ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल

सुकुमार बाला

ब्लागर हलकान ’विद्रोही’ ने अपनी डायरी शिवकुमार मिसिर को दे दी थी। थोड़ी देर बाद वापस ले ली। उसके बाद हम उनके भी उनके पास गये तो उन्होंने हमें भी डायरी थोड़ी देर के लिये थमा दी। हमने सोचा कि शायद टिप्पणी करने के लिये दी है। हमने डायरी बिना देखे उनसे कहा- आपके और आपके परिवार को दशहरे की शुभकामनायें। ब्लागर हलकान विद्रोही ने अपने जबड़े इधर-उधर नचाये तो मुझे लगा कि उनको पैरालिसिस का अटैक पड़ा है शरीर के दायें भाग का बांये से तालमेल गड़बड़ा गया है। लेकिन हलकान विद्रोही ने जब अपने नकली दांत लगाकर उनको पीसते हुये मेरी तरफ़ देखा तो मुझे लगा कि संभवत: वे मझ पर अपना रोष जाहिर करना चाहते हैं।

हमारी और ब्लागर हलकान ’विद्रोही’ की उमर और लिंग मुझे इस बात के लिये उत्साहित न कर सकी कि हम उनके रोष से सहमकर उनसे ही चिपट जायें और वे अपने रोष को लाड़-दुलार में परिवर्तित करके हमसे कहने लगें- अरे,अरे तुम तो सच में डर गये। मैं तो ऐसे ही मजाक कर रहा था।लिहाजा हमने अपनी भौंहें चालीस डिग्री और गरदन पचास डिग्री एक साथ ऊपर की और उनसे कहा- आप सीधे-सीधे अपनी बात समझाइये। संस्कृत तो मती झेलाइये। हमारे पास समय किंचित अभाव सा है। हम अनुवाद न कर पायेंगे और न करा पायेंगे किसी से। और हम मजाक के मूड में तो कत्तई नहीं हैं। देख ही रहे हैं जरा सा मजाक करते ही कित्ता बड़ा जलजला आ जाता है। इंडोनेशिया में तबाही ही मची हुई है। किसी ने वहां मजाक किया होगा उसी से आया है यह जलजला।

बाद में पता चला कि ब्लागर हलकान ’विद्रोही’ अपनी डायरी हमें दे रहे हैं ताकि उससे कुछ टीपकर हम आप तक उनके मनोभाव पहुंचा सकें। दांत वे इसलिये पीस रहे थे कि हमने उनको दशहरे की शुभकामनायें दे दीं जबकि वे चाहते थे कि हम उसमें यह भी लिखते कि आपने बहुत सुन्दर लिखा है। ऐसा सिर्फ़ आप ही लिख सकते हैं। बहरहाल जब ब्लागर हलकान ’विद्रोही’ अपने दांत पर्याप्त पीस चुके और इस बीच उनकी तारीफ़ करके मैंने उनका मूड ठिकाने लगा दिया तो हम पर खुश से हो गये। खुश होकर उन्होंने मुझे डायरी देना स्थगित करके आधुनिक विक्रम-बेताल कथा सुनाई! श्रम को भुलाने के लिये आप भी सुनें।

अथ विक्रम बेताल कथा

सुकुमार बाला

हमेशा की तरह विक्रम ने बंधुआ मजदूर की तरह वेताल को अपने कंधे पर टांग लिया। एक अवांक्षित बेनामी टिप्पणी की तरह। बेताल ने लदते ही विक्रम को अपनी कथा झेलानी शुरु कर दी।

एक शहर में एक सुकुमार बाला रहती थी ( जिन साथियों को सुकुमार बाला से एतराज हो वे उसकी जगह किसी गबरू जवान या अपनी पसंद के अनुसार किसी और के बारे में सोच लें। बाकी जगह पर भी यथास्थान परिवर्तन कर लें! )कोई काम न धाम। इधर-उधर डांय-डांय फ़िरती थी। सुन्दर थी। अलबेली थी। भगवान ने उसे आराम से या कहें फ़ुरसत में बनाया था। लेकिन वह कभी फ़ुरसत में नहीं रहती थी। हमेशा व्यस्त रहती थी। कोई काम-धाम न रहने से उसे व्यस्त रहने की सहूलियत भी थी। जब मन चाहती व्यस्त हो जाती। अपने मन की ही करती थी। घर वालों के लाड़-प्यार में पली थी इसलिये घर वाले उसका कुछ और तो कर नहीं पाते थे खाली उसके लिये परेशान हो लेते थे। कभी उसके भविष्य के लिये, कभी उसकी सुरक्षा के लिये। कभी किसी के लिये, कभी किसी के लिये।

बाला एकदम आधुनिकतम तकनीक के बारे में अद्यतन जानकारी रखती थी। जैसे ही बाजार में कोई नयी चीज आती वो जिद करती और वो चीजे हासिल करके रहती। जब घर वाले उसको मना करते वह जान दे देने की धमकी देती और मजबूरन घर वाले उसकी इच्छा पूरी करते। अभी हाल ही में जान देने की धमकी देकर उसने एकदम नया मोबाइल हासिल किया था। मोबाइल में इन्टरनेट, झकास कैमरा और न जाने क्या हेन-तेन मौजूद था।

एक दिन बाला एक सूनसान इलाके से जा रही थी। अचानक उसने देखा कि कुछ लफ़ंगे टाइप के लोग उसके पीछे लग गये। आसपास कोई दिख भी नहीं रहा था। बाला को याद आया कि उसके घरवाले उसको अकेले अनजान राहों पर जाने से मना करते थे। कहते रहते थे कि जमाना बड़ा खराब है। कहीं कुछ ऊंच-नीच हो गयी तो क्या होगा। उसको लगा कि आज कोई ऊंच नीच होकर ही रहेगी शायद!

बहरहाल जब लफ़ंगे पीछे लग ही लिये तो बाला ने भी सोचा कि इनसे भी अब निपट ही लिया जाये। उसने चुपके से अपने मोबाइल पर कोई बटन दबाया और निश्चिन्त होकर टहलती हुय़ी चलने लगी। निश्चिन्त होने के पहले उसने एक बार घबराने का नाटक भी किया। सोचा तो उसने पसीना बहाने के लिये भी लेकिन फ़िर मेकअप खराब होने की बात सोचते हुये उसने ऐसा नहीं किया।

मोबाइल पर बटन दबने के बाद पलक झपकते ही वहां वहां हाहाकार मच गया। चारो तरफ़ लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। कोई उसके लिये खून देने की बात करने लगा ।कोई जान देने की। कोई जान लेने की करने लगा। कोई कहने लगा तुम बिन हम जियेंगे कैसे? किसी के दिन सूने हो रहे थे किसी की रातें। किसी की चैन उड़ गया किसी का ज्ञान! किसी की बहर बिगड़ गयी किसी की सहर। किसी ने उसको महान बताया किसी ने सबसे महान। किसी ने कहा तुम सा कोई हुआ नहीं । कोई कहने लगा कि आगे भी न होगा। एक ने दोनों को डांटते हुये कहा- अबे इसको देवभाषा में कहते हैं, न भूतो न भविष्यति। किसी ने कहा अब जरा इसे अंग्रेजी में भी कहो तो लोगों ने इन्कार कर दिया यह कहते हुये कि यह तो ज्ञानजी का काम है।

बहरहाल लब्बो और लुआब दोनों मिलाकर हुआ यह कि जनता उस बाला के चारो तरफ़ इकट्ठा होकर उसके सुरक्षा गार्ड की तरह चलने लगी। लफ़ंगे जो उसको सीटियां मारने के लिये होंठ गोलिया रहे थे उसका जैकारा लगाने लगे। सब तरफ़ वातावरण में जय-जयकार होने लगी।

कहानी सुनाकर बेताल ने हमेशा की तरह पूछा कि हे विक्रम यह कथा तुमने सुनी। अब बताओ वह बाला कौन थी? उसने मोबाइल पर क्या किया जिसके कारण इतने सारे लोग उसकी रक्षा के लिये उमड़ पड़े? वे लफ़ंगे जो उसको छेड़ रहे थे बाद में उसकी ही जै-जैकार क्यों करने लगे? इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है?

विक्रम ने बताया कि हे बेताल! जो जरा सा भी ब्लागिंग में रुचि रखता है वह इस सवाल का जबाब बिना चुटकी बजाये ही दे सकता है। वह बाला एक ब्लागर थी। उसने जैसे ही लफ़ंगो को देखा वैसे ही उसने पहले से ही टाइप पोस्ट अपने मोबाइल से पोस्ट कर दी। उस पोस्ट में उसके ब्लाग के बंद करने की घोषणा थी। जैसे ही पोस्ट को लोगों ने देखा वैसे ही उससे ऐसा न करने का करने का अनुरोध करते हुये उसके चारो तरफ़ उमड़ पड़े। उसे छेड़ने वाले लफ़ंगे भी जै कारे में साथ इसलिये लग लिये जिससे कि पिटाई से बच सकें। इस कथा से यह सीख मिलती है कि ब्लाग का उपयोग खाली टाइम पास के अलावा अपनी इज्जत आबरू और जिन्दगी बचाने क लिये भी हो सकता है।

जबाब सुनते ही बेताल विक्रम के कन्धे पर उचक कर पास की डाल पर लटक गया।

हलकान विद्रोही भी अपनी डायरी समेटकर दूसरे किसी ब्लागर का इंतजार करने लगे।

हम वहां से निकलकर फ़ूट लिये। सोचा आपको अपनी मुलाकात के बारे में बता दें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

23 responses to “ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल”

  1. विवेक सिंह

    आप की पोस्ट पढ़ने के चक्कर में हम अपनी पोस्ट न लिख सके, अब काम पर जाने का समय हो गया,

    इस प्रकार हिन्दी ब्लॉग-जगत एक अच्छी पोस्ट से वंचित हो गया और एक घटिया टिप्पणी पा गया !

  2. Shiv Kumar Mishra

    हलकान भाई से यह उम्मीद नहीं थी. मुझसे डायरी छीन ली लेकिन आपको पढ़ने के लिए थमा दी. अब मैं उनकी डायरी कभी नहीं छापूंगा. धन्यवाद के साथ लौटा दूंगा. इससे पब्लिशर धर्म का पालन भी हो जाएगा.

    बोध-कथा बहुत बढ़िया रही. आशा है अब विक्रम भी ब्लॉग बना लेंगे. चाहें तो बेताल और उस बाला के साथ एक कम्यूनिटी ब्लॉग बना लें….:-)

    और विवेक की टिपण्णी घटिया है कि नहीं, इस बात को जानने के लिए एक कमीशन बैठाकर फैसला किया जाना चाहिए. टिप्पणी अगर घटिया निकले तो उसे धन्यवाद के साथ विवेक को लौटा दिया जाय.

  3. कुश

    एक नहीं दो फालतू टिपण्णी… हुंह

  4. हिमांशु

    ब्लॉग के उपयोग में एक और कड़ी –
    “ब्लाग का उपयोग खाली टाइम पास के अलावा अपनी इज्जत आबरू और जिन्दगी बचाने क लिये भी हो सकता है।”

    आभार ।

  5. संजय बेंगाणी

    अभी क्या बोलें? कम से कम इतना तो पता चला कन्या सुन्दर थी…..बदमाश पीछे पड़े थे और ब्लॉगर आबरू बचा सकता है….

  6. Prashant(PD)

    oopar vala photo usi bala ka hai kya?? :-o

  7. ताऊ रामपुरिया

    ब्लाग का उपयोग खाली टाइम पास के अलावा अपनी इज्जत आबरू और जिन्दगी बचाने क लिये भी हो सकता है।

    और उतना ही इज्जत गंवाने के लिए भी किया जा सकता है.:)

    रामराम.

    (पुनश्च : कमेंट फ़ालोअप का बटन लगवाईये ना.)

  8. वन्दना अवस्थी दुबे

    वाह! बडी अच्छी शिक्षा मिलती है इस बेताल-कथा से तो. खास तौर पर हम महिला ब्लौगरों के लिये तो बडे काम की पोस्ट है…………..

  9. रंजना

    बेताल कथा तो इतनी जानदार लगी कि कानो में दूरदर्शन वाले विक्रम बेताल धारावाहिक का टायटल म्यूजिक गूंजने लगा…..

    बहुतै लाजवाब लिख डाले हैं अनूप भाई….जय हो… कहने को मन हो आया है पढ़कर…जय जय हो……

  10. Pankaj

    शुक्ला जी बिक्रम बेताल भी नहीं बच सके इस ब्लागिंग के रोग से .
    वैसे अगर टिप्पणी जाच करवाना हो तो मेरे हिसाब से टिप्पू चच्चा काफी मददगार हो सकते है :)

  11. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    कमाल है – फोटो में तो बाला की ओर कोई देख तक नहीं रहा! :-)

  12. दिनेशराय द्विवेदी

    ये हलकान विद्रोही बड़े जोरदार हैं। कल कलकत्ता में थे आज कानपुर में। कहीं ये बालाजी प्रोडक्शन्स के रिश्तेदार तो नहीं जहाँ भी जाते हैं वहाँ का नाम क से आरंभ हो रहा है। वैसे आप को पता हो तो बताएँ आगे कहाँ कहाँ जाने वाले हैं?

  13. Darpan Sah

    Soch raha hoon apna blog band kar doon….

    ;)

  14. समीर लाल

    हलाकान विद्रोही की विक्रम बेताल कथा में ब्लॉगर से ज्यादा लफंगो के लिए सीख है जिनके सीटी बजाने के लिए हुए गोल ओंठ पिटन से बचने के लिए जयजयकारा लगाने लगते हैं. कभी गोलाई से नारा मोड में आने में देर हो गई, तो खैर नहीं. :)

    मस्त्त रहा.

    त्योहार की बधाई. कोई न कोई त्योहार तो होगा ही.

  15. चंद्र मौलेश्वर

    विद्रोही से बच के रहना रे बा बा!! वर्ना हलकान कर देगा:)

    ब्लागर की इज़्ज़त और आबरू!!!!!!!!!!!!!!! जानकारी के लिए आभार:)

  16. Abhishek Ojha

    इ फोटू वाली बाला के ब्लॉग का लिंक दीजिये न ?

  17. Kavita Vachaknavee

    ये बालाएँ भी न बला की तरह आपके पीछे पडी हैं ! च च च च

    हर कोई आपको ही क्यों आँखें दिखाती है? शोध का मामला है.

    डांय-डांय फिरने की बात तो अजब ही देखी

  18. shefali pande

    “इधर-उधर डांय-डांय फ़िरती थी”।
    ये कौन सी तरह का फिरना है जी ??

  19. क़न्फ़्यूजाया उल्लू


    कथा पर गत तीन घँटे से मनन चल रहा है,
    कहीं राजन का सिर टुकड़े टुकड़े न हो जाये,
    अतः हर शाख पर उल्लू प्रदेश जाने की फ़ुरसत का इंतज़ार है ।
    टिप्पणी लम्बित समझा जाये, अभी तो खुदै क़फ़्यूज़ियाये अपना कान खुजा रहें हैं, जी ।

  20. shyamalsuman

    विक्रम – बेताल के बहाने रोचक प्रस्तुति।

  21. dr anurag

    अभिषेक को गर लिंक दे चुके हो तो उसी को फॉरवर्ड कर दीजिये….आजकल ससुरा बेताल भी मोर्डन हो गया है .सुना है कोई बेल्ट बाँधने लगा है ..बिक्रम को बाँधने के वास्ते …..

  22. काजल कुमार

    हम्म्म
    अच्छी कहानी कही.

  23. Rajesh Srivastavaa

    :-) ! हम तो नया नया गिरे हैं ब्लॉग्गिंग के दुनिया में, वो भी सिर्फ पढ़ते हैं (ना जी ना, हम कलाकार नहीं, सुनकार हैं ). कहीं ये पोस्ट उस ब्लॉग पे तो नहीं जो अभी अभी पुनः खोला गया (apparently जनता के डिमांड पे)? :-) पढ़ के मजा आया. धन्यवाद!

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