रिड और मैन्चेस्टर यूनाइटेड की तरह. अब आपसे कौन जीतेगा?
लेख तो जबर्दस्त है. अब दूसरी ओर से भी इसकी टक्कर की कोई चीज आये तो बात बने. कौन कहता है कि ब्लॉग्स पर स्वस्थ बहस नहीं होतीं?
इन सब के साथ एक बात और भी खास ध्यान होने योग्य है । सँस्कृत का सारा साहित्य हिन्दू समाज को पुनर्जीवित न कर सका, इसलिये सामयिक भाषा में नवीन साहित्य की सृष्टि की गयी । उस सामयिक भाव के साहित्य ने जो प्रभाव दिखाया वही हम आज तक अनुभव करते हैं । एक अच्छे समझदार व्यक्ति के लिये क्लिष्ट सँस्कृत के मन्त्र तथा पुरानी अरबी की आयतें इतनी प्रभावकारी नहीं हो सकती जितनी कि उसकी साधारण भाषा की साधारण बातें ।
” श्री भीमसेन विद्यालँकार – हिन्दी सन्देश 28 फरवरी 1933 पृष्ठ 27 से ”
हाथ कँगन को आरसी क्या … जनमानस पर जितना प्रभाव रामचरित मानस, कबीर की साखी, रहीम के दोहे, रसखान की रचनायें, घाघ की सूक्तियों का पड़ा, वह आज भी प्रत्यक्ष है । ” कामिनि कंत सों, जामिनि चंद सों, दामिनि पावस-मेघ घटा सों, कीरति दान सों, सूरति ज्ञान सों, प्रीति बड़ी सनमान महा सों ..” जैसी रचनायें पाठ्यपुस्तकों में ही भली लगती हैं । प्रसँगवश यह भी जिक्र कर दूँ कि महाकवि भूषण इस भाषा सौन्दर्य को सँभाल न पाये, और इसी रचना को आगे उन्होंने तत्कालीन भदेश ” ऐल-फैल खैल भैल खलक पै गैल-गैल, गजन कि ठेल पेल सैल उसलत हैं.. ” जैसी पँक्तियों से सँभाला ।
टिप्पणी गरिष्ठ होती जा रही है, इस पर यदि एक पोस्ट लिख ही डालूँ, तो पढ़ेगा कौन ?
कुल मिलाकर यह कि कोई अँग्रेज़ी बघार कर हड़काता है, कोई सँस्कृत का हवाला देकर उकसाता है, पर पब्लिकिया तो मुम्बईया टपोरी पर मरी जाती है । हैदराबादी हिन्दी अब तक क्यों ज़िन्दा है ? उसमें शब्दों को समाहित करने की एक साल्वेन्ट जैसी क्षमता है… पर हम हिन्दीयाइट्स वहीं फँसे पड़े हैं । खेद है कि इसी व्यामोह के चलते हिन्दी राष्ट्रभाषा बन कर भी सर्वमान्य सम्पर्क भाषा आज तक न बन पायी ।
लीजिये साहब, लिखने की रौ में भड़ से एक शब्द हिन्दीयाइट बन ही गया, यदि आदरणीय ज्ञानदत्त जी ने इसे अब तक न बनाया तो क्या.. बन तो गया ही है ।
श्रीलाल शुक्ल के विचार प्रासंगिक हैं
बहुत सुसंगत और तर्कपूर्ण -कहीं भी झोल नहीं झलकता ! भाषा का ज्ञान और उसकी जन समझ दोनों पृथक पहलू है ! हम रिक्शेवालों से बात करें तो उनकी बोली भाषा में और विद्वानों के बीच रहें तो उतने सरलीकरण की आवश्यकता नहीं है ! हाँ दुरूहता और पांडित्य प्रदर्शन से परहेज भी जरूरी है ! शुक्ल जी ने बेमेलता और हास्यास्पद प्रयोगों की मनाही की है मगर संस्कृत के शब्दों के सहज प्रयोग पर कोई फतवा नहीं जारी किया है जैसा हिन्दी चिट्ठाजगत में किया जा रहा है !
मान तो यही लिया गया है की संस्कृत एक मृत भाषा है मगर अब हिन्दी ब्लागजगत मर्सिया भी पढ़ कर उसे पूरे रीति रिवाज से बाकायदा दफनाने को तुल गया है ! यह चिंताजनक है ! हम इसका विरोध जारी रखेगें !
दुरूह शब्दों के प्रयोग से हमें उसे उसी तरह बचना चाहिये जैसे जहाजों के सतर्क नाविक समुद्र में चट्टानों से बचते चलते हैं।
आपको इस आलेख के लिये कोटिश: धन्यवाद.
आपके धैर्य को सलाम देव….पिछले आधे घंटे से हूँ इस पोस्ट पे। सोचता हूँ, आपको लिखने में कितना वक्त लगा होगा?
संग्रहणीय आलेख!
ऐसा लिखो कि समझ आए.
मौका हाथ में है, मन की कह रहा हूँ….कुछ चिट्ठाकार धर्मनिरपेक्ष दिखने के फेर में अनावश्यक अरबी घुसड़ते है. कोई विद्वान दिखने के फेर में अंग्रेजी. कोई प्रगतिशील दिखने के फेर में अजीब सी अजदकी भाषा…..ये भाषा समझ में नहीं आती भाई…..आप भी कभी कभी स्थानिय बोली का कुछ ज्यादा ही प्रयोग कर जाते है….. बाकी जय हिन्दी…..
भाषा मृत नहीं होती, मात्र शनैः शनैः हमारे दैनंदिन प्रयोगों से दूर होती जाती है| रही बात संस्कृत जैसी भाषा को मृत मान लेने की, तो मैं इसका विरोध करता हूँ|
आज जबकि अधिकांश शोधों से सिद्ध हो चुका है की जर्मन, स्पेनिश, और अन्य योरोपियन भाषाओँ के साथ संस्कृत का भी एक साझा सेमेटिक मूल है, और आज अन्य भाषाएँ निरंतर प्रयोग में बनी हैं, ऐसे में संस्कृत को ही मृत मान लेना अपनी कमियों को बौद्धिकता के परदे में छुपाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं, ऐसा मेरा मानना है|
रही बात भाषा में क्लिष्टता के समावेश की, तो भाषा वही अच्छी जो बहुसंख्य जन को बिना डिक्शनरी के समझ में आ जाये|
सम्प्रेषण तो करेक्टिव कोर्स लेता है। आप को जो कच्ची-पक्की भाषा आती है, उसमें लिखते-कहते हैं। अगला समझ कर उत्तर देता है, या भकुआ बना रहता है। उसे तोल कर आप अपनी भाषा (या सम्प्रेष्ण समग्र) में परिवर्तन करते हैं। यह सतत प्रक्रिया है। कम से कम मैं तो यही कर रहा हूं।
कुछ लोग अपनी भाषा और अपने सामने वाले के प्रति पूरी तरह आश्वस्त होंगे और वे एक निश्चित प्रकार से चल सकते हैं। आप उनमें से एक होंगे।
हम उतने भाग्यशाली नहीं हैं। लिहाजा श्रीयुत श्रीलाल शुक्ल जी की सीख पूर्णत: पालन करना पासैबिलै नहीं है। (और उनकी महानता के प्रति अवज्ञाभाव न माना जाये इसे!)
अपुन को तो आज तक ये लफडा समझ नहीं आयेला है कि हर दो पांच दिन के बाद सब लोग एक नया लोचा किधर से लेकर आता है..
अपुन तो जैसा है वैसा इच टिक है,.. खाली पिली मगजमारी में काहे को टेम खोटी करने का.. एक ना एक दिन सबकी बोलती बंद होनी है रे.. फिर कौनसी बोली और कौनसी भाषा..
डाक्टर अमर कुमार ‘नकली’ जी की टिपण्णी को सो लम्बर !
फिल्म ‘खुदा के लिए’ में पाकिस्तान से आये एक व्यक्ति की ताबीज पर अरबी में लिखी लाइनों का मतलब पूछने पर वह बताता है कि मैं इसे पढ़ तो सकता हूँ पर इसका मतलब नहीं बता सकता.मुझे तो वही याद आया.
ई श्रीलाल शुक्ल तो अनूप शुक्ल से बढि़या लिखेला है:)
इस महत्वपूर्ण विषय पर श्री हिमांशु पाण्डेय जी की टिप्पणी सर्वथा प्रासंगिक है.
“हम विस्मृत कर रहे हैं उपनिषदीय वचन – “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य” । आत्मा कैसे पायी जा सकेगी यदि बल ही खो गया । बलहीन आत्मा की उपलब्धि नहीं किया करते । हिन्दी की उपेक्षा में क्या भारत की आत्मा ही नहीं खो गयी ? सृजनशीलता की कर्मण्यता ही नहीं खो गयी ?
हिन्दी को उपेक्षित कर हमने अपने आत्मविश्वास को उपेक्षित कर दिया है । हमारी अन्तर्निहित प्रज्ञा, हमारी प्रतिभा, हमारा सम्मान वंचित हो रहा है। हमें हिन्दी के इस आत्मविश्वास को संरक्षित करना होगा ।”
प्रत्येक हिन्दी लेखक अपने लिये वह अनुशासन स्वीकार करके चले कि उसका कथ्य ऐसे पाठक के लिये है जो अंग्रेजी नहीं जानता। वह यह ध्यान रखे कि वह अपनी भाषा द्वारा अपने पाठक को अंग्रेजी की जटिल शब्द श्रंखला का उपहार नहीं दे रहा, बल्कि उसे उस भाषा के माध्यम से अपनी संवेदना और चिंतन का भागी बना रहा है।
वस्तुतः यही निचोड़ है…..यदि हमें हिंदी को बचाते हुए उसे समृद्धि देनी है तो बहुत गहरे यह बात बैठानी होगी…
विचार प्रासंगिक हैं-बेहतरीन..समझ में आया.
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.
कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरु करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.
माननीय अनूप जी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनायें.
[हम सब की तरफ से [लगता है.. ]apni पोस्ट में पाबला जी ने ‘गमले सहित’ फूल aap ko भेंट किये हुए हैं!]
हम आप के ब्लॉग पर जन्मदिन की मिठाई केक शेक की उम्मीद से आये थे..यहाँ तो हिंदी दिवस चल रहा है.
बहुत बहुत बधाई.
जन्मदिन की बधाई स्वीकारें,
हो सके तो कुछ लिख मारें.
शुक्ल जी की बातें तो सौ फ़ीसदी सही लगती हैं। काश कि लोग इसपर ग़ौर करें और अमल में लाएँ। नहीं तो लोगों की बाउंसर टाइप हिन्दी सर के ऊपर से निकल जाती है।
हम तो अभी सीख रहे हैं… आप सिखाते रहिये…
धन्यवाद।
भाषा एक बहता हुआ पानी है, कब किधर जाए, कौन जाने?
Think Scientific Act Scientific
शुक्ल जी की राग दरबारी के कुछ पृष्ठ पढ़े बिना नींद नहीं आती है. श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखी गयी दूसरी टिप्पणी की प्रतीक्षा है.
ap to ap hai ap to mere vicharo ke bhi bap hai