तुम कौन सी शाख के मोर हो जी

मोर

कल सुबह दक्षिण भारत की तबाही के सीन टेलिविजन पर देखे। जगह-ए-तबाही से इत्ती दूर फ़िर भी देखकर हड़क गये। लगा कि कुदरतजी भन्नाई हुई है। कोई भन्नाया हुआ आका तबादले में किसी को कहीं किसी को कहीं पटक देता है। तबादलित कर देता है। वैसे ही प्रकृति भी मनमौजी है। पानी मांग रहे थे लेव पानी। जी भर पानी। हर तरफ़ पानी ही पानी। याद आ गयी नानी। अब न कहना हमने करी बेमानी।

२०० सौ लोग निपट गये बाढ़ में। पौने दो लाख घर बह गये। सर्वांग सुन्दरी प्रकृति को कौन सुनाये ये शेर बशीर साहब का घुमा-फ़िराकर:

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
आप हिचकती नहीं इत्ते घर बहाने में।

उधर इंडोनेशिया में तबाही में न जाने कित्ते लोग मर गये। तबाही के न जाने कित्ते मंजर। लोग कह रहे हैं इंडोनेशिया के नये चुने गये राष्ट्रपति ही अभिशप्त हैं। पुराना रिकार्ड रहा हैं उनका अभिशप्त होने का। प्रकृति ने पुरानी रिपोर्ट देखकर थमा दिया एक ठो और भूकंप इंडोनेशिया को। लेओ थामो।

कमरे से बाहर निकले तो देखा तो कुदरत यहां तो मेहरबान है। खुला-खिला आसमान है। कुछ देर देखा, कुछ देर निहारा। जित्ता देख पाये देखा बाकी थोड़ी देर में देखने के लिये कहकर गाड़ी का पंक्चरित पहिया खोलने में जुट गये।

पहिया खोलते समय कुछ देर यह सोचने में लगायी कि जोर ऊपर लगायें या नीचे। नहीं समझ में आया तब बारी-बारी से दोनों तरफ़ लगा दिया। फ़िर जब देर हो गयी तो जिधर लगाना था उधर ही लगाते हुये बोल्ट के कस-बल ढीले कर दिये। इस बीच यह भी सोच डाला कि कहीं नट जाम तो नहीं हो गये। जाम हो गये तो एक और झाम। बड़का बच्चा भी इस बहाने याद आया। पढ़ने न गया होता तो भला ये समय देखना पड़ता। दो घंटे बाद खुलता लेकिन पहिया उसी से खुलता।

पंचर बनाने वाले ने बताया कि टायर अब वरिष्ठ टायर हो गया है। इसके तार निकल आये हैं। ये ट्यूब को काट देता है। कटखना हो गया है। मैंने सोचा। क्या वरिष्ठ की नियति/परिणति कटखना हो जाना ही है। यह सोचा गया कि पड़ा रहेगा अब स्टेपनी में कुछ दिन बदले जाने के पहले।

पंक्चर बनवाने के दौरान केदारनाथ सिंह का लेख पढ़ा। उन्होंने शरद कालीन समय में लिखी कविताओं का जिक्र किया था। एक थी- फ़ूल खिले,खिले फ़ूल।इसके अलावा कुमुदनी का जिक्र करते हुये भी एक कविता थी। लेख पढ़ते ही हमारे तथाकथित दिमाग में तड़तड़ कुछ पंक्तियां बिना मे आई कम सर कहे घुस गईं और फ़ड़फ़ड़ करते हुये उल्टे पैरों वापस हो गयीं। जो समझा हो उन्होंने लेकिन बिना पूछे आईं और बिना बताये चली गयीं। शायद वे हमारी बेबहर इमेज से बाकिफ़ हो गयीं हों अकल-दरवज्जे में घुसते ही।

लौटते में देखा कि एक कौआ कड़क्को सा खेलने वाले अंदाज में एक पैर और फ़िर दूसरे पैर पर उचक रहा था। उचकते-उचकते शायद वह थक गया या फ़िर बोर गया। क्योंकि थोड़ी देर में सरपट दोनों पैरों पर भागता चला गया। इससे मुझे लगा कि उचकने के लिये भले ही एक पैर पर आप उचक लें लेकिन सरपट भागने के लिये दोनों पैरों में तालमेल होना आवश्यक है।

घर लौटकर देखा तो दो मोरनियां ऊपर-नीचे दो तारों पर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिशा में मुंह किये बैठीं थीं। शायद दो मोरनियां भी आपस में एक-दूजे को पसंद न करती हों। पक्षियों में समलैंगिकता जैसी बात तो होती नहीं कि वे बेसबब आपस में ही एक-दूजे के लिये होकर निहार-क्रिया में जुटी रहें। वैसे यह हो सकता है कि वे आपस में पक्की सहेलियां हों और आपस में मिलकर किसी पंखधारी मोर का इंतजार कर रही हों। मैं इधर देखती हूं तू उधर को ताक स्ट्रेटेजी के तहत वे एक-दूसरे के विपरीत मुंह किये बैठी हों। शायद मोर के काव्यात्मक स्वागत के लिये पंक्तियां भी गढ़ रही हों:

तुम कौन सी शाख के मोर हो जी, इत आये कितै से कितै को धाये हो,
पंख तो बढ़िया झकास धरै हो जी, मनो कोई साबुन नया सा लगाये हो,
आओ नगीच पे बैठ के बताओ जी, काहे को इत्ता बेवजह हकबकाये हो,
कछु हाल कहो, कछु चाल चलो जी, काहे को हमसे शरमाये हुये हो।

आगे की पंक्तियां अंतरग होने और निजता के उल्लंघन से बचने के लिहाज से हम यहां नहीं दे रहे हैं। वैसे कुछ लोग शाख का कापीराइट उल्लू के साथ होने की बात कहकर कहें कि मोर की जगह उल्लू कहने की जिद करें। लेकिन अब किसी की जिद का क्या किया जाये। लोग तो कुछ भी जिद कर बैठते हैं। करने के बाद जिस चीज के लिये जिद करते हैं उस तक को बैठा देते हैं। आप तो ऐसे नहीं हैं न!वैसे अगर हैं भी तो कोई गलत बात नहीं- अपनी चीज की तरफ़दारी करना सहज बात है।

शाम को पत्नीश्री को भेजने स्टेशन गये। उनकी एक सहेली मिली। साथ में उनका बच्चा और गुरुजी। बाद में पत्नीश्री बता रहीं थीं कि गुरुजी उनको बता रहे थे कि उनके पति उत्ती उमर के नहीं लगते जित्ती उमर के वे बता रही थीं (कुछ ज्यादा लगते हैं)। शायद उनका कहने का आशय रहा हो कि वे उतनी उमर की नहीं लगतीं जितनी कि वे हैं। कम लगती हैं। वैसे मैंने अक्सर देखा कि जब भी बात उमर की चलती है तो हमारे मन में या तो कोई डंडी मार दुकानदार बैठ जाता है जो घट-गिनती करता है या फ़िर कोई ग्वाला जो सामने वाले की उमर नापते समय कुछ उमर-दूध घाते के रूप में डाल देता है। सही हो या गलत लेकिन मामला असलियत से दूर रखने का मजा ही कुछ और है। :)

कुल जमा हजार से पार अक्षर हो गये। इसी तरह गिनते रहे तो देर नहीं लगेगी और हो जायेंगे दो हजार पार। इसलिये फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर कभी। जल्दी ही।

मेरी पसन्द

ब्लाग जगत में कवितायें तमाम लोग लिखते हैं। कविताओं पर बहुत कम लोग लिखते हैं। लेकिन ऐसे लोगों की कविताओं के बारे में और कम लोग लिखते हैं जिनकी रचनायें महत्वपू्र्ण होते हुये पाठकों तक पहुंच नहीं पाती। देहरादून के हमारे साथी विजय गौड़ इस कमी को पूरा करने का प्रयास करते हैं। मैंने विजय गौड़ से अनुरोध किया है कि वे ब्लाग जगत में लिखी जा रही कविताओं के बारे में भी कभी-कभी लिखा करें। विजय गौड़ के बारे में विस्तार से फ़िर कभी! फ़िलहाल आज विजय गौड़ के माध्यम से ही प्रदीप कांत की ये रचना आपको पढ़वा रहे हैं। दूसरी रचना आप विजय गौड़ के ब्लाग पर ही पढ़ सकते हैं।

सुकुमार बाला

स्कूल जाते
बच्चे के बस्ते में

चुपके से डाल देता हूं
कुछ अधूरी कविताएँ

इस विश्वास के साथ
कि वह
पूरी करेगा इन्हें
एक दिन

विजय कांत

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

31 Comments

  1. सिद्धार्थ जोशी

    अब सोच रहा हूं हर शाख पर मोर बैठा हो तो अंजामे गुलिस्‍तां क्‍या होगा? :)

  2. रवि

    क्या बात है! जीवन इसी का नाम है. आसपास को तटस्थ नजरों से तौलना…

    पुनश्च – आपके ब्लॉग पर (भी) विज्ञापन देख कर भला लगा…

  3. दिनेशराय द्विवेदी

    आप की जबरिया पोस्ट का आनंद लिया।

  4. विवेक सिंह

    फुरसतिया: दादी माँ अब हम भी विज्ञापन वाले हो गए हैं !

  5. Saagar

    आप ब्लॉग जगत के एक सहेजने वाली संपत्ति हैं… विरासत, मुझे लगता है हमें ऋणी होना चाहिए आपका, साथ ही सिर्फ वैसा नहीं है जैसा आप लिखते है, कई सतहें हैं… गहरायी से सोचता हूँ तो आप खुद एक महागाथा लगते हैं…, गुरु भी…

    कविता लाजवाब है… शुक्रिया…

  6. dr anurag

    कुदरत से छेड़छाड़ .प्रकति का अपने मतलब के लिए दोहन …अगली प्रलय का जिम्मेवार आदमी ही है जी…खैर जाने दीजिये .आप कहेगे हम हर जगह सीरियस हो जाते है …..
    हमारे यहां भी कई मरीजो की उम्र तीस से पैतीस से बीच कित्ते सालो से अटकी पड़ी है …कभी कभार कोई उसे धकेलने की कोशिश करता है तो धमका दिया जाता है ….खैर आज की पोस्ट की बाबत कई सवाल है दिमाग में …मसलन ….बशीर बद्र की जो टांग आपने तोडी है जी…मसलन नीचे जो फोटू देकर आप परिचय छापे है …मसलन इधर बाए हाथ में दो तें विज्ञापन जो है..

  7. ताऊ रामपुरिया

    बहुत लाजवाब जी. मोरनियों के दिल का हाल फ़ुरसतिया निगाहे ही ताड सकती हैं?:)

    बहुत लाजवाब लिखा, बहुत आनंद आया, शुभकामनाएं.

    रामराम.

  8. वन्दना अवस्थी दुबे

    वैसे दक्षिण भारत जैसा हाल यहां भी किये है बारिश. शहर की नालियां (नदी तो यहां है नहीं) खतरे के निशान से ऊपर बह रहीं हैं. अभी भी मूसलाधार बारिश हो रही है. आम तौर पर पक्षी नाराज़ से ही बैठे रहते हैं , पर कवित्त बहुत बढिया है.

  9. kavita

    Nirpechh bhav se chalte rahe, yahee jeevan hai.
    Think Scientific Act Scientific

  10. कार्तिकेय

    ये दिल माँगे मोर…

  11. चंद्र मौलेश्वर

    खुला-खिला आसमान है। कुछ देर देखा, कुछ देर निहारा।

    और बाद में हवा उतर गई – वरिष्ठ टायर को मुंह लटकाए देख कर:)

    और हां, महिलाएं झूठ नहीं बोल रहीं जब वे अपनी उम्र कम बताती हैं……क्योंकि वे ईश्वर से सदा यही दुआ मांगती है “मेरी उम्र भी इन्हें लग जाय” :) परसों करवा चौथ है… सभी सुहागिनों को शुभकामनाएं॥

  12. कुश

    आओ नगीच पे बैठ के बताओ जी, काहे को इत्ता बेवजह हकबकाये हो,
    कछु हाल कहो, कछु चाल चलो जी, काहे को हमसे शरमाये हुये हो।

    इन दोनों पंक्तियों को तो १०० लम्बर

    बाकी विजय गौड़ जी बढ़िया लिखेले है..

  13. संजय बेंगाणी

    विज्ञापन से सौ रूपये मासिक आय नहीं होती. कितनी हो सकती है यह जाँचने के लिए विज्ञापन लगाया था, मगर मैं निराश नहीं हूँ. आप भी डटे रहें. आखिर इस राह अर हिन्दी ब्लॉगिंग को निकलना ही है. अच्छा कदम.

  14. seema gupta

    तुम कौन सी शाख के मोर हो जी, इत आये कितै से कितै को धाये हो,
    पंख तो बढ़िया झकास धरै हो जी, मनो कोई साबुन नया सा लगाये हो,
    हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा रोचक और मजेदार ये तो आप ही लिख सकते हैं हा हा

    regards

  15. मैं, दिल धक्क से..


    २०० सौ लोग निपट गये बाढ़ में ..

    तक पढ़ लिया जी ।

  16. Shiv Kumar Mishra

    सुन्दर लेख. बधाई. विज्ञापन की बधाई अलग से.

  17. arvind mishra

    जिस कौवे को आपने देखा वह पानी से भीगा था -उड़ नहीं पा रहा था -छुपने के लिए भागा था -साहित्यकारों को ऐसे वर्णनों और खासकर निष्कर्षों को लेकर बहुत सावधान रहना चाहिए !
    मोरनियों की फोटो नहीं लगाई आपने -ऊपर तो नर मोर बैठा है !

  18. Rashmi Swaroop

    ”लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
    आप हिचकती नहीं इत्ते घर बहाने में।”

    so sad na, sir ?
    aapki pasand behad khoobsurat hai.

    :)

  19. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    स्कूल जाते
    बच्चे के बस्ते में

    चुपके से डाल देता हूं
    कुछ अधूरी पोस्टें

    इस विश्वास के साथ
    कि वह
    पूरी करेगा इन्हें
    एक दिन

    और ठेलेगा
    अपने ब्लॉग पर!

  20. अभय तिवारी

    चऊचक अहै!

  21. mahendra mishra

    तुम कौन सी शाख के मोर हो जी, इत आये कितै से कितै को धाये हो,
    पंख तो बढ़िया झकास धरै हो जी, मनो कोई साबुन नया सा लगाये हो,

    अनूप जी
    पढ़कर आनंद गया. बहुत सुन्दर रोचक प्रस्तुति.
    आभार

  22. बवाल

    आदरणीय फ़ुरसतिया जी,
    क्या कनेक्शन बिठा के बात पेश करते हो सर, आप। मालिक ऐसा लेखन और लेखन की समझ सबको दे। आज न जाने क्यों उदास मन से मगर आपके लिए दुआ के साथ !

  23. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'

    मैंने सोचा। क्या वरिष्ठ की नियति/परिणति कटखना हो जाना ही है-इसमें सोचने जैसा बचा क्या है. :)

    विज्ञापन का क्या रेजेल्ट निकला-आगे कभी जरुर बताईयेगा.

    विजय कांत जी कविता बहुत गहरी है और आपकी मोर मोरनी वाली चौचक. बधाई.

  24. shefali pande

    कहीं पढ़ा था –
    देखो तूफ़ान आ गया
    प्रकृति को भी आन्दोलन भा गया …..

  25. anil kant

    आपका बात कहने का अंदाज़ बहुत अच्छा लगा

  26. अजित वडनेरकर

    अभी तो सिर्फ विज्ञापन देख कर और क्लिकिया कर ही जा रहे हैं।
    लेख शाम को पढ़कर फिर टिपियाएंगे।
    चलेगा?

  27. venus kesari

    कई दिन के बाद आपको पढना पड़ा,,,, जी हाँ आप जब लिखते है तो मन मार के पढ़ लेना हमारी नियति है :)
    वैसे आप पूछ सकते है किया दिन के बाद क्यों ?

    तो अब क्या कहें लम्बी कहानी है
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    “एक महीने से नेट का मू नहीं देख पाए ठ ”
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    बस जी यही कहानी थी

    क्या पता आपने महीने भर में कुछ लिखा भी है,,,, नहीं कल देखा जायेगा

    जय राम जी की

    आपका वीनस केसरी

  28. रंजना

    खरी कुरकुरी बातों का खूब आनद लिया….

    सही कहा ,कभी तो बिन पानी सब सून था और अब पानी में सब गुम हो गया..

  29. गिरिजेश राव

    पानी जब बेपानी किया जाता है तो ऐसे ही पनियाता है। पानी के पानी पर एक पानीदार कविता प्रस्तुत है। थोड़ी संस्कृताहिन है लेकिन समझ माँ आ जावेगी। निराला जी लिखन हैं: (अभी हाल की एक पोस्ट में देखा आई मीन नकल कर ठेला था, फिर दे रहा हूँ।)

    “..शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़
    जल राशि राशि पर चढ़ता खाता पछाड़
    तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
    दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष ..”
    _________________________
    कौवा और मोर पर कछु कहूँगा तो आप और बिद्वान जन कहेंगे कि देखो कउवा मोरों के आगे नाचने की कोशिश कर रहा है। मैं एक और मुहावरे के पैदा होने का कारण नहीं बनना चाहता।

  30. काजल कुमार

    ब्लागों पर कविताएं तो बहुत होती हैं पर सही बात है रोकने वाली विरले ही मिलती हैं…सुंदर रचना बांटने के लिए आभार.

  31. प्रदीप कांत

    मुझे विजय भाई ने कहा तो था कि आपकी कविता इस ब्लाग पर डाली गई है – पर मैं इसे आज खोज पाया -

    - प्रदीप कांत

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