By फ़ुरसतिया on August 3, 2009
[आज डा.अमर कुमार, डा.समीरलाल और ज्ञानगुरु ज्ञानजी ने पत्नी महिमा का दबे-छुपे वर्णन किया है। ऐसे में हम एक बार फ़िर कह रहे हैं जो हम ठीक दो साल ग्यारह महीने पहिले कह चुके हैं कि पतियों को अपनी असलियत का अन्दाजा होना चाहिये। उनको पता होना चाहिये कि पति सिर्फ़ एक आइटम होता है।] [...]
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By फ़ुरसतिया on January 28, 2007
[परसाईजी के लेखों की श्रंखला में आज पेश है उनका प्रसिद्ध व्यंग्य लेख- पहिला सफेद बाल। इस लेख में जो यौवन की परिभाषा परसाईजी ने बतायी है वह मुझे खासतौर पर आकर्षित करती है-यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; [...]
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By फ़ुरसतिया on January 26, 2007
[आज गणतंत्र-दिवस है। इस मौके पर मैंहरिशंकर परसाईजीका लिखा अपनी पसंद का एक लेख पोस्ट कर रहा हूं- ठिठुरता हुआ गणतंत्र। यह लेख मुझे कई कारणों से पसंद है। आज के मौके पर जब समाजवाद की बातें भी होनी बन्द हो गयीं हैं और भूमंडलीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था के हल्ले में समाजवाद की आवाजें मध्यम हो [...]
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By फ़ुरसतिया on April 21, 2005
मैं आमतौर पर खुशमिज़ाज इंसान के रूप में बदनाम हूं.किसी किसिम की चिरकुट-चिंता से मुक्त.पर कभी-कभी कुछ-कुछ होने लगता है.क्या होता है बताना मुश्किल है. पर ‘ट्राई’मारने में क्या हर्जा ? जब कभी मैं अपने तकनीकी वीरों को खुल्लमखुल्ला तकनीकी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते देखता हूं तो अफसोस होता है कि मैं उनको बूझने लायक [...]
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By फ़ुरसतिया on April 5, 2005
हम आज फजलगंज से घर की तरफ आ रहे थे-सपत्नीक.सामने से से एक सांड आता दिखा.आता क्या -भागता सा.मेरे मुंह से अचानक निकल – स्वामीजी यहां कैसे.पर वह सांड सीधा था,बिना रुके ,उचके भागता चला गया. यह हायकू (संक्षिप्त) दर्शन हुये आज सांड के.हायकू कविता पढ़ी आज स्वामीजी की.जो हायकू कविता सबसे पहले मैंने सुनी [...]
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