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फुरसतिया
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कविता

… बरसात, बिम्ब की तलाश और बेवकूफ़ी की बहस

By फ़ुरसतिया on July 24, 2010

बड़े मनुहार के बाद बारिश आयी है। अपने लाव लश्कर के साथ। सब ताम-झाम साथ लाई हैं वर्षा महारानी। अकेले चलना उनको सुहाता भी नहीं। वे वी आई पी की तरह आयी हैं। वीआईपी देर से आता है लेकिन ताम-झाम साथ में लाता है। बारिश भी तमाम बवाल संलग्नक की तरह लाई है। रास्तों पर [...]

Posted in बस यूं ही | Tagged कवि, कविता, टेम्पो, बरसात, बिम्ब | 23 Responses

मैं कहीं कवि न बन जाऊं …

By फ़ुरसतिया on October 23, 2008

प्रेमी-प्रेमिका की झील सी गहरी आंखों में बिना लाइफ़ जैकेट के कूद गया। तैरना नहीं जानता फ़िर भी बेखौफ़ छ्प्प- छैंया करता रहा। इस तरह की बेवकूफ़ी कोई बावरा प्रेमी ही कर सकता है। प्रेम-मंदिर में प्रवेश के लिये अकल-पादुकायें उतारके बाहर रखनी पड़ती हैं! अचानक प्रेमिका ने कजरारे नैनों के इशारे से बताया प्रेमी [...]

Posted in बस यूं ही | Tagged कवि, कविता, प्रेमिका, प्रेमी, features | 30 Responses

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  • Saagar on …. एक बीच बचाव करने वाले से बातचीत
  • Saagar on …. एक बीच बचाव करने वाले से बातचीत
  • shikha varshney on …जिन्दगी ऐसी नदी है जिसमें देर तक साथ बह नहीं सकते
  • manoj kumar on …. एक बीच बचाव करने वाले से बातचीत
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