By फ़ुरसतिया on December 24, 2006
बेल्दा में हम एक मंदिर में रुके थे। सबेरे वहां से नाश्ता करके हम आगे के लिये चल दिये। थोड़ी ही देर में हम उड़ीसा राज्य की सीमा पर मौजूद थे। “उड़ीसा आपका स्वागत करता है” के पत्थर के दोनों तरफ खड़े दिलीप गोलानी और विनय अवस्थी के फोटो हमने खींचे थे। २३ साल पहले [...]
Posted in जिज्ञासु यायावर, संस्मरण
By फ़ुरसतिया on December 24, 2006
हमने राग दरबारी का अगला भाग पोस्ट करके आराम की सांस लेना शुरू ही किया था कि तरकश के इस तीर ने हमारे आराम का ‘हे राम!’ कर दिया। हम ‘सर्वश्रेष्ठ उभरता हुआ चिट्ठाकार – 2006′ के चुनाव के जज बना दिये गये। बनाये तो हम मुख्य जज गये थे लेकिन जब हमने बताया कि [...]
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By फ़ुरसतिया on December 19, 2006
काफ़ी दिनों के बाद आज मन किया फिर से अपने साइकिल यात्रा के किस्से सुनाने का। जिन साथियों को इससे पहले के किस्से पढ़ने का मन करे वे जिज्ञासु यायावर श्रेणी की पोस्टें देख सकते हैं। कलकत्ता से हम सबेरे ही सबेरे नाश्ता करके निकल लिये थे। हमारी अगली मंजिल थी खड़गपुर। खड़गपुर कलकत्ता से [...]
Posted in जिज्ञासु यायावर
By फ़ुरसतिया on December 18, 2006
पिछली पोस्ट में मैंने अपनी बहुत पहले की लिखी एक कविता कम तुकबंदी ज्यादा का जिक्र किया था। इसे हमने सालों पहले होली के मौके पर लिखा था। कुछ लोगों को यह कुछ पसंद आयी। अपने इस भ्रम की आड़ में मैं यह कविता यहां पूरी की पूरी पेश कर रहा हूं। जो लोग इसे [...]
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By फ़ुरसतिया on December 16, 2006
लोग कहते हैं कि ‘असंभव’ शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है। एक स्वयंभू ज्ञानी को अपने शब्दकोश में ‘असंभव’ दिख गया तो महीनों परेशान रहा। उसको समझ में नहीं आ रहा था कि इतने ज्ञानी होने के बावजूद उसके शब्दकोश में मूर्खता कैसे आ गयी! किसी ने उसे समझाया भी कि ये उसी [...]
Posted in बस यूं ही
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