
चिठेरा-चिठेरी काफ़ी दिन बाद मिले थे। आपस में बातचीत करने के पहले उन्होंने एक-दूसरे की असलियत पहचानने के लिये पहले से तय पासवर्ड वाक्यों का आदान-प्रदान किया।
चिठेरी:उधार प्रेम की कैंची है!
चिठेरा:यह प्रेम के रिश्तों को काटती ही नहीं संवारती भी है।
चिठेरी:आज नकद कल उधार!
चिठेरा:इसी लिये हम पहले ही ले गये यार।
चिठेरी:धर्म वह है जो धारण करने योग्य है!
चिठेरा:बाकी लड़ने भिड़ने के काम आता है।
चिठेरी:अनामी ब्लागर को कैसे पहचानें!
चिठेरा:उसको सम्मानित करने की घोषणा करके उसकी फ़ोटो मंगायें। खतरा यह भी है कि एक मंगाओगे दस भेजेंगे।
चिठेरी:कविता क्या है?
चिठेरा:अपनी बात को एक लाइन में सीधे-सीधे न लिख पाने पर तमाम लाइनों में गोलमोल भाषा में लिखने की बकैती का नाम कविता है।
चिठेरी: अरे वाह! आखिर् हमने एक-दूजे को पहचान ही लिया। कहां गायब रहे इतने दिन?
चिठेरा: अरे मत पूछो! समझ लो भूमिगत रहना पड़ा पिछले माह।
चिठेरी: क्यों तुमने क्या किसी की भैंस खोल ली थी जो छिपना पड़े।
चिठेरा:नहीं! लेकिन डर था कि कहीं कोई पकड़ के नोबले प्राइज न थमा दे।
चिठेरी: वाह, ऐसे किसी की गुंडागर्दी है जो तुमको कोई नोबले प्राइज थमा दे। हमारे रहते किसी की ऐसे हिम्मत। मैं उसका ब्लाग नोच लूंगी जो ये हरकत करने की कोशिश करेगा।
चिठेरा:अरे चिठेरी तेरी सब बातें ठीक हैं। लेकिन जब इन लोगों ने अमेरिका के राष्ट्रपति को नहीं बक्शा जिसका लोहा दुनिया मानती है तो हम कौन चीज् हैं! इनका कोई भरोसा नहीं किसी को भी पकड़ के सम्मानित कर सकते हैं। इनके मुंह लगने से कोई फ़ायदा नहीं। अपनी इज्जत अपने हाथ होती है। इसीलिये मैं इतने दिन भूमिगत रहा। अगर मैं सावधानी नहीं बरतता तो क्या पता क्या अनहोनी घट जाती। कोई पकड़ के नोबल प्राइज थमा देता।
चिठेरी: अरे लेकिन ऐसे कौन तुमको सम्मानित कर सकता है?
चिठेरा: कैसे क्या जैसे बेचारे ओबामा को कर दिया। इत्ती कम उमर में बेचारा कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। बेचारा सफ़ाई देते घूम रहा है कि वो इस लायक नहीं लेकिन लोगों ने इनाम थमा दिया। अब अमेरिका के राष्ट्रपति की कोई औकात तो होती नहीं जो इसके अलावा कुछ कह सके। झेलना पड़ेगा उसको। बैठे ठाले एक आफ़त।
चिठेरी: लेकिन तुमको किस बात के लिये दे देते नोबल इनाम? क्यों डर रहे थे?
चिठेरा:अरे कोई भरोसा है? कह देते कि बढ़िया बवाल जयी लेखन करते हो। अनंत संभावनायें हैं। लेव थामो साहित्य का नोबल इनाम। या फ़िर कह देते चिठेरी-चिठेरे में कहा-सुनी न करके विश्व शांति की दिशा में अद्भुत काम किया है। ये संभालो शांति का नोबल इनाम।
चिठेरा: हां ये बवाल तो हैं। ओबामा बेचारा अभी दस दिन पहले बैठा था कुर्सी पर और लोगों ने भेज दिया था उसका नाम। अपने बचाव का प्रयास तक नहीं कर पाया। दुनिया बड़ी जालिम है।
चिठेरी: लेकिन वो मना भी तो कर सकता है न!
चिठेरा: अरे बेचारा डरता होगा। लोग उसको बदतमीज कहेंगे। उसकी राजा-बेटा की छवि खराब हो जायेगी। मिला तो उसकी आफ़त। लौटाये तो आफ़त। लौटाये तो उससे कम काबिल को मिलेगा तो उसका भी दोष इसी पर आयेगा। भले आदमी की हर तरफ़ से मरन है।
चिठेरी: सो तो खैर है। और कुछ लिखा क्या आज?
चिठेरा: हां लिखे हैं। देखो। एक ठो कविता जिसको हम कक्षा चार या पांच में पढ़े थे। कविता चांद की अपनी अम्मा से फ़रमाइश के बारे में थी। उसई कविता को घुमा-फ़िरा के लिखे हैं।
चिठेरी: ये तुम घुमा-फ़िरा के लिखना कब छोड़ोगे? चलो सुनाओ अच्छा।
चिठेरा: लेव सुनो। सुना तो रहे हैं लेकिन डर लग रहा है कि कहीं कोई साहित्य का नोबल पुरस्कार न थमा दे।
चिठेरी: अरे तुम मस्त रहो। हमारे रहते तुम्हारे साथ कोई नाइन्साफ़ी नहीं कर सकता।
चिठेरा: सच चिठेरी तुम कित्ती अच्छी हो। ये लो कविता सुनो अब।
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सटकर बैठा चांद एक दिन करने दो अब मुझे मोहब्बत
मेरे नाम पे कितने ही जोड़े काला अक्षर जिनको भैंस बराबर वे भी इलू-इलू चिल्लाते हैं।
उमर हो रही मेरी भी अब किसी सुन्दरी के चक्कर में पड़ सबसे ऊंचा आशिक कहलाऊंगा।
बिना प्रेम के सड़ी जिन्दगी शांत-शांत से गुजर रहे दिन मन में खड़बड़-खड़बड़ होती है।
लोग कहेंगे इस चंदा ने रूखे-सूखे दिल वालों में प्रेम बीज पनपायें हैं।
लेकिन खुद न प्रेम कर सका मिला किसी से नहीं आज तक नहीं उठाया किसी का नखरा।
इसलिये सुनो मम्मी अब तुम इश्क मोहब्बत में जो होता है वह सब अब मैं फ़रमाऊंगा।
मम्मी बोली सुन मेरे बच्चे तेरी बातों से लगता है अब तू सच्ची में पगलाया है।
युग बीते मैं बस रही तरसती गला फ़टा है तो क्या बेटा हल्ले-गुल्ले में सब दब जायेगा।
कन्या के संग इधर-उधर तू तेरी और बुराई छिप जायेंगी बस मजनूंपन का हल्ला होगा।
कन्या कैसी चाहिये तुझको अभी फ़ाइनल कर लेते हैं अखबार में विज्ञापन दे दो।
दो दिन में न्यूज छपेगी दो दिन में फ़िर छांट-छूंटकर तेरे लिये कुड़ी-चयन कर दूंगी।
लड़की लड़की जैसी हो बस जब शरमाना तो हड़काये औ हड़काने के मौके पर शर्माती हो।
एस.एम.एस.करना आता हो झूठ बोलने से गुस्साती हो पर बोलने पे हल्के से लेती हो।
मम्मी अब क्या तुम्हें बताऊं पहला प्यार का मामला है मैं बतलाऊं क्या कैसे तुमको। |
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मम्मी जी ने खबर भेजवाई अनगिन सारे बायोडाटा आये अनगिन ने मारा सवाल का छापा।
लड़के की लम्बाई क्या है लड़का लड़की के साथ रहेगा या मम्मी का हांजी-हांजी है।
बात दहेज की भी फ़रिया लें वैसे तो हम सब कैश ही देंगे क्या कुछ काइंड में चल जायेगा।
लड़की जींस पहनती है पर अपने सारा अल्हड़पन क्या लाये साथ या यहीं दफ़ना ले?
जैसे आप कहेंगी वैसे ही नहीं पटेगी गर लड़के से अपना मुंह सिल निभायेगी।
लेकिन भैया लड़के की सूट सिलाना है दूल्हे का पक्का करना है दर्जी से।
ऐसे भी रिश्ते आये थे लड़के को उस तरफ़ जाना था उसकी ऐसी-तैसी पक्की थी।
दो बार मिलेगा मम्मी से धीमे-धीमे से मुस्काना है हफ़्ते में दुइऐ बार चहकना है।
ससुराल को स्वर्ग समझना है मम्मी की याद करी अगर समझो रिश्ते पर गाज गिरी।
मम्मी ने जब चंदा से पूछा बोला मम्मी तुम क्या करती काहे मोरा व्याह कराय रही।
हमने कन्या की बात करी शादी की न अभी उमर मेरी न कोई इच्छा व्याह करन की।
अभी मुझे आवारा फ़िरने दो कन्या की भी तुम चिंता छोड़ो मैं खुद जुगाड़ कुछ कर लूंगा।
कुश की शादी में जाऊंगा बात करूंगा हौले-हौले उनके दिल में जा बैठूंगा।
इस तरह खोजकर कन्या कोई चाहे कुछ भी करना पड़ जाये लेकिन मैं मजनू बनकर हीमानूंगा।
मम्मी ने ली उसकी बलैयां चांद गया फ़िर ड्यू्टी पर अपनी खिला-खिला सा उस दिन घूमा। |
कविता खतम करके चिठेरे न जब आंखें खोली तो चिठेरी जा चुकी थी। उसकी एक चिट पड़ी थी। उसमें कविता की तारीफ़ और अगली बार मिलने पर पूछे जाने वाले पासवर्ड लिखे थे। चिठेरा डरा हुआ है कि कहीं चिठेरी उसके लिये कोई साहित्यिक इनाम की साजिश न करने गयी हो। दुनिया में किसी का कोई भरोसा नहीं है जी।









इधर हमारी खुद की शादी अटकी पड़ी है और आप उसमे दुसरो की सेटिंग करवा रहे है.. हम तो आपको राजा बेटा समझे थे पर आप तो बड़े वो निकले..
“उसका ब्लाग नोच लूंगी’-
हे भगवान अब ब्लाग नोचा नोची न शुरू करा दें आप !
रचना जी का आह्वान तो नहीं है यह ?
वृथा न जाई देव ऋषि बानी !
और कविता का तो क्या पूंछना
मस्त मस्त ही है पूरी फुरसतिया मार्का
बाल बोध और काल बोध से संपृक्त !
अनूप जी,
पहले ब्लॉगिंग का ओसामा बिन लादेन ढूंढते हैं…नोबेल के लिए उससे अच्छा नाम और कौन होगा…
कविता दिल की गहराई तक असर करने वाली है…
जय हिंद…
@कुश ,खुद नहीं ये महराज खुद अपनी ही सेटिंग में हैं -सावधान रहना भाई !
शादी में एक दुई ठो लोगों को इनके पीछे लगाये रहना !
पहली बार इतनी लम्बी कविता लिखे हो महाराज..कहीं नोबल सम्मान की चक्कर में तो नहीं? चिठेरी तो है ही जुगाड़ फिट करवाने के लिए..इस बार काम हुआ ही समझो.
बढ़िया है जी। बेचारे चांद का बेड़ा भी पार लगे।
बहुत आनन्द आया ………..
कविता भी कमाल की………
बधाई !
कविता सुन
भई चिठेरी नाराज
ये क्या लिख लाए
बुरी बुरी सी कुछ बात
जब तक हम हैं दुनिया में
दाल तुम्हारी गलने न देंगे
बात किसी से चलाई तुमने
सबक करारा उस को देंगे
इतना ही कहूँगी कि आपमें प्रतिभा है। इस तरह कविता लिखना आसान नहीं, प्रतिभा न हो तो। फ़ुरसतिया छाप कवितायें, तारीफ़ के योग्य हैं, पर ज़रा संजीदा प्रयास कर के भी देखें, अच्छा लिखेंगे आप।
कितनी लम्बी कविता के लिये पुरुस्कार तो होना ही चाहिये लो जी हमारी तरफ से ब्लाग शान्ति पुरुस्कार आपको दिया जाता है। मगर हमारा ब्लाग ही न कोई नोच ले। शुभकामनायें
भाई फुरसतियां जी,
अब मुझे समझ में आ रहा है कि अमेरिका ने चांद को क्यों फोड़ डाला? वहाँ पानी ढूंढ रहे हैं। चाँद बेचारा यहाँ प्यार ढूंढ रहा था और उसके पीछे से वार कर दिया। आपकी कल्पना अच्छी लगी। नोबेल पुरस्कार का इंतजार कीजिए, हर बरस ही आता है यह मौका, कब तक बचेंगे?
अफ़्सोस…. नोबल इस बार तो गया हाथ से….. चिठेरे को डरने की कोई जरुरत नही है.:)
रामराम.
अरे बाप रे बाप !!!!!!!!! एक दिन की क्लास में इतने पाठ याद कर लिए ? हंसते हंसते बुरा हाल है ……..”नोबेल पुरस्कार” का डर………………हद हो गई अनूप जी ! कहाँ तक पहुँच गए श्रीमन !
साहित्य के नोबुल की एक कटेगरी ब्लॉग की भी जोड़ दी गई है आप को नामांकित किया जा रह है . अब आप भाषण तैयार रखे जो आप को पुरूस्कार के बाद कहना है . लेकिन यह बात कनाडा नहीं पहुचनी चाहिए गारंटी खत्म हो जायेगी .
ओ तेरी के… दिमाग है की खेत… ? फिर मिटटी कौन सी है … दोमट ? हाँ यही होगा तभी तो… इ हाल है ! वैसे बेक ग्राउंड में गीत भी सुनायी दे रहा है… “तौबा तेरा जलवा… तौबा तेरा प्यार “… और कुश की ” टेल मी- टेल मी हाउ डिड यू डिच मी ?”
बहुत खूब !
नोबल से ओबामा की तरह डर लगता हो तो इतना बढिया-बढिया मत लिखा करिये ।
चांद को अनमैरिड ही रहने दीजिए वरना प्रेमी – प्रेमिकाओं का दिल टूट जायेगा ।
भले आदमी की हर तरफ़ से मरन है।।
सही कहा, इसीलिये हम भी जियादह नहीं लिखते। लेकिन कहाँ बिचारे एक सनातन संस्कृति के देवता को लप्पेबाजी में अटका रहे हैं। सुन्दरी के चक्कर में कपड़ा फाड़े, दाढ़ी बढ़ाये जब नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे भटकेंगे तब इज्जत का कतई फालूदा ही हो जायेगा।
एक और बात पर शक़ हो रहा है। कहीं इस करवा चौथ पर चलनी के पार कोई भा तो नहीं गई! घोर कलयुग है….
बहुत बढिया प्रस्तुति। शुरू से अंत तक बांधे रखा।कविता लम्बी है मगर बढिया है। अग्रिम बधाई मजंनू बन ने के प्रयास के लिए:)
‘कुश की शादी में जाऊंगा
कुछ सुमुखि सुंदरियां देखूंगा
बात करूंगा हौले-हौले
उनके दिल में जा बैठूंगा।’
-वाह !चाँद की ख्वाहिशें!
–काश !ओबामा को मालूम होता की हिंदी ब्लॉग जगत में उन के नोबल पुरूस्कार के कितने चर्चे हो गए..
-लिखने का यह अंदाज़ भी निराला है.
-’चिठेरे -चिठेरी ‘कितने प्यारे नाम और उनका यह प्रसंग..वाह!
नतमस्तक !
सादर नमन!
बहुत शानदार. बाकी का कमेंट परमजीत जी से copy- paste कर लें. बहुत सही फ़रमाया है उन्होंने. हमारी भी बधाई.
शुक्र है हम भूमिगत हैं हम पर कोई खतरा नहीं है
कविता अच्छी लगी. टिप्पणी कर दी है, पढ़ेंगे कल.
आशा है स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के लिए स्वर्ग में नींद की गोलियाँ तो कविता छपने से पहले ही भिजवा दी गयी होंगी ।
विवेक जी की टिप्पणी अनूप जी की पोस्ट पर ऐसे आई है..जैसे ‘सब्जी में तड़का ‘ लग गया हो!
इत्ती लम्बी कविता…ऊ तो दो कॉलम में लिख मारे हैं नहीं तो देख के फूट लेते की फुर्सत में पढेंगे
आप काहे पुरस्कार के पीछे पड़े हैं जी…पिच्छली बार भारत रत्न, इस बार नोबल…और फिर से इस बार कुश को लपेटा है कविता में. चिठेरी का तो पता नहीं, हमको तो लगता है कुश की अवार्ड वालों से जरूर कोई सेटिंग है
कोडिंग की बात गज़ब है जी…मज़ा आ गया.
हम पूरी कोशिश करेंगे कोई न कोई अवार्ड दिलवाने की आपको
चिठेरी-चिठेरा संवाद पढ़ कर आनंद आ गया…चाँद की कविता जो उसने अपनी माँ को सुनाई, भी जोरदार लगी…
नीरज
आनंद आया
अरे, चाँद एक फाइनल फ़िनिश तो मार लेने देते,
पहले ही कनपुरिया हाथ मार दिया, मूडी होने की हद है !
मैंने नोबल लौटा दिया कि, नोबल के श्राद्ध का पँडा हम न बनेंगे ।
रहा सवाल बोलागिंग का तो, हमसे बड़े बड़े लोग बईठे कीबोर्ड ठोंकि रहे हैं ।
कमेटी वाले रिसियाय गये, कहे कि ब्लॉगिंग के धोखे में तुम लोग साहित्य ठेले दे रहे हो,
असलियत अब सामने आयी है । जब यही है तो नकली शाँति के नाम पर हमको ज़बरई अशाँत रखने के ठेकेदार राष्ट्रपति क्या बुरे हैं ?
चाँद ने जो पानी इकठ्ठा करके रखा है वह क्या शादी के लिए तैयारी है क्या?क्या कविता है. मन प्रसन्न हो गया. साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार की घोषणा तो नहीं हुई अभी?
सुनते है एक ठो पुराने नोबेल …भीखू हलवाई के बराबर वाली गली के पीछे बैठे कबाडी के यहां भी रखे है …इधर जब भी कोई सेटिंग वाला पुरस्कार देना होता है .फोटू खिचवा के वापस पहुंचा दिया जाता है ….तारीख पहले से बतानी होती है …वर्ना फिर मुश्किल होती है ….
आपकी कविता मैराथन दौड़ में शामिल हो गयी है…
कविता पर बकैती वाली बात जम गयी जी. हमारे होस्टल में होने वाली एक प्रतियोगिता का नाम बकैती हुआ करता था (है!). और कविता पर तो नोबेल प्राइज़ तो पक्का समझो आप, नोमिनेशन भेज देता हूँ मैं. कुछ हिस्सा इधर भी दे दीजियेगा
एक आईडिया आया है!
क्यूं ना हम तीन कालम मे ही लिखा करें .. बीच वाले मे विज्ञापन की पट्टीयां ठूंस दिया करेंगें!
बधाई हो जी …
अब हिन्दी ब्लॉग मंडल में आप ही कविवर उपाधि से पूजे जायेंगें
बढिया प्रणय वार्ता रही इस बार
” इस तरह खोजकर कन्या कोई
मैं अब लव करके ही मानूंगा
चाहे कुछ भी करना पड़ जाये
लेकिन मैं मजनू बनकर हीमानूंगा। “
सारी खुदाई एक तरफ ….कनपुरियों की लगाईं – बुझाई एक तरफ
चिठेरा और चिठेरी का वाद संवाद बहुत अच्छा लगा..और आपकी यह कविता चाँद वाला तो दिल जीत लिए बचपन में कुछ ऐसी ही एक कविता पढ़ी थी आज आपने अलग अंदाज में प्रस्तुत किया..बहुत अच्छा लगा..बधाई
ajee ye to meree kahaa sunee hai aapne chithere ke naam se chhap dee
………………………………………….
gaayab to ham hi the ek maheene se………..
कविता के भाव अच्छे है..बीच बीच में कविता बहर से बहक जाती है… नायक चंद्रमा का ध्यान अपनी शादी से ज्यादा लैमारी में है और माता, माता हो कर भी ये पाने असमर्थ है… वह चाँद की लैमारी को ना समझते हुए अपनी बहू लाने का सपना पूरा करने में लगी हुई है…! कविता के इस मोड़ पर आने के बाद नायक चंद्रमा की दशा भारी संवेदना जगाती है। पाठक बेचैन हो उठता है किसी भी तरह चंद्रमा को विवाह के बंधन से बचा कर लैमारी के रास्ते पर डालने को…! और ऐसे में अचानक कवि अनूप शुक्ला द्वारा क्लाइमेक्स पर चंद्रमा की माँ का चाँद के मनोविज्ञान को समझते हुए उसकी बलायें लेते लैमारी की परिमशन देना कविता में एक अलग ही आनंद पैदा करते हैं और कविता सुखांत को प्राप्त होती हुई पाठकगण को हर्षित करती है।
कवि अनूप शुक्ला की इस कविता को नोबेल तो नही मगर ओवेल पुरस्कार अवश्य दिया का सकता है क्योंकि कविता भी ओवेल शैप की है और जगह जगह लुढ़क गई है।
अनूप भाई,
आपका गद्य आपके तथाकथित पद्य से अधिक सशक्त और प्रभावशाली।
एक सामयिक विषय पर सार्थक व्यंग्य के लिये बधाई!
सादर
परसों से आ रहा हूँ…टिप्पणी जा ही नहीं रही है।
पहले तो चिठेरी-चिठेरे संवाद ने अपने कटाक्ष से मौज ला दिया…और फिर इस अद्भुत थीम पर इतनी लंबी रचना…ऊपर मानोशी जी की बातों से मैं भी सहमत हूँ, देव। उधर मोबाइल पर आपके सुनाने का अंदाज़ भी निराला था।
…और मेल में जो गुहार लगायी है मैंने, तनिक उस पर तव्वजो दी जाये!
बचपन की पढ़ी “हठ कर बैठा चाँद….. झिंगोला ” वाली कविता का यह कायांतरण बढिया है,
आप मस्त मौज लेते रहिए |
कुश की चिंता वाजिब है, ध्यान दिया जाए |
I liked it. So much useful material. I read with great interest.
हमने समझा कुंजीपटल में फिसलन से “कुछ” की जगह “कुश” हो गया टाईप ..पर इधर तो बाते कुछ और है
फ़ुरसतियाji
सुख, समृद्धि और शान्ति का आगमन हो
जीवन प्रकाश से आलोकित हो !
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
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ताऊ किसी दूसरे पर तोहमत नही लगाता-
रामपुरियाजी
हमारे सहवर्ती हिन्दी ब्लोग पर
मुम्बई-टाईगर
ताऊ की भुमिका का बेखुबी से निर्वाह कर रहे श्री पी.सी.रामपुरिया जी (मुदगल)
जो किसी परिचय के मोहताज नही हैं,
ने हमको एक छोटी सी बातचीत का समय दिया।
दिपावली के शुभ अवसर पर आपको भी ताऊ से रुबरू करवाते हैं।
पढना ना भूले। आज सुबह 4 बजे.
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
हे! प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई-टाईगर
द फोटू गैलेरी
महाप्रेम
माई ब्लोग
SELECTION & COLLECTION
to chanda mama chale maami to dhundhne… badhiya hai !
सबकुछ गजब है !!!!!!
bahut fursat se likhte hain aap ………..sachmuch fursatya hain
सोचे थे कि कविता फ़ुरसत मे पढ़ेंगे जब पढ़ना शुरू किया तो बस जी पढ़ते चले गए। क्या ख़ूब कविता है।
भैया !
एकदम निजी शिल्प तलाशे
हौ …
ई सब तौ ” फुर्सतियै ” मा
ह्वै सकत है …
सुक्रिया … …
ओह ये सूक्तियां कई सदियां लेट हो गईं…
आशा है अब तक चाँद की प्रार्थना पर पर्याप्त गौर दिया गया होगा..सो फ़ुल-चाँद की प्रत्यक्ष गवाही मे खालिस कनपुरिया इश्टाइल मे होली पर हफ़्ते भर के रंग के डब्बों के साथ साल भर की शुभकामनाओं का फ़ुल ऎडवांस पेमेंट स्वीकार्य होने की पावती दी जाय