बस यूं ही

…और ये फ़ुरसतिया के छह साल

…..और मजाक-मजाक में छह साल निकल लिये! पूरी शराफ़त से !एक , दो ,तीन , और चार और पांच को रास्ता देकर। अपने पहले पांच साल के अनुभव ऊपर की लिंकों में दिये हैं मैंने। उनको कम ही लोग पढ़ेंगे लेकिन दोहराना भी क्या? पाठक समझदार होता है! उसको बबुआ नहीं समझना चाहिये। जबरिया लिखना [...]

…एक बेमतलब की पोस्ट

1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। 2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते [...]

…स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें

१.वे लिख रहे हैं कवितायें जैसे जाड़े की गुनगुनी दोपहर में गोल घेरे में बैठी औरतें बिनती जाती हैं स्वेटर आपस में गपियाती हुई तीन फ़ंदा नीचे, चार फ़ंदा ऊपर* उतार देती हैं एक पल्ला दोपहर खतम होते-होते हंसते,बतियाते,गपियाते हुये। औरतें अब घेरे में नहीं बैठती, आपस में बतियाती नहीं, हंसती,गपियाती नहीं स्वेटर बिनना तो [...]

कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग

कवि और लेखक अपनी बात कहने के लिये उपमा/रूपक का सहारा लेते हैं। फ़ूल सा चेहरा, झील सी आंखे, हिमालय सी ऊंचाई, सागर सी गहराई, मक्खन सा मुलायम, चाकू सा तेज, कल्पना का घोड़ा। इस तरह से बात समझने में आसानी होती है। पढ़ा/सुना/देखा/सोचा और बात समझ में आ गयी। जिस चीज को किसी ने [...]

बरसात, बचपन,वजीफ़ा और मित्रता दिवस

दो दिन से टेलीफोन गड़बड़ाया था। बरसात के चलते हुआ होगा शायद। बरसता पानी घुसा होगा गढ्ढे में और अंधेरे में तार को जकड़ लिया होगा तन्वंगी नायिका समझकर। अब वहां उनको बरजने टोंकने वाला तो कोई है नहीं। जुटे हैं अकेले में। टेलीफ़ोन खराब हो, बिजली जाये उनकी बला से। उनको तो अपने से [...]