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By फ़ुरसतिया on December 4, 2007
मुंबई ब्लागर मिलन में अनिल रघुराज का गीत सुनकर अद्भुत आनंद आया। इस गीत के संदर्भ में अपने मामा डा.कन्हैयालाल नंदन का आत्मपरक लेख याद आ गया। इस लेख में उन्होंने अपने उन दिनों की याद की थी जब उनकी संवेदना को उनके गुरू डा.ब्रजलाल वर्मा संवार रहे थे। उन्होंने लिखा था- मैं हाई स्कूल [...]
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By फ़ुरसतिया on November 26, 2007
हमारी माताजी तो अक्सर कोई न कोई गीत गुनगुनाया करती हैं। बहुत दिन पहले उनके द्वारा गाई एक लोरी रिकार्ड की थी। आज उसे खोज रहा था लेकिन सोचा कि इसकी वीडिओ रिकार्डिंग क्यों न की जाये। बस फिर क्या, हमारे छोटे सुपुत्र के हाथ में मोबाइल था और धूप में बैठी कुछ काट रही [...]
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By फ़ुरसतिया on November 23, 2007
हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के इतवार का एक आकर्षण होता है उर्मिल कुमार थपलियाल की लिखी हुयी सप्ताह की नौटंकी। पिछले इतवार के कुछ अंश देखे जायें- नटी:आधा बीत गया नवंबर। नट: मुआ मुकद्दर। मरा सिकन्दर। नटी:सत्ता बन गई मोटा अजगर। नट: क्या कहन। भई क्या कहने। नटी: कपटी पहने संत का चोगा। नट: सारे भोगी [...]
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By फ़ुरसतिया on November 17, 2007
दो दिन पहले अपने जनमदिन का बहाना लेकर ज्ञानजी ने ब्लागरों के खिलाफ़ प्रथम सूचना रपट टाइप कुछ लिखाया और बताया कि ब्लागर लोग उनका वह बदल देने पर तुले हैं जिसको अंग्रेजी में ‘पर्सोना’ कहते हैं। उन्होंने अपने इस रूपानतरण को बयान करते हुये कहा- समझ में नहीं आ रहा कि अपने में सिमटा [...]
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By फ़ुरसतिया on November 13, 2007
कानपुर के गीतकारों में अंसार कंबरी ऐसे गीतकार हैं जिनकी आवाज वर्षों से जस की तस मधुर बनी हुई है। वे कहीं भी कविता पढ़ें उनके चाहने वाले श्रोता उनसे उनके बेहद प्रसिद्ध गीत तुम कुछ कहो तो सही को सुनने के लिये फ़रमाइश अवश्य करते हैं। यह गीत मुझे भी पसंद है परन्तु इसमें [...]
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