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	<title>फुरसतिया&#187; जिज्ञासु यायावर</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>हादसे राह भूल जायेंगे</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Jan 2009 02:51:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूंज]]></category>
		<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
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		<category><![CDATA[सूचना]]></category>
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		<description><![CDATA[पिछली पोस्ट पिछले साल लिखी थी। १९ दिसम्बर को। इस बीच साल निकल गया। न जाने कित्ते शुभकामना सन्देशों का आदान-प्रदान हो गया। कई उधारी में पड़े हैं। सबके जबाब देने हैं। रोज सोचते हैं आज लिखेंगे, कल लिखेंगे। लिख नहीं पाते। कोई नाराज होगा तो मना ही लेंगे। यही विश्वास आलस्य को बढ़ावा देता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SWVqO3tEIlI/AAAAAAAAANE/jQTwWnQsINQ/s1600-h/25122008417.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SWVqO3tEIlI/AAAAAAAAANE/jQTwWnQsINQ/s320/25122008417.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288750141120193106" /></a>पिछली पोस्ट पिछले साल लिखी थी। १९ दिसम्बर को। </p>
<p>इस बीच साल निकल गया। न जाने कित्ते शुभकामना सन्देशों का आदान-प्रदान हो गया। कई उधारी में पड़े हैं। सबके जबाब देने हैं। रोज सोचते हैं आज लिखेंगे, कल लिखेंगे। लिख नहीं पाते।  कोई नाराज होगा तो मना ही लेंगे। यही विश्वास आलस्य को बढ़ावा देता है।</p>
<p>साल खतम होने के पहले जबलपुर जाना हुआ। समीरलाल समधी बन गये। अब उनके ब्लाग के पाठक और बढ़ गये। सुना है समीरलाल जी ने यह करार किया है कि समधियाने वाले लगातार उनके ब्लाग पर टिपियाते रहेंगे।  बहरहाल, जबलपुर कथा फ़िर कभी।</p>
<p>पुराना साल जब बीत रहा था तब आखिरी दिन ऐसा लगा कि जित्ता काम बाकी है सब इसी साल निपटा लिया जाये। काफ़ी देर तक दफ़्तर में रहे भी। साल बाय-बाय करने को उतावला सा हो रहा था। हमने सोचा उसको गाना-ऊना सुनाया जाये। दो ठो सोचे भी-एक तो सोचा कि सुनाया जाये &#8211; <strong>हम तुमको चाहते हैं अईसे/मरने वाला जिंदगी चाहता हो जईसे।</strong></p>
<p>लेकिन सोचा कि इसमें पोयटिक लोचा न हो जाये। जा तो ससुर वो रहा है और मरने की बात हम अपने लिये करें। और यह भी हो सकता है वो पलट के डांट दे, प्रमोदजी की तरह- <strong>अरे हम त खाली जा रहे हैं, मर कौन ससुर रहा है। हम तो धांस के रहेंगे यादों में, ख्बाबों में, किताबों में और न जाने किधर-किधर। तो ई सब रोना-गाना बन्द करो। आई से -जस्ट स्टाप। कहौ वो और अंग्रेजी छौंकने के मूड में हो तो डैम इट भी कह दे।</strong></p>
<p>लिहाजा गाना स्थगित हो गया। गले की मौज। लेकिन कहां का आराम। खाली दिमाग शैतान का धर। फ़िर दूसरा गाना उचका दिमाग में। सोचा गाया जाये- <strong>अभी न जाओ छोड़ के कि दिल अभी भरा नहीं।</strong> लेकिन पुराने साल ने इसको भी भाव नहीं दिया। बोला साल भर इधर-उधर फ़ुट्ट-फ़ैरी करते रहे और अब आये हो नाटक करने। हमको कोई निर्दलीय विधायक समझ लिया है जो सरकार बनाने के गठबंधन में शामिल हो जायें। हम जा रहे हैं। अलविदा बोले तो कुश की दस्विदानिया। </p>
<p>और साल चला गया- <strong>मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग</strong>  को मुझसे भी बेसुरी आवाज में गाते हुये। हमें फ़िर लगा कि हमसे बेसुरा गाना वाले अकेले समीरलाल ही नहीं हैं और लोग भी हैं दुनिया में। और भी गवैये हैं मुझसे बेसुरे ज्यादा! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>हम भी पुराने साल को विदा कर दिये। पहिले तो कि सोचा गुस्से में कहें- <strong>चल। जा। भाग।  बड़ा आया महबूब कहीं का। </strong> लेकिन फ़िर सोचा गुस्साने से कौन जाड़ा कम हो जायेगा। और फ़िर झटके में <strong>माई फ़ुट</strong> टाइप की अंग्रेजी गाली भी टपक पड़ेगी और कोई ब्लागर रोमन में टिपियाते हुये कहेगा- <strong>आपको शरम नहीं आती हिंदी के ब्लागर होते हुये भी अंग्रेजी में गाली देते हैं। अपनी भाषा को इत्ता कमजोर समझते हैं। जबकि आपको अच्छी तरह पता है कि गिनती, गाली और गन्दा लतीफ़ा अपनी मादरी जबान में ही मजा देता है।  </strong></p>
<p>हम यह भी विचार किये कि गाली-गलौज का काफ़ी रियाज साल के आखिरी में हो ही चुका है ब्लागजगत में तो अब इस पर क्या सर खपाया जाये। सो हम छोड़े दिये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>इसीलिये हम कुच्छ नहीं बोले पुराने साल से। जाने दिये। वह चला गया। हम मुंह ढंक के सो गये। सोचते हुये- <strong>जो आया है सो जायेगा, राजा , रंक , फ़कीर!</strong></p>
<p>नया साल शुरू हुआ। हम मुंह ढंक के सोते रहे। अब नया साल कोई ब्लागर तो है नहीं कि झट से उसके आते ही उसके ब्लाग पर पहुंचे और स्वागत टिपियायी करते हुये कहें- <strong>कृपया अपने ब्लाग वर्ड वेरीफ़िकेशन हटा लें।</strong> इसमें भी गलती हो सकती है और लिख सकते हैं- <strong>कृपया अपना ब्लाग हटा लें।</strong> फ़िर तो जो होगा सो आप भी समझ सकते हैं। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  </p>
<p>नये साल में दफ़्तर ले दनादन, दे देनादन वाले अंदाज में नये साल को मुबारक किया गया। पिछले साल का आखिरी दिन और नये साल का पहिला दिन ऐसे ही चला जाता है। अच्छा किये कि ये शेर नये साल के पहिले नहीं पढ़ा गया-<br />
<strong>उम्रे दराज मांग कर लाये थ चार दिन,<br />
दो आरजू में कट गये, दो इंतजार में।</strong><br />
अगर नये साल के मौके पर पढ़ा जाता तो  आरजू और इंतजार के हिस्से का एक-एक दिन नये और पुराने साल का गठबंधन फ़िरौती के रूप में वसूल के अपने कब्जे में कर लेते।</p>
<p>नये साल में तमाम लोग तमाम वायदे करते हैं अपने से। इस साल ये करेंगे , वो करेंगे। कोई बोला बेहतर मनुष्य बनेंगे। अब बताओ कैसे हम ये कहें। जिस रास्ते जाना नहीं उसके कोस गिनने का क्या फ़ायदा? हम जैसे हैं वैसे ही नहीं रह पा रहे हैं, बेहतरी कहां से लायेंगे।</p>
<p>पिछले साल के सारे वायदे इधर-उधर हो गये। कोई पूरा नहीं हो पाया। सब मुंह बिराते हैं। इसलिये कोई वायदा नहीं किया हमने। कोई का कल्लेगा? छठे वेतन आयोग में वैसे भी वायदे करने पर कोई अलाउन्स नहीं मिलना है। वहां कहा गया है- वायदा नहीं काम चाहिये।  <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p> हमारे लिये पिछला साल बड़ा दुखद और दुर्घटना प्रधान सा रहा। हमारे बड़े भाई <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=384 ">साथ छोड़ गये</a>। याद आती है तो आंसू पहले आते हैं। अभी भी लगता है कि वे कहीं गये नहीं हैं। आयेंगे लौट के। सच तो यह है कि पिछले कई दिन उनकी याद में ही मन भारी रहा। मन नहीं किया कुछ करने का। </p>
<p>और भी तमाम कष्ट रहे लेकिन सब ठिकाने लग गये धीरे-धीरे। जो नहीं लगे हैं लग जायेंगे।</p>
<p>ब्लागिंग की दुनिया में तमाम अनुभव रहे। मजेदार ही रहे मेरे लिये तो। खराब कोई नहीं रहा। लेकिन मुझे कुल मिलाकर ऐसा ही लगा कि यह अभिव्यक्ति का माध्यम है और जित्ती बुराइयों की बात लोग कहते हैं उससे कहीं अधिक अच्छाइयां हैं इसमें। अब यह इसका प्रयोग करने वाले पर निर्भर है कि कैसे इसे लेता है। </p>
<p>शाहजहांपुर में हमारे एक कर्मचारी टेलर का काम करते थे। वजीर  अंजुम। फ़ैक्ट्री में थे। डायबिटीज के मरीज थे। धांस के शक्कर डाल के चाय पीते थे। एक बार हमारे घर में जमावड़ा हुआ तो उन्हॊंने बड़े तरन्नुम में सुनाया-<br />
<strong><br />
मैं अपना सब गम भुला तो दूं ,<br />
कोई अपना मुझे कहे तो सही<br />
हादसे राह भूल जायेंगे,<br />
कोई मेरे साथ चले तो सही।</strong></p>
<p>जब उनसे पहली और आखिरी  बार सुना था उसके कुछ समय बाद  वे हमेशा के लिये चले गये। लेकिन उनकी हौसला देती आवाज अब भी सुनाई देती है।</p>
<p>हमारे मामाजी एक शेर पढ़ते हैं:<br />
<strong>जब मुसीबत पड़े और  भारी पड़े,<br />
तो कोई तो एक चश्मेतर चाहिये।</strong></p>
<p>नये साल में आपके और आपके साथ जुड़े लोगों के दिन खुशनुमा बीतें। आपका अपने पर विश्वास बना रहे यही कामना है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/566" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2160/2150890145_1b93f5c407_m.jpg" alt="मृत्य जिजीविषा से बहुत डरती है" title="मृत्य जिजीविषा से बहुत डरती है" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/566" rel="bookmark" class="crp_title">मृत्य जिजीविषा से बहुत डरती है</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/570" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SW6hw9oz0aI/AAAAAAAAANg/-HAxFj9654E/s320/IMG_1605.JPG" alt="जबलपुर के कुछ और किस्से" title="जबलपुर के कुछ और किस्से" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/570" rel="bookmark" class="crp_title">जबलपुर के कुछ और किस्से</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/613" rel="bookmark"><img src="http://lh3.ggpht.com/_gonR097kmxE/SeiuTxxTHUI/AAAAAAAAF3k/y3RL2kOQfms/New%20Rickshaw_thumb%5B14%5D.jpg?imgmax=800" alt="मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका" title="मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/613" rel="bookmark" class="crp_title">मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/612" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SgoyTpqcKyI/AAAAAAAAAQo/9HsX4GbW8gA/s320/08052009645.jpg" alt="होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा" title="होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/612" rel="bookmark" class="crp_title">होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/568" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SWwKoRknK7I/AAAAAAAAANM/iKeg7aN_lqQ/s320/25122008435.jpg" alt="अथ बारात कथा" title="अथ बारात कथा" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/568" rel="bookmark" class="crp_title">अथ बारात कथा</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>बाल दिवस पर ज्ञान दिवस</title>
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		<pubDate>Fri, 14 Nov 2008 01:25:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>
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		<description><![CDATA[पिछले शनिवार को एक दिन के लिये इलाहाबाद जाना हुआ। हमारे कालेज में जो लोग १९८३ में पास आउट हुये उनका रजत जयन्ती मिलन समारोह था। हम १९८५ में कालेज-बाहर हुये लेकिन जान-पहचान के लोगों से मिलने के मोह ने हमको बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बना दिया। कालेज गये वहां तमाम पुराने जाने-पहचाने लोगों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:left; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/1968851770/" title="ब्लागर परिवार"><img src="http://photos1.blogger.com/x/blogger2/7695/1009087037506125/211/z/62280/gse_multipart38329.jpg" alt="ब्लागर परिवार" /></a></div>
<p>पिछले शनिवार को एक दिन के लिये इलाहाबाद जाना हुआ। हमारे <a href=" http://www.mnnit.ac.in/">कालेज</a> में जो लोग १९८३ में पास आउट हुये उनका रजत जयन्ती मिलन समारोह था। हम १९८५ में कालेज-बाहर हुये लेकिन जान-पहचान के लोगों से मिलने के मोह ने हमको बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बना दिया।</p>
<p>कालेज गये वहां तमाम पुराने जाने-पहचाने लोगों की शक्लें बदल जाने के कारण बेगाने से खड़े रहे। फ़िर जब पता चला अरे ये तो वो हैं, अबे तू है, हां हम हैं तो मिलन-जुलन यादों का सिलसिला चला।</p>
<p>शाम को जब मिलन-जुलन से फ़ारिग हुये तो वहीं बगल में  शिवकुटी के पास ज्ञानकुटी में धावा बोला गया। ज्ञानजी  गंगा किनारे जिस इलाके में रहते हैं वह इलाका हमारे कालेज में पढ़ते समय इत्ता भरा-भरा नहीं था जित्ता आज है। उनके घर के आस-पास तमाम घरों के आगे ईटों के चट्टे लगे हुये थे। लोगों ने जमीनों पर कब्जे कर लिये हैं, अब आसमान की बारी है।</p>
<p>ज्ञानजी के यहां पहुंचते ही ज्ञानजी ने सबसे पहले अपने यहां आपातकाल लगाने की कोशिश की। भाभी जी से बोले कि कुछ बोलना मत नहीं तो यह छाप देंगे। हमने बहुत आश्वासन दिया लेकिन ज्ञानजी चुप्पी साधे रहे काफ़ी देर। बाद में जब उनकी तारीफ़ शुरू करी हमने तब ज्ञानजी कुछ खुले। तारीफ़ ऐसा ब्रम्हास्त्र है जो बड़े-बड़ों को घायल देता है। </p>
<p><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SRy53QJwOUI/AAAAAAAAAKM/aFl8LzCPYdw/s1600-h/08112008158.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SRy53QJwOUI/AAAAAAAAAKM/aFl8LzCPYdw/s320/08112008158.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268290022996457794" /></a><br />
तारीफ़ के बाद हमने ज्ञान जी की खूब बुराई भी की। हमने भाभीजी से कहा कि ज्ञानजी आपकी सब खराब-खराब फोटो जान-बूझकर लगाते हैं। आप तो अपनी फ़ोटुओं से बहुत अच्छी हैं। उन्होंने भी इस बात को समझा और महसूस किया। फ़िर ज्ञानजी ने पता  नहीं किस  तरह इस बात को रफ़ा-दफ़ा करने में सफ़लता हासिल की मुझे याद नहीं। याद होगा भी तो बतायेंगे नहीं क्योंकि हमने उनको आश्वासन दिया था कि हम कुछ छापेंगे नहीं।</p>
<p>हमने भाभीजी के लेखन की भी तारीफ़ की और उनको नियमित लिखने को कहा। उनको यह बात ज्ञानजी ने शायद पहले बताई नहीं थी। शायद वो उनको उनके लेख पर आई टिप्पणियां दिखाते नहीं होगे। लेकिन जब एक बार हमने बताया तो उनको असलियत समझ में आ गई और  फ़ट से उन्होंने एक <a href="http://halchal.gyandutt.com/2008/11/blog-post_11.html ">धांसू लेख लिख</a> मारा। आशा है अब वे नियमित लिखती रहेंगी।</p>
<p>ज्ञानजी के ब्लाग चरित्र भरतलाल से भी  दर्शन हुये। और भी बहुत सारी बातें हुयीं। वहीं से <a href=" http://shiv-gyan.blogspot.com/">शिवकुमार मिश्र </a>को चर्चा का आदेश दिया गया। उनकी भी तारीफ़ करी गयी। हमने उनको जहां बताया कि भाभी कह रहीं हैं कि शिवकुमार अच्छी चर्चा करते हैं तो वे टंकियों पर चढ़ने का मौसम होने के बावजूद फ़ौरन पानी पर चढ़ गये। कल चर्चा <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/11/blog-post_5921.html ">कर बैठे।</a> कहा ही गया है कि तारीफ़ आदमी को कहीं का नहीं छोड़ती।<br />
<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SRy6HV1Ia8I/AAAAAAAAAKU/gXGRoyug4AY/s1600-h/08112008160.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SRy6HV1Ia8I/AAAAAAAAAKU/gXGRoyug4AY/s320/08112008160.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268290299398482882" /></a></p>
<p>करीब दो घंटे बातचीत के बाद हम वहां से बिदा हो लिये। शाम को कानपुर वापस। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी , प्रमेंन्द्र और दूसरे ब्लागर साथियों से भी मिलने का विचार था अगले दिन लेकिन एक दिन में ही मन कानपुर वापस आने के लिये हुड़कने लगा। जैसे उड़ि जहाज को पंछी की तरह हम रात एक बजे अपने घर आ गये।</p>
<p>इस ज्ञानचर्चा का उद्देश्य यह बताना भी था कि आज ज्ञानजी का जन्मदिन है। देश भर में बालदिवस मनाया जा रहा है। हम शुरुआत ज्ञानदिवस से कर रहे हैं।</p>
<p>ज्ञानजी के बारे में हम पहले ही काफ़ी कुछ लिख चुके हैं। अब और कुछ लिखेंगे तो उनके डर की पुष्टि होगी और वे कहने लगेंगे- <strong>देखो हम मना कर रहे थे कि कुछ बोलो नहीं वर्ना ये छाप देंगे।</strong></p>
<p>कुछ और लिखने में फ़िर शिकायत करेंगे कि देखो फ़ुरसतिया <a href=" http://halchal.gyandutt.com/2007/11/blog-post_15.html">हमारा पर्सोना बिगाड़े दे रहे हैं।</a></p>
<p>इसलिये सिर्फ़ यही कह रहे हैं -<strong>ज्ञानजी को उनका जनमदिन मुबारक हो। वे स्वस्थ रहें, मस्त रहें। प्रसन्न रहे, टिचन्न रहें। अपने कैमरे का उपयोग करके भाभी जी की अच्छी, नेचुरल फोटो खींचने में करें। मेहनत करके खराब फोटॊ खींचना कोई अच्छी बात नहीं है जी।<br />
</strong><br />
आप यह पढ़कर जिस तरह मुस्करा हैं वैसेइच मुस्कराते रहें बाकी हम देख लेंगे। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  </p>
<h2>ये भी बांच लें:</h2>
<ol>
<li><a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=370 ">ज्ञानजी, जन्मदिन मुबारक! </a></li>
<li><a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=474">ज्ञानजी हिंदी ब्लागजगत के मार्निंग ब्लागर हैं </a></li>
<li><a href="http://halchal.gyandutt.com/2007/11/blog-post_15.html "> मित्रों, आप तो मेरा पर्सोना ही बदल दे रहे हैं! </a></li>
</ol>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/613" rel="bookmark"><img src="http://lh3.ggpht.com/_gonR097kmxE/SeiuTxxTHUI/AAAAAAAAF3k/y3RL2kOQfms/New%20Rickshaw_thumb%5B14%5D.jpg?imgmax=800" alt="मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका" title="मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/613" rel="bookmark" class="crp_title">मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/612" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SgoyTpqcKyI/AAAAAAAAAQo/9HsX4GbW8gA/s320/08052009645.jpg" alt="होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा" title="होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/612" rel="bookmark" class="crp_title">होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/635" rel="bookmark"><img src="http://1.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/ShdXeuOJwNI/AAAAAAAAARs/_hde16nsYcc/s320/08052009667.jpg" alt="इलाहाबाद के सच्चे किस्से" title="इलाहाबाद के सच्चे किस्से" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/635" rel="bookmark" class="crp_title">इलाहाबाद के सच्चे किस्से</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/570" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SW6hw9oz0aI/AAAAAAAAANg/-HAxFj9654E/s320/IMG_1605.JPG" alt="जबलपुर के कुछ और किस्से" title="जबलपुर के कुछ और किस्से" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/570" rel="bookmark" class="crp_title">जबलपुर के कुछ और किस्से</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/568" rel="bookmark"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/SWwKoRknK7I/AAAAAAAAANM/iKeg7aN_lqQ/s320/25122008435.jpg" alt="अथ बारात कथा" title="अथ बारात कथा" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/568" rel="bookmark" class="crp_title">अथ बारात कथा</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>खराब लिखने के फ़ायदे</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 18:27:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूंज]]></category>
		<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
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		<description><![CDATA[1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। 2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।</p>
<p>2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे।</strong>-<a href=" http://hindini.com/fursatiya/?p=269">ब्लागिंग के सूत्र</a></p>
<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;"> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </span><img src="http://farm1.static.flickr.com/86/250235189_bb8fda34f9_m.jpg" alt=" लिखो भाई खराब ही लिखो" /></div>
<p>कल हमने बताना चाहा कि ब्लाग <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=512">ऐसे लिखा जाता है। </a></p>
<p>उस पर मिश्रित प्रतिक्रिया रही। कुछ लोग मुद्दे की बाद छोड़ के वर्तनी की खूंटी से लटक लिये। लिंग परिवर्तन पर चर्चा करने लगे। हम हिन्दुस्तानियों में यही अच्छी आदत है। किसी भी मुद्दे की बात की अनदेखी करने, दायें-बायें करने और किसी भी गाड़ी को पटरी से उतारने  का हुनर हमें अच्छी तरह आता है। हमें लगता है कि अगर कोई हमें जन्नत में ले जाये तो कहो हम कहने लगें- <strong>क्या फ़ायदा ऐसी जन्नत का जहां ससुरी लाइट एक्को मिनट के लिये भी नहीं जाती। </strong></p>
<p><a href="http://raviratlami.blogspot.com/">रवि रतलामी</a> और <a href="http://anuragarya.blogspot.com/">डा. आर्य</a> को भी मजा नहीं आया -<strong>अच्छा , ऐसे लिखते हैं ब्लाग! हमें पता ही न था। अच्छा किया आपने बता दिया।</strong> उनकी बात का हिंदी अनुवाद है- <strong>हुंह बड़े आये हैं हमें ब्लाग लिखना सिखाने वाले।</strong> रवि रतलामी तो यह भी कहते पाये गये &#8211; हुंह! हमसे ही सीखे कि <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2004/blogs.htm">ब्लाग क्या होता है </a> और हमको सिखा रहे हैं कि ब्लाग कैसे लिखा जाता है! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बहरहाल हम इन बातों से बिचलित-विचलित न होते हुये मुद्दे की बात करते हैं। </p>
<p>हमारा आज का मुद्दा है ब्लाग जगत के सुधी पाठकों को खराब लेखन के फ़ायदे बताने का। सुधी पाठक कौन होगा? ये कोई तय नहीं है लेकिन आप भी हो सकते हैं अगर ये लेख बांच लें।</p>
<p>आपने देखा होगा कि ब्लाग जगत में अच्छा लिखने वालों की रेल-पेल मची है। सब अच्छा लिखते हैं, कुछ लोग बहुत अच्छा लिखते हैं, कुछ लोगों की पोस्ट तो हमेशा सबसे अच्छी होती है। वे इत्ते मजबूर होते हैं सबसे अच्छा लिखने के लिये कि अगर उनको कोई सजा देनी हो तो उनसे कहा जाये कि आप एक खराब पोस्ट लिख के दिखाओ। मेरा दावा है कि उनकी हवा खिसक जायेगी। हलक सूख जायेगा। कुंजी पटल लड़खड़ाने लगेगा। हो सकता है वे मिमियाने भी लगें- <strong>भाई मेरे अच्छा लिखता हूं। इसमें मेरा क्या कसूर। सब लोग लिखते हैं। आप हमीं को काहे खराब लिखने के लिये कह रहे हो। इतनी छोटी गलती की इतनी बड़ी सजा न दो।</strong></p>
<p>आप पसीज जाओगे। क्या कहोगे? यही न कि -अच्छा जाओ लिखो। लेकिन खराब लिखने का भी अभ्यास करो। बहुत दिन चल नहीं पाओगे अच्छे लेखन के सहारे।</p>
<p>खराब लिखने के लिये मैं इस लिये कह रहा हूं कि मैं देखता हूं कि ब्लागजगत में खराब लिखने वाले दिखते ही नहीं। शुरुआत से ही लोग अच्छा लिखने के प्रयास में लगे हैं। किसी ने खराब लिखने की संभावनाओं पर विचार ही नहीं किया। भेड़ चाल में अच्छा, बहुत अच्छा, सबसे अच्छा लिखने में लगे हैं।</p>
<p>पहले तो आप बहुत अच्छा और सबसे अच्छा लिखने के नुकसान गिन लें। आपने देखा होगा कि जो लोग सबसे अच्छा लिखते हैं लोग उनके जैसा लिखने की कोशिश करने लगते हैं। आम लोगों में भेड़चाल और नकल की भावना का प्रसार होता है। लोगों में हीनभाव आता है कि -<strong>हाय, हम इत्ता अच्छा काहे नही लिख पाते हैं। </strong></p>
<p>कुछ वाकये तो ऐसे हुये कि जहां किसी ने कुछ ’बहुत अच्छा’ सा लिख दिया तहां कोई उसके चरण छूना चाहता है , कोई कहता है- अपनी कलम दे दो, कोई लेखक के हाथ मांगता है, कोई कहता है- काश ये हुनर हमें भी मिला होता। कोई किसी को कवि सम्राट बता देता है, कोई ब्लाग सम्राट, कोई बादशाह कोई कुछ , कोई कुछ। मतलब जिसके मन में जो आता है वो कहके अच्छा लिखने वाले की तारीफ़ करता है। किसी से देर हो गयी तारीफ़ करने में तो वहीं ऐन ब्लाग के ही ऊपर खड़ा होकर <span style="font-weight:bold;">’टिप्पणी माफ़ी’ </span>मांग लेता है- <span style="font-weight:bold;">माफ़ करना देर हो गयी टिपियाने में।</span> तमाम लोग इस तरह की बातें कह चुके हैं। ब्लाग अभिलेखागार में इसका ब्यौरा मौजूद है।</p>
<p>इस तरह ये सबसे अच्छा लिखने वाले ब्लाग जगत में गुरुडम, सामन्तवाद , अच्छा -बहुत अच्छा ब्लागरवाद फ़ैलाता  हैं। इससे जाने-अनजाने लोगों के आत्मविश्वास में कमी आती है, हीनभावना बढ़ती है। लोग नकलची संस्कृति अपना कर देखा-देखी अच्छा , बहुत अच्छा, सबसे अच्छा लिखने का प्रयास करने में जुट जाते हैं। ये कुछ ऐसे ही है जैसे लोग देखा-देखी दुबले होने के लिये दिन-रात दुबले होते रहते हैं। पेट से पीठ सटाने के लिये हज्जारों रुपये फ़ूंक देते हैं।</p>
<p>एक अच्छी पोस्ट जहां लोगों को चकित, विस्मित और हीनभाव से ग्रसित (हाय हम क्यों न लिख पाये यह) करती है वहीं एक कम अच्छी पोस्ट लोगों में यह विश्वास पैदा करती है कि हम इन लोगों से तो अच्छे हैं। कुछ इस तरह से जैसे कि ओलम्पिक में चीन से पदक की तुलना करने में हीनभाव पैदा होता है लेकिन उन देशों से तुलना करें जो मेडल विहीन वापस गये तो कित्ता मजा आता है। कित्ता हाऊ स्वीट, हाऊ क्यूट लगता है!</p>
<p>इस पर ब्लाग जगत में एक सर्वे भी हुआ। एक बहुत अच्छे ब्लागर के ब्लाग पर एक बहुत अच्छी कविता पोस्ट की गयी। उसमें लोगों की प्रतिक्रियायें आयीं- वाह, बहुत अच्छे, सबसे अच्छे, स्तब्ध हूं पढकर, क्या कहूं शब्द नहीं हैं, ओह क्या लिखा है। मतलब लोगों में उस कविता की अच्छाई को लेकर आतंक का भाव था।</p>
<p>वहीं एक आम ब्लागर के ब्लाग पर एक साधारण सी कविता पोस्ट की। तमाम लोग ने उस पर उससे बेहतर कविता टिपिया दी। मतलब लोगों  के मन में उस साधारण सी कविता ने असाधारण आत्मविश्वास का संचार किया और वे उस कविता से जुड़कर वे (कविता के प्यार में) कवि बन गये। </p>
<p>अच्छा लिखने के मुकाबले खराब लिखने के कुछ सहज फ़ायदे यहां बताये जा रहे हैं।</p>
<p><span style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 3px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 3px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px 0px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 3px solid; WIDTH: 510px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 3px solid"><center><strong>खराब लिखने के फ़ायदे </strong></p>
<div style="border-top: 3px solid #7facde; border-bottom: 3px solid #7facde; margin: 10px; width: 525px; color: green; font-size: 10pt; text-align:left; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 3px; padding-bottom: 3px; float: center;">
<li>खराब लिखने से कोई आपसे ईर्ष्या न करेगा। अगर आप जैसा को तैसा के स्वर्ण सिद्धान्त को मानते हैं तो आप भी इस जंजाल से मुक्त रहेंगे।</li>
<li>आप के ऊपर खामखाह का अच्छा लिखने का कोई दबाब न होगा।</li>
<li>आपके अच्छे लेखन की संभवनायें हमेशा बनी रहेंगी। आप जित्ता अच्छा लिखेंगे उसमें सुधार के अवसर उत्ता ही कम होते जायेंगे। </li>
<li>अगर आप खराब लिखते हैं तो बहुमत भले ही ऊपर से आपके साथ न हो लेकिन लोग आपको अपना जैसा मानते हुये आपके साथ सहानुभूति रखते रहेंगे। अंदरूनी तौर पर आपकी पार्टी का बहुमत होगा।</li>
<li आम तौर पर अच्छा लिखने वालों को मजबूरन अपनी अच्छी पोस्टों का लिंक याद रखना पड़ता है ताकि वे गाहे-बगाहे इधर-उधर ठेल सकें( मैंने भी इस पर एक लेख लिखा था टाइप)। खराब लेखन आपको इन चोंचलों से बचाता है- हमने कोई अच्छी पोस्ट लिखी नहीं ,लिखते ही नहीं जी तो बेकार में अपने दिमाग की मेमोरी इसमें फ़ंसायें! </li>
</li>
<li>ब्लाग जगत में जब किसी को कोसने-उलाहना देने का मन होता है तो सबसे पहले अच्छा लिखने के लिये बदनाम लोगों से शुरुआत होती है। ये मठाधीश हमारे यहां टिपियाते नहीं। अपने को तीसमार खां समझते हैं। खराब लिखते ही आप पर इसका डर खतम हो जाता है।</li>
<li>अगर आप अच्छा लिखते हैं तो लोग आपसे अपना समूह ब्लाग ज्वाइन करने के लिये कहेंगे, लेख मांगेंगे और न जाने क्या-क्या काम बतायेंगे। आप अगर खराब लिखने का अभ्यास कर लेंगे तो इस सब चोचलों से दूर रहेंगे।</li>
<li>अगर आप अच्छा लिखते हैं तो आप एक खराब लिखने वाले के मुकाबले अपने को श्रेष्ठ मानने लगेंगे। आपकी गरदन में बढि़या लेखन स्पांडलाइटिस हो सकता है। गरदन अकड़ी रह सकती है।</li></div>
<p> </center></span></p>
<p>अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो खराब लेखन के बारे में गम्भीरता से सोचिये। आज नहीं तो कल आपको इस तरफ़ आना ही पड़ेगा। जो काम कल करना है वो आज क्यों न करें।</p>
<p>आपको अगर अच्छा लिखने की ही आदत पड़ी है और आप जानते नहीं हैं कि एक खराब पोस्ट कैसे लिखी जाती है तो नमूने के लिये इस पोस्ट से सीख ले सकते हैं। इसी तरह आप और <span style="font-weight:bold;">बेहतर खराब पोस्ट</span> लिख सकते हैं। </p>
<p>खराब लिखना मुश्किल है लेकिन असम्भव नहीं। एक बार सच्चे मन से प्रयास तो करें।</p>
<h2>मेरी पसन्द</h2>
<p>मरने में मरने वाला ही नहीं मरता<br />
उसके साथ मरते हैं<br />
बहुत सारे लोग<br />
थोड़ा-थोड़ा!</p>
<p>जैसे रोशनी के साथ<br />
 मरता है थोड़ा अंधेरा।<br />
जैसे बादल के साथ<br />
मरता है थोड़ा आकाश।<br />
जैसे जल के साथ<br />
मरती है थोड़ी सी प्यास।<br />
जैसे आंसुओं के साथ<br />
मरती है थोड़ी से आग भी।<br />
जैसे समुद्र के साथ<br />
मरती है थोड़ी धरती।<br />
जैसे शून्य के साथ<br />
मरती है थोड़ी सी हवा।</p>
<p>उसी तरह<br />
जीवन के साथ</p>
<p>थोड़ा-बहुत मृत्यु भी<br />
मरती है।</p>
<p>इसीलिये मृत्य<br />
जिजीविषा से<br />
बहुत डरती है।</p>
<p><strong><br />
डा.कन्हैयालाल नंदन</strong></p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/543" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3150/2371194284_835666fc3e_m.jpg" alt="मैं कहीं कवि न बन जाऊं &#8230;" title="मैं कहीं कवि न बन जाऊं &#8230;" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/543" rel="bookmark" class="crp_title">मैं कहीं कवि न बन जाऊं &#8230;</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/533" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2299/2123927026_d7bd8e3aff_m.jpg" alt="बोरियत जो न कराये" title="बोरियत जो न कराये" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/533" rel="bookmark" class="crp_title">बोरियत जो न कराये</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/551" rel="bookmark"><img src="http://1.bp.blogspot.com/_p4fwR-VKt70/SQXH8l-n9sI/AAAAAAAAAro/XLzym0M-UnM/s320/diwali_2.jpg" alt="दीपक से साक्षात्कार" title="दीपक से साक्षात्कार" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/551" rel="bookmark" class="crp_title">दीपक से साक्षात्कार</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/531" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3095/2865689961_825d1f57b0_m.jpg" alt="काम छोड़ो-महान बनो" title="काम छोड़ो-महान बनो" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/531" rel="bookmark" class="crp_title">काम छोड़ो-महान बनो</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/512" rel="bookmark"><img src="http://farm1.static.flickr.com/206/443651596_eecfdf0ab4_m.jpg" alt="ऐसे  लिखा जाता है ब्लाग !" title="ऐसे  लिखा जाता है ब्लाग !" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/512" rel="bookmark" class="crp_title">ऐसे  लिखा जाता है ब्लाग !</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>एक चिट्ठी शिवजी के नाम</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/501</link>
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		<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 03:05:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूंज]]></category>
		<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
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		<description><![CDATA[परम प्रिय भाई शिवजी, अत्र कुशलम तत्रास्तु। दीगर समाचार यह है कि इधर हम छठे पे कमीशन में कित्ते पैसे मिलेंगे, कौन उधार चुकाया जायेगा, कैसे फ़िर से कंगाल हुआ जायेगा ई सब निहायत स्ट्रेटिजिक प्लान बनाने में अरझे हुये थे कि पता चला आप पर जैंटेलमेन की आफ़त आ गिरी। सुना तो ये भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/">परम प्रिय भाई शिवजी</a>,<br />
अत्र कुशलम तत्रास्तु।</p>
<p>दीगर समाचार यह है कि इधर हम छठे पे कमीशन में कित्ते पैसे मिलेंगे, कौन उधार चुकाया जायेगा, कैसे फ़िर से कंगाल हुआ जायेगा ई सब निहायत स्ट्रेटिजिक प्लान बनाने में अरझे हुये थे कि पता चला आप पर <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html">जैंटेलमेन</a> की आफ़त आ गिरी। सुना तो ये भी की आपके पर भी <a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2008/08/blog-post_17.html">निकल आये</a> हैं।</p>
<p>हमने पहले तो सोचा कि <span style="font-weight:bold;">हम भी जैंटेलमैनी मुबारक हो</span> कहते बधाई-सधाई टिका दें काहे से कुछ लोग बोले जेंटेलमैंन माने सभ्य आदमी होता है। लेकिन हमारे कुछ खालिस  कनपुरिया दोस्त, जिनको ई सब चोचलों की ज्यादा जानकारी रहती है, उई सब कहन लगे कि जेंटेलमैन माने सभ्य आदमी आक्स्फ़ोर्ड डिक्शनरी के हिसाब से होता होगा। कनपुरिया शब्दकोश में इसका कुछ औरे मतलब है। हम पूछा सो क्या है गुरुदेव शीघ्र बतायें जानने की तीव्र इच्छा है। </p>
<div style="float: right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;">प्रियंकर-शिवजी</span><img src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SKgYyzyCDPI/AAAAAAAAAHU/7Dq2xROPaLw/s320/DSC02421.JPG" alt=" प्रियंकर-शिवजी " /></div>
<p>गुरुदेव काम भर का नखरा मारकर उवाचे। बोले- जेंटेलमैन शब्द का उद्भव जेंटील से हुआ है। जेंटील से कपड़े धोये जाते हैं। धोया जायेगा तो फ़ींचा भी जायेगा। फ़ींचते-फ़ींचते कपड़ा जब लत्ता (अरे वही जिसके लिये कहा गया- <span style="font-weight:bold;">तन पर नहीं लत्ता, पान खायें अलबत्ता</span>) बन जाता है उसी को जेंटीलमैन कहा जाता है। वही अपभ्रंश होते-होते जेंटेलमैन बन गया। </p>
<p>हमने आदतन एतराज करने का प्रयास किया कहते हुये कि जेंटील इसी जमाने में शुरू हुआ लेकिन जेटेंलमैन तो बहुत दिन पहले से पाये जाते हैं। फ़िर जेटिलमैन और जेटील का जोड़ कैसे हुआ? </p>
<p>इस पर हमको <span style="font-weight:bold;">आदमी हो कि पायजामा</span> कहते हुये बड़े प्यार से समझाया गया- अरे भाई जब पहले जैंटेलमैन होते थे तब जेंटील न था। अब जेंटील है जेंटेलमैन नहीं पाये जाते। लेकिन चूंकि दोनों एक ही जैसे लगते हैं इसलिये इनको  एक ही दल में रहना पड़ेगा इनको। आखिर अनुशासन भी तो कोई चीज होती है! शब्द कोई मौकापरस्त सांसद तो होते नहीं जो जब मौका मिला पलटी मार गये।</p>
<div style="border-top: 5px solid #7facde; border-bottom: 5px solid #7facde; margin: 10px; width: 150px; color: green; font-size: 10pt; text-align: center; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; float: right;">बहुत दिन तक ये जेंटेलमैनी बांध के रख न पायेगी आपको। जैसे चिरई बुद्धि नहीं वैसे ही जैंटेलमैन भी न रहेंगे। रहना भी चाहेंगे तो हम आपको बहुत दिन तक जेंटेलमैनी के जंगल में भटकने न देंगे। </div>
<p>अब आप तो इसे समझ गये लेकिन आप इसे प्रियंकर जी को मत पढ़वाइयेगा। ऊ क्या है कि हम जब भी कोई कायदे की बात कहते हैं तो वे तड़ से <a href="http://anahadnaad.wordpress.com/2006/10/11/poem2-priyankar/">पोयटिक जस्टिस</a> की तलवार लेकर भड़ से तर्क/बात की गरदन उड़ा देते हैं। अभी जो प्रियंकरजी किलकिल च पुलकित  <a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SKgYXc5c9yI/AAAAAAAAAHE/ZpRB_DkOsyM/s400/DSC02417.JPG">कोलगेटिया मुस्कान</a> मारते हुये आपकी तरफ़ निहारते हुये मुस्कराने और खिलखिलाने के पुल पर खड़े हैं वे ही प्रियंकरजी जहां प्रत्यक्षाजी की जेंटेलमैन वाली बात पर सवाल उठते देखेंगे वे फ़ौरन से पेश्तर एक लम्बीईईईईईईईईईईई सी टिप्पणी ठेल देंगे बताते हुये कि अमिधा, लक्षणा,व्यंजना, आनुनासिक-सानुनासिक हिसाब से सुकुल का एतराज खारिज किया जाता है। माने कि पोयटिक जस्टिस के अखाड़े में सुकुल का तर्क चारो खाने चित हो गया। भगवान बचाये इन पी.पी.पी.पी.पी. से (प्रत्यक्षा प्रियंकर पोयटिक पूलिंग पहलवानों ) से।</p>
<p>वैसे भी प्रत्यक्षाजी की बात का ज्यादा गम नहीं करना चाहिये। उन्होंने खुद कहा है- <span style="font-weight:bold;">फिर साबित हुआ कि पहला इम्प्रेशन हमेशा सही नहीं होता ।</span> इसका मतलब है -वे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की मंशा रखती हैं। आपको उन पर भरोसा करना चाहिये। आज वे कह रही हैं तो कल पुनर्विचार कर भी देंगी। <span style="font-weight:bold;">दुख है तो दुख हरने वाले भी होंगे। </span>वैसे तो आप खुदै पर्याप्त समर्थ हो और बहुत दिन तक ये जेंटेलमैनी बांध के रख न पायेगी आपको। जैसे चिरई बुद्धि नहीं वैसे ही जैंटेलमैन भी न रहेंगे। रहना भी चाहेंगे तो हम आपको बहुत दिन तक जेंटेलमैनी के जंगल में भटकने न देंगे। </p>
<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;">प्रत्यक्षा</span><img src="http://photos1.blogger.com/blogger/7517/1065/320/New%20Image.0.jpg" alt=" प्रत्यक्षा " /></div>
<p>जो आपके ऊपर आरोप लगा कि आपने प्रत्यक्षा जी की फोटो काहे नहीं खींची तो आपको संस्कृति वाला दांव लगा देना चाहिये था। कह देते कि प्रत्यक्षाजी भले प्रियंकरजी की मुंह बाये <a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SKgX42u3G7I/AAAAAAAAAG0/r5I-LPNj40E/s400/DSC02414.JPG">जम्हुआई </a> फ़ोटो सटा दें लेकिन वे हमारी मेहमान हैं हमारी संस्कृति हमें इस बात की इजाजत नहीं देती कि हम अपने मेहमान की अलसाई सी फोटो कहीं लगायें।(प्रत्यक्षाजी की अभी तक जित्ती भी फ़ोटो हमने अभी तक देखी सब अलस आलस्य मुद्रा में देखीं। इसीलिये हम बहुत पहले कह भी चुके हैं- <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=356">आलस्य उनका ठिठौना है</a> ) अगर बात संस्कृति से न सलटती तो परंपरा की गोद में बैठ जाते। कह देते कि कलकत्ता में ब्लागर मिलन ब्लागर में ब्लागर की खिंचाई भले की जाती हो लेकिन ब्लागर के फ़ोटो खींचने की परम्परा नहीं है। प्रमाण के लिये <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=279">प्रियंकरजी-फ़ुरसतिया मीट</a> का हवाला दे देते।</p>
<div style="border-top: 5px solid #7facde; border-bottom: 5px solid #7facde; margin: 10px; width: 150px; color: green; font-size: 10pt; text-align: center; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; float: right;">ज्यादा किसी को गरिया के पंगे लेने से क्या फ़ायदा? यहां मोहल्ले वालों का कोई भरोसा नहीं। कब किस बात पर बखेड़ा खड़ा कर दें। और हमारी तारीफ़ ज्यादा मत किया करें भाई। ये ठीक है लेकिन फ़िर भी क्या एक ही सच बार-बार दोहराना?</div>
<p>ई परम्परा वाला हथियार है न उससे आप बालकिशनजी को भी निपटा सकते हैं। जो उन्होंने <a href="http://bal-kishan.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html"> आरोप लगाया </a>कि मिल लिये तब बता रहे हैं। आप उनसे कहते कि यहां ब्लागर मीट करने के बाद बताने की परम्परा है। आपको ही कहां बताये थे प्रियंकरजी कि वे फ़ुरसतिया से मिलने वाले हैं। परम्परा का निर्वाह होना चाहिये और अगली बार कोई बालकिशुन को भी उलाहना देता पाया जायेगा- बताये नहीं अकेले-अकेले बतिया लिये?</p>
<p>बिना सेल टैक्स, खेल टैक्स की एक सौ पचहत्तर रुपये की बोतल के सामने बैठे हुये आप मुस्कराते रहे। आपकी हिम्मत की दाद देता हूं। छा गये गुरु, मान गये आपके जिगरे को। हम जब <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=135">देबाशीष से मिलने गये </a> पूना और चाय के दाम देखे साठ रुपये तो घबरा गये थे। हम साठ रुपये में बोल गये आप एक सौ पचहत्तर झेल गये। वहां डटे रहे आप धन्य हैं। धन्य है वह ब्लागर डाट काम जिसने आप जैसे वीर ब्लागर को जन्म दिया।</p>
<p>आप लोगों ने कुछ लोगों की तारीफ़ की कुछ को गालियां दीं। अब जो हो गया सो गया लेकिन ज्यादा किसी को गरिया के पंगे लेने से क्या फ़ायदा? यहां मोहल्ले वालों का कोई भरोसा नहीं। कब किस बात पर बखेड़ा खड़ा कर दें। और हमारी तारीफ़ ज्यादा मत किया करें भाई। ये ठीक है लेकिन फ़िर भी क्या एक ही सच बार-बार दोहराना?</p>
<p>आपने फोन ज्ञानजी के हाल-चाल जानने चाहे हैं। ज्ञानजी का अब क्या बतायें? वे आजकल हमसे बड़े खफ़ा और खुश दोनों हैं। खफ़ा और खुश एक साथ कैसे हैं आपको अचरज लग रहा होगा लेकिन सच यही है। बताते हैं। </p>
<p>हुआ यह कि दो दिन पहले ज्ञानजी कानपुर आये थे। स्टेशन से बतियाये तो हमने समीरलाल की <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html">वर्षा-पुराण</a> वाली पोस्ट के बारे में जिक्र किया। कहा घर आइये सुनवाते हैं। ज्ञानजी हड़बड़ा के उसे स्टेशनै पर पढ़ लिये। सुने भी। बाद में पता चला कि पोस्ट /पाडकास्ट सुनते ही उनकी तबियत गड़बड़ा गयी और वे चौरी-चौरा से चोरी-चोरी चुपके-चुपके वापस इलाहाबाद निकल लिये।</p>
<div style="border-top: 5px solid #7facde; border-bottom: 5px solid #7facde; margin: 10px; width: 150px; color: green; font-size: 10pt; text-align: center; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; float: right;">दरवाजे पर खटका होते ही न जाने कित्ते निर्बुद्धियों को <span style="font-weight:bold;">आइये-आइये ज्ञानजी</span> कहा तथा आगन्तुक और हम दोनों शर्मिन्दा हुये। हालत यह हुई कि शाम तक शर्मिन्दा होते-होते शर्म का पुलिन्दा बन गये। </div>
<p>हमने शाम तक पलक-पांवड़े बिछाके , झमाझम पकौड़े तलवा के  ज्ञानजी के आने का इंतजार किया। दरवाजे पर खटका होते ही न जाने कित्ते निर्बुद्धियों को <span style="font-weight:bold;">आइये-आइये ज्ञानजी</span> कहा तथा आगन्तुक और हम दोनों शर्मिन्दा हुये। हालत यह हुई कि शाम तक शर्मिन्दा होते-होते शर्म का पुलिन्दा बन गये। शाम को जब फोन किया तो पता चला कि ज्ञानजी इलाहाबाद में बिस्तरगत हो गये हैं।  बार-बार कह रहे थे आपने जानते-बूझते हुये समीरलाल जी का वर्षा-पुराण हमको काहे सुनवाया? हमें क्यों डराया? आप तो ऐसे न थे। </p>
<p>हमने उनकी तारीफ़ करते हुये कहा भी हमने कहा -आप तबियत बहलाने के लिये ब्लागिंग करिये, कुछ पढ़िये। लेकिन ज्ञानजी की नाराजगी बरकरार थी। बोले &#8211; कम्प्यूटर तो फोड़ देने का मन करता है। हमें समझ में आ गया कि वे सोच रहे होंगे काश इस कम्प्यूटर की जगह सुकुल का सर होता तो वे अपने इरादे कार्यान्वयित कर डालते। बाद में एक पोस्ट लिख देते- मित्रों, एक पोस्ट भी आदमी को बहकाने के लिये काफ़ी होती है। बहरहाल!</p>
<p>हमने आगे कहा भी- ज्ञानजी आप अगर हमारी तरह सुनते तो आपका यह हाल न होता और जो आपका तीस-चालीस टिप्पणियों का नुकसान प्रतिदिन हो रहा है सो न होता। ज्ञानजी ने पूछा-किस तरह सुनता? हमने बताया- हम जब भी कोई कविता का पाडकास्ट सुनते हैं, खासकर समीरलाल जैसे महान ब्लागर की जिनकी श्रंगार रस की कविता भी पाडकास्टित होकर रौद्र रस से शुरू होती होकर वीर रस की धरती पर ही टहलती है, तो पहले तो अपने लैपटाप का आडियो पहने न्यूनतम पर कर देते हैं फ़िर उसको ’म्यूट’(आवाज बंद) करके तब सुनते हैं। सबसे बढिया इफ़ेक्ट आता है ऐसे में पाडकास्ट का।</p>
<div style="border-top: 5px solid #7facde; border-bottom: 5px solid #7facde; margin: 10px; width: 150px; color: green; font-size: 10pt; text-align: center; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; float: right;">भाईजी, हम आपकी इज्जत करते हैं क्योंकि उसमें कोई पैसा नहीं लगता। लेकिन हम अपनी पत्नी के जान के दुश्मन भी तो नहीं कि उनको बेबजह इत्ता कष्ट दें। माना कि वे नारी हैं लेकिन हमारी भी तो पत्नी हैं। </div>
<p>रही बात खुशी की तो ज्ञानजी से अगले दिन एक मीटिंग में पूछा गया कि जो नील गाय ट्रेन की पटरियों पर आकर मर जाती हैं और रेलवे ट्रैफ़िक में व्यवधान पैदा करती हैं उनसे बचाव का क्या उपाय है। ज्ञानजी ने फ़ौरन सुझाव दिया कि समीरलाल का पाडकास्ट जगह-जगह बजाया जाये। सुनते ही नीलगाय भाग जायेंगी। ज्ञानजी के सुझाव की टेस्टिंग कर ली गयी है। बस अमल में लाना है। इससे वे हमसे किंचित खुश हैं। </p>
<p>लेकिन शिव भाई, अभी तो ज्ञानजी हमसे आधा-खुश हैं आधा नाराज। लेकिन हम यह सोचकर डरे हुये हैं कि जब यह नीलगाय भगाने का कार्यक्रम होगा तो क्या ट्रेन से यात्री न भाग खड़े होंगे? यह बात ज्ञानजी को कैसे बतायें? हम दुविधा में हैं। </p>
<p>लेकिन अभी एक बात पता चली है। अभी नोयडा-फ़ोयडा, मेरठ-सेरठ में जो हड़ताल-फ़ड़ताल में गोली-सोली चली-वली और उसमें कुछ लोग-सोग मारे-वारे गये तो उसमें हाकिम-साकिम लोगों ने सुझाव-फ़ुझाव दिया है कि लोगों के ऊपर गोली-सोली चलाने-वलाने से अच्छा ये रहेगा कि इसी टाइप के पाडकास्ट-वाडकास्ट चालू कर दिये जायें। जहां जनता-फ़नता बबाल-सवाल करे फ़ौरन चला दो इसी तरह के पाडकास्ट-साडकास्ट- भागिये बारिशों का मौसम है। </p>
<p>पब्लिक फ़ूट लेगी। दुबारा आंदोलन-सांदोलन का नाम न लेगी। ये होगा ब्लागिंग का गांधीवाधी उपयोग। </p>
<p>पाडकास्ट की बात चली तो एक सच्चा किस्सा और सुनाते हैं। हमारे बहुत अच्छे मित्र हैं। वे अपना गाना एक दिन रिकार्ड करके हमको सुनाये। हमने कहा- भाई ई तो बहुत भयानक है। बोले -तुमको गाने की समझ नहीं है। भाभीजी को सुनवाओ, वो इसका मर्म समझेंगे। अब बताओ भैया शिवजी  भाभीजी के कान में कोई छन्नी लगी है और भयानकता कोई चाय की पत्ती जो उनके कान से निकलकर भयावह आवाज मधुरी बानी हो जायेगी। </p>
<p>हमने साफ़ कह दिया- भाईजी, हम आपकी इज्जत करते हैं क्योंकि उसमें कोई पैसा नहीं लगता। लेकिन हम अपनी पत्नी के जान के दुश्मन भी तो नहीं कि उनको बेबजह इत्ता कष्ट दें। माना कि वे नारी हैं लेकिन हमारी भी तो पत्नी हैं। हम उनको कष्ट देकर अपराध बोध सिवा क्या पायेंगे? </p>
<p>अगले दिन पता लगा वे मोहल्ले भर में अपने गाने की सीडी सब भाभियों सुनवा आये। भाभियां अपना सर पकड़े अपने पतियों के फ़ोड़ रही हैं। हमारी पत्नीजी हमको निहारते हुये कह रही हैं- सच, तुम कित्ते अच्छे हो जी। हमारा कित्ता ख्याल रखते हो। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<div style="border-top: 5px solid #7facde; border-bottom: 5px solid #7facde; margin: 10px; width: 150px; color: green; font-size: 10pt; text-align: center; line-height: 100%; font-weight: bold; padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; float: right;">लोग बताते हैं कि समीरलाल बहुत स्लिम-ट्रिम टाइप के थे।  विनम्रता से दोहरे- चौहरे होते-होते छरहरे से शरीर का स्वामी इत्ता भरा-भरा सा हो गया है। इनके अन्दर जो स्वास्थ्य का सागर ठाठे मारता है उनमें सारी की सारी विनम्रता की हवा (नामानुरूप) भरी पड़ी है।</div>
<p> आखिर में यही कहना चाहता हूं कि आप दुखी मत हों। आपको जो जेंटेलमैन की उपाधि दी गयी है उसे आप अपने नाम को चरितार्थ करते हुये अपना कंठहार बनाइये। नीलकंठ इस उपाधि को नीले दांत(ब्लू टूथ) की तरह नये जमाने का उपहार समझिये। यहां किसके ऊपर आरोप नहीं लगे बताइये भला? समीरलाल जी को बेहतरीन ब्लागर का इनाम मिला उन्होंने उफ़ तक नहीं की। विनम्रता पूर्वक ग्रहण किया। बेहतरीन उदीयमान चिट्ठाकार का इनाम मिला- चुपचाप उदय हो लिये। विनम्रता पूर्वक। उनकी विनम्रता भी गजब की है। लोग बताते हैं कि समीरलाल बहुत स्लिम-ट्रिम टाइप के थे।  विनम्रता से दोहरे- चौहरे होते-होते छरहरे से शरीर का स्वामी इत्ता भरा-भरा सा हो गया है। इनके अन्दर जो स्वास्थ्य का सागर ठाठे मारता है उनमें सारी की सारी विनम्रता की हवा (नामानुरूप) भरी पड़ी है। अगर इनके अन्दर से विनम्रता निकाल दो भारतीय किसान की तरह तन्वंगे हो जायें।</p>
<p>और तो और जिन माननीय मैथिलीजी के यहां ब्लागवाणी में रजिस्ट्री कराने के लिये दे मेल पे मेल ठेलते हैं नवागंतुक ब्लागर , उन मैथिलीजी की शुरुआत <a href="http://www.akshargram.com/2007/01/31/586/"> ब्लाग उड़ाका  </a> की मानद उपाधि से हुयी। उनकी सफ़ाई के बाद मामला साफ़ हुआ। आज वे सब उपाधियां भारत के अतीत गौरव की तरह भूली-बिसरी चीज हो गयी हैं। ऐसे ही आपका भी ये अस्थायी पुछल्ला आपके साथ ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला। समय के साथ सब हवा हो जायेगा।</p>
<p>न वो दिन रहे न ये रहेंगे। आप ज्यादा परेशान न हों। भगवान सबका भला देखता है। देखने के अलावा वो बेचारा कुछ कर भी नहीं सकता। जो करना है वो बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कर रही हैं। बाजार कर रहा है। भगवान भी अपने किसी नये एडीशन के आने का इंतजार कर रहा है। आप भी करें। </p>
<p>चिट्ठी पढ़कर फ़ाड़ दीजियेगा। डर लगता है कि न जाने कौन ब्लागर टीप के अपने ब्लाग पर मौलिक पत्र कहकर छाप दे।</p>
<p>बकिया चकाचक है,</p>
<p>आपका शुभाकांक्षी,<br />
फ़ुरसतिया</p>
<h2>संबंधित कड़ियां</h2>
<p>१.<a href=" http://pratyaksha.blogspot.com/2008/08/blog-post_17.html"> ब्लॉगरों में क्या सुर्खाब के पर लगे होते हैं ? </a><br />
२.<a href=" http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html"> कि ब्लॉगर बन गया जेंटलमैन&#8230;. </a><br />
३.<a href=" http://bal-kishan.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html">छुटके से ब्लागर तेरा दरद न जाने कोय </a><br />
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६.<a href="http://udantashtari.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html ">बारिशों का मौसम है&#8230;  </a><br />
७. <a href=" http://anahadnaad.wordpress.com/2006/10/11/poem2-priyankar/">सबसे बुरा दिन </a><br />
८.<a href=" http://hindini.com/fursatiya/?p=238"> ब्लाग चोरी से बचने के कुछ सुगम उपाय</a><br />
९.<a href=" http://hindini.com/fursatiya/?p=205">प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत  </a></p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<div style="float:left; margin-left: 1px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;">प्रियंकर</span><img src="http://farm4.static.flickr.com/3142/2368353672_98d1acce58_m.jpg" alt=" प्रियंकर " /></div>
<p><strong>सबसे बुरा दिन वह होगा<br />
जब कई प्रकाशवर्ष दूर से<br />
सूरज भेज देगा<br />
‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल<br />
यह अंधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा| </p>
<p>पृथ्वी मांग लेगी<br />
अपने नमक का मोल<br />
मौका नहीं देगी<br />
किसी भी गलती को सुधारने का<br />
क्रोध में कांपती हुई कह देगी<br />
जाओ तुम्हारी लीज़ खत्म हुई<br />
यह भारत के भुज बनने का समय होगा|</p>
<p>सबसे बुरा दिन वह होगा<br />
जब नदी लागू कर देगी नया विधान<br />
कि अबसे सभ्यताएं<br />
अनुज्ञापत्र के पश्चात ही विकसित हो सकेंगी<br />
अधिकृत सभ्यता-नियोजक ही<br />
मंजूर करेंगे बसावट और<br />
वैचारिक बुनावट के मानचित्र<br />
यह नवप्रवर्तन की नसबंदी का दिन होगा</p>
<p>भारत और पाकिस्तान के बीच<br />
विवाद का नया विषय होगा<br />
सहस्राब्दियों से बाकी<br />
सिंधु सभ्यता के नगरों को आपूर्त<br />
जल के शुल्क का भुगतान</p>
<p>मुद्रा कोष के संपेरों की बीन पर<br />
फन हिलाएंगी खस्ताहाल बहरी सरकारें<br />
राष्ट्रीय गीतों की धुन तैयार करेंगे<br />
विश्व बैंक के पेशेवर संगीतकार<br />
आर्थिक कीर्तन के कोलाहल की पृष्ठभूमि में<br />
यह बंदरबांट के नियम का अंतरराष्ट्रीयकरण होगा </p>
<p>शास्त्र हर हाल में<br />
आशा की कविता के पक्ष में है<br />
सत्ता और संपादक को सलामी के पश्चात</p>
<p>कवि को सुहाता है करुणा का धंधा<br />
विज्ञापन युग में कविता और ‘कॉपीराइटिंग’ की<br />
गहन अंतर्क्रिया के पश्चात<br />
जन्म लेगी ‘विज्ञ कविता’<br />
यह नई विधा के जन्म पर सोहर गाने का दिन होगा </p>
<p>सबसे बुरा दिन वह होगा<br />
जब जुड़वां भाई<br />
भूल जाएगा मेरा जन्म दिन<br />
यह विश्वग्राम की<br />
  नव-नागरिक-निर्माण-परियोजना का अंतिम चरण होगा ।</strong><br />
 <a href="http://anahadnaad.wordpress.com/ 2006/10/11/poem2-priyankar/ ">प्रियंकर</a></p>
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		<title>कोणार्क- जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Nov 2007 19:06:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।- रवीन्द्रनाथ टैगोर पुरी कथा कहने के बाद हमें अगली पोस्ट में कोणार्क वर्णन करना था। छह माह से भी ज्यादा हो गये वह अगली पोस्ट न लिखी जा सकी। यह होता है यारों का वायदा निभाने का फ़ुरसतिया अंदाज! शाम को हम पुरी की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:left; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www. flickr.com/photos/94063381@N00/1630252572/" title="कोणार्क"><img src="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/images/1236_konark_temple/0125930_konark.jpg" alt="कोणार्क"/></a></div>
<p><strong>कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।- रवीन्द्रनाथ टैगोर<br />
</strong><br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=258">पुरी कथा </a>कहने के बाद हमें अगली पोस्ट में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Konark">कोणार्क </a> वर्णन करना था। छह  माह से भी ज्यादा हो गये वह अगली पोस्ट न लिखी जा सकी। यह  होता है यारों का वायदा निभाने का फ़ुरसतिया अंदाज! </p>
<p>शाम को हम पुरी की एक् धर्मशाला में ठहर् गये। सुबह-सबेरे बस पकड़कर् पुरी से 35 किमी की यात्रा करके कोणार्क पहुंचे। यह  मंदिर  भुवनेश्वर  से 65 किमी दूर  है। कहते हैं कि इसे ईसवीं 13वीं शताब्दी में राजा नरसिंहदेव ने बनवाया था। अपने स्थापत्य और शिल्प के लिए यह मंदिर दुनियाभर में जाना जाता है। यह मंदिर सूर्य देवता का है। मंदिर का नक्शा एक रथ की छवि को ध्यान में रखकर बनाया गया था। सूर्य का रथ यानी सात घोड़ों और बारह पहियों वाला एक विशालकाय रथ।</p>
<p>मंदिर  का सबसे अधिक आकर्षक  पहलू वहां उकेरी गयी मिथुन  मूर्तियां हैं। तरह -तरह  की भाव भंगिमाओं वाली मिथुन  मूर्तियां देखकर लगता है कि आचार्य वात्स्यायन की कामसूत्र का पत्थरों पर  चित्रात्मक  अनुवाद  किया गया है। </p>
<p>हम  जैसे ही वहां पहुंचे हमें वहां के गाइड लोगों ने घेर् लिया। लेकिन हमें देखकर  उनको जल्दी ही अहसास  हो गया कि हम  फोकटिये हैं। यह दिव्यज्ञान होते ही वे हमसे ऐसे दूर गये जैसे चुनाव  के बाद नेता अपने चुनाव क्षेत्र से तिड़ी-बिड़ी हो जाते हैं।</p>
<div style="float:right; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos<br />
/94063381@N00/1844654220/" title="कोणार्क ऊपर हम तीन दोस्त"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2164/1844654220_b77d6e661a.jpg" width="500"height="383" alt="कोणार्क ऊपर हम तीन दोस्त" </a/></a></div>
<p>गाइड से मुक्त होने के बाद हम मुक्त् भाव से मंदिर् का विचरण करने लगे। अब गाइड की फ़ीस कौन भरे। हमारा प्रतिदिन का खर्चा सौ-दो सौ होता था। उतने हम केवल गाइड  को दे दें तो हो चुका भारत  दर्शन।</p>
<p>लेकिन हमने सोचा कि  शकल  से फोकटिया होने का मतलब यह  थोड़ी की अकल  से फोकटिया हो गये। सो हम  जुगाड़ी लिंक की तरह् उन  समूहों के साथ  चलने लगे जिन्होंने गाइड  कर  रखे थे। </p>
<p>गाइडों  ने जैसा बताया उससे ऐसा लगा कि हम् आज् के समय् में कित्ता पीछे हो गये हैं वास्तु में। बकौल् गाइड सूर्य् की रोशनी मंदिर् में मौजूद सूर्य की मूर्ति पर पड़ती थी। मूर्ति नीचे और ऊपर स्थित  चुम्बक की वजह से जमीन और छत् के बीच में स्थित रहती थी। बाद में आक्रमण्कारी लोग चुम्बक निकाल ले गये और् मूर्ति नीचे आ गयी।</p>
<p>सूर्य की रोशनी अन्दर प्रवेश करने के गाइड के वर्णन  से अन्दाजा लगा कि बहुत् उन्नत् व्यवस्था रही होगी उस  समय। </p>
<p>मंदिर् के चारो तरफ़ काम-कला के अनुपम चित्र् पत्थरों पर् उकेरे गये थे। इनमें युगल रति दृश्यों के अलावा कुछ और मिथुन दृश्य भी हैं यानी समूह में और अप्राकृतिक रूप से सहवासरत लोग भी। उन् चित्रों को उस् समय् देखकर् लगा था कि अगर सच् में इस् तरह् के लोग् आज् होते तो भारत् हर् साल् जिम्नास्टिक् में तमाम् पदक बटोर् लाता। क्या-क्या अंदाज् में लोग् काम् पर् लगे हैं। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>आज यह सोचता हूं कि अमेरिका का बहुत् बड़ा व्यापार अश्लील् चित्रों और् फिल्मों का धंधा है। अगर् उन्मुक्तजी मेहनत् करें तो अमेरिका के ऊपर दावा ठोंका जा सकता है कि उसके यहां जितना भी अश्लीलता का धंधा है वह् हमारे यहां के खजुराहो और् कोणार्क की बेतुकी नकल् है। दावा ठोंकते ही उनको अहसास् होगा कि आइडिया चोरी करना इत्ता आसान् नहीं है। पकड़ ही जाता है।</p>
<p>हम् जब् फोटू खींच् रहे थे तो एक् शरीफ़् से लगने वाले भाई साहब् हमारे कैमरे के सामने आने लगे और् हमसे अपनी फोटू खिंचवाने लगे। जो सफ़ेद कपड़े में शरीफ़् से लगने वाले हैं वेवही  भाई जी हैं। उस् समय् भी हम् विदेशियों को ऐसे देखते थे कि गुरू देख लो वर्ना चली गयी विदेश  तो देखते रह् जाओगे। हमने उन् में से एक् का फोटो भी खींच् लिया। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>मंदिर् अब् काफ़ी क्षतिग्रस्त हो गयी है। लेकिन् खंडहर् बताते हैं कि इमारत् बुलन्द् थी। </p>
<p>हमने उस् समय् जो फोटो अपने क्लिक्-III कैमरे से खींचे थे वे वैसे ही आये जैसे आ सकते थे। उनको छोटा करके लगाया तो जगह् तो कम् घिरी लेकिन् वह् मजा न् आया। सो फिर् बड़े ही लगाये गये। शाम को हम् कोणार्क से पुरी वापस् लौट आये।उस् दिन् तारीख थी 18 जुलाई, 1983 |</p>
<p>वह् मेरी पहली कोणार्क यात्रा थी। अब् तक् पहली ही बनी हुयी है। पता नहीं  दुबारा कब् जाना होता है। लेकिन् यह पोस्ट् लिखते समय् चौबीस् साल पहले की तमाम् यादें धुंधली ही सही सामने से गुजर् रही हैं। फोटो भी इसीलिये धुंधली ही अच्छी हैं। मैच् बन् रहा है। है न्!</p>
<h2>वो मजा नहीं आयेगा</h2>
<p>जो लोग छात्रावासों में रहे हैं उनके लिये यह किस्सा किसी न किसी रूप में <span style="font-weight:bold;">सुन चुके हैं </span>टाइप होगा। लेकिन अन्य साथियों के लिये इसे लिख रहा हूं। एक इंजीनियरिंग कालेज में एकाध बार फ़ेल हो चुके इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र  को से फ़ाइनल ईयर में पास कराने की मंशा से कालेज के टीचरों ने बाहर से आये अध्यापकों से वाइवा में सरल सवाल पूछने को कहा। </p>
<p>बाहर से आये अध्यापकों ने अपनी जान में बहुत आसान सवाल पूछा- अगर AC मोटर को DC करेंट से चलायें तो चल जायेगी?</p>
<p>छात्र ने अपने दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद जबाब दिया- <strong>सरजी, चलने को तो चल जायेगी, लेकिन वो मजा नहीं आयेगा।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>यह सुनने के बाद वो मजा न आयेगा हमारे बातचीत में शामिल हो गया। लिखने को तो लिख गये लेकिन वो मजा नही आया। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><span style="font-weight:bold;">संबंधित कड़ियां:</span></p>
<p>1. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Konark">कोणार्क विकीपीडिया में</a><br />
2.<a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/1236_konark_temple/index.shtml ">बीबीसी में कोणार्क के बारे में </a><br />
3.<a href="http://konark.nic.in/index.htm ">कोणार्क सम्पूर्ण परिचय </a><br />
4.<a href=" http://ashishkachittha.blogspot.com/2006/07/blog-post_14.html">आशीष गर्ग की उड़ीसा यात्रा के चित्र </a><br />
5.<a href=" http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">हमारे यायावरी के पिछले किस्से </a></p>
<div style="float:left; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/1843826705/" title="विनय"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2322/1843826705_90e2cfaab9.jpg" width="374" height="500" alt="विनय" /></a></div>
<div style="float:right; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/1843823837/" title="गोलानी"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2187/1843823837_778bda9426.jpg" width="386" height="500" alt="गोलानी" /></a> </div>
<div style="float:right; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/1844652724/" title="परदेशी भाई"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2127/1844652724_a75d03b401.jpg" width="500" height="375" alt=" परदेशी भाई" /></a></div>
<div style="float:left; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/1844650122/" title="विनय, गोलानी, अनूप और परदेशी भाई"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2039/1844650122_643a2cec21.jpg" width="500" height="365" alt="विनय, गोलानी, अनूप और परदेशी भाई" /></a></div>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/349" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2355/1506593529_68d15283f6_m.jpg" alt="मुंबई से आया मेरा दोस्त&#8230;" title="मुंबई से आया मेरा दोस्त&#8230;" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/349" rel="bookmark" class="crp_title">मुंबई से आया मेरा दोस्त&#8230;</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/301" rel="bookmark"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1099/810105075_af9fe9ef8c_m.jpg" alt="जहां चार यार मिल जायें&#8230;" title="जहां चार यार मिल जायें&#8230;" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/301" rel="bookmark" class="crp_title">जहां चार यार मिल जायें&#8230;</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/369" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2400/1968851770_042e4e69c4_m.jpg" alt="एक खुशनुमा मुलाकात&#8230;" title="एक खुशनुमा मुलाकात&#8230;" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/369" rel="bookmark" class="crp_title">एक खुशनुमा मुलाकात&#8230;</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/447" rel="bookmark"><img src="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:Rf_C5sPjeY48dM:http://www.babytoothcenter.com/images/home-noflash.jpg" alt="उल्लू का पठ्ठा शब्द का उद्भव कईसे हुआ?" title="उल्लू का पठ्ठा शब्द का उद्भव कईसे हुआ?" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/447" rel="bookmark" class="crp_title">उल्लू का पठ्ठा शब्द का उद्भव कईसे हुआ?</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/645" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3578/3346248321_259f26a0fe_m.jpg" alt="ट्विटर,फ़ीड और खामोशी" title="ट्विटर,फ़ीड और खामोशी" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/645" rel="bookmark" class="crp_title">ट्विटर,फ़ीड और खामोशी</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>हम तुम्हारे पिताजी के दोस्त हैं</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jun 2007 02:57:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[बहुत दिनों से हमारी साइकिल यात्रा के किस्से अटके हुये हैं। सिलसिलेवार लिखने के चक्कर में सब सिलसिला टूट जाता है। बहरहाल जबतक वह सिलसिला शुरु हो तब तक एक मुख्तसर सा किस्सा। इससे हमारी पोस्ट की लम्बाई से आक्रांत लोग भी चैन की सांस लेंगे और कहेंगे शार्ट एंड स्वीट। हम अपने जिज्ञासु यायावरी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दिनों से हमारी <a href="http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">साइकिल यात्रा</a> के किस्से अटके हुये हैं। सिलसिलेवार लिखने के चक्कर में सब सिलसिला टूट जाता है। बहरहाल जबतक वह सिलसिला शुरु हो तब तक एक मुख्तसर सा किस्सा। इससे हमारी पोस्ट की लम्बाई से आक्रांत लोग भी चैन की सांस लेंगे और कहेंगे शार्ट एंड स्वीट।</p>
<p>हम अपने जिज्ञासु यायावरी की मंजिल हासिल करके घर वापस लौट रहे थे। हमारा लक्ष्य था कि हम १५ अगस्त की सुबह कन्याकुमारी पर झंडा फहराता हुआ देखें।<br />
हम तमाम बाधाओं को धता बताते हुये १४ अगस्त को ही कन्याकुमारी की चाय पीते हुये विवेकानंद स्मारक को अपनी आंखों से देख रहे थे।</p>
<p>लौटते में हम केरल होते हुये आये। उस समय शायद संपूर्ण साक्षर न हुआ हो लेकिन बच्चों की भीड़ की भीड़ स्कूल जाती दिखती। घर साफ़ सुथरे। एक दूसरे से सटे सड़क के किनारे के गांव।</p>
<p>घर से इतनी दूर आने के बावजूद, भाषा की स्वाभाविक छोटी-मोटी समस्या के बावजूद हमें कहीं से यह नहीं लग रहा था कि हम कहीं पराये देश में हैं।</p>
<p>उस दिन ऒणम का त्योहार था। हर घर के सामने अल्पना सजी हुयी थी। साफ़ घर। खुशियों का त्योहार अपनी पूरी धूम-धाम से मनाया जा रहा था।</p>
<p>दोपहर हो चुकी थी। हम एक कस्बे में पहुंचे। खाने-पीने का हिसाब-किताब बनाने की सोच रहे थे। एक होटल में जब घुसे तो वहां बैठे एक सज्जन से बातचीत होने लगी। आराम से हिंदी में बतियाते उन सज्जन ने हमारी साइकिल पर लगे बोर्ड को देखते ही कहा हमारा स्वागत किया। साइकिल पर हमारे नाम और जिज्ञासु यायावर, साइकिल यात्रा शुरु करने की तारीख आदि लिखे थे। </p>
<p>वे बोले- आओ भाई हम तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे। तुम्हारे पिताजी हमारे  दोस्त हैं। </p>
<p>हमारे लिये यह आश्चर्य था। मेरे पिताजी कभी केरल आये नहीं। अवस्थी के पिताजी अर्सा पहले गुजर चुके थे। फिर यह कैसे हमारे पिताजी को जानता है। मैंने पूछा भी कि आपके पिताजी हमारे कैसे दोस्त हैं? आप कहां के रहने वाले हैं? बताइये।</p>
<p>लेकिन उन्होंने कहा- अरे सब बतायेंगे तुमको। हड़बड़ाऒ नहीं। पहले आराम से खाना खाओ। भूखे लग रहे हो। बताओ क्या खाने का मन है?</p>
<p>हमने वहां उपलब्ध जो भी भोजन था वह किया। इस बीच वे सज्जन हमारे रास्ते के अनुभव सुनते रहे। बड़ी तल्लीनता के साथ। हम भी सुनाने में खो गये। उन्होंने हमारे अभियान की बहुत तारीफ़ की। देश को देखने का इससे अच्छा तरीका नहीं कि सड़क से यात्रा की जाये। आदि-इत्यादि।</p>
<p>खाने के बाद उन्होंने हमसे अपने घर में रुक जाने के लिये और अगले दिन आगे जाने के लिये कहा। हमें इस तरह के पहले भी बहुत से पस्ताव अनजान लोगों से मिलते रहे थे। लेकिन हम दिन में अपनी यात्रा स्थगित करके कहीं रुकते नहीं थे। <strong>यात्रा ही मंजिल है</strong> का गाना गाते हुये आगे बढ़ते रहते। रात को अगर कोई प्रस्ताव मिलता तो हम उसको निराश नहीं करते। इसलिये हमने कहा- हमें तो आगे जाना है इसलिये रुकेंगे नहीं।</p>
<p>उन्होंने हमें आगे जाने की अनुमति दे दी। अपने पास से कुछ पैसे भी दिये। </p>
<p>चलने से पहले हमने पूछा- अच्छा, अब तो बता दीजिये कि हमारे पिताजी आपके दोस्त कैसे हैं?</p>
<p>उन्होंने कहा- <strong>तुम्हारे पिताजी कमोबेश हमारी ही उमर के होंगे। तुम्हारी उमर के हमारे लड़के हैं। हम तुम्हारे पिताजी से कभी मिले नहीं। न ही हम उनको जानते हैं। लेकिन अगर तुमको देखकर मुझे लगता है कि तुम लोग हमारे बच्चों के समान हो और तुम्हारे पिताजी हमारे दोस्त हैं तो तुमको इससे क्या परेशानी है बेटा! दोस्ती के लिये क्या मिलना जरूरी होता है?</strong></p>
<p>हमारे पास कोई जवाब!  न तब था न अब। </p>
<p>इस घटना को २४ साल के करीब होने को आये। आज हमारे पिताजी नहीं है, अवस्थी के पिताजी पहले जा चुके थे। उन सज्जन का कुछ पता है। न उनका नाम पूछा था। न पता ने पेशा। न कौम। न राज्य। न जिला। लेकिन उनकी कही बात मेरे दिमाग में अभी भी धंसी है और अक्सर याद आती है। मैं जब भी किसी अजनबी को देखता और उससे दूरी का जरा सा भी अहसास होता है तो दिमाग के न जाने किस कोने से फड़फड़ाती हुयी आवाज सुनायी देती है- <strong>हम तुम्हारे पिताजी के दोस्त हैं।</strong></p>
<p>क्या आपको भी इस तरह की कोई आवाज कभी सुनायी देती है?</p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/176" rel="bookmark"><img src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/plugins/contextual-related-posts/default.png" alt="फ़ुरसतिया-पुराने लेख" title="फ़ुरसतिया-पुराने लेख" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/176" rel="bookmark" class="crp_title">फ़ुरसतिया-पुराने लेख</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/673" rel="bookmark"><img src="http://abhivyakti-hindi.org/lekhak/h/images/harishanker_parsai_web.jpg" alt="हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)" title="हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/673" rel="bookmark" class="crp_title">हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/672" rel="bookmark"><img src="http://abhivyakti-hindi.org/lekhak/h/images/harishanker_parsai_web.jpg" alt="परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)" title="परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/672" rel="bookmark" class="crp_title">परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/416" rel="bookmark"><img src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/plugins/contextual-related-posts/default.png" alt="मुन्नी पोस्ट के बहाने फ़ुरसतिया पोस्ट" title="मुन्नी पोस्ट के बहाने फ़ुरसतिया पोस्ट" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/416" rel="bookmark" class="crp_title">मुन्नी पोस्ट के बहाने फ़ुरसतिया पोस्ट</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/902" rel="bookmark"><img src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2009/10/23102009047Small_thumb.jpg" alt="ब्लागर समारोह का उद्घाटन और सत्यार्थ मित्र का विमोचन" title="ब्लागर समारोह का उद्घाटन और सत्यार्थ मित्र का विमोचन" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/902" rel="bookmark" class="crp_title">ब्लागर समारोह का उद्घाटन और सत्यार्थ मित्र का विमोचन</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>दुख हैं, तो दुख हरने वाले भी हैं</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Mar 2007 18:17:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी पिछ्ले दिनों जब खुशी ने हमसे सवाल-जवाब किये तो उनमें से एक सवाल यह भी था कि अगर अब यात्रा पर जाने को कहा जाये तो कहां जायेंगे? हमारा जवाब था -पहले तो घर से बाहर जायेंगे। अपना देश और विदेश भी घूमने का मेरा मन और इरादा भी है। लेकिन अब साइकिल से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-toip: 0px; "></span><br /><a href ="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/54922384/" title="रथयात्रा का रथ"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5c/Scattered_Temple.jpg/180px-Scattered_Temple.jpg" width="200" height="225"alt="रथयात्रा का रथ"/></a></div>
<p>अभी पिछ्ले दिनों जब खुशी ने हमसे <a href="http://www.tarakash.com/index.php?option=com_content&#038;task=view&#038;id=119&#038;Itemid=37">सवाल-जवाब</a> किये तो उनमें से एक सवाल यह भी था कि अगर अब यात्रा पर जाने को कहा जाये तो कहां जायेंगे?</p>
<p>हमारा जवाब था -पहले तो घर से बाहर जायेंगे।</p>
<p>अपना देश और विदेश भी घूमने का मेरा मन और इरादा भी है। लेकिन अब साइकिल से नहीं। मोटर साइकिल से या कार से। ट्रेन, बस, हवाई जहाज से घूमने में वह मजा आ ही नहीं सकता जो अपने साधन से घूमने में है, जिसका नियंत्रण आपके अपने हाथ में हो, जब मन किय चल पड़े। जहां दिल लगा, ठहर गये।</p>
<p>अपनी पिछली यात्रा में हमने बालासोर के किस्से<span id="more-258"></span> सुनाये थे। बालासोर से हम १६ जुलाई, १९८३ को लगभग ८० किमी दूर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bhadrak">भद्रक</a> पहुंचे। भद्रक में रहने का कोई ठीक जुगाड़ न होने के कारण हम रात में ही वहां से कटक के लिये निकल लिये। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cuttack">कटक</a> पहुंचे सबेरे साढ़े नौ बजे। १७ जुलाई को ही हम कटक से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bhubaneswar">भुवनेश्वर</a> और भुवनेश्वर से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Puri,_Orissa">पुरी</a> पहुंचे। उसी दिन। भुवनेश्वर में हम ज्यादा देर रुके नहीं। शायद इसलिये कि एक तो हमें वहां के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी दूसरे हमारा कोई दोस्त वहां रहता नहीं था।
<div style="float:left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-toip: 0px; "></span><br /><a href ="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/54922384/" title="लिंगराज मंदिर"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/thumb/3/38/Lingaraj_2.jpg/180px-Lingaraj_2.jpg" width="200" height="225"alt="लिंगराज मंदिर"/></a></div>
<p>कटक हम रुके बहुत थो़ड़ी देर लेकिन उतने में ही हम वहां के समाचार पत्र में अपने कटक आगमन की खबर दे आये थे। सन १९८९ से १९९२ के दौरान उड़ीसा में रहने के दौरान मैं ऊड़िया पढ़ना सीखी था लेकिन अब अभ्यास के कारण छूट गया वर्ना उड़िया के इस अखबार के समाचार को हिंदी में लिखकर बताता। यह समाचार शायद उड़िया दैनिक समाज में छपा था। </p>
<p>कटक उड़ीसा के सबसे पुराने शहरों में से एक है। कटक मूलत: संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है छावनी। १००० वर्ष से अधिक पुराना यह शहर लगभग ९ शताब्दियों तक उड़ीसा की राजधानी रहा। बाद में भुवनेश्वर उड़ीसा की राजधानी बना। कटक चांदी, तांबे और हाथीदांत पर तारों के काम के लिये प्रसिद्ध है। इसे &#8216;<strong>ताराकसी</strong>&#8216; कहते हैं। चांदी के पतले तारों बने (ताराकसी) गहने बहुत आकर्षक लगते हैं।<br />
<a href="http://bp3.blogger.com/_Fpm5WZgUMHs/Rf2JMEGYChI/AAAAAAAAAAk/iCaF9xhiN1Y/s1600-h/0193.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_Fpm5WZgUMHs/Rf2JMEGYChI/AAAAAAAAAAk/iCaF9xhiN1Y/s200/0193.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043337998076742162" /></a></p>
<p>उड़ीसा में यात्रा के दौरान गर्मी अपने चरम पर थी। रास्ते सूनसान। दूर-दूर तक कोई दिखता नहीं था। एक दोपहर हमने एक जानवर चराने वाले का फोटो खींचा। उसकी हड्डियां चमक रहीं थीं। भयंकर चिलचिलाती गर्मी में नंगे बदन तन पर सिर्फ लंगोटी। सर पर धूप से बचने के लिये शायद नारियल के पत्तों से बना छाता भी साथ में था।<br />
<a hre="http://en.wikipedia.org/wiki/Bhubaneswar">भुवनेश्वर</a> बोले तो संसार का ईश्वर १९८४८ में उड़ीसा की राजधानी बना। इसके पहले यह कलिंग की राजधानी रह चुका था। दस लाख से अधिक की आबादी वाला यह शहर मंदिरों का शहर के रूप में भी जाना जाता है। लिंगराज मंदिर, परसुरामेश्वर मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर यहां  के प्रसिद्ध मंदिरों में हैं। प्रसिद्ध  कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक द्वार बनवाया गया शांतिस्तूप भी शहर के दर्शनीय स्थलों में है।</p>
<p>भुवनेश्वर से हम उसी दिन मतलब १७ जुलाई को ही पुरी पहुंच गये। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Puri,_Orissa">पुरी </a>भारत का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह शहर ग्याहरवीं शताब्दी में बनवाये गये जगन्नाथ मंदिर के कारण प्रसिद्ध है। पुरी की प्रसिद्धि के अन्य कारणों में यहां का समुद्र तट, इसकी स्वर्ग के द्वार के रूप में मान्यता, आदि शंकराचार्य की पीठ होने के कारण, यहां की रथयात्रा, कोणार्क के सूर्य मंदिर के प्रवेश द्वार के रूप में  तथा शिव शम्भू के अनुयायियों के लिये सरकारी दुकानों में उपलब्ध मारीजुआना और अफीम हैं।<br />
 <a href="http://bp0.blogger.com/_Fpm5WZgUMHs/Rf2LoUGYCkI/AAAAAAAAAA8/0CzMqTzaqn8/s1600-h/0263.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_Fpm5WZgUMHs/Rf2LoUGYCkI/AAAAAAAAAA8/0CzMqTzaqn8/s400/0263.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043340682431302210" /></a></p>
<p>पुरी के मंदिर में अछूतों का प्रवेश वर्जित है। अछूते मतलब गैर हिंदू और गैर सवर्ण। जब इंदिरा गांधी ने पारसी फिरोज गांधी से विवाह किया तो उनके मंदिर में प्रवेश की बात को लेकर बहुत बवाल मचा था। पुरी के रेलवे स्टेशन के बाहर एक बोर्ड लिखा है- <strong><em>यहां १९३१ में महात्मा गांधी आये थे, लेकिन उन्होंने मंदिर में जगन्नाथ जी के दर्शन नहीं किये थे, क्योंकि वहां अछूतों का प्रवेश वर्जित था। उन्होंने कस्तूरबा गांधी और महादेव देसाई को फटकारा था कि उन्होंने क्यों ऐसे देवता के दर्शन किये जिसका दर्शन अछूतों के लिये निषिद्ध था।</em></strong><br />
पुरी का मंदिर इस अर्थ में अपने ढंग का अनूठा है कि यहां हर बारह वर्ष में नयी मूर्तियां बनती हैं। सामान्यतया मंदिरों का जीर्णोद्धार होता रहता है। लेकिन पुरी का मंदिर इस मामले में अलग ही परम्परा है कि यहां बारह वर्ष के बाद देव मूर्तियां बदल दी जाती हैं। मूर्ति के निर्माण में नीम की लकड़ियों का प्रयोग होता है। </p>
<p>पुरी में भगवान जगन्नाथ की  रथयात्रा भी बड़ी धूमधाम से निकलती है। बड़ा तामझाम, लाखों की भीड़। कॄष्ण, बलराम सुभद्रा की रथयात्रा। रथायात्रा का उद्देश्य यह बताया जाता है कि जो लोग मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते उनको दर्शन देने के लिये ही भगवान रथ में बाहर निकलते हैं। फिर वे गुंडीचा देवी के मंदिर में रहते हैं और वापस लौट आते हैं।</p>
<p>पुरी , कोणार्क, भुवनेश्वर मिलकर एक त्रिभुज बनाते हैं। तीनों उड़ीसा के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल हैं। अगले दिन हम पुरी से कोणार्क गये। वहां का सूर्य मंदिर देखने। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। </p>
<h2><strong>मेरी पसंद</strong></h2>
<p> मेरी पसंद में आज कानपुर के प्रख्यात गीतकार उपेंन्द्र जी का एक गीत दे रहा हूं। उपेंन्द्रजी ने तमाम गीत लिखे हैं जो उनके श्रोता गुनगुनाते रहते हैं। उनके गीतकंठ से प्रभावित होकर एक बार बच्चन जी ने उनसे कहा -<strong>उपेंन्द्र मैं तुम्हारा गला काट के ले जाउंगा। </strong></p>
<p>उनके तमाम प्रसिद्ध गीतों में से एक की शुरुआती पंक्ति- <strong>जो सिफारिश से सुलभ हो, है नहीं वह प्राप्य मेरा </strong>से उनके मिजाज का पता चलता है। कल उपेंन्द्र जी का शहर में दैनिक जागरण समूह की तरफ़ से सारस्वत सम्मान किया गया। मैं वहां मौजूद था। कवि विनोद श्रीवास्तव ने मुझे उपेंन्द्र और उनका रचनालोक पुस्तक उपलब्ध करा दी। इसमें उपेंन्द्र जी बारे में तमाम लोंगों के संस्मरण/पत्रों के अलावा उनके कुछ गीत भी संग्रहीत हैं। उपेन्द्र जी मूलत: प्यार के गीतकार हैं। उनके गीत पढ़ते हुये मुझे <a href="http://geetkalash.blogspot.com/">राकेश खंडेलवाल</a> के गीत याद आ रहे थे। </p>
<p>अपने गले की तकलीफ के बावजूद उपेंन्द्रजी ने एक गीत वहां किंचित हिचकिचाहट के साथ पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ता गया , उनके चेहरे पर चमक और आवाज में उत्साह और मुस्कराहट आती गयी। कुछ लाइनों को सुनते हुये मैं अपनी कविता पंक्तियां <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=50">आऒ बैठें कुछ देर पास में</a> याद करने लगा। यहां प्रस्तुत है उपेंन्द्रजी गीत जिसका शीर्षक है-<strong><em>कोई प्यारा सा गीत  गुनगुनायें।</em></strong><br />
<strong>साथी आओ कुछ देर ठहर जायें,<br />
इस घने पेड़ के नीचे, सांझ ढले,<br />
कोई प्यारा सा गीत गुनगुनायें<br />
सन्नाटा कुछ टूटे कुछ मन बहले।</p>
<p>गीतों की ये स्वर-ताल मयी लड़ियां,<br />
जुड़ती हैं जिनसे हृदयों की कड़ियां,<br />
कोसों की वे दूरियां सिमटती हैं,<br />
हंसते-गाते कटती दुख की घड़ियां।</p>
<p>भीतर का सोया वृंदावन जागे,<br />
वंशी से ऐसा वेधक स्वर निकले।</p>
<p>माना जीवन में बहुत-बहुत तम है,<br />
पर उससे ज्यादा तम का मातम है,<br />
दुख हैं, तो दुख हरने वाले भी हैं,<br />
चोटें हैं, तो चोटों का मरहम है,</p>
<p>काली-काली रातों में अक्सर,<br />
देखे जग ने सपने उजले-उजले।</p>
<p>इस उपवन में बहार तब आती है,<br />
पीड़ा ही जब गायन बन जाती है,<br />
कविता अभाव के काटों में खिलती,<br />
सुविधा की सेजों पर मुरझाती है;</p>
<p>हमसे पहले भी कितने लोग हुये,<br />
जो अंधियारों के बनकर दीप जले।</p>
<p>आओ युग के संत्रासों से उबरें,<br />
मन की अभिशप्त उसासों से उबरें,<br />
रागों की मीठी छुवनों से शीतल<br />
सुधियों की लहरों में डूबे-उछरें;</p>
<p>फिर चाहें प्राणों में बिजली कौंधे,<br />
फिर चाहे नयनों में सावन मचले।</strong></p>
<p><strong>-उपेंद्र, कानपुर।</strong></p>
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		<title>बेल्दा से बालासोर</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Dec 2006 18:16:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[बेल्दा में हम एक मंदिर में रुके थे। सबेरे वहां से नाश्ता करके हम आगे के लिये चल दिये। थोड़ी ही देर में हम उड़ीसा राज्य की सीमा पर मौजूद थे। &#8220;उड़ीसा आपका स्वागत करता है&#8221; के पत्थर के दोनों तरफ खड़े दिलीप गोलानी और विनय अवस्थी के फोटो हमने खींचे थे। २३ साल पहले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=219">बेल्दा</a> में हम एक मंदिर में रुके थे। सबेरे वहां से नाश्ता करके हम आगे के लिये चल दिये। थोड़ी ही देर में हम उड़ीसा राज्य की सीमा पर मौजूद थे। &#8220;उड़ीसा आपका स्वागत करता है&#8221; के पत्थर के दोनों तरफ खड़े दिलीप गोलानी और विनय अवस्थी के फोटो हमने खींचे थे। २३ साल पहले के खींचे फोटो में चेहरे पहचाने जा रहे हैं यह कम बड़ी बात नहीं है। ये फोटो क्लिक-III  कैमरे से खींचे गये थे। लगभग तीन महीने तक ये रोल बिना डेवलप हुये हमारे पास रखे रहे। </p>
<p>कुछ दिन पहले पंकज बेंगाणी उर्फ मास्साब ने कहा था कि वे इन फोटुऒं को बेहतर बनाने की तरकीब जानते हैं। लेकिन अभी तक वो इनको बेहतर बनाने के लिये हमारे निमंत्रण पत्र का इंतजार करते दिखते हैं। देखो भाई, इनको और कितना चमका सकते हो! कुछ करोगे-धरोगे या ऐसे ही बातें हांकते रहोगे!</p>
<p>हमारा अगला पड़ाव <a href="http://baleswar.nic.in/AboutBalasore.htm">बालासोर</a> था। बेल्दा से बालासोर की हमारी यात्रा में कोई खास बात नहीं हुई। शाम होते-होते हम बालासोर पहुंच गये थे। बालासोर के बारे में उन दिनों हम ज्यादा जानते नहीं थे और उस समय न हमें इसकी इसकी आवश्यकता महसूस हुयी। लेकिन आज जब मैं अपनी यात्रा के बारे में लिख रहा हूं तो बालासोर के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रहा हूं।
<div style="float:right;margin-left:10px;margin-bottom:10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top:0px;">दिलीप गोलानी, विनय अवस्थी</span><br /> <img src="http://farm1.static.flickr.com/126/331978498_40e7b8a55b.jpg" width="500" height="376" alt="दिलीप गोलानी, विनय अवस्थी" /></div>
<p><a href="http://baleswar.nic.in/HISTORY%20AND%20CULTURE.htm">बालासोर</a> भारत के पूर्वी समुद्र के किनारे स्थित एक शहर है। यह कभी कलिंग राज्य का अंग रहा फिर उत्कल राज्य में शामिल हो गया। बाद में मुगल साम्राज्य में शामिल हुआ और इसके बाद मराठों के अधीन हुआ। इसके बाद अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त होकर बालासोर १ अप्रैल, सन १९३६ को उड़ीसा राज्य का अभिन्न अंग बन गया।</p>
<p> ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पता लगता है कि  बाणेश्वर( भगवान शंकर) के कारण इस शहर को पहले बाणेश्वर के नाम से जाना जाता था जो कि बाद में मुगलकाल में बदलकर बालासोर हो गया। ऐसा शायद मुगलकाल में फारसी के प्रभाव के कारण हुआ हो। फारसी में बालासोर शब्द का अर्थ है-समुद्र में स्थित शहर।</p>
<p>यहां का समुद्र तट अपने ढंग का अनूठा है। यहां समुद्र अपने तट से पांच किलोमीटर तक पीछे लौट जाता है। अपनी इस अनूठी विशेषता के कारण यहां तमाम तरह की तोपों, तोप के गोलों और मिसाइलों की टेस्टिंग होती है। </p>
<p>तोपों और तोप के गोलों की टेस्टिंग के लिये पी.एक्स.ई.(प्रूफ एन्ड एक्सपेरीमेंटल इस्टब्लिशमेंट)बालासोर  में खास सुविधायें हैं। यहां सारे देश के विभिंन्न हिस्सों से आयी तोपों और तोप के गोलों की जांच की जाती है। जांच का तरीका उनको तरह-तरह से फायर करके ही होता है। इनकी जांच की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है। देश की सेना में शामिल कोई भी तोप बिना उसके फायरिंग परीक्षण के सप्लाई नहीं होती। तोप की हर बैरल की टेस्टिंग होती है। </p>
<p>तोपों की टेस्टिंग तो आसान है। इनको सीधा ऊपर या कुछ अंश पर फायरिंग करके इनकी जांच की जा सकती है। हर तोप के गोले का व्यास अलग-अलग होता है। आजकल विश्व में जिन गोलों का सबसे ज्यादा चलन हैं वे १५५ मिमी व्यास के होते हैं। पुरानी तोपों के लिये १०५ मिमी,१२५ मिमी, १३० मिमी के गोले भी बनते हैं। सारी दुनिया धीरे-धीरे १५५ मिमी तोप की तरफ बढ़ रही है।</p>
<p>तोप की बैरल की लम्बाई और उसके व्यास (बोर) के अनुपात को कैलीबर कहते हैं। अगर किसी तोप के बारे में कहा जाये कि वह १५५ मिमी ,३९ कैलीबर की तोप है तो इसका मतलब है कि उसका व्यास १५५ मिमी और उसकी बैरल की लम्बाई १५५x ३९ होगी। तोप की प्रहार क्षमता आदि में इन सब बातों का बहुत प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>तोप के गोलों के दो तरह के प्रूफ टेस्ट होते हैं। एक जिनमें कि केवल फायरिंग करके टेस्ट होते हैं। दूसरे जिसमें फायर किये गये गोलों के खोल बरामद करके उनका परीक्षण किया जाता है। इसे रिकवरी प्रूफ कहते हैं। इसमें गोले के खोल का परीक्षण करके देखा जाता है कि गोले सही बने हैं या कुछ गड़बड़ है। गोलों के प्रकार के अनुसार गोलों की ५००/१०००/२००० की लाट बनती हैं। इन लाटों में से कोई ५-१० गोले निकालकर उनकी फायरिंग करके टेस्ट होते हैं। </p>
<p>बालासोर में समुद्र अपने तट से पांच किमी तक पीछे लौट जाता है। इसकी  इसी विशेषता के कारण इसे &#8216;रिकवरी प्रूफ&#8217; के आदर्श स्थान माना जाता है। गोलों को जब फायर किया जाता है तो वे समुद्र में जा गिरते हैं। जब समुद्र पीछे जाता है तो फायर किये गये गोलों को खोज कर उनका परीक्षण किया जाता है। </p>
<p>यह सब बड़ी जटिल प्रक्रिया है। एकदम साधारण सा दिखने वाला एक तोप का गोला फायरिंग होने की स्थिति तक पहुंचते-पहुंचते हजारों चरणों से गुजरता है। कुछ तोप के गोलों की कीमत लाख रुपये के आसपास तक जा पहुंचती है। लाखों रुपये की कीमत की एक टैक गन अक्सर २५० गोलों को फायर करने के बाद बेकार हो जाती है।
<div style="float:right;margin-left:10px;margin-bottom:10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top:0px;">विदेशी पर्यट्रक</span><br /><img src="http://farm1.static.flickr.com/128/331978496_5836221613_m.jpg" width="178" height="240" alt="विदेशी पर्यट्रक" /></div>
<p>यही कारण है कि विकासशील देशों के लिये युद्ध एक विलासिता है। एक दो हफ्ते की लड़ाई में ही देशों का बारह बज जाता है। </p>
<p>बालासोर प्रूफ रेंज के पास ही स्थित है अंतरिम टेस्ट रेंज। यहां मिसाइलों के परीक्षण चलते रहते हैं। </p>
<p>बालासोर का समुद्र तट शहर से करीब चालीस किमी दूर है। हम वहां भी गये। हमारे देखते-देखते एक विदेशी पर्यटक ने अपने सारे कपड़े उतार दिये और एक दम नंगा होकर समुद्र में कूद गया। काफी देर तक वह तैरता रहा। तमाम लोग उसे कौतूहल से देखते रहे। हमारी निगाहें भी दूर से उसका मुआयना कर रहीं थीं।<br />
जब वह समुद्र से बाहर निकला तो वहां पानी में तैरते नारियल के पेड़ के पत्ते को लपेटकर बाहर आया। हमने दूर से उसकी फोटो भी खींची।</p>
<p>पिछले दिनों बालासोर एक और खबर के लिये चर्चा में था। यहां के 13 गांवों के लोगों ने करीब दो दशकों तक सरकारी विभागों और अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद  एक नदी पर अपने पैसे से लकड़ी का पुल <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/msid-1477714,prtpage-1.cms">बनाकर</a> विकास की रोशनी अपने इलाके तक पहुंचाने की कोशिश की। </p>
<p>बालासोर में हम लोगों का कोई रहने का जुगाड़ नहीं था। लिहाजा हम फ्री के जुगाड़ की तलाश में थे। अंतत: हम एक थाने में रुक गये। आज ताज्जुब होता है यह सब सोचकर कि जहां जाना हम गवारा नहीं करते उन जगहों पर हम ऐसे रह जाते रहे गोया वो हमारी खाला के घर के हों।</p>
<p>अपनी साइकिल यात्रा के दौरान हम अनेक ऐसी जगहों पर रुके जो हमारे लिये बिल्कुल अनजानी थीं। बिल्कुल अजनबी लोगों ने पांच-दस मिनट की बातचीत में अपने दिल और घर के दरवाजे  हमारे लिये खोल दिये। आज जब मैं देखता हूं कि टीवी पर तमाम तरह की चेतावनियां आती हैं कि &#8216;अजनबियों से सावधान रहें&#8217;, &#8216;अनजान व्यक्ति की दी हुई चीज न खायें&#8217; तो लगता है कि क्या सचमुच दुनिया इतनी बदल गयी है पिछले २३ सालों में कि कोई भरोसे काबिल नहीं रहा!</p>
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		<title>देश का पहला भारतीय तकनीकी संस्थान</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Dec 2006 02:41:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>

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		<description><![CDATA[काफ़ी दिनों के बाद आज मन किया फिर से अपने साइकिल यात्रा के किस्से सुनाने का। जिन साथियों को इससे पहले के किस्से पढ़ने का मन करे वे जिज्ञासु यायावर श्रेणी की पोस्टें देख सकते हैं। कलकत्ता से हम सबेरे ही सबेरे नाश्ता करके निकल लिये थे। हमारी अगली मंजिल थी खड़गपुर। खड़गपुर कलकत्ता से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>काफ़ी दिनों के बाद आज मन किया फिर से अपने <a href="http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">साइकिल यात्रा </a>के किस्से सुनाने का। जिन साथियों को इससे पहले के किस्से पढ़ने का मन करे वे <a href="http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">जिज्ञासु यायावर </a>श्रेणी की पोस्टें देख सकते हैं।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/325147669/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/136/325147669_7a546a03f3.jpg" width="500" height="382" alt="गोलानी, अनूप, विवेक और उसका दोस्त" /></a></p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=187">कलकत्ता</a> से हम सबेरे ही सबेरे नाश्ता करके निकल लिये थे। हमारी अगली मंजिल थी खड़गपुर। खड़गपुर कलकत्ता से करीब १२० किमी दूर है। हम कलकत्ता से सबेरे निकलकर पैडलियाते हुये जब खड़गपुर पहुंचे तो रात हो चुकी थी। वहां <a href=" http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Institute_of_Technology_Kharagpur">आई.आई.टी.खड़गपुर</a> में हमें रुकना था जहां कि हमारे कनपुरिया मोहल्ले के दोस्त विवेक बाजपेयी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।</p>
<p>विवेक हमारे मोहल्ले गांधी नगर में ही रहते थे। हम दोनों ने एक साथ बी.एन.एस.डी. इंटरकालेज से इंटर किया था। <span id="more-219"></span>मैं इंटर के तुरंत बाद इलाहाबाद मोनेरेको चला गया था। विवेक ने अगले साल अपनी मेहनत के बल पर आई.आई.टी. खड़गपुर में एडमिशन लिया। बाद में लगनपूर्वक प्रयास करके आई.आई.एम. से एम.बी.ए. किया। आज पता नहीं कहां है विवेक लेकिन अब जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो पुराने दिनों की याद सामने आ रही है।</p>
<p>हम लोग एक ही मोहल्ले में रहते थे। विवेक से परिचय हुआ तब हम लोग ग्याहरवीं में पढ़ते थे। हमारा स्कूल १२ बजे से होता था। हम विवेक के घर के पास ही बने पार्क में अक्सर क्रिकेट खेला करते थे। हमारे साथियों में राकेश मिश्रा और राकेश द्विवेदी भी होते थे। राकेश मिश्रा बाद में दरोगा बन गये और राकेश द्विवेदी आजकल दैनिक जागरण में हैं। अपने घर के अलावा जिस एक घर में मैंने अपना समय सबसे ज्यादा बिताया वह राकेश द्विवेदी के घर था। क्या विडम्बना है कि अपने ही शहर में रहते हुये भी अपने सबसे बेहतरीन समय के साथियों से रूबरू मुलाकात किये हुये महीने, साल गुजर जाते हैं।</p>
<p>उन दिनों मोबाइल का चलन तो था नहीं कि मिनट-मिनट की खबर लेते रहें। फोन भी विलासिता ही थे। संप्रेषण का माध्यम  चिट्ठी-पत्री ही था। हमने काफ़ी पहले ही विवेक को अपने आने की सूचना दे दी थी। हमें कोई जवाब नहीं मिला था लेकिन विश्वास था कि वह वहां मिलेगा। </p>
<p>हमारे पहुंचते-पहुंचते रात हो गयी थी। मेस शायद बंद थी या देर हो जाने के कारण हमने हास्टल के पास ही बने ढाबों में खाना खाया। वापस आकर विवेक के कमरे में ही लेटे-लेटे बातें करते-करते हम कब सो गये हमें पता ही नहीं चला। विवेक अपने किसी दोस्त के कमरे में सोने चला गया।<br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/325147670/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/141/325147670_e6113785b1.jpg" width="500" height="385" alt="गोलानी, विनय, विवेक और उसका दोस्त" /></a></p>
<p>सबेरे नास्ता करके हम आई.आई.टी. कैम्पस देखने निकले। तमाम जगह घूमते रहे। संस्थान की मुख्य इमारत के पास हमने फोटो भी खिंचवाई। आज जब मैं अपनी उन फोटुऒं को देख रहा था तो लग रहा था कि समय के साथ हमारे शरीर के ढांचे में कितना अतिक्रमण जमा हो गया है। मैं दुबला-पतला था जबकि आज मेरा वजन अस्सी-नब्बे के बीच झूलता रहता है। लेकिन लंबाई कुछ ढंके रहती है सचाई। विनय का तो चतुर्दिक विकास हो गया है। दिलीप गोलानी के बहुत दिन से दर्शन नहीं हुये। न जाने किस हाल में हो हमारा यायावर साथी!</p>
<p>पिछले दिनों खड़गपुर आई.आई.टी. के एक छात्र ने एक छात्रा की अश्लील फोटो बाजी.काम साइट के माध्यम से बेचने का प्रयास किया था। यह अपनी तरह का पहला मामला था। इसी क्रम में जानकारी देते चलें कि खड़गपुर का तकनीकी संस्थान अपने देश का पहला प्रौद्योगिकी संस्थान है। </p>
<p>सन १९४६ में बने उच्च तकनीकी शिक्षा आयोग ने यह सिफारिश की कि अमेरिका के मेसाट्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की तर्ज पर भारत में भी तकनीकी संस्थान स्थापित किये जायें। उन दिनों भारत के अधिकांश उद्योग कलकत्ता में थे इसलिये  पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अनुरोध किया कि पहले तकनीकी संस्थान की स्थापना<br />
कलकत्ता में ही की जाये। परिणाम स्वरूप मई,१९५० में कलकत्ता में <strong>पूर्वी उच्च तकनीकी संस्थान </strong>की स्थापना हुई। बाद में जून, १९५० में इस तकनीकी संस्थान को कलकत्ता से १२० किमी दूर खड़गपुर के हिजली नामक एतिहासिक स्थान में स्थानान्तरित किया गया।</p>
<p>कलकत्ता में तकनीकी संस्थान ५, एस्प्लेनेड में बनाया गया। यह मेरे लिये सुखद सूचना सा है क्योंकि हमारी आयुध निर्माणियों का मुख्यालय बहुत दिनों तक ६, एस्प्लेनेड, कलकत्ता में रहा। आज भी हमारे विभाग के कुछ कार्यालय ६,एस्प्लेनेड, कलकत्ता में हैं।</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Institute_of_Technology_Kharagpur">हिजली</a> एक ऐतिहासिक स्थल है। पहले यह हिजली बंदी ग्रह के रूप में जाना था(अब शहीद भवन)यहां अंग्रेजों के जमाने में राजनैतिक बंदी लाये जाते थे।यहां उन पर मुकदमा चलता था और उनको बंदी बनाकर रखा जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां पर अमेरिकी की २०वीं वायुसेना कमान का  मुख्यालय भी रहा।</p>
<p>सन १९५६ में खड़गपुर तकनीकी संस्थान के संस्थान के दीक्षांत समारोह में अपने उद्गार व्यक्त करते हुये <strong><em>भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने</em></strong> कहा:-<br />
<strong><br />
<blockquote>ऐतिहासिक हिजली बंदी ग्रह जो भारत के बेहतरीन स्मारकों में से एक है अब भारत के नये भविष्य के रूप में बदल रहा है। यह चित्र मुझे उन परिवर्तनों का आभास कराता है जो कि भारत में हो रहे हैं। </p></blockquote>
<p></strong><br />
हालांकि संस्थान की मुख्य इमारत की फोटुयें धुंधली हो गयीं हैं लेकिन भारतीय तकनीकी संस्थान,खड़गपुर की उन इमारत में नाम के नीचे लिखी हुयी मेरी याद में अभी भी एकदम ताजा है। वहां लिखा है:-<br />
<strong><br />
<blockquote>यह संस्थान राष्ट्र की सेवा के लिये समर्पित है।</p></blockquote>
<p></strong><br />
देश और राष्ट्र के लिये समर्पण करने वाले अब अल्पमत में हैं और समर्पण भावना अब पुराने फैशन की चीजों मे शामिल हो गयी है। लेकिन इमारते हैं कि अपना रूप नहीं बदलती।</p>
<p>बहरहाल, हम दोपहर को खाना खाकर आगे के लिये चल दिये। रास्ते में कुछ समय लग गया और शाम होते-होते हम खड़गपुर से मात्र ३५ किमीं दूर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Belda">बेल्दा </a>कस्बे तक ही पहुंच पाये। बेल्दा पश्चिम बंगाल के मिदिनापुर जिले का एक कस्बा है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या ५ के पास स्थित है। यह राजमार्ग भारत सरकार की महत्वाकांक्षी स्वर्णचतुर्भुज योजना से जुड़ा है। बेल्दा से कुछ ही दूर पर उड़ीसा राज्य की सीमा शुरू होने के कारण इसे उड़ीसा का प्रवेश द्वार भी कहते हैं।</p>
<p>हम शाम को बेल्दा पहुंचे थे। खाना खाकर रात में वहीं एक मंदिर में रुक गये। उस दिन तारीख थी -१४  जुलाई, १९८३ ।</p>
<p>हमारी अगली मंजिल थी बालासोर!</p>
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		<title>गालिब भी गये थे कलकत्ता&#8230;</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Sep 2006 17:41:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[जिज्ञासु यायावर]]></category>
		<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[[काफी दिनों से हम अपनी साइकिल यात्रा कथा को सुनाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन कोई न कोई व्यवधान आता रहा। कभी फोटो अपलोड नहीं कभी कम्प्यूटर ने समर्थन वापस ले लिया और कभी मियां-मूड नदारद। एक बार तो पूरा लिखा हुआ मसाला हमारी बेवकूफी और कम्प्यूटर हजम कर गये ,जैसे जनता की गाढी़ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em>[काफी दिनों से हम अपनी <a href="http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">साइकिल यात्रा कथा </a>को सुनाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन कोई न कोई व्यवधान आता रहा।  कभी फोटो अपलोड नहीं कभी कम्प्यूटर ने समर्थन वापस ले लिया और कभी मियां-मूड नदारद।  एक बार तो पूरा लिखा हुआ मसाला हमारी बेवकूफी और कम्प्यूटर हजम कर गये ,जैसे जनता की गाढी़ कमाई को नेता-नौकरशाह-व्यापारी गठबंधन पचा जाता है(ऐसी अफवाह है)। बहरहाल आज हम फिर पूरी तैयारी से लिखने बैठे हैं फिर से अपनी साइकिल यात्रा के किस्से.जिन लोगों को पुराने किस्से पढ़ने हों वे <a href="http://hindini.com/fursatiya/?cat=11">यहां</a> पढ़ सकते हैं]</em></p>
<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px;">हावडा़ पुल</span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/239394894/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/83/239394894_6ab639832b_m.jpg" width="240" height="178" alt="दूर से दिखता हावडा़ पुल" /></a></div>
<p>हम जब <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/कलकत्ता">कलकत्ता</a> की तरफ बढ़ रहे थे तो मेरे मन में <a href="http://www.bbunl.com/bridge_howrah.html">हावड़ा ब्रिज</a> को देखने का कौतूहल था। यह मेरे जीवन की पहली <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kolkata">कलकत्ता</a> यात्रा थी । इसके पहले मैंने कलकत्ता को साहित्य के माध्यम से ही जाना था। विमल मित्र के उपन्यास <strong>&#8216;खरीदी कौड़ियों के मोल&#8217; </strong>के <strong>दीपंकर</strong> के साथ-साथ मैंने कलकत्ता के गाड़ियाहाट और तमाम दूसरी जगहों की काल्पनिक यात्रायें की थीं। इसके बाद पढ़ा था कलकत्ता के बारे में । कालेज स्ट्रीट,ईडन गार्डन,विक्टोरिया मेमोरियल,विवेकानन्द आश्रम,कालीबाड़ी मंदिर,फेरी सर्विस,ट्राम,हाथ रिक्शा, सोनागाछी और न जाने क्या-क्या। </p>
<p>हावड़ा ब्रिज को देखने की थी उत्सुकता का यह था कि बचपन से मैंने इसके बारे में अनेकों कहानी-किस्से सुन रखे थे। दुनिया का सबसे बड़ा पुल है, चार घंटे में पूरा खुल जाता है,जहाज निकलने के लिये खुल जाता है आदि-इत्यादि।</p>
<p>बहरहाल जब हम पुल के पास पहुँचे तो मुँह बाये बहुत देर तक देखते रहे इसे। यह विश्व  का व्यस्ततम पुल है। यह &#8216;प्राप्ड कैंटीलीवर टाइप&#8217; (एक तरफ धंसा दूसरी तरफ टिका)पुल है।इसके बारे में तमाम जानकारियाँ उपलब्ध हैं तथा कवितायें भी लिखी हैं। मजे की बात है कि जो पुल १९३७ से १९४१ के बीच बना उसके बारे में लिखी <a href="http://howrahbridgekolkata.nic.in/Bridge_poem.htm">कविता </a>१९२५ की है।२६००० टन लोहे से बना यह पुल हावड़ा तथा कलकत्ता को जोड़ता है।</p>
<p>पुल पर पैदल,साइकिल,रिक्शा,बस,ट्राम का रेला गुजरता ही दिखा। इतनी भीड़ में वहाँ खड़े होना आफत। इसलिये पुल को आराम से देखने के लिये एक दिन हम रात को पुल पर आये।देखकर लौट गये। अब लगता है रात के सन्नाटे में पुल से बतियाते हुये एकाध कविता लिख लेते तो अच्छा रहता।</p>
<p>पुल पार करते ही स्ट्रैंड रोड आ जाता है जहाँ इन्द्र अवस्थी रहते थे। पहले रोड शुरू होते ही टकसाल थी(मिंट)जहाँ सिक्के ढलते थे। अब यह टकसाल अलीपुर चली गयी है तथा वहाँ सी.आर.पी.एफ. का आफिस खुल गया है।</p>
<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px;">हावडा़ पुल</span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/239394898/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/86/239394898_2e4fdb7b4c_m.jpg" width="240" height="181" alt="पुल के बीच" /></a></div>
<p>वहीं मुझे दिखे तमाम बिहारी मजदूर जो सड़क के किनारे ,फुटपाथ पर अपना डेरा बनाये  खाना बना रहे थे,बतिया रहे थे।इन बिहारी ,पूर्वी उत्तर प्रदेश के मेहनती मजदूरों से कलकत्ता निवासी चाहे जितना नाक भौं सिकोड़ें लेकिन इनके बिना कलकत्ता का काम भी नहीं चलता। अब तो बंगलादेशी घुसपैठियों के चलते ये बिहारी भाई भी अच्छी निगाहों से देखे जाने लगे हैं।</p>
<p>दुनिया में आज फास्ट फूड संस्कृति की आलोचना होती है। लेकिन बिहारियों और यू.पी. वालों का सत्तू एक ऐसा पदार्थ है जो दुनिया का <strong>&#8216;फास्टेस्ट फूड&#8217; </strong>है और सबसे निरापद भी। भइया लोगों से नाक भौं सिकोड़ने वाले लोग भी अब इसकी शरण में आ गये हैं तथा सत्तू का  घोल पीकर राजरोग(डायबिटीज) से बचने का उपाय करते हैं।बहरहाल यह तो ऐसे ही प्रसंगता:।</p>
<p>स्ट्रैंड रोड बडा़ बाजार में है। बडा़ बाजार के बारे में बताते हुये अवस्थी बोले- बडा़ बाजार कलकत्ता की शान है,सबसे बड़ा बाजार है,तमाम सामानों की थोक मंडी है,हजारों लोगों की रोजी-रोटी का सहारा है। और भी तमाम बातें बताईं लेकिन क्या फायदा उनको दोहराने से बस यह समझ लीजिये कि बड़ा बाजार बहुत बड़ा है।</p>
<p>इंद्र का परिवार जिस मकान में रहता था वहाँ मकान के सामने दुकाने थीं। कई किरायेदार रहते थे। इनका भी संयुक्त परिवार था। कुछ कमरों के घर में हम बिना पूछे धंस लिये थे। यह बचपना ही था कि हम बिना पूछे ,बिना घरवाले की परेशानी के बारे में सोचे, दोस्तों के यहाँ रुकते रहे। सोचते तो सोचते ही रह जाते आज ये लिख न रहे होते।</p>
<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px;">हावडा़ पुल</span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/239394897/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/79/239394897_495b096305_m.jpg" width="240" height="181" alt="हावडा़ पुल पर विदा लेते हुये" /></a></div>
<p>अवस्थी के पूरे परिवार में ठेलुहई के कीटाणु हैं किसी में कुछ कम किसी में कुछ ज्यादा। केवल माताजी इस बुराई से मुक्त हैं। माताजी के चलते ही सारे लोग निश्चिंत होकर ठेलुहई कर पाते हैं। माताजी ने हम लोगों को भी तीन दिन सहेजा और हमें यह अहसास ही नहीं हुआ कि हम अपने घर में नहीं हैं।</p>
<p>अवस्थी के साथ ही उनके बालसखा बिनोद भी थे । बिनोद हमारे हास्टल में हमारे कमरे के बगल वाले कमरे में ही रहते थे।हमारी विंग में ही रहने के कारण बिनोद से हमारा खास लगाव था । आज भी है। बिनोद वहीं ३६,ब्रजोदुलाल स्ट्रीट में अपने भइया-भाभी के साथ रहते थे। मां-पिता का निधन हो चुका था।एक दिन बिनोद् के घर भी गये। बाकी हमारा कैंप स्ट्रैंड रोड पर ही रहा ।बिनोद रोज आते और अवस्थी-बिनोद की जोडी़ यायावरों की तिकडी़ को गली-मोहल्ले,बाजार-सड़क,टहलाती रही ।</p>
<p>अवस्थी -बिनोद ने हमें जितना सम्भव हो सकता था कलकत्ता घुमाया। बाकी का बाद के लिये छोड़ दिया। हम विक्टोरिया मेमोरियल गये थे। सुना था कि यह मलिका-ए-विक्टोरिया के स्वागत-सम्मान में ताजमहल की तर्ज पर बना था। मजे की बात हमने ताजमहल बाद में देखा ,उसके तर्ज पर बने विक्टोरिया मेमोरियल को पहले।</p>
<p>कलकत्ते के हाथ-रिक्शे भी वहां की खासियत हैं। न जाने किन हालातों में इनका चलन शुरू  हुआ होगा। लेकिन आज भी मारवाड़ी महिलायें तथा कुछ बंगाली बाबू इन पर सवारी करना पसंद करते हैं।</p>
<p>कलकत्ते में ही हमने ट्राम पहली बार देखी।मजे की बात सबेरे -सबेरे कभी-कभी देखा कि ट्राम चली जा रही है आगे कोई सांड़ खड़ा हो गया । अब कंडक्टर उतर कर सांड को हटा रहा है। सड़क के किनारे चारपाई बिछाये आदमी को झल्लाते हुये उठा रहा है। आगे लगा जाम हटा रहा है।हम कई बार ट्राम में घूमे।</p>
<p>आफिस के घंटों में कलकत्ते का सड़क का ट्रफिक रेंगता हुआ चलता है। गाड़ियाँ साम्राज्यवाद और आतंकवाद की जुगलबंदी की तरह सटी-सटी चलती हैं।उन दिनों हमारे पास समय इफरात में था। समय की कीमत का अंदाजा नहीं था।लेकिन अब जब कभी कलकत्ता जाता हूँ तो लगता है कि कितने रेंगते हुये वाहनों का बोझ रोज सहता है यह <strong>सिटी आफ ज्वाय।</strong></p>
<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px;">हावडा़ पुल</span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/239394896/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/95/239394896_b961e6c453_m.jpg" width="240" height="188" alt="हावडा़ पुल पर विदा लेते हुये" /></a></div>
<p>सिटी आफ ज्वाय डामनिक लैपियर की वह किताब है जिसे उन्होंने कलकत्ता के बारे में कलकत्ता में रहते हुये छह साल के अध्ययन के बाद लिखीं। मैं कुल तीन दिन रहा वहाँ।२३ साल पहली की इतनी ही यादे हैं मेरे दिमाग में वहाँ की। बाकी की अवस्थी कभी शायद लिखें अपने आलस्य का त्याग करके।</p>
<p>तीन दिन कलकत्ता रहने के बाद हम वहाँ से आगे खड़कपुर के लिये चल दिये। वापसी में अवस्थी,बिनोद और उनके साथ के लोग हमें हावड़ा पुल तक छोड़ने आये। वहाँ हम काफी देर तक खड़े गपियाते रहे।फोटो-सोटो भी हुये काफी। आज हम बहुत् देर तक उन तस्वीर्रो को निहारते रहे। अवस्थी-बिनोद  के सर के उड़ते बाल गार्ड की झंडी की तरह फहरा रहे थे। हम उन लोगों को विदा लेकर आगे बढ़ गये। बाद के दिनों में सर के बालों ने भी इनका साथ छोड़ दिया।</p>
<p><strong>मेरी पसंद</strong><em><br />
आज की मेरी पसंद की कविता कलकत्ता पर केंद्रित है। ८ अप्रैल,१९७४ को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे जितेंद्र श्रीवास्तव की यह कविता (तद्भव,अक्टूबर २००५ में प्रकाशित) इस वर्ष के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिये चुनी गयी है। पुरस्कार के  निर्णायक व प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह का कहना है कि इसके केंद्र में गालिब की प्रसिद्ध कलकत्ता यात्रा कीस्मृति है,पूरी कविता इस स्मृति के साथ की  जाने वाली एक सर्जनात्मक यात्रा है। इस यात्रा के प्रति एक काव्यांजलि है ,जिसकी सार्थकता राजनीति-सामाजिक संदर्भ में आर बढ़ जाती है।</em></p>
<blockquote><p>
अभी और कितनी दूर है कलकत्ता<br />
वही कलकत्ता<br />
जहाँ पहुँचे थे कभी अपने मिर्जा गालिब<br />
और लौटे थे जेहन में आधुनिकता लेकर।</p>
<p>मैंने कितनी कितनी बार दुहराया है<br />
वह शेर<br />
किसी सबक की तरह<br />
जिसमें दुविधा के बीच<br />
जीवन की राह तलाशता है शायर।</p>
<p>वहाँ सवाल ईमान और कुफ्र का नहीं<br />
वहाँ सवाल धर्मी और विधर्मी का नहीं<br />
वहाँ सवाल एक नयी रोशनी का है।</p>
<p>गालिब की यात्रा के सैकड़ों सालों बाद<br />
मैं हिंदी का एक अदना-सा कवि<br />
जा रहा हूँ कलकत्ता।</p>
<p>मन में गहरी बेचैनी है<br />
इधर बदल गये हैं हमारे शहर<br />
वहाँ अदृश्य हो रहे हैं आत्मा के वृक्ष<br />
अब कोई आँधी नहीं आती<br />
जो उड़ा दे भ्रम की चादर।</p>
<p>यह जादुई विज्ञापनों का समय है<br />
यह विस्मरण का समय है।</p>
<p>इस समय रिश्तों पर बात करना<br />
प्रागैतिहासिक काल पर बात करने जैसा हो गया है।</p>
<p>हमारे शहर बदल गये हैं<br />
कलकत्ता भी बदल गया<br />
पर अभी कितनी दूर है वह<br />
बैठ-बैठे पिरा रही है कमर<br />
बढ़ती जा रही है हसरत।</p>
<p>कितना समय लगा होगा गालिब को<br />
वहाँ पहुँचने में<br />
महज देह नहीं<br />
आत्मा भी दुखी होगी उनकी।</p>
<p>उनके लिये कलकत्ता महज एक शहर नहीं था<br />
उनकी यात्रा किसी सैलानी की यात्रा न थी।</p>
<p>जब हम देखते हैं किसी शहर को<br />
वह शहर भी देखता है हमको<br />
कलकत्ते ने देखा होगा हमारे महाकवि को<br />
उसके आंसुओं को<br />
उसके दुख को।</p>
<p>क्या कलकत्ते ने देखा होगा<br />
हमारे महाकवि की आत्मा को<br />
उसके भीतर की अजस्र कविता को।</p>
<p>मैं कलकत्ते में<br />
कैसे पहचानूँगा उस पत्थर को<br />
जिस पर समय से दो हाथ करता<br />
कुछ पल सुस्ताने के लिये बैठा होगा<br />
हमारी कविता का  मस्तक<br />
रेख्ते का वह उस्ताद।</p>
<p>मैं जी भर देखना चाहता हूँ कलकत्ता<br />
इसलिये चाहे जितना पिराये कमर<br />
चाहे जितनी सताये थकान<br />
मैं लौटूँगा नहीं दिल्ली<br />
जरूर जाऊँगा कलकत्ता।</p></blockquote>
<p><strong>जितेंद्र श्रीवास्तव</strong></p>
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