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	<title>फुरसतिया</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
	<lastBuildDate>Fri, 20 Aug 2010 20:06:32 +0000</lastBuildDate>
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		<title>&#8230;और ये फ़ुरसतिया के छह साल</title>
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		<pubDate>Fri, 20 Aug 2010 03:21:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[…..और मजाक-मजाक में छह साल निकल लिये! पूरी शराफ़त से !एक , दो ,तीन , और चार और पांच को रास्ता देकर। अपने पहले पांच साल के अनुभव ऊपर की लिंकों में दिये हैं मैंने। उनको कम ही लोग पढ़ेंगे लेकिन दोहराना भी क्या? पाठक समझदार होता है! उसको बबुआ नहीं समझना चाहिये। जबरिया लिखना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create. g?blogID=16767459olor: teal;"></span><img src="http://farm3.static.flickr.com/2283/1819472111_2e09f25e9d_m.jpg"alt="फ़ूल"/></div>
<p>…..और मजाक-मजाक में छह साल निकल लिये! पूरी शराफ़त से !<a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005_08_01_archive.html ">एक </a>, <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=175 ">दो </a>,<a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=324 ">तीन </a>, और <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=519 ">चार </a> और <a href=" http://hindini.com/fursatiya/archives/670">पांच </a> को रास्ता देकर।</p>
<p>अपने पहले पांच साल के अनुभव ऊपर की लिंकों में दिये हैं मैंने। उनको कम ही लोग पढ़ेंगे लेकिन दोहराना भी क्या? पाठक समझदार होता है! उसको बबुआ नहीं समझना चाहिये। जबरिया लिखना अलग बात है लेकिन किसी को जबरिया पढ़वाना ट्रेन पकड़ने के लिये बगटुट भागते यात्री को अपनी थीसिस पढ़वाने जैसे है। वह बहुत खूब कहकर और तेजी से भाग लेगा।</p>
<p>मेरे ब्लॉगजगत के छह साल के अनुभव बहुत मजेदार रहे। फ़ंटास्टिक! सच तो यह है कि दुनिया अद्भुत है। हर तरह का मसाला यहां रेडीमेड उपलब्ध है। अब गुणवत्ता फ़ुणवत्ता को मारिये गोली। अनुभव और लेखन का ताजापन देखिये। जो और कहीं नहीं मिलेगा वो हमीअस्तो,हमीअस्तो,हमीअस्तो। </p>
<p>अपने पांच साल के अनुभव क्या दोहरायें! पिछले साल  की सालगिरह वाली पोस्ट में कह ही चुके हैं:</p>
<blockquote><p>
जैसे बुढौती के चलते लोगों को सीनियर सिटीजनशिप अपने आप मिल जाती है वैसे ही हम पहले से की-बोर्ड काला करते रहने के कारण यदाकदा <strong>वरिष्ठ ब्लागर</strong> कहलाये जाने लगे। जो लोग की-बोर्ड पर <strong>वरिष्ठ</strong>  लिखने में परेशानी महसूस करते हैं उन्होंने इसकी जगह <strong>मठाधीश ब्लागर</strong> भी कहा। कई बार लोगों ने जूते-चप्पल भी भेंट किये और लोगों ने यह भी लिखा कि हम मूढ़मति हैं तथा हमको वाक्य बनाना भी नहीं आता। हम भी शातिर लोगों की तरह इन सब सच्चाईं से मुंह फ़िराकर मन को प्रफ़ुल्लित कर देने वाली तारीफ़ की रेत में गरदन छिपाये रहे। बड़ा कूल-कूल लगता रहा।</p>
<p>ब्लाग जगत में अक्सर लोग इस बात से परेशान हो जाते हैं कि यहां वाद-विवाद, लात-जूता, उठा-पटक, गुट-बंदी, गाली-गलौज बहुत है। तो मेरा तो यही मानना और कहना है कि ब्लाग तो सिर्फ़ अभिव्यक्ति का माध्यम है। कोई सोनछड़ी तो है नहीं कि घुमाते ही सब लोग अच्छे-अच्छे हो जायेंगे। जो जैसा है वैसा ही तो व्यवहार करेगा। यहां किसी देवस्थान की तरह की केवल पवित्रता की आशा करना खामख्याली ही है। देवस्थान में भी उठापटक और छीछालेदर तो होती ही है।
</p></blockquote>
<p>अच्छा लिखने के साथ-साथ जब लोग लड़ते-झगड़ते हैं तो पहले तो डर लगता था लेकिन अब समय के साथ डर खतम हो गया है। </p>
<p>पिछले साल काफ़ी उठापटक वाले रहे। इलाहाबाद में हुई गोष्ठी के बाद काफ़ी दिन बमचक मची। इसके बाद फ़िर चिट्ठाचर्चा की हजार पोस्टें होने के बाद। कई एशोसियेशनें बनीं ,कई अध्यक्षों ने इस्तीफ़े दिये। कई घोषणायें हुईं, कई प्रस्ताव पास हुये और बस पास ही होकर रह गये। सास-बहू सीरियल की तरह साल भर इनाम बंटते रहे। </p>
<p>कई लोग, ब्लॉग-मंच पर धूमकेतु की तरह उगे और उसई के तरह नजरों से ओझल हो गये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बीच-बीच में कुछ लोगों को जीनियस, सुपर जीनियस और अतिमानव सा बताया गया जिनको देखकर लगा ये किसी इतरलोक के जीव हैं। यह हमारे समाज का सहज स्वभाव है। जिसको चाहते हैं ,बल भर चाहते हैं। उसमें कोई कमीं नहीं देखना चाहते। किसी ने उसकी तरफ़ इशारा भी किया तो उसकी आंख निकाल लेने के लिये हाथ बढ़ा देते हैं।</p>
<p>ब्लॉगजगत त्वरित  लेखन और त्वरित प्रतिक्रियाओं का माध्यम है। आभासी माध्यम है तो किसी के बारे में जो आपके मन में छवि बनी है उसी के अनुसार त्वरित प्रतिक्रिया आती है। जब आप कर देते हैं तो कभी बाद में अफ़सोस भी होता है। लेकिन उससे क्या होता है। ऐसी कई मजेदार प्रतिक्रियायें पिछले साल मुझे मिलीं। </p>
<p>किसी ने हड़काया संभल जाओ अनूप, किसी ने कहा आप मुझसे जलते हैं, किसी ने कहा मुकदमा कर देंगे। अभी हाल ही में किसी ने बताया कि मैं अपनी घटती लोकप्रियता से परेशान होकर ऊलजलूल पोस्टें लिख रहा हूं।</p>
<p>ये सब प्रतिक्रियायें उन लोगों की हैं जो मेरे प्रशंसक रहे हैं और आज भी भले ही प्रशंसक न हों लेकिन पाठक तो हैं हीं। मैं जब भी इस तरह की प्रतिक्रियाओं के बारे में सोचता हूं ,मुझे <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/173 ">हरिशंकर परसाई जी की लिखी यह बात</a> याद आती है:</p>
<p><strong>हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं। हम कहीं करुण होते हैं और कहीं क्रूर होते हैं। इस तथ्य को स्वीकारना चाहिये।</strong></p>
<p>दरअसल हम लोग अपनी इमेज के बारे में बहुत सतर्क रहते हैं। जरा सा किसी ने  उसके खिलाफ़ कुछ लिखा-कहा परेशान हो गये। इमेज का सीरजा बिखरने की जरा सी आहट हमें बेचैन कर देती है। गोया हमारी इमेज कोई बतासा हो जो खिलाफ़ बरसात में बह जायेगी। हम दाना-पानी लेकर चढ़ बैठते हैं।उस समय यह भूल जाते हैं यह भी लोग देख रहे हैं कि हम कैसे ,क्या कर रहे हैं। </p>
<p>पिछले साल कई ऐसे लोग रहे जिनसे मैंने जमकर मौज ली। वे बड़े भले दिल के हैं या होंगे या फ़िर लोग उनको मानते तो हैं हीं। कुछ न कुछ ऐसा मुझे उनके लेखन में और व्यवहार में दिखता रहा कि उनसे मौज लेने का मन करता रहा। लोगों के व्यवहार का दोहरा-तिहरापन और अतिनाटकीयता मुझे हमेशा एक फ़ूले गुब्बारे की लगता रहता जिसे फ़ोड़ूं भले न लेकिन उसमें पिन चुभाने का मन हमेशा करता है।  कभी मन को डपट दिया और कभी मनमानी कर ली। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>छह साल का अनुभव बहुत होता  है ऐसे माध्यम में रहने के लिये जिसमें आते ही लोग उसके बारे में सर्वज्ञ हो जाते हैं। हर लटके-झटके से परिचित होने के बावजूद ऐसा है कुछ जो उनको अपनाने से रोकता है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बहरहाल ये छह साल मेरे बड़े मजे में बीते इतनी उदार पाठक मिले कि मुझे अपने बारे में गलतफ़हमी भी हुई कभी-कभी कि हम कोई फ़न्ने खां लेखक हैं। साथ ही ऐसे पाठक भी मिले जो पोस्ट-दर-पोस्ट बताते भी रहे कि ये ये चिरकुटई छोड़ दो। भले ही उन्होंने टिप्पणियों में न लिखा हो लेकिन एहसास कराया।</p>
<p>बेहतरीन ब्लॉगर भी मिले जिनका लिखा पढ़कर दिल खुश होता रहता है।</p>
<p>ओह , कहां-कहां की लंतरानी हांकने लगे। ये होता है -की-बोर्ड, समय और नेट कनेक्शन मिल जाने का दुष्प्रभाव।</p>
<p>चलते-चलते तीन दोस्तों को याद कर लेना चाहता हूं एक रविरतलामी जिन्होंने इस माध्यम से मेरा परिचय कराया, दूसरे देबाशीष जिनका ब्लॉगजगत से दूर रहना मुझे सबसे ज्यादा अखरता है और तीसरा ई-स्वामी जिनसे मैं आजतक नहीं मिला लेकिन उनके जबरियन आग्रह के चलते हिन्दिनी पर लिखना शुरू किया और आजतक सिलसिला चल रहा है । <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बाकी और बहुत सारे लोग याद आ रहे हैं जो समय,समय पर साथ रहे। पाठक के रूप में प्रशंसक के रूप में, निदक के रूप में और न जाने किस-किस रूप में। सब मिलाकर जो एहसास बन रहा है वह बड़ा हसीन टाइप है।खूबसूरत, मनमोहक और न जाने कैसा-कैसा। लेकिन उसके बारे में फ़िर कभी। अभी चला जाये।:)</p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<p><strong>भये छियालिस के फ़ुरसतिया<br />
ठेलत अपना ब्लाग जबरिया।</p>
<p>मौज मजे की बाते करते<br />
अकल-फ़कल से दूरी रखते।<br />
लम्बी-लम्बी पोस्ट ठेलते<br />
टोंकों तो भी कभी न सुनते॥</p>
<p>कभी सीरियस ही  न दिखते,<br />
हर दम हाहा ठीठी करते।<br />
पांच साल से पिले पड़े हैं<br />
ब्लाग बना लफ़्फ़ाजी करते॥</p>
<p>मठाधीश हैं नारि विरोधी<br />
बेवकूफ़ी की बातें करते।<br />
हिन्दी की न कोई डिगरी<br />
बड़े सूरमा बनते फ़िरते॥</p>
<p>गुटबाजी भीषण करवाते<br />
विद्वतजन की हंसी उड़ाते।<br />
साधु बेचारे आजिज आकर<br />
सुबह-सुबह क्षमा फ़र्माते॥</p>
<p>चर्चा में भी लफ़ड़ा करते<br />
अपने गुट के ब्लाग देखते।<br />
काबिल जन की करें उपेक्षा<br />
कूड़ा-कचरा आगे करते॥</p>
<p>एक बात हो तो बतलावैं<br />
कितने इनके अवगुन भईया।<br />
कब तक इनको झेलेंगे हम<br />
कब अपनी पार लगेगी नैया॥</p>
<p>भये छियालिस के फ़ुरसतिया<br />
ठेलत अपना ब्लाग जबरिया।</strong></p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/691 ">अनूप शुक्ल</a></p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1236" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2226/2057965417_6144f3541b_m.jpg" alt="बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!" title="बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1236" rel="bookmark" class="crp_title">बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/769" rel="bookmark"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1119/1360868818_80e60d9855_m.jpg" alt="ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल" title="ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/769" rel="bookmark" class="crp_title">ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/807" rel="bookmark"><img src="http://farm1.static.flickr.com/220/500508013_cb56e88d1a_m.jpg" alt="&#8230;.भेजे क्यों मीठे सपने" title="&#8230;.भेजे क्यों मीठे सपने" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/807" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;.भेजे क्यों मीठे सपने</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/670" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2306/2445478859_b8a526cab4_m.jpg" alt="&#8230;और ये फ़ुरसतिया के पांच साल" title="&#8230;और ये फ़ुरसतिया के पांच साल" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/670" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;और ये फ़ुरसतिया के पांच साल</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/549" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3262/2600767899_37a1cf7c8c_m.jpg" alt="कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता" title="कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/549" rel="bookmark" class="crp_title">कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>&#8230;एक बेमतलब की पोस्ट</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Aug 2010 19:35:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। 2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।</p>
<p>2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे। </strong>: <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1471 ">ब्लागिंग के सूत्र</a></p>
<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span> <br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/42236633/" title="Photo Sharing"><img src="http://farm1.static.flickr.com/29/91245230_03a1a6b69b_m.jpg"  alt="ब्लॉगिंग" /></a></div>
<p>बहुत दिन हो गये ब्लॉगर की  डायरी लिखे हुये।</p>
<p>ब्लॉगजगत अद्भुत है। भांति-भांति के लोग यहां मिल जाते हैं। बस नेट के सामने बैठ जाइये। फ़िर तो मजे ही मजे। हर मिजाज का सामान मिल जायेगा आपको यहां। फ़्री फ़ंड में। हर्र लगे न फ़िटकरी रंग चोखा टाइप।</p>
<p>कोई भी एग्रीगेटर खोलकर कुछ भी पढ़ना शुरू कर  दीजिये। मजे की फ़ुल गारंटी। सीरियस पोस्ट के नीचे जीनियस पोस्ट!  जीनियस पोस्ट से सटी हुई कोई फ़ड़कती पोस्ट। फ़ड़कती पोस्ट के बगल में कोई अकड़ती पोस्ट। अकड़ती पोस्ट के ठीक नीचे कोई भावुक सी गीली-गीली पोस्ट! साथ में कई सारी सीली-सीली सी पोस्ट! उसके ठीक ऊपर एकाध दियासलाई की तीली सी पोस्ट। कुल मिलाकर मामला गठबंधन सरकार सा लगता है। जिसके हरेक घटक का आपस में छत्तीस का आंकड़ा गठबंधन की पहली शर्त है।</p>
<p>कोई क्रांति फ़ैला रहा है, कोई भ्रांति। किसी ने जरा सा हल्ला मचाया नहीं कि दस लोग चिल्लाते हुये शांति पाठ करने लगते हैं। मन लगाकर लड़ने भी नहीं देते। जहां घाव दिखा मरहम लगा दिया। जहां  घाव  नहीं हुआ बना दिया-<strong>आखिर मरहम तो लगाना ही है। </strong></p>
<p>आज ही किसी ने एक एस.एम.एस. पढ़वाया। उसमें किसी ने अपने दोस्त को पीट दिया। दोस्त ने पूछा-मैंने क्या गलती की जो मुझे पीटा तुमने। उसको जबाब मिला- <strong>साले हम तुम्हारी गलती का इंतजार करने लगे पीटने के लिये तब तो हो चुका।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>कुछ लोगों का लेखन तो इतना बहुरंगी , इंद्रधनुषी सा लगता है कि सुबह जो लेख फ़ड़कता हुआ दीखता है, वही शाम तक सीरियस हो जाता है। भावुक लेख दयनीय सा लगने लगता है। गीले में और गीलापन पाठक लोग जोड़ देते हैं। बजबजा जाता है मामला कभी-कभी तो। इसका उलट भी होता है, पुलट भी होता है। उलट-पुलट तो खैर होता ही रहता है-हमेशा।</p>
<p>ओह! भूल गये न! यह तो बताया ही नहीं कि ब्लॉगिंग क्या है! ब्लॉगिंग की परिभाषा हर ब्लॉगर अपने मन से तय करता है।  समय-समय पर जाहिर भी कर देता है। कई बार तो  लोग ब्लॉगिंग बाद में शुरू करते हैं इसके बारे में व्याख्या /राय पहले जारी करते हैं। लोग कहते हैं- <strong>ब्लॉगिंग साहित्य नहीं हैं।</strong> <strong>साहित्य नहीं है तो वाहित्य भी नहीं है।</strong> पत्रकारिता वाले भी इसे अपनी तरफ़ खींचते हैं। कविता-कहानी-लेख-नाटक-गीत-संगीत-फ़ंगीत-तकनीक-फ़कनीक-खेल-वेल सबसे जुड़े लोग इसे अपने हिसाब से परिभाषित करते हैं। </p>
<p>जैसा <em>लोग</em> कहते हैं कुछ उसी तरह बातें <em>बाग</em> कहते हैं। अब जब <em>लोग-बाग</em> कुछ कहेंगे तो वन,वाटिका,कूप,तड़ाग का मुंह कौन बंद कर सकता है। उनका भी जो मन आता है कहते हैं। कहते रहेंगे, कहने दिया जाये।</p>
<p>जैसे ग्राम समाज की जमीन पर दबंग लोग कब्जा करने की कोशिश करते हैं जनहित में वैसे ही जो जिस रंग का होता है उस रंग का झंडा फ़हरा लेता है ब्लॉग के लिये। वैसे मेरे हिसाब से तो <strong>ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है।</strong> रसोई गैस की तरह है जिसमें आप हर वह व्यंजन बना सकते हैं जिसका सामान आपके पास है। एक  तुक्कड़ कवि ने कहा भी है:</p>
<blockquote><p><strong><br />
ब्लॉगिंग किसी का टाइम पास है।<br />
किसी के लिये ये टाइमफ़ेल है।<br />
किसी की मन की मुक्त उड़ान है।<br />
किसी के लिये बिल्कुल अझेल है।</strong></p></blockquote>
<p>ब्लॉग लेखन भी अलग-अलग क्वालिटी का है। सब मिलकर दो भागों में बंटी है-अच्छा और खराब!</p>
<p>कोई अच्छा लिखे तो आफ़त। खराब लिखे तो डबल आफ़त।<br />
अच्छा लिखे तो कहा जाता है- <strong>तारीफ़ के लिये शब्द नहीं हैं। </strong><br />
खराब लिखे तो- <strong>वाह, बहुत खूब! लिखते रहिये। साधुवाद!</strong></p>
<p>मरन है लिखने वाले की। समझ ही नहीं पाता कि लोग कह क्या रहे हैं। वो तो भला हो अनामी-सनामी भाइयों का जो मुंह दबाकर सच बयान कर जाते हैं। कुछ सच का पता चलता है वर्ना तो पता ही न चले।</p>
<p>जिसे देखो वह कालजयी लेखन कर रहा है। कालजयी लेखन के चलते अकालजयी च बवालजयी लेखन दब जाता है। जैसे कालाधन सफ़ेदधन को साइडलाइन कर देता है वैसे ही कालजयी लेखन अकालजयी लेखन का टेटुआ दबा देता है। </p>
<p>इतना अच्छापन और भलापन पसरा है यहां पर कि चलते हुये डर लगता है। कहीं किसी अच्छाई को टक्कर न लग जाये। कोई भलमनसाहत आहत न हो जाये। जिसे देखो वह भला दिखता है। जिसे देखो वह अच्छा। भलमनसाहत और अच्छाई के मारे नाक में दम है। स्व.राजबहादुर विकल जी शाहजहांपुर के बारे में बताते हुये कविता पढ़ते थे:<strong><br />
<blockquote>पांव के बल मत चलो, अपमान होगा!<br />
सर शहीदों के यहां बोये हुये हैं।</p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>कविता से लगता है कि बड़े सलीके से शहीदों के सर देख-देखकर मार्गों पर बोये गये होंगे ताकि आने वाली पीढियां पांव के बल चलने में शरमायें।</p>
<p>ब्लॉगिग के बारे में एक अच्छी बात है कि लोग इसके स्तर के प्रति काफ़ी चिंतित रहते हैं। इसका स्तर गिरने न पाये। स्तर ऊंचा होता रहे इसके लिये लोग बहुत पसीना बहाते हैं। परेशान रहते हैं। अब यह बात अलग है कि जैसे-जैसे इसके स्तर की चिंता करने वाले  बढ़ रहे हैं लोगों में इसके गिरते स्तर के प्रति बेचैनी बढ़ती जा रही है। कोई तो बता रहा था कि किसी डाक्टर ने अपने मरीज को वजन कम करने की सलाह देते हुये बताया- <strong>ब्लॉगिंग के स्तर के बारे में चिंता करते रहो, दुबले हो जाओगे।</strong>  हर जिम्मेदार ब्लॉगर स्टुअर्ट लिटिल  की तरह ब्लॉग की नैया को बचाने में पिला पड़ा है।</p>
<p>कुछ दोस्त भी गजब के होते हैं। एक ने मेरे लेख का एक हिस्सा अपने नाम से कहीं पेश किया। मैंने उससे बाद में धमकाते  हुये अकेले में कहा- वाह बेटा, मेरा लेख मय कामा-फ़ुल स्टॉप के अपने नाम से छाप दिया। कम से क्रेडिट तो दे देते मुझे।</p>
<p>उसने फ़ौरन पलटवार किया- तुम क्या कामा, फ़ुल स्टॉप विरासत में लेकर पैदा हुये थे। और वो लेख तुमने कहां से टोपा बतायें क्या!  उसको क्रेडिट दिया जहां से टीपा?</p>
<p>हम चुप हो गये। जरा सी बात पर दोस्त से क्या बहस करें। बह्स की एक बड़ी आफ़त तो यह कि जहां शुरू करो लोग टोंकने लगते हैं  स्वस्थ बहस करो। इतना तो ट्रैफ़िक वाले गाड़ी का प्रदूषण प्रमाण पत्र नहीं मांगते जितना बहस के गवाह बहस का स्वास्थ्य प्रमाणपत्र मांगते हैं। कोई-कोई तो बिना बहस अपने पास से दे देता है प्रमाण पत्र-<strong>स्वस्थ बहस देखकर अच्छा लगा।</strong></p>
<p>बहस का तो ऐसा है कि बहस में लोग तर्क,विषय, तथ्य के चक्कर में नहीं पड़ते। बात चाहे ईरान की हो चाहे तूरान की। तर्क अगर अफ़गानिस्तान के हैं तो वही पेश किये जायेंगे। न हुआ तो राजस्थान के तो हैं ही इफ़रात में। आपको मानना हो तो मानो न मानना हो तो भी मानना तो पड़ेगा ही। आखिर स्वस्थ बहस जो हो रही है। बहस में वही तो कहेंगे जो पता है। सही-गलत की चिंता करें तब तो  हो चुकी बहस। </p>
<p>दो दिन पहले कुछ कवितायें अदबदाकर निकल पड़ीं। मैंने उनको पोस्ट कर दिया। भाई लोगों ने खूब मजे लिये। कोई कहता है बहुत खूब लिखते रहें, कोई कहता मौज लेना सामाजिक अपराध है। हालत ऐसे हो गये हमारे  जैसे भीड़ में कोई उचक्का फ़ंस जाये। कोई उसे इधर घसीटता है कोई उधर। कोई कहता है मारो साले को । कोई कहता है छोड़ दो बेचारे को। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>कवितायें जब भी सोचता हूं खुराफ़ात ही सूझती है। खुराफ़ाती मुखड़े आकर खड़े हो जाते हैं सामने फ़ट से। जैसे &#8230; अब जैसे के आगे क्या कहें। अपने आप समझ जाइये।<br />
जैसे आज ही सोचना शुरू किया तो फ़ट से एक मुखड़ा सामने आ गया रूपा फ़्रंट लाइन पहनकर-<br />
<strong>जिंदगी एक झाम है<br />
कलट्टरगंज का जाम है<br />
निकल गये तो सुकून है<br />
फ़ंस गये तो हराम है।</p>
<p></strong></p>
<p>अब देखिये डायरी से शुरू हुये थे। कविता तक आ पहुंचे- बेमतलब की बातें करते-करते। </p>
<p>अच्छा ही हुआ। <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/513 ">खराब लिखने के यही फ़ायदे</a>तो देख ही चुके  हैं। अब बेमतलब लिखने के भी देख लिये जायें।</p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span> <br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/42236633/" title="Photo Sharing"><img src="http://3.bp.blogspot.com/_zBSqWAaYKPY/TGgDd4zROiI/AAAAAAAAAH0/kwU_lU9SNCY/S172/DSC00650+(1).JPG"  alt="शिवकुमार मिश्र" /></a></div>
<p>मीर के थे तीर तो गालिब का भी था इक कमान<br />
नाम लेकर इनका ही चलती हैं कितनी ही दुकान है।</p>
<p>मीर थे, ग़ालिब थे, चाहे दाग थे तो इसमें क्या<br />
लिख दिया ब्लॉगर कवि ने एक मोटा सा दीवान है।</p>
<p>मीर-गालिब ब्लॉग पर लिखते गजल की पोस्ट औ<br />
गर न मिलती टिपण्णी तो लुट गया होता जहान है।</p>
<p>है सदा रोशन तुम्हीं से बुद्धि का दीपक यहाँ<br />
और ऐसे दीपकों से जगमगाता है मकान है।</p>
<p>कह दिया इक ब्लॉगर ने भी बात जो मन में रही<br />
और कहकर दे गया अपना भी छोटा सा निशान है।</p>
<p>सच तो ये है ब्लॉग पर भी कितने गालिब-मीर हैं<br />
सब मिले तो उठ गया है, ब्लॉग का ऊंचा मचान है।</p>
<p>आप से हमारी ए विनती ऐड कर अशआर एक<br />
और घर पर पंहुच कर डिनर में लें सब्जी औ नान है।</p>
<p><a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/ ">शिवकुमार मिश्र की बज में बिना मतलब का सुधार करने के बाद </a></p>
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		</item>
		<item>
		<title>&#8230;तुम मेरे जीवन का उजास हो</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1632</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1632#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 11 Aug 2010 16:30:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[तुम मेरे जीवन का उजास हो! न जाने कब मेरे मन आयी होगी पहली बार यह बात लेकिन अब इसे मैं फ़िर फ़िर दोहराता हूं सोचता हूं फ़िर दोहराता हूं। सच तो यह है कि मुझे पता भी नहीं ठीक-ठीक मतलब उजास का लेकिन कुछ-कुछ ऐसा लगता है कि इसका मतलब होता है रोशनी जिसमें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span> <br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/42236633/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/32/42236633_5522633bdf_m.jpg"  alt="गुलाब घिर गया है गुलालों से" /></a></div>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/44 ">तुम </a>मेरे जीवन का उजास हो!</p>
<p>न जाने कब मेरे मन आयी होगी<br />
पहली बार यह बात<br />
लेकिन अब इसे मैं<br />
फ़िर फ़िर दोहराता हूं<br />
सोचता हूं फ़िर दोहराता हूं।</p>
<p>सच तो यह है<br />
कि मुझे पता भी नहीं<br />
ठीक-ठीक मतलब उजास का<br />
लेकिन कुछ-कुछ ऐसा लगता है<br />
कि इसका मतलब होता है रोशनी<br />
जिसमें सब कुछ दिखता है उजला-उजला सा<br />
तुम्हारी मुस्कान में धुला-धुला सा।</p>
<p>अगर कोई पूछे<br />
तो शायद बता भी न पाऊं ठीक-ठीक<br />
कि कैसा होता है जीवन का उजास<br />
हां यह जरूर लगता है कि यह है<br />
बस एक खुशनुमा सा एहसास<br />
जिसमें न रोशनी में चौंधियाती हैं आंखें<br />
और न किसी अंधेरे में उड़ते हैं होशो हवास।</p>
<p>मैं यह नहीं कहता<br />
-सच तो यह है कि मैं यह कहना भी नहीं चाहता<br />
कि तुम सबसे सुन्दर<br />
सबसे अच्छी हो इस दुनिया में<br />
या तुम जैसा भला-प्यारा<br />
और कोई नहीं इस सारी दुनिया में।</p>
<p>क्योंकि ऐसा सोचना तुमसे बिछुड़कर<br />
पूरी दुनिया में बेमतलब भटकने जैसा है<br />
दुनिया भर की सुन्दरता में कुश्ती कराने जैसा<br />
जिसमें सिवाय बदसूरती के कोई नहीं जीतता।</p>
<p>जितनी भी यादे हैं हमारे साथ की<br />
वे बस पहले और पहले<br />
या उसके भी और पहले की हैं<br />
या फ़िर पहले के थोड़ा बाद की<br />
या फ़िर बाद वाली से कुछ पहले की।</p>
<p>ऐसा कुछ याद नहीं मुझे<br />
जिसे दोहराते हुये मैं कह सकूं<br />
ये तो भला हुआ हमारे साथ<br />
लेकिन वो हुआ कुछ कम भला<br />
जो समय बीत गया<br />
लगता है सब भला-भला सा<br />
तुम्हारी मुस्कान में धुला-धुला सा।</p>
<p>पहले, बहुत पहले कभी डरता था<br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/44 ">तुमसे बिछुड़ जाने के एहसास से</a><br />
अर्सा हुआ ऐसी कोई बात सोचे हुये<br />
अब तो हंसी आती है<br />
कभी ऐसा सोचने की बात सोच-सोचकर।</p>
<p>लगता ही नहीं कभी अलग रहे<br />
अनगिन दिन के अलगाव के बावजूद<br />
हमेशा यही लगता रहा<br />
कि तुम कहीं दूर नहीं<br />
बस यहीं कहीं आसपास हो!</p>
<p>तुम मेरे जीवन का उजास हो!</p>
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		</item>
		<item>
		<title>&#8230;स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1619</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1619#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 10 Aug 2010 03:15:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[१.वे लिख रहे हैं कवितायें जैसे जाड़े की गुनगुनी दोपहर में गोल घेरे में बैठी औरतें बिनती जाती हैं स्वेटर आपस में गपियाती हुई तीन फ़ंदा नीचे, चार फ़ंदा ऊपर* उतार देती हैं एक पल्ला दोपहर खतम होते-होते हंसते,बतियाते,गपियाते हुये। औरतें अब घेरे में नहीं बैठती, आपस में बतियाती नहीं, हंसती,गपियाती नहीं स्वेटर बिनना तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;;" src="http://farm1.static.flickr.com/3/4386588_4929bbde26_m.jpg" /></a></div>
<p>१.वे लिख रहे हैं कवितायें<br />
जैसे जाड़े की गुनगुनी दोपहर में<br />
गोल घेरे में बैठी औरतें<br />
बिनती जाती हैं स्वेटर<br />
आपस में गपियाती हुई<br />
तीन फ़ंदा नीचे, चार फ़ंदा ऊपर*<br />
उतार देती हैं एक पल्ला<br />
दोपहर खतम होते-होते<br />
हंसते,बतियाते,गपियाते हुये।</p>
<p>औरतें अब घेरे में नहीं बैठती,<br />
आपस में बतियाती नहीं,<br />
हंसती,गपियाती नहीं<br />
स्वेटर बिनना तो कब का छोड़ चुकी हैं!</p>
<p>लेकिन वे कवितायें उसी तरह लिखते आ रहे हैं वर्षों से<br />
जैसे औरतें गपियाती हुई स्वेटर बिनतीं थीं</p>
<p>और किसी तरीके से कविता सधती नहीं उनसे।</p>
<p> * <a href="http://kabaadkhaana.blogspot.com/ ">कबाड़खाना</a> वाले अशोक पांडेय जी से हुई महीनो पहले हुयी बातचीत याद आने पर जिसमें उन्होंने कहा था- <strong>आजकल कवितायें ऐसे लिखते हैं लोग जैसे औरतें स्वेटर बुनती हैं।</strong></p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;;" src="http://farm4.static.flickr.com/3277/2496139865_feea470d64_m.jpg" /></a></div>
<p>२. देख री जरा कैसी बनी है कविता -<br />
आज ही लिखी सुबह भाव आया<br />
साबुन लगाकर नहाते हुये<br />
सोचा लिख डालूं इसके पहले कि<br />
भाव फ़ूट ले निगोड़ा हरजाई बादल सा<br />
उसे कैद कर लूं अपनी कविता में।</p>
<p>अच्छी है लेकिन थोड़ा कठोर है<br />
भावुकता जरा कम है तेरे हिसाब से<br />
सहेली टेलिविजन पर निगाह गड़ाये हुये बताती है।</p>
<p>वह जोड़ती है कविता में<br />
कुछ कोमल ,मुलायम शब्द<br />
और कविता के अंत में आये<br />
नायक के चेहरे से चश्मा उतरवाते हुये थमाती है रूमाल<br />
कविता में मिलाती है थोड़ी भावुकता और ढेर सारा गीलापन।</p>
<p>सहेली को फ़िर दिखाती है<br />
सहेली खिल जाती है<br />
&#8212; कविता में आये बदलाव को देखकर<br />
कविता का लटपटापन उसको प्यारा लग रहा है।</p>
<p>लड़की खुश होकर दूसरी कविता लिखती है<br />
उसके पास अभी बचा हुआ है सुबह-सुबह आये<br />
भाव का बहुत बड़ा हिस्सा<br />
वह हिल्ले लगा देना चाहती है उसे भूल जाने से पहले।</p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;;" src="http://farm3.static.flickr.com/2639/3924151157_278c2bb7b1_m.jpg" /></a></div>
<p>३. बहुत प्यारी कवितायें हैं<br />
उपमायें गजब की हैं<br />
खिलखिलाती लड़कियां<br />
खिले हुये फ़ूल<br />
झरने सी हंसी<br />
उजले दांत<br />
तितली सी हसरतें<br />
भौंरो सी इच्छायें</p>
<p>लेकिन इस तरह की कवितायें तो बहुत आम हैं<br />
हर कोई लिखता है</p>
<p>कुछ अलग लिखो ताकि लोगों को लगे<br />
हां यह कोई अलग कविता है<br />
कविता लिखना जितना जरूरी है<br />
उससे कम जरूरी नहीं अलग तरह की कविता लिखना।</p>
<p>जी मैं अभी सीख रहा हूं<br />
हाल ही में शुरू किया प्रेम कवितायें लिखना<br />
इसके पहले क्रांति,बदलाव, समाज पर लगा रहा।<br />
आप प्लीज इनको जरा सुधार दीजिये।</p>
<p>गुरुजी जुट गये हैं कविता शुद्धिकरण में<br />
तोड़ दिया दांत आधा उजले दांतों से<br />
खिलखिलाती हंसी में मिला दिया चुटकी भर डर<br />
मसल दिया तितली का एक पर<br />
तोड़ दी भौंरे की एक सूंड़<br />
सारे बिम्ब बना दिये पूरे से जरा सा कम पूरे।</p>
<p>उन्होंने पढ़ा है कल ही किसी कविता में-<br />
पूरी सुन्दरता से ज्यादा अपील करती है<br />
सुन्दरता की तरफ़ बढ़ती थोड़ी कम सुन्दरता।</p>
<p>गुरुजी जुटे हुये हैं कविता का अंग-भंग कर<br />
उसे अलग तरह की कविता बनाने में<br />
जैसे बच्चों के हाथ-पांव तोड़कर<br />
उनको भीख मांगने के लिये तैयार किया जाता है।</p>
<p>नया कवि देख रहा है गुरूजी को मुग्ध भाव से<br />
एक अच्छी भली कविता को<br />
अलग तरह की कविता बनाते  हुये।</p>
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		</item>
		<item>
		<title>कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1612</link>
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		<pubDate>Fri, 06 Aug 2010 16:06:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=1612</guid>
		<description><![CDATA[कवि और लेखक अपनी बात कहने के लिये उपमा/रूपक का सहारा लेते हैं। फ़ूल सा चेहरा, झील सी आंखे, हिमालय सी ऊंचाई, सागर सी गहराई, मक्खन सा मुलायम, चाकू सा तेज, कल्पना का घोड़ा। इस तरह से बात समझने में आसानी होती है। पढ़ा/सुना/देखा/सोचा और बात समझ में आ गयी। जिस चीज को किसी ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a href="file:///C:\Users\AKS\AppData\Local\Temp\WindowsLiveWriter-429641856\supfiles100933\image15.png"><img title="clip_image002[4]" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="185" alt="clip_image002[4]" src="http://farm4.static.flickr.com/3159/2579037271_b6df3724a0_m.jpg" align="left" border="0" /></a></div>
<p>कवि और लेखक अपनी बात कहने के लिये उपमा/रूपक  का सहारा लेते हैं। फ़ूल सा चेहरा, झील सी आंखे, हिमालय सी ऊंचाई, सागर सी गहराई, मक्खन सा मुलायम, चाकू सा तेज, कल्पना का घोड़ा।</p>
<p>इस तरह से बात समझने में आसानी होती है। पढ़ा/सुना/देखा/सोचा और बात समझ में आ गयी। जिस चीज को किसी ने देखा हो उस सरीखा किसी दूसरे को बताया जाये तो दूसरे के बारे में खट से एक अंदाज हो जाता है। </p>
<p>लेकिन बिम्ब/उपमाओं की भी उमर होती है। समय के साथ वे उपमायें बेमानी सी हो जाती हैं लेकिन रूढ़ हो जाने के चलते चालू रहती हैं। प्रयोग करते रहते हैं लोग! उपमायें कोई <strong>’प्रयोग किया फ़ेंक दिया’</strong> जैसी खपतिया सामान तो होती नहीं। पीढियों तक चलती हैं। लेकिन इसई के चलते लफ़ड़ा भी होता है अक्सर।</p>
<p>अब जैसे देखिये जैसे कल्पना के घोड़े पर सवार होने की बात है। यह उपमा जब प्रयोग में आना शुरु हुई होगी तब घोड़ा ही सबसे तेज सवारी होता होगा। कल्पना को तेज भगाना है सो घोड़े पर बैठा दिया। भागती चली गयी किड़बिड़-किड़बिड़। जिन लोगों ने इसका प्रयोग शुरु किया होगा वे पुरुषवादी मानसिकता के भी बताये जा सकते हैं। क्योंकि घोड़े पर बैठने का काम ज्यादातर पुरुषों ने किया। महिलायें तो डोली/पालकी पर ही चलती रहीं। तो जहां कल्पनाओं की बात चली। पुरुषों की कल्पनायें भागती चली गयी घोड़े पर और स्त्रियों की कल्पनायें धीरे-धीरे पिछलग्गू बनी चलती रहीं। पिछड़ गयीं। क्या यह भी एक कारण है महिलाओं के पीछे रह जाने का? </p>
<div style="width: 200px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%;  border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;">कल्पना के लिये घोड़े की सवारी करते हुये दिखाना ऐसा ही है जैसा बाढ़ में राहत सामग्री बंटना। कागज पर सब बंट गयी लेकिन पहुंची कहीं नहीं।  </div>
<p>अब कोई कह सकता है कि कल्पना तो अंतत: स्त्रीलिंग शब्द है। चाहे पुरुष की हो या स्त्री की। घुड़सवारी तो कल्पना ही करेगी। लेकिन यह भी सोचा जाये कि जो स्त्री पात्र कभी खुद घोड़े पर नहीं बैठी वह अपनी कल्पना को कैसे बैठा देगी। बैठायेगी भी तो बहुत दूर तक भेजने में सकुचाइयेगी। इत्ती दूर तक ही भेजेगी ताकि अंधेरा होने के पहले कल्पना वापस घर लौट आये। या फ़िर किसी पुरुष कल्पना के साथ सवार होकर उसके साथ जायेगी।</p>
<p>बहरहाल छोड़िये औरत/मर्द की बात। अब आप यह सोचिये कि आजकल तेज सवारी कार के जमाने में  कल्पना को घोड़े पर सवार बताना क्या सही है। सड़कों से घोड़े गायब हैं, गांवों से अस्तबल गायब हैं, सेनाओं में घोड़े केवल परेड के लिये बचे। ले-देकर घोड़े सिनेमा में बचे हैं जहां हीरो या विलेन को किसी घोड़े पर दांव लगाते दिखाना होता है बस्स। ऐसे में कल्पना के लिये घोड़े की सवारी करते हुये दिखाना ऐसा ही है जैसा बाढ़ में राहत सामग्री बंटना। कागज पर सब बंट गयी लेकिन पहुंची कहीं नहीं।  </p>
<p>अब कल्पना के घोड़े की जगह कल्पना की साइकिल,मोटर साइकिल, कार, मर्सिडीज ,आल्टो प्रयोग होना चाहिये। सामूहिक कल्पनाओं के लिये मेट्रो कल्पना, राजधानी कल्पना, शताब्दी कल्पनायें प्रयोग की जा सकती हैं।</p>
<div><a href="file:///C:\Users\AKS\AppData\Local\Temp\WindowsLiveWriter-429641856\supfiles100933\image15.png"><img title="clip_image002[4]" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="185" alt="clip_image002[4]" src="http://farm4.static.flickr.com/3140/3534416614_a55b1c80e5_m.jpg" align="left" border="0" /></a></div>
<p>कभी-कभी लोग बड़ी अटपटी उपमायें प्रयोग करते हैं। ऐसा लगता है कि कवि/लेखक लोग हमेशा क्रांति के मूड में रहते हैं। जो चीज दिखी सामने उसे हथियार में बदल लिया। जो बिम्ब दिखा उसे जोत दिया अपनी रचना सवारी में। चल बेटा पाठक के पास। पाठक अपना दिल खोले इंतजार कर रहा है। पलक पांवड़े बिछाये हुये।</p>
<div style="width: 200px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%;  border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;">बिम्ब/ उपमानों का भी कोई बिम्ब-उपमान अधिकार होना चाहिये। जिस किसी बिम्ब को उसकी गरिमा के अनुरूप न लगाया जाये वो भाग के चला जाये <strong>बिम्ब अधिकार आयोग</strong> में और ठोंक से मानहानि का दावा। </div>
<p>आये दिन इस तरह के अन्याय/अत्याचार होते रहते हैं बिम्बों/उपमानों के साथ। किसी को कहीं फ़िट कर दिया कोई कहीं। बिम्ब/ उपमानों का भी कोई बिम्ब-उपमान अधिकार होना चाहिये। जिस किसी बिम्ब को उसकी गरिमा के अनुरूप न लगाया जाये वो भाग के चला जाये <strong>बिम्ब अधिकार आयोग</strong> में और ठोंक से मानहानि का दावा। ऊंचाई का बिम्ब ऊंचाई के लिये, नीचाई का नीचाई के लिये। महानता का बिम्ब महान लोगों के साथ लगेगा, कम महान लोगों का कम महान लोगों के साथ। सीनियर बिम्ब सीनियर पात्र के लिये जूनियर बिम्ब नये,ताजे, फ़ड़कते पात्र के लिये। किसी भी बिम्ब के साथ दुभांती हुई तो वह बिना फ़ीस के अदालत में मुकदमा ठोंक सकता है। उसका केस कोई सरकारी वकील बिम्ब लड़ेगा जिसको साहित्य की भी जानकारी होगी। </p>
<p>बहुतायत में प्रयोग किये जाने वाले बिम्ब बिम्ब आयोग अधिकार में अर्जी लगा सकते हैं कि साहब देखिये काम तो हमसे हचक के लिया जाता है लेकिन मजूरी वही जो सबको मिलती है। फ़िंच जाते हैं प्रयोग होते-होते लेकिन उसके हिसाब से भुगतान नहीं होता। कम उमर वाले नये बिम्ब को खतरे वाली जगहों में भेजने की मनाही हो सकती है। स्त्री बिम्बों की सुरक्षा के लिये विशेष उपाय किये जायें। उनके भी आरक्षण की बात चल सकती है ताकि उसे भी लटकाया जा सके।</p>
<p>अगर ऐसा हुआ तो बड़े मजेदार किस्से आयेंगे सामने। अब देखिये एक  नामचीन च लोकप्रिय गीतकार ने <a href="http://www.youtube.com/watch?v=Z01tIg6SS8A&#038;feature=autofb ">शहीद की शान में कविता</a>पेश की है। </p>
<p>शहीद की शान में कवितायें लिखना एक उज्ज्वल परम्परा शहीदों पर कविता लिखना हमेशा सुरक्षित रहता है। कोई कुछ बोल नहीं सकता सिवाय सर झुकाकर आंखे नम कर लेने के। कवि को भी कविता में शहीद अलाउंस मिल जाता है। उसके  काव्यदोष को अनदेखा कर दिया जाता है। पोयटिक जस्टिस का भी विशेषाधिकार तो हमेशा ही रहता है कवि के साथ।</p>
<p>हां तो बात शहीद पर लिखी गयी कविता की हो रही थी। तो कवि ने लिखा है और फ़िर सुर में गाया भी है- <strong>है नमन उनको कि, जिनके सामने बौना हिमालय</strong> अब बताइये इसका मतलब क्या समझा जाये। हिमालय को बौना बना दिया शहीद के सम्मान में। </p>
<div><a href="file:///C:\Users\AKS\AppData\Local\Temp\WindowsLiveWriter-429641856\supfiles100933\image15.png"><img title="clip_image002[4]" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="185" alt="clip_image002[4]" src="http://farm4.static.flickr.com/3172/2618179576_9fdcb25ede_m.jpg" align="left" border="0" /></a></div>
<p>हिमालय को हम <a href="http://www.brandbihar.com/hindi/literature/kavya/ramdharisingh_dinkar.html ">दिनकरजी की कविताओं </a>से जानते आये हैं।<br />
<strong>मेरे नगपति! मेरे विशाल!<br />
साकार, दिव्य, गौरव विराट<br />
पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!<br />
मेरी जननी के हिम-किरीट!<br />
मेरे भारत के दिव्य भाल!<br />
मेरे नगपति! मेरे विशाल!</strong><br />
अब बताइये कभी का साकार,दिव्य,गौरव विराट बौना होकर कैसा लगेगा?  कवि हिमालय को बौना बनाये बिना भी शहीद को महान बता सकता था। हिमालय से अनुरोध करता तो वह शहीद के सम्मान में अपना माथा झुका देता। उससे कहते तो वह शहीद की याद में नदियों के रूप में बह जाता। लेकिन शायद कवि मजबूर है। उसका काम हिमालय को बौना बिना चल नहीं पायेगा। </p>
<p>एक सैनिक के मुंह से ही कभी हमें सुनवाया गया था-<strong><br />
कट गये सर हमारे तो कुछ गम नहीं<br />
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया। </strong></p>
<div style="width: 200px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%;  border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;">शहीद की शान में कवितायें लिखना एक उज्ज्वल परम्परा शहीदों पर कविता लिखना हमेशा सुरक्षित रहता है। कोई कुछ बोल नहीं सकता सिवाय सर झुकाकर आंखे नम कर लेने के। कवि को भी कविता में शहीद अलाउंस मिल जाता है। </div>
<p>अपनी जान देकर भी जिस हिमालय के सर को झुकने से बचा पाने का संतोष  सैनिक के मन रहा होगा उसी हिमालय को सैनिक के सम्मान में बौना बना दिया। सैनिक की आत्मा कलपती होगी। जिसकी रक्षा के लिये वह शहीद हो गया वही उसके चलते बौना हो गया। बेटे की शहादत पर बाप का सीना चौड़ा होता है, सर फ़ख्र से ऊंचा होता है। किसी बेटे की शहादत के बारे में लिखते हुये कोई कवि लिखे बेटे के शहीद होने से बाप बौना हो गया-इसी तरह की बात लगती है हिमालय को बौना बताना।</p>
<p>धर्मपाल अवस्थीजी ने कारगिल के शहीदों की याद करते हुये कविता में पाकिस्तानी सैनिकों का जिक्र करते हुये लिखा है- अउना, बउना सब पउना सब। ( वे सब भगोड़े तुम्हारे सामने (शहीदों के सामने) औने,बौने, पौने हैं)। लेकिन यहां कवि जी ने हिमालय का हिसाब कर दिया। देश का गौरव सैनिक की शहादत से बौना हो गया। बलिहारी है कवी जी की।  </p>
<p>कोई आशु कवि इस तरह की उपमायें लिखे तो बात  समझ में आती हैं लेकिन हमारे समय के  लोकप्रिय गीतकार इस तरह की वीरतायें दिखायें हैं तो उनको कौन रोकेगा? कौन टोकेगा? खासकर तब जब वे इस बात को अपना कविता पाठ शुरू करने से पहले बताते हैं अंग्रेजी में- Its better to be a good poet than a bad engineer. जब अच्छे कवि के ये हाल हैं तो खराब कविगणों के क्या हवाल होंगे। उनके प्रशंसक जो उनको अनुकरण करके लिखने-पढ़ने का अभ्यास करते हैं वे भी इसी महान परम्परा को आगे बढ़ायेंगे। अटपटे,चौंकाने वाले बिम्ब इस्तेमाल करेंगे, बेमेल उपमायें देंगे और कविता- कल्याण करेंगे।</p>
<p>वैसे कवि की अपनी स्वतंत्र सत्ता होती है। वह अपने मन, मूड, मौका, मर्जी के अनुसार अपने बिंब तय करता है। कभी-कभी तो चाहकर भी अटपटा बिम्ब बदल नहीं पाता। किसी-किसी कविता में तो बिम्ब का अटपटापन ही उसकी खूबसूरती बन जाता है। बिम्ब से अटपटापन हटा दो कविता की खूबसूरती का फ़ेयरवेल हो जाता है।</p>
<div><a href="file:///C:\Users\AKS\AppData\Local\Temp\WindowsLiveWriter-429641856\supfiles100933\image15.png"><img title="clip_image002[4]" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="185" alt="clip_image002[4]" src="http://farm3.static.flickr.com/2118/2177840305_d3b442fda2_m.jpg" align="left" border="0" /></a></div>
<div style="width: 200px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%;  border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;">रचनाओं के साथ नये-नये प्रयोग करने की चाह के चलते भी चौंकाने वाले बिम्ब प्रयोग में लाये जाते हैं। अक्सर इस तरह के प्रयोग देखते रहने के चलते अब तो इस तरह के प्रयोगों में चौंकाने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।</div>
<p>निदा फ़ाजली जी की बहुत प्रसिद्ध गजल है जिसमें उन्होंने मां के बारे में लिखते हुये लिखा था- <a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80_%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A4%B0_/_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B2%E0%A5%80 ">बेसन की सोंधी रोटी पर ,खट्टी चटनी जैसी मां।</a> बहुत प्यारी सी बलि-बलि जाऊं टाइप उपमा है मां की। न जाने कितने लोगों ने इस जमीन पर गजलें लिखीं होंगी। लेकिन इसको अलग नजरिये से देखा जाये तो लगता है कि संबंधो की वस्तुओं में बदलने की कवायद की शुरुआत है। मां का दर्जा दुनिया के हर साहित्य में ऊंचा ,सबसे ऊंचा माना गया है। मां के उदात्त गुणों की बात की जाती है। मां की ममता , प्रेम, क्षमा, त्याग के न जाने कितनी-कितनी तरह उपमायें प्रयोग की गयीं होंगी। लेकिन इसमें मां की याद को खट्टी चटनी,चौका-बासन,चिमटा, फुकनी  जैसी बताकर शायर ने मां को सामान में बदल दिया। बहुत प्यारा बिम्ब है लेकिन मां को सामान में बदलने के बाद। </p>
<p>रचनाओं के साथ नये-नये प्रयोग करने की चाह के चलते भी चौंकाने वाले बिम्ब प्रयोग में लाये जाते हैं। अक्सर इस तरह के प्रयोग देखते रहने के चलते अब तो इस तरह के प्रयोगों में चौंकाने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।</p>
<p>अरे लेकिन हम भी यह सब क्यों लिख रहे हैं। हम कोई कवि या आलोचक तो हैं नहीं। मात्र पाठक और श्रोता हैं। एक श्रोता और पाठक को यह अधिकार थोड़ी होता है कि वह कवि और शायर के काम में दखल दे। है कि नहीं! </p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<div><a href="file:///C:\Users\AKS\AppData\Local\Temp\WindowsLiveWriter-429641856\supfiles100933\image15.png"><img title="clip_image002[4]" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="185" alt="clip_image002[4]" src="http://www.anubhuti-hindi.org/geet/v/vinod_shrivastav/vinod_shrivastav.jpg" align="left" border="0" /></a></div>
<p>गीत !<br />
हम गाते नहीं<br />
तो कौन गाता?</p>
<p>ये पटरियां<br />
ये धुआँ<br />
उस पर अंधरे रास्ते<br />
तुम चले आओ यहाँ<br />
हम हैं तुम्हारे वास्ते।</p>
<p>गीत !<br />
हम आते नहीं तो<br />
कौन आता?</p>
<p>छीनकर सब ले चले<br />
हमको<br />
हमारे शहर से<br />
पर कहाँ सम्भव<br />
कि बह ले<br />
नीर<br />
बचकर लहर से।</p>
<p>गीत!<br />
हम लाते नहीं<br />
तो कौन लाता?</p>
<p>प्यार ही छूटा नहीं<br />
घर-बार भी<br />
त्यौहार भी<br />
और शायद छूट जाये<br />
प्राण का आधार भी</p>
<p>गीत!<br />
हम पाते नहीं<br />
तो कौन पाता?</p>
<p>-<a href=" http://www.anubhuti-hindi.org/geet/v/vinod_shrivastav/index.htm">विनोद श्रीवास्तव,कानपुर</a></p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1144" rel="bookmark"><img src="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/Syi1BcMe3hI/AAAAAAAAApY/A4c5sVp5wts/s400/14122009284.jpg" alt="&hellip;..जिंदगी धूप तुम घना साया" title="&hellip;..जिंदगी धूप तुम घना साया" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1144" rel="bookmark" class="crp_title">&hellip;..जिंदगी धूप तुम घना साया</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1390" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2422/3553188761_e711eb9e7a_m.jpg" alt="&#8230;हम आपकी इज्जत करते हैं!" title="&#8230;हम आपकी इज्जत करते हैं!" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1390" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;हम आपकी इज्जत करते हैं!</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1333" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3220/3069355997_1d7cc2c6e3_m.jpg" alt="छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला" title="छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1333" rel="bookmark" class="crp_title">छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1371" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3299/3257348510_7124ee889a.jpg" alt="&#8230;आंख के अन्धे नाम नयनसुख" title="&#8230;आंख के अन्धे नाम नयनसुख" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1371" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;आंख के अन्धे नाम नयनसुख</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1360" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2570/4095083186_21a29670a3_m.jpg" alt="&#8230;चींटी चढ़ी पहाड़ पर" title="&#8230;चींटी चढ़ी पहाड़ पर" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1360" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;चींटी चढ़ी पहाड़ पर</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>बरसात, बचपन,वजीफ़ा और मित्रता दिवस</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1597</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1597#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 03 Aug 2010 19:42:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[दो दिन से टेलीफोन गड़बड़ाया था। बरसात के चलते हुआ होगा शायद। बरसता पानी घुसा होगा गढ्ढे में और अंधेरे में तार को जकड़ लिया होगा तन्वंगी नायिका समझकर। अब वहां उनको बरजने टोंकने वाला तो कोई है नहीं। जुटे हैं अकेले में। टेलीफ़ोन खराब हो, बिजली जाये उनकी बला से। उनको तो अपने से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TFhj70hFd6I/AAAAAAAABG4/0EtggiHD3ps/s1600/Picture+269.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://farm5.static.flickr.com/4002/4489005424_d63a513e8e_m.jpg" border="0"alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501256824193906594" /></a></div>
<p>दो दिन  से टेलीफोन गड़बड़ाया था। बरसात के चलते हुआ होगा शायद। बरसता पानी घुसा होगा गढ्ढे में और अंधेरे में तार को जकड़ लिया होगा तन्वंगी नायिका समझकर। अब वहां  उनको बरजने टोंकने वाला तो कोई है नहीं। जुटे हैं अकेले में। टेलीफ़ोन खराब हो, बिजली जाये उनकी बला से। उनको तो अपने से मतलब बस्स!</p>
<p>मौसम भइय़ाजी की तरह चिपचिपा हो गया है। पंखा चल रहा है लेकिन चिपचिपाहट की सामान्तर सरकार चल रही है। उसको उखाड़ नहीं पाती पंखे की हवा। एयरकंडीशनर चल नहीं रहा है। वोल्टेज कम है। ऐसा अक्सर होता है। चिपचिपी गर्मी में एयरकंडीशनर चल नहीं पाता। वैसे ही जैसे मौके पर स्टार खिलाड़ी चल नहीं पाते। </p>
<p>बरसात की जब बात चलती है मुझको बचपन की याद आती है। बचपन में मकान के बाहर की नाली के उफ़नते पानी में कागज की नाव बना के डालते थे। नाव उचकती-फ़ुचकती आगे जाती।वहां तक जाती जहां तक पानी की धार साफ़ रहती। जहां नाली में कूड़े का स्पीड ब्रेकर मिलता वहीं चक्कर खाकर रुक जाती। आगे नहीं जा पाती। स्मृतियों में नाव अभी भी बनी है। नावों का याद आना यह बताता है कि कोई यात्रा पूरी नहीं हुई है। यात्रायें या तो अभी शुरू हुई हैं या अटकी हैं। यात्रा पूरी हुई होती तो नावें याद न आती, नाली का साफ़ पानी याद आता, नाली की धार याद आती।</p>
<p>यादों का भी अजीब खेल है। अक्सर बचपन ही याद आता है। मेरे छोटा बच्चे ने तो बोलना शुरू करते ही कहना शुरू कर दिया था-<strong>&#8230;.जब हम छोटे थे।</strong></p>
<p>इतवार को स्टेशन से घर वापस लौटते हुये अपने पुराने मोहल्ले (गांधी नगर) की तरफ़ चले गये। मन किया कि वह कारखाना देखें जहां <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/384 ">भैया बचपन में काम करते थे। </a>धीरे-धीरे  चलते हुये एक-एक इमारत देखते रहे। कहीं वह कारखाना न दिखा। सोचा तीस-पैंतीस साल हो गये शायद कारखाना बंद हो गया हो। जब बड़ी-बड़ी मिलों के प्लॉट काटकर बेचे जा रहे हैं तो एक मकान में चलते कारखाने की क्या औकात।</p>
<p>फ़िर याद आया कि अब जिब बिकती कहां  हैं! स्याही वाले पेन ही जब चलन से बाहर हो गये हैं तो पेन में लगनी वाली जिब का क्या काम? फ़िर उसके कारखाने की क्या जरूरत। बन्द हो गया होगा। स्मृति में वह मकान/कारखाना अभी भी है लेकिन वास्तविकता में वहां नहीं है। ठीक-ठीक याद भी नहीं है कौन मकान था। लेकिन याद भी होता तो क्या उसकी जगह नया मकान आ जाता। यादों में <strong>इसकी जगह ये पढ़ें</strong> नहीं चलता!</p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TFhj70hFd6I/AAAAAAAABG4/0EtggiHD3ps/s1600/Picture+269.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://farm1.static.flickr.com/113/284654625_50305672b3_m.jpg" border="0"alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501256824193906594" /></a></div>
<p>फ़िर वहीं आगे आनन्द बाग में रहने  वाले बचपन के दोस्त लक्ष्मी बाजपेयी से मिलने चले गये। तमाम यादें दोहराते रहे। लेलिन पार्क से समोसा मंगाये गये। कोने वाली जिस दुकान से मंगाये गये थे उस दुकान से कभी अपने दोस्त के साथ अक्सर जलेबी खाते थे। चवन्नी की जलेबी बहुत लगती थी। आज चवन्नी की क्या औकात?</p>
<p>लक्ष्मी रोज मेरी फ़ैक्ट्री के आगे से निकलते हैं लेकिन मुलाकात नहीं हो पाती। वे एक प्राइवेट फ़ैक्ट्री में काम करते हैं। हजार करोड़ रुपये का टर्न ओवर है लगभग साल भर का। बता रहे थे उस इंडस्ट्रियल स्टेट के लोगों को मजूरी तीन-हजार /पांच हजार मिलती है। अपने यहां सरकारी लोगों की तन्ख्वाह से तुलना करते हैं तो लगता हैं सरकारी मजूर प्राइवेट के मुकाबले में बहुत मजे में है। प्राइवेट में ज्यादा पैसे केवल गिने-चुने लोगों को मिलते हैं। हल्ला बहुत होता है। इत्ते लाख का पैकेज उत्ते लाख का पैकेज। जान निकाल लेते हैं कामगारों की। </p>
<p>लक्ष्मी के मकान के ही बगल के मकान में वह प्राइमरी स्कूल था जिसमें मैं कक्षा एक से कक्षा पांच तक पढ़ा। जिस बरामदे में हम लोग  रोज शाम को गुरुजी की निगरानी में  कबड्डी खिलाते थे उसकी रेलिंग टूट गयी है और नीचे झूल गयी है। अगल-बगल के बड़े-बड़े मकान जो उस समय बड़े भव्य लगते थे उनमें कबूतर बैठे गुटरगूं करते दिखे। मानो वे भी अपना बचपना याद कर रहे हों। यह भी लगता है कि सामने स्कूल देखकर पहाड़े याद कर रहे हों।  </p>
<p>आगे ही थोड़ी दूर पर वह मकान है जिसके एक कमरे में हम लोग किराये पर रहते थे। बचपन से इलाहाबाद जाने तक। कमरे का किराया मुझे अभी भी याद है छह रुपया महीना। बिजली का किराया एक बल्ब के लिये पांच रुपये महीना था। यह पच्चीस -सत्ताइस साल पहले की बात है। मकान में अठारह किरायेदार रहते थे। एक नल। पानी के पीछे अक्सर लड़ाई-झगड़ा होता। हर किरायेदार अपना नम्बर आने पर सबसे बड़ी बाल्टी में पानी भरता और आखिरी बूंद की गुंजाइश होने तक बाल्टी नल के नीचे रहती। पता नहीं अब पानी आता भी न शायद उन नलों में। सार्वजनिक पानी की व्यवस्था बीते सालों के साथ चौपट ही हुई है।</p>
<p>मकान में सब साधारण स्थिति वाले किरायेदार रहते थे। एक-एक कमरे में पांच-सात,दस लोग रहने वाले। हल्ला-गुल्ला,चहल-पहल मची रहती। अंधेरे भरे उस मकान में आंगन में आती धूप की अभी भी याद है। तीन मंजिलों वाले उस मकान में बच्चे-बड़े मिलाकर सौ लोग रहते होंगे। हर मंजिल पर एक सार्वजनिक पाखाना था और एक नल । उसमें भी ऊपर की मंजिल पर पानी कम ही पहुंचता था। अगल-बगल  रहने वाले किरायेदारों के परिवार वाले शहर में ही रहते हैं लेकिन वहां से निकलने के बाद फ़िर बहुत कम लोगों से मिलना हुआ। </p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TFhj70hFd6I/AAAAAAAABG4/0EtggiHD3ps/s1600/Picture+269.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TFhj70hFd6I/AAAAAAAABG4/0EtggiHD3ps/s320/Picture+269.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501256824193906594" /></a></div>
<p>बगल के ही घर में रहने वाले अनिल दीक्षित ने मुझसे एक साल पहले कानपुर के ही एचबीटीआई से बीटेक,आई.आई.टी.खड़गपुर से एम.टेक और फ़िर कार्मेल युनिवर्सिटी अमेरिका से पी.एच.डी की। आजकल मुंबई आई.आई.टी. में प्रोफ़ेसर हैं। आजकल कानपुर आये हुये हैं। कल के अखबार में छात्रवृत्ति के बारे में अन्य लोगों के साथ उनका  एक बयान छपा। उन्होंने कहा- ’ <strong>मध्यवर्गीय परिवार के लिये स्कॉलरशिप भारत रत्न से कम नहीं होती’।</strong>कल रात यह खबर पढ़ी अखबार में। देर तक सोचता रहा कि अगर बचपन से पढ़ाई पूरी होने तक अगर स्कॉलरशिप न मिली होती तो क्या आज यहां तक पहुंच पाते हम। पता नहीं क्या होता मुझे लेकिन अनिल की बात सही लगती है। </p>
<p>अपने देश में न हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री है। गड़बड़झाला है। घपले-घोटाले हैं। भाई-भतीजावाद है। लेकिन उसी के बीच ऐसे भी हालात हैं जहां तमाम लोग बिना किसी सोर्स-सिफ़ारिश के स्कॉलरशिप पाते हैं , पढ़ाई कर लेते हैं, नौकरी पाते हैं और अन्य न जाने कितनी-कितनी सहूलियतें पाते हैं। मिल जाने पर यह सब बड़ा सुकूनदेह लगता है। लेकिन न जाने कितने ऐसे भी होते हैं जो काबिल होते हुये भी सही जानकारी के अभाव में इनसे वंचित रह जाते हैं। यह भी एक संयोग ही है कि किसी को उसकी काबिलियत के अनुसार मौके पर सहायता मिल जाये। </p>
<p>कहां से कहां पहुंच गये हम भी। इसीलिये कहा जाता है कि यादें भूलभुलैया की तरह होती हैं। एक बार भटके कि फ़िर भटकते ही रहते हैं। </p>
<p>अब जब पोस्ट कर रहे हैं इसे तब याद आ रहा है कि इतवार को लक्ष्मी से मिले थे। उस दिन मित्रता दिवस था। दो घंटे बतियाते रहे लेकिन दोनों में से किसी को याद नहीं रहा कि मित्रता दिवस की मुबारक भी देनी है जबकि उसी दिन सुबह से कई लोगों से यह आदान-प्रदान हो चुका था।</p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TFhj70hFd6I/AAAAAAAABG4/0EtggiHD3ps/s1600/Picture+269.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://0.gravatar.com/avatar/ebec36c44cd1371daa3eea01cb2cc668?s=96&#038;d=http%3A%2F%2F0.gravatar.com%2Favatar%2Fad516503a11cd5ca435acc9bb6523536%3Fs%3D96&#038;r=G" border="0"alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501256824193906594" /></a></div>
<p>छलांग भर की दूरी पर<br />
सड़क कालीन सी पसरी है<br />
शाम के गढ़ियाते अंधेरे में<br />
कोई साया तैरता सा गुजरता है।</p>
<p>कमरा भर अंधेरे के बाहर,<br />
खिड़की के पार-<br />
बरसाती घास के उस तरफ,<br />
सड़क पर गुजरता शरीर<br />
गाढ़ेपन में एकाकार हो<br />
विलीन होता दीखता है।</p>
<p>पर अभी भी<br />
यह एकदम साफ है कि<br />
रास्तों पर जिंदगी बाकायदा आबाद है।</p>
<p>-<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/56 ">अनूप शुक्ल</a></p>
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		<title>&#8230;.जिंदगी का एक इतवार</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 03:55:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[दो दिन पहले झमाझम बारिश हुई। दफ़्तर से घर आने के लिये उसके रुकने का इंतजार करते बारिश के जलवे देखते रहे। मन किया कि बारिश में भीगते हुये घर चला जाये। लेकिन यह सोचकर कि जेब मे कागज और मोबाइल भीग जायेंगे बरज दिये मन को। कपड़े भले सूख जायें एक दिन में लेकिन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://farm3.static.flickr.com/2492/4122319476_caeefbb75b_m.jpg" /></a></div>
<p>दो दिन पहले <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1583 ">झमाझम बारिश</a> हुई। दफ़्तर से घर आने के लिये उसके रुकने का इंतजार करते बारिश के जलवे देखते रहे। मन किया कि बारिश में भीगते हुये घर चला जाये। लेकिन यह सोचकर कि जेब मे कागज और मोबाइल भीग जायेंगे बरज दिये मन को। कपड़े भले सूख जायें एक दिन में लेकिन जूता सूखने में दो दिन ले लेगा। मोबाइल भी चला जायेगा। वैसे पन्नी में सब कुछ रखकर भीगने की हसरत ( जो सच में थी ही नहीं)  पूरी कर सकते थे लेकिन फ़िर मटिया ही तो दिये।</p>
<p>झमाझम बारिश में एक चिड़िया के दो बच्चे पानी में फ़ंस गये हैं। आफ़िस के सामने सड़क पर फ़ंसे वे पानी में छ्टपटा रहे हैं। साथ के लोग उन बच्चों को भीगते हुये सड़क से उठाकर बरामदे में रखते हैं। बच्चे ठिठुर रहे हैं। उनके शरीर के रोयें शरीर में चिपके हैं। चिड़ियों, पेड़ों के बारे में सिफ़र जानकारी के चलते मुझे पता चलता कि वे किस चिड़िया के बच्चे हैं। तब तक एक चिड़िया वहां आ जाती है। शायद वह उन बच्चों की मां है। पानी में भीगते हुये वह आवाज लगाकर बच्चों को खोजती है। बच्चे उसकी आवाज सुनकर धीरे-धीरे बोलते हैं। दोनों में संवाद स्थापित हो जाता है। चिड़िया को अपने बच्चों की स्थिति का अंदाजा हो जाता है। वह वहां बरामदे से हमारे हटने का इंतजार कर रही है शायद।</p>
<p>शहर में सड़क जगह-जगह खुदी है। खुदी जगहों पर बोर्ड लगे हैं कि सड़क पर ताजा खुदी मिट्टी है। धंस सकती है। भारी वाहन न आयें। लिखावट इत्ती छोटी है कि दूर से दिखती नहीं। ट्रक अगर कोई आयेगा रात के अंधेरे में तो कैसे देखेगा। खुदाई बहुत दिन से हो रही है। भराई भी। अभी सड़क का समतल होना और बोर्ड का हटना बाकी है।</p>
<p>शहर की तरफ़ जाते हुये देखता हूं कि एक नौजवान बड़ी इस्पीड में मोटरसाइकिल दौड़ाते आता है और सामने से फ़ुर्र सा सड़क पर मोटरसाइकिल लहराते हुये चला जाता है। सड़क पर मोटरसाइकिल लहराते हुये वह साइन वेव सी बनाता है। उसके बाल हवा में उड़ रहे हैं। हेलमेट भी नहीं लगाये है बच्चा। मैं अपनी हमेशा की बोर कर देने वाली समझाइस अपने मन में दोहराता हूं- अगर आप 100% परफ़ेक्ट ड्राइवर हैं तो आप 50% सुरक्षित हैं। पचास प्रतिशत सुरक्षा अगले  के हाथ में हैं। बच्चा हेलमेट भी नहीं लगाये है। </p>
<p>पत्नी और बच्चा बिग बाजार में पैसे बरबाद करने गये हैं। मैं बाहर इंतजार कर रहा हूं। आते-जाते लोगों को देखता हूं। मॉल में लोग कितने खुश-खुश से लगते हैं। खुबसूरत, चहकते,महकते, बेपरवाह, बिन्दास। कभी-कभी लगता है कि अपना सारा देश एक बहुत बड़ा मॉल होता। सबको यहां बुलाकर शामिल कर लिया जाता। सारी गरीबी,दुख, कष्ट दूर हो जाते। देश क्या दुनिया के बारे में भी ऐसा ही लगता है। लेकिन इत्ता बड़ा मॉल बनने में बहुत समय लगेगा। न जाने कित्ते साल। न जाने कित्ते दशक। न कित्ती शताब्दियां।</p>
<p>कभी-कभी हिसाब लगाता हूं कि आज के ही दिन दुनिया की सारी सम्पत्ति सब लोगों में बराबर-बराबर बांट दी जाये तो कित्ता पड़ेगा हरेक के हिस्से में। हमारी कित्ती कम हो जायेगी। यह खाम ख्याली है। लेकिन सोचते हैं अक्सर। सोचना ससुर अपने आप में खाम ख्याली है। ख्याल जब आते हैं मन में तो उनकी जामा तलासी नहीं होती। मन मॉल बनने से बचा हुआ है। </p>
<p>मुझे तीसरी मंजिल पर रेलिंग के पास बहुत देर से खड़ा देखकर नीचे से सिक्योरिटी गार्ड वहां से हटने के लिये कहता है। उसको बताया गया होगा यह करने के लिये। आजकल हर जगह सुरक्षा की ढेर चिंता की जाती है। हर जगह जामा तलाशी। हर जगह बदन टटोली। लेकिन फ़िर भी दुर्घटनायें हैं कि घट ही जाती हैं। बेतुकेपन के बावजूद ये कविता पंक्ति याद आती है:<strong><br />
<blockquote>तस्वीर पर जड़े हैं<br />
ब्रह्मचर्य के नियम और<br />
उसी तस्वीर के पीछे<br />
एक चिड़िया बच्चा दे जाती है।</p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>इस बीच मैं पास में ही रहने वाले अपने सीनियर अग्निहोत्री जी से मिलकर आता हूं। चाय के बहाने उनकी बहू तमाम तरह का नास्ता करा देती है। सास-ससुर अपनी बहू की खूब सारी तारीफ़ करते हैं। अग्निहोत्री जी तमाम किस्से सुनाते हैं। एक महाप्रबंधक ने किसी गलती पर उनके एक स्टॉफ़ को निलम्बित करने का आदेश दिया। अग्निहोत्रीजी ने उनसे कहा- साहब गलती तो हुई है लेकिन इसके लिये आपका उस स्टॉफ़ को निलम्बित करना शेर के द्वारा मेढक का शिकार करने जैसा है। इसी बात पर खुश होकर उन्होंने निलम्बन रद्द कर दिया। उन्हीं महाप्रबंधक ने एक दिन उनको फ़ोन किया और कहा- अग्निहोत्री मैं इस समय हजरतगंज में लाल बत्ती की गाड़ी में घूम रहा हूं। मैंने जिन्दगी में इस बात की कभी कल्पना नहीं थी। सोचा यह बात किससे शेयर करूं तो तुम्हारी याद आयी और तुमको फ़ोन किया। </p>
<p>आदमी कितनी भी ऊंची पोस्ट पर पहुंच जाये उसके अंदर तमाम मासूम ख्वाहिशें बनी रहती हैं। हमारे अंदर कुछ बचपना हमेशा बना रहता है।</p>
<p>घर लौटते हुये कार का एअर कंडीशनर चालू कर देता हूं। वही सीली हवा बार-बार घूमती रहती है। बाहर गरम हवा फ़ेंकती है कार। दुनिया में वातानुकूलन बढ़ता जा रहा है। धरती गर्म हो रही है। दुनिया भर में न जाने कित्ती बहसें एअरकंडीशनर कमरों/हालों में होती हैं। धरती को ठंडा करने के उपाय उसको गरम करते हुये सोचे जाते हैं। जिसे देखो वह कहने लगता कि नष्ट हो जायेगी धरती इस तरह एक दिन।</p>
<p>मैं सोचता हूं कि धरती क्या नष्ट हो जायेगी। उसके लिये तो मानव और तमाम लोगों की तरह एक जानवर है। जब डायनोसर खतम हुये तब भी धरती न नष्ट हुई। तमाम तरह के जानवर नष्ट हुये, वनस्पतियां खतम हो गयीं तब भी धरती न नष्ट हुई तो आदमी के नष्ट होने से क्या खतम होगी! उसके लिये यह तो केवल बदलाव होगा। शायद रोचक भी हो कि उसकी छाती पर मूंग दलने वाले कम हुये। उसके दूसरे बच्चों को आजादी मिली। 6000 किलोमीटर की त्रिज्या वाली पृथ्वी के एकाध -दो, दस-बीस मिलोमीटर को बरबाद करके हम सोचते हैं कि धरती खतम हो जायेगी। धरती जब हिम युग में न खतम हुई, आग के गोले के समय न खतम हुई तो जरा सा ताममान बढ़ने से खतम हो जायेगी भला।</p>
<p>हम अपने को सब कुछ मानकर सबके खात्मे की बात करने लगते हैं। यह दीवार पर चढ़ती एक चींटी की सोच की तरह है जिसके पर निकल आये हैं और वह सोचती है अब तो दुनिया खतम हो जायेगी। </p>
<p>अजब चिरकुटई है। है कि नहीं! बताइये भला। </p>
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		<title>&#8230; बरसात, बिम्ब की तलाश और बेवकूफ़ी की बहस</title>
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		<pubDate>Fri, 23 Jul 2010 19:14:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बड़े मनुहार के बाद बारिश आयी है। अपने लाव लश्कर के साथ। सब ताम-झाम साथ लाई हैं वर्षा महारानी। अकेले चलना उनको सुहाता भी नहीं। वे वी आई पी की तरह आयी हैं। वीआईपी देर से आता है लेकिन ताम-झाम साथ में लाता है। बारिश भी तमाम बवाल संलग्नक की तरह लाई है। रास्तों पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बड़े मनुहार के बाद बारिश आयी है। अपने लाव लश्कर के साथ। सब ताम-झाम साथ लाई हैं वर्षा महारानी। अकेले चलना उनको सुहाता भी नहीं। वे वी आई पी की तरह आयी हैं। वीआईपी देर से आता है लेकिन ताम-झाम साथ में लाता है। बारिश भी तमाम बवाल संलग्नक की तरह लाई है। रास्तों पर पानी, याद आई नानी। सड़कों पर जाम, नगरवासी हलकान। मकान गिरा  धड़ाम, कित्ते निपट गये हाय राम। </p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm4.static.flickr.com/3595/3779577088_5128964345_m.jpg" /></a></div>
<p>बारिश आते ही लोगों के मन-मयूर नृत्य करने लगे। जिन लोगों ने मोर नाचते हुये नहीं देखे वे इसे <strong>मन नचबलिये हो गया</strong> हो गया पढ़ें। बारिश होते ही तमाम लोग <strong>सरोज खान</strong> की तरह सीटी बचाने लगे। भीगने का प्लान बनाने लगे। भीगते ही कपड़े सुखाने लगे। सड़कें पानी से धुल गयीं। तमाम सड़कें तो धुलते-धुलते खुल गयीं। पानी को देखते ही सड़कों के मन जमाखोर से हो गये। उन्होंने अपने-अपने सीने खोल दिये पानी के स्वागत में। पानी की हवस में टूट गयीं लेकिन पानी को नाली तक जाने नहीं दिया। सच तो यह है कि नालियां हैं ही नहीं। शहरों में नालियां प्राइमरी हेल्थ क्लीनिक के डाक्टरों सी नदारद दिखती हैं हमेशा।</p>
<p>सड़क पर पानी को अकेले डर लगता है। उसने सड़क पर खुदी सीवर लाइन की मिट्टी से गठबंधन कर लिया है और कीचड़ बन गया है। कीचड़ गढ्ढों में गुम्म-सुम्म सा बैठ गया है। कोई सवारी आती है उससे मिलने तो छटककर गढ्ढे से दूर भाग जाता है। सवारी दूर जाते ही फ़िर वापस आ जाता है। </p>
<p>बारिश आते ही अखबारों के संवाददाता कैमरा लेकर नीचे इलाकों की तरफ़ टूट पड़ते हैं। उलटे-पुलटे ट्रक,धंसी सड़कों, दरके मकान , तालाब बने पार्क की फ़ोटो लेकर अखबारों में सटाने लगते हैं। एक महिला की तस्वीर में दिखाया है कि वह पानी के बीच स्कूटर हाथ से घसीटकर जा रही है। ऐसे में गंदगी दिख जाये पानी के किनारे फ़ोटोग्राफ़र को तो सोने में सुहागा। लेकिन पानी जब तेज बहता है तो गंदगी को भी अपने साथ ले लेता है। कहां अकेले बोर होगी -चल मेरे साथ। कहीं गप्पे लड़ायेंगे। दो-चार दिन ऐश करेंगे। सूखे में साथ नसीब न हुआ तो क्या। बारिश में तो साथ रह ही सकते हैं। </p>
<p>एक आटो वाला सवारी लादे  एक पानी भरे गढ्ढे के बगल से मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर निकल रहा है। गढ्ढा पार ही होने वाला है तब तक एक बस बगल से आकर सड़क का सारा कीचड़ उठाकर उसके ऊपर फ़ेंककर बेशरम सी आगे चली जाती है। आटो में बैठी सवारी बस वाले को कोसने की सोचती है लेकिन अचानक सड़क पर आये गढ्ढे के कारण आटो सहित टेढ़ा होने पर अपने दूसरी तरह मेढा हो जाती है। आटो के सीधा होने और बच जाने के सुकून की सांस लेती है । बस से मिला  कीचड़ भी इस सुकून कर्म में साथ देता है। मुसीबत में साथ देने के कारण वह कीचड़ के प्रति कटुता भुला देती है। उसने मुसीबत में साथ जो दिया है।</p>
<p>मुसीबत में साथ देने वाली मुसीबत भी हमें प्यारी लगती है। </p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://farm1.static.flickr.com/151/392172804_0b3da33e0b_m.jpg" /></a></div>
<p>धार-धार हो रही बरसात छतों को उलाहना देते हुये कह रही हैं अरे नामुरादियों अब न टपकोगी तो कब टपकोगी। छतें बरसात के बहकावे में आकर टपकने लगी हैं। दरारें पानी की संगत पाकर चौड़ी हो रही हैं और  मीरजाफ़र बनी अपने बीच से पानी को घर में जाने का रास्ता दे रही हैं। घर के पुराने बर्तन मुसीबत में पुरानी कहावतों की तरह काम आ रहे हैं। लोग उनको यहां से वहां और वहां से फ़िर वहां न जाने कहां-कहां लिये टहल रहे हैं। बाहर होती बारिश से लोग अंदर तक दहल रहे हैं। इस कमरे से उस कमरे में टहल रहे हैं।</p>
<p>साल भर बारिश की बाट जोहने वाले और उसमें भीगने की तमन्ना रखने वाले कवि-कवियत्रियां अपने-अपने घर में घुसकर कविताओं/गजलों का मसौदा बनाने लगे हैं। वे उन देश भक्त नेताओं की तरह लग रहे हैं जो किसी आतंकी हमले के समय जेड सुरक्षा की गोद में दुबक में जाते हैं। </p>
<p>एक कवि अपने घर में सुरक्षित बैठा सामने की मूसलाधार बारिश का फ़ोटोस्नैप लेकर उसको बहुत पहले की अपने याद-कबाड़ की झोपड़ी के स्नैप शाट से मिलाता है। प्रभाव लाने के लिये याद-कबाड़ की झोपड़ी में दो-चार छेद करता है और उसमें से पानी अंदर घुसाकर सब गीला-सीला करके गीली-सीली कवितायें रच डालता है।कविता में मार्मिकता लाने के लिये वह उसमें डेढ़ किलो दर्द मिलाता है। झोपड़ी के बच्चे के कपड़े फ़ाड़कर उसकी मासूम हंसी को अनदेखाकर  उसमें अपनी  बेबसी चस्पा करता है और कविता फ़ाइनल कर देता है। उसके चेहरे पर सृजन का दर्द फ़ैला हुआ है। </p>
<p>बारिश अभी खतम नहीं हुई सो कवि फ़िर दूसरी कविता रचने लगता है। इसमें वह बच्चे की मुस्कान को उसके पास ही छोड़ देता है और बिजली की चमक को चपला बताकर लिखता है कि वह(बिजली) उसके (बालक के ) दांतों की चमक से हीन भावना ग्रस्त होकर  धरती पर सरपटक कर आत्महत्या कर लेती है।</p>
<p>एक दूसरा कवि नये मूड की कविता लिखने की जिद पाले पन्ने-पन्ने पर बरबाद किये जा रहा है। कविता उसे सूझ नहीं रही है जैसे हमें अपने देश की आबादी, अशिक्षा, गरीबी, बिजली,पानी  की समस्यायों के हल नहीं सूझते। अचानक वह एकदम नये मूड में आकर  <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/27 ">हायकू</a> रचने लगता है:</p>
<blockquote>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://farm4.static.flickr.com/3173/3055731804_b6b10d0cbd_m.jpg" /></a></div>
<p><strong>पानी बरसा,<br />
छत टपक गई<br />
अरे बाप रे!</p>
<p>मिट्टी थी जो,<br />
कीचड़ बन गई,<br />
अरे बाप रे!</p>
<p>दरारें बोली,<br />
मेरे पानी भइया<br />
धीरे निकलो!</p>
<p>छाता चहका,<br />
सुन मेरी छतरी<br />
पूरी बिक जा!</strong></p></blockquote>
<p>कवियत्रियां भी कविता रत हैं। कुछ बारिश में मायके को याद कर रही हैं। कुछ अपनी सहेलियों को और बाकी अपने दोस्तों को। बरसते पानी में उनको कविताओं के सिवा कुछ सूझ नहीं रहा है। मायकों के  नीम के पेड़ पर पड़े झूले पर न जाने कितनों ने अपनी कवितायें टांग दी हैं। नीम के पेड़ पर कविताओं का जाम सा लग गया है। ट्रैफ़िक आगे बढ़ ही नहीं रहा है। </p>
<p>एक तो कवियत्री तो बारिश के बिम्ब तलाशने के लिये अपने आफ़िस में ही नेट आन करके बैठ गयी है। संयोग से उसी समय उसकी सहेली भी आनलाइन हुई और दोनों बतियाने लगीं। होते करते एक ने सलाह दी कि बारिश में प्रियतम पर भी तो कविता लिखी जा सकती है। अगली ने ’नाट अ बैड आइडिया’ कहते हुये उससे प्रियतम का ’इक्जैक्ट मीनिंग’ पूंछ लिया। उसने बताया कि प्रियतम माने सबसे ज्यादा प्यारा। फ़िर तो उनके बीच प्रियतम पर शब्द चर्चा होने लगी। देखिये आप भी:</p>
<p><strong>सहेली नं १:</strong> आर यू श्योर कि प्रियतम माने सबसे प्यारा होता है?<br />
<strong>सहेली नं २:</strong> या आई थिंक सो। नाट १००% श्योर।  बट मेरे ख्याल में यही होता है।</p>
<p><strong>सहेली नं १:</strong> लेकिन मुझे तो लगता है कि प्रिय माने प्यारा तम माने अंधेरा तो <strong>प्रियतम=प्रिय + तम =प्यारा अंधेरा</strong> होना चाहिये।<br />
<strong>सहेली नं२:</strong> तुझे अंधेरे ही प्यारे लगते होंगे इसी लिये ऐसा कह रही है। लेकिन प्रियतम माने मेरे ख्याल से सबसे प्यारा ही होना चाहिये।</p>
<p><strong>सहेली नं१:</strong> ओके कोई एक्जाम्पल देकर बताओ। आई मीन किसके लिये कहा जाता है प्रियतम?<br />
<strong>सहेली नं२:</strong> एज सच कोई रूल तो नहीं है। जिसको जो प्यारा लगता है उसको प्रियतम कहने लगता है। कहीं-कहीं तो लोग अपने लवर को, हसबैंड को ही प्रियतम कहने लगते हैं। आजकल तो किसी को भी कोई भी प्रियतम कह देता है। किसी की कोई भरोसा नहीं। रिश्ते आजकल गतिशील हो गये हैं। अभी-अभी जिन लोगों में सर-फ़ुटौव्वल होने वाली है अगले क्षण वे ही एक दूसरे के प्रियतम बन सकते हैं। एक दूसरे को फ़ूटी आंखों न सुहाने वाले भी एक दूसरे की आंखों में डूबे हुये जिन्दगी गुजारने लगते हैं , प्रियतम बन जाते हैं। </p>
<p><strong>सहेली नं१:</strong> लेकिन यार तुझको ये नहीं लगता कि जो मैं कह रही हूं वह सही है। प्रियतम माने <strong>प्यारा अंधेरा</strong> ही होता है।<br />
<strong>सहेली नं२:</strong> अब भाई मैं क्या कहूं? मैं जो बता रही हूं तेरी समझ में आ नहीं रहा है। तू बहुत काबिल है न! मैं ठहरी बेवकूफ़। तू जो सही समझती है वही सही है।</p>
<p>अपने को बेवकूफ़  कहकर सहेली नं २ ने बहस में हनक लाने की कोशिश की। सहेली नं १ इस चालाकी को समझ गयी। वह अच्छी तरह समझती है कि उसकी सहेली बेवकूफ़ी को हथियार की तरह प्रयोग करती है। जहां कहीं फ़ंस गयी वहां अपने को बेवकूफ़ बताकर जमानत करा ली। </p>
<p>अपने समाज में यह अक्सर होता है। जब शातिर लोग चिरकुटई करते पकड़े जाते हैं तो अपने को जाहिल और भुच्च देहाती बताकर बच निकलते हैं। जाहिलियत और देहातीपने को हथियार की तरह प्रयोग करते हैं।</p>
<p>सहेली नं २ के पलट वार करते हुये कहा- तू अपने को बहुत बेवकूफ़ समझती है। मैं तेरे को चैलेंज करती हूं कि अगर मैं चाहूं तो तेरे को एक महीने में बेवकूफ़ी में पछाड़ कर रख दूंगी। तेरे से बड़ी बेवकूफ़ बनकर दिखा दूंगी। </p>
<p>सहेलियां बरसात, कविता, प्रियतम और अंधेरे को अकेला छोड़कर आपस में बहस करने लगीं। समय की कमी थी और बहस बहुत सारी करनी थी इसलिये वे हिन्दी छोड़कर फ़ुल अंग्रेजी में उतर कर बहस करने लगीं। </p>
<p>अंग्रेजी में बहस की स्पीड रहती है और बहसियाने वाले ग्रेसफ़ुल लगते हैं। अंग्रेजी में बहस करने का यही फ़ायदा है कि बकबास करते लोग भी ऊंची बात कहते प्रतीत होते हैं। औपनिवेशिक देशों के अग्रेंजी वह तिरपाल है जिसके नीचे लोग अपनी तमाम कमियां छुपा लेते हैं।</p>
<p>दोनों सहेलियां के बहस में व्यवधान डाला उनमें से  एक के दफ़्तर के बाबू ने। उसने पूछा -मैडम ये बताइये कि कम्प्यूटर पर हिंदी में ’बाढ़ ’ कैसे लिखते हैं?</p>
<p>सहेली ने बताने के पहले कारण पूछा। उसको शक हुआ कि शायद बाबू भी बारिश पर कोई कविता लिखना चाहता है।</p>
<p>लेकिन बाबू के इरादे नेक थे। वह सूखा राहत कार्यों के लिये खरीदी गयी फ़ाइलों में से बच गयी फ़ाइलों का उपयोग बाढ़ राहत के कामों के लिये करके सरकारी पैसे बचाने की मंशा से सूखा की जगह बाढ़ लिखना चाह रहा था। वह कम्प्यूटर पर बाढ़ की चिप्पियां तैयार कर रहा था। लिख रहा था baaDHx= बाढ़|</p>
<p>बरसात अभी हो रही है। छत अभी टपक रही हैं। बिम्ब पर बहस जारी है। कविगण कवितायें लिख रहे हैं। छते चू रही हैं। छतरियां खुल रही हैं। खिल रही हैं। पानी झमाझम बरस रहा है। </p>
<p>ऐसे में बताओ मैं यह पोस्ट लिखे जा रहा हूं। बेवकूफ़ी ही है न! </p>
<p>अच्छा बताओ आप होते तो क्या करते ऐसी बरसात में?</p>
<h2>मेरी पसन्द</h2>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://anubhuti-hindi.org/kavi/k/kln/kanhaiyalal_nandan.jpg" /></a></div>
<p>बिन बरसे मत जाना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना।</p>
<p>मेरा सावन रूठ गया है<br />
मुझको उसे मनाना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना!</p>
<p>झुकी बदरिया आसमान पर<br />
मन मेरा सूना।<br />
सूखा सावन सूखा भादों<br />
दुख होता दूना<br />
दुख का<br />
तिनका-तिनका लेकर<br />
मन को खूब सजाना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना!</p>
<p>एक अपरिचय के आँगन में<br />
तुलसी दल बोये<br />
फँसे कुशंकाओं के जंगल में<br />
चुपचुप रोए<br />
चुप-चुप रोना भर असली है<br />
बाकी सिर्फ़ बहाना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना।</p>
<p>पिसे काँच पर धरी ज़िंदगी<br />
कात रही सपने!<br />
मुठ्ठी की-सी रेत<br />
खिसकते चले गए अपने!<br />
भ्रम के इंद्रधनुष रंग बाँटें<br />
उन पर क्या इतराना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना!</p>
<p>मेरा सावन रूठ गया है<br />
मुझको उसे मनाना रे बादल!<br />
बिन बरसे मत जाना!</p>
<p><a href="http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/varshamangal/sets/18aug.htm ">डा.कन्हैयालाल नंदन</a></p>
<div id="crp_related"><h3>ये भी देखें:</h3><ul><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1564" rel="bookmark"><img src="http://farm5.static.flickr.com/4040/4390436711_98ca85724e_m.jpg" alt="&#8230;खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी" title="&#8230;खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1564" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1619" rel="bookmark"><img src="http://farm1.static.flickr.com/3/4386588_4929bbde26_m.jpg" alt="&#8230;स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें" title="&#8230;स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1619" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1576" rel="bookmark"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3319/3662450501_7368fdfe0e_m.jpg" alt="&#8230;.बरखा रानी जरा जम के बरसो" title="&#8230;.बरखा रानी जरा जम के बरसो" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1576" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;.बरखा रानी जरा जम के बरसो</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1590" rel="bookmark"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2492/4122319476_caeefbb75b_m.jpg" alt="&#8230;.जिंदगी का एक इतवार" title="&#8230;.जिंदगी का एक इतवार" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1590" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;.जिंदगी का एक इतवार</a></li><li><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1556" rel="bookmark"><img src="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s200/06072010946.jpg" alt="&#8230;.देश बड़ी इस्पीड में चल रहा है" title="&#8230;.देश बड़ी इस्पीड में चल रहा है" width="50" height="50" border="0" class="crp_thumb" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1556" rel="bookmark" class="crp_title">&#8230;.देश बड़ी इस्पीड में चल रहा है</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>&#8230;.बरखा रानी जरा जम के बरसो</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Jul 2010 03:47:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
		<category><![CDATA[इंद्र]]></category>
		<category><![CDATA[बदली]]></category>
		<category><![CDATA[बादल]]></category>
		<category><![CDATA[बारिश]]></category>
		<category><![CDATA[मुंबई]]></category>
		<category><![CDATA[रामपुर]]></category>

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		<description><![CDATA[देश में मानसून आ गया है। छा गया है। लेकिन हमारे इधर अभी बारिश जम के नहीं हुई है। न सड़कें भरी हैं न नालियां जाम। बारिश में भीगने की तमन्ना तो खैर सालों से है। भीगने से डर से इसको हम अमल में नहीं लाते। बहरहाल इसी बहाने एक पुराने लेख का रिठेल देखिये। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>देश में मानसून आ गया है। छा गया है। लेकिन हमारे इधर अभी बारिश जम के नहीं हुई है। न सड़कें भरी हैं न नालियां जाम। बारिश में भीगने की तमन्ना तो खैर सालों से है। भीगने से डर से इसको हम अमल में नहीं लाते। बहरहाल इसी बहाने एक <a href=" http://hindini.com/fursatiya/archives/165">पुराने लेख</a> का रिठेल देखिये। सोचते हैं बरखा रानी कहीं दिखें तो उनको भी पढ़वाकर कहें &#8211; बरखा रानी जरा जम के बरसो!</p>
<h2><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/165 ">हमरी लग गयी आंख बलम का बिल्लो ले गयी रे</a></h2>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm4.static.flickr.com/3319/3662450501_7368fdfe0e_m.jpg" /></a></div>
<p>हम खुले में खड़े थे। आसमान महीने की अंतिम तारीख की जेब सा  साफ था। अचानक मौसम किसी अवसर वादी नेता की जबान सा पलटा और बादल पिंडारियों की तरह हमारे कपड़े का सूखापन लूट कर सडकों,नालियों से होते हुये जमीन को भिगोते हुये नाले में बहने लगे ।</p>
<p>बरसात का मौसम होते ही इन्द्र देवता की नाक में दम होने लगता है। हर बादल को अलग-अलग इलाके में बरसने के लिये भेजने का काम करना होता है। बादल भी अब राजनीतिक दलों के नेताओं की तरह अनुशासनहीनता की हरकतें करने लगे हैं। भेजो कहीं के लिये, बरस कहीं और आते हैं&#8230;।</p>
<p>भगवान इन्द्र एक मनचले से बादल को फटकारते हुये बोले,&#8217;क्यों भाई,तुम्हारी ड्यूटी इस बार लगी थी झांसी जिले में और तुम ड्यूटी बजा आये मुंबई में। पिछली बार भी तुम बस्तर की बजाय सारा पानी मुंबई में उड़ेल आये थे। ये क्या मजाक है?&#8217;</p>
<p>बादल कुछ शर्म से तथा बाकी बेशर्मी से बोला,&#8217;साहब बरसने का मजा तो मुंबई में ही है। वहां तो हीरो-हीरोइनों तक को भिगोने का मौका-मजा मिलता है। मुझे जब आपने झांसी भेजा तो स्टेशन से बरसने की शुरूआत का डौल लगा ही था ,भूरा रंग कर लिया था,हवा चला दी। मेढक की टर्र-टर्र का इंतजाम कर लिया,कौन झोपड़ी गिरानी है यह भी तय कर लिया।कौन सा नाला उफनायेगा,कहां सड़क में पानी भरेगा सब प्लान कर लिया। हम बस &#8216;एक्शन&#8217;कहने ही वाले थे कि साहब हमें पुष्पक एक्सप्रेस दिख गयी। सो साहब अपना दिल मचल गया। पिछले साल की याद आ गई। दिल माना नहीं और हम लटक लिये ट्रेन में और जाकर मुंबई में बरस आये। अब आप जो सजा देओ ,सो सर माथे। &#8216;सजा सर माथे&#8217; सुनते ही इन्द्र भगवान ने अपना सर और माथा दोनों पकड़ लिया।&#8217;</p>
<p>एक दूसरे बरसे हुये बादल को डांटते हुये भगवन बोले,&#8217;क्योंजी तुम्हें रामपुर के लिये भेजा गया था और तुम सारा पानी सीतापुर में उड़ेल आये? ये कैसी लापरवाही है? क्या भांग खाये रहते हो जो रेलवे के ड्राइवरों की तरह काम करते  हो?तुम्हें पानी बरसाने भेजा गया था कोई कार्पेट बाम्बिंग करने थोडी की जहां जगह देखी गिरा दिया जखीरा।&#8217;</p>
<p>&#8220;साहब हम जब रामपुर जा रहे थे तो सीतापुर से होकर गुजरे। वहां देखा कि वर्षा के लिये पूजा-पाठ,शंख-घड़ियाल हो रहा था। हमने सोचा एक ही घर का मामला है। सीतापुर में जो पानी दे देंगे तो रामपुर चला ही जायेगा। हम इसी धोखे में रहे और डिलीवरी देकर चले आये। &#8220;-बादल ने अपना बचाव करते हुये कहा।</p>
<p>&#8216;अरे क्या बेवकूफों की तरह बात करते हो? जहां ड्यूटी लगी है वहाँ जाना चाहिये। हमने तुम लोगों को पचास बार समझाया कि पैट्रयाट मिसाइलों जैसी हरकतें मत किया करो जो दगती किले पर हैं, गिरती आबादी पर हैं। ये पगलैटों की तरह हरकतें मत किया करो। ज्यादा बदमाशी करोगे तो फिर से लगा देंगे डाक बांटने में। बने मेघदूत थमाते रहोगे चिट्ठियां दुनिया भर में,विरहणी नायिकाऒं को।&#8217;-इंद्र भगवान आज कुछ ज्यादा ही उखड़ रहे थे।</p>
<p>&#8216;लगता है साहब को आज फिर सबेरे-सबेरे डायटिंग अभियान के चलते नाश्ता नहीं मिला तभी इतना कुड़बुड़ा रहे हैं&#8217; ,बादल ने सोचा और उवाचा- &#8216;साहब ,वो तो सब ठीक है लेकिन लोगों की पूजा-पाठ,जरूरत को भी तो कोई तवज्जो देनी पड़ती है कि नहीं। हमारी तो वहां यज्ञ के धुयें हालत खराब हो गयी इसीलिये हम घबरा के वहीं निपट लिये।&#8217;</p>
<p>&#8216;अरे यार,तुमको क्या समझायें,कैसे समझायें। हम तो लगता है पागल हो जायेंगे समझाते-समझाते। अगर खाली चिरौरी-मिनती से हम पसीजते होते तो अब तक कालाहांडी,बस्तर,पाठा जलमग्न हो गये होते।अच्छा जाओ ज्यादा बहस मत करो। जाओ जरा दस मिनट की खेप ले जाओ। बंबई की तरफ वाला वाल्व खोल के निकल जाओ और डाल आओ जरा चौपाटी पर पानी। अगर थोड़ा-बहुत बचे तो खंडाला में गिरा आना।&#8217;</p>
<p>बादल के निकलते ही इंद्र भगवान फिर से अपने बादलों में बढती अनुशासनहीनता के बारे में विचार करने लगे।</p>
<div style="float:left; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-toip: 0px; "></span><br /><a href ="http://farm1.static.flickr.com/21/38725721_1f8889c918_m.jpg" title="बदली "><img src="http://farm4.static.flickr.com/3272/2511369048_c17a1fb442_m.jpg" alt="बदली "/></a></div>
<p>इन्द्र भगवान ने बहुत कोशिश की आवारा बादलों को सुधार सकें। लेकिन आवारा ,चाहें बादल ही क्यों न हो,कहीं सुधरने के लिये आवारा बनता है! रेगिस्तान में बरसने के लिये भेजे गये बादल,चेरापूंजी में खलास हो के आ जाते हैं। जो बादल भूले -भटके वहां  रेगिस्तान में पहुंच भी गये वे बादल भी बिन बरसे चले आते हैं। सारा पानी वहीं इकट्ठा होता है,जहां पहले से ही पानी जमा होता है। सूखी  जगहें बादलों के विरह में सूखती रहती हैं- <strong>अंखडियां झाईं पड़ी,पंथ निहारि-निहारि।</strong></p>
<p>भगवान अच्छी तरह समझते थे कि यह सब आदमियों की संगति का परिणाम है। लेकिन वे कुछ कर नहीं सकते थे। आखिर पहले वे भी तो जरा-जरा सी प्रार्थना पर फिसल जाया करते थे। योजना बना के रात में घूमते फिरते थे गांव-गांव। जहां किसी गांव में रात के अंधेरे में पानी के लिये महिलायें निर्वस्त्र होकर हल चलाती दिखीं वहीं के लिये वहीं से खड़े-खड़े पानी की डिलीवरी के लिये आदेश भेज दिया। बोरी-बोरी भर हवन सामग्री पर दिल लुटा बैठे। किसी भी छुटभैये देवता की सिफारिश पर उसके भक्त का घर पानी से तर कर दिया। भर दिये कुयें, बाबड़ी, नदी, ताल, तलैया, पोखर।</p>
<p>पहले तो पानी इफरात था। चल जाता था यह सब। लेकिन फ्री-फण्ड में पानी पाते-पाते मानव जाति नराधम हो गयी। पानी के साथ &#8216;अइयासी&#8217; करने लगी। जहां एक चुल्लू की जरूरत है वहां बाल्टी बहा दी। पेड़ काटे सो अलग। पेड़ तो बादलों के लिये लंगर होते हैं। जहां पेड़ होंगे वहां बादल खूंटा गाड़ के बरस लेंगे। होते-करते पानी का ड्योढ़ा गड़बड़ गया। खर्चा हुआ ज्यादा ,जमा हुआ कम। अब हालत यह है कि सारे बादलों की फौज मनचली ,अनुशासनहीन हो गयी है। उनका स्टेमिना भी कम हो गया । केरल के लिये निकला बादल सउदी अरब पहुंचते-पहुंचते हांफते हुये पस्त होकर सारा पानी उड़ेल के खलास हो जाता है। पटियाला के लिये निकला बादल कबूतर बाजी करते-करते बोस्टन में ग्रीन कार्ड की दर्‌खास्त देते पकड़ा जाता है।</p>
<p>तमाम लोगों ने समझाया कि भगवन अब जमाना बहुत आगे बढ़ गया है। ये पोथी-पत्रा त्यागो। सारा डाटा कम्प्यूटर पर रख लो। सारे बादलों को माउस से कंट्रोल करो। सब गड़बड़ी दूर हो जायेगी। इंद्र भगवान ने अपने यहां के तकनीकी देवताओं को लगाया भी इस काम में लेकिन वे भी ,आदतन ,धरती के तकनीकी विशेषज्ञों की तरह किसी भी निर्णय पर न पहुंचने का लक्ष्य पूरा कर रहे हैं। पसीना सबका बह रहा है लेकिन इंद्रजी का काम नहीं पूरा हो रहा है। खुपिया जानकारी से पता चला कि सारे तकनीकी विशेषज्ञ देवता देवभूमि भारत के हैं।</p>
<p>इंद्र भगवान पानी की मांग और पूर्ति की चूल बैठा रहे थे। जितने पानी का हिसाब  नहीं मिल रहा था उसे फुटकर खर्चे में डालते जा रहे थे। यह वे बहुत देर में जान पाये कि फुटकर खर्चे का सारा जोड़ थोक के खर्चे से कई गुना ज्यादा बैठ रहा था। भगवान सोच  में पड़ गये। पड़े-पड़े(सोच में) उनको अहसास हुआ कि यहां भी हिसाब <strong>भारत दैट इज इंडिया </strong>के रुपये की तरह हो गया है जिसके जितने हिस्से का हिसाब मिलता है उससे कई गुना ज्यादा का तो मिलता ही नहीं। जितना सफेद होता है उससे कई गुना ज्यादा काला होता है।</p>
<p>इधर इंद्र जी हिसाब में लगे थे। उधर उन्होंने देखा कि बदलियों का झुण्ड खिलखिलाते हुये इधर-उधर डोलने का अहसास देते हुये पंखों को फ्राक की तरह समेटे सरपट ही,ही,ही करता भागा चला जा रहा था। इधर-उधर के आवारा बादल उनके आसपास घूमते-घूरते हुये उनसे सटने की तमन्ना सी लिये उनके आगे पीछे लग लिये। </p>
<p>इंद्रजी ने बदलियों को आवारगी के लिये झिड़कते हुये टोंका -&#8217;तुम लोगों को कुछ काम-धाम नहीं है क्या? जब देखो डांय-डांय घूमती रहती हो। अरे कुछ नहीं तो जाओ किसी जोड़े को ही भिगा कर आ जाओ। या किसी विरहणी नायिका के पास होकर उसके पिया का संदेशा दे आओ।&#8217;</p>
<p>इसपर बदलियां खिलखिलाती हुयी बोलीं-&#8217;साहब आज तो हम कहीं न जायेंगें। हम तो आज जा रहें हैं आपके महल में। मैडम ने बुलवाया है,हरियाली तीज के लिये। देर हो गयी सजने में। जाने दीजिये नहीं तो मैडम डाटेंगीं।&#8217;</p>
<p>इंद्र को अब समझ में आया कि पिछले हफ्ते से किस लिये रोज इंद्राणी उनसे लगभग हर साड़ी लपेट के पूछ चुकीं हैं -&#8217;देखो जी मैं इसमें कैसी लगती हूँ!&#8217; उनको याद आया कि रात में नींद-बोझिल पलकों से इंद्राणी के उलाहने <strong>,&#8221;सबके आदमी कित्ता-कित्ता तो लगाते हैं,करते हैं अपनी पत्नियों के लिये। तुम मेरे हाथ हाथों में मेंहदी नहीं लगा सकते।अभी तो मैं जवान हूँ तब ये हाल है। बुढ़ापे में जाने क्या करोगे?&#8221;</strong> सुनकर घंटों मेंहदी लगाते रहे। बाद में हमेशा की तरह काम पूरा होने पर यही सुनकर सो पाये-&#8221;<strong>हटोजी ,तुमसे कुछ नहीं हो सकता। मेंहदी के साथ हमारी साड़ी भी बरबाद कर दी।</strong>&#8221;</p>
<p>सुमुखि बदलियों को देखकर इंद्र भगवान का मन कुछ बदला। काली-काली मेघ सुंदरियों का समूह उनको किसी फूल के बगीचे सा लग रहा था। छोटी-छोटी बदलियों की अल्हड़ हरकतें उनके मन में वात्सल्य पूर्ण गुदगुदी करने लगी। बच्ची बदलियों के सर पर हाथ फिराते ही उनका रहा-सहा गुस्सा भी हवा हो गया। उन्होंने सोचा बेकार &#8216;ब्लड-प्रेशर&#8217; के लिये  इतनी दवा फांकते हैं। इन बादल-बदलियों की संगत रोज क्यों न किया करें। इंद्रजी ने बदलियों को मुस्करा कर जाने का इशारा किया। </p>
<p>बदलियां ,थैंक्यू,थैंक्यू कहती हुयी झरने सी इठलाती ,कोलगेटिया मुस्कान बिखेरती इंद्र के महल की तरफ चल दीं। साड़ी समेट कर गुनगुनाती,मुस्कराती एक गतयौवना सी सुंदरी से &#8216;बस यूं ही&#8217; कुछ पूछने के लिये पूछते हुये इंद्र ने पूछा -&#8217;क्योंजी मिसेज बादल आज कौन सा गीत गाने जा रही हैं? मि.बादल तो गये हैं आज पानी बरसाने। जाते समय बता रहे थे कि आपको जाने के बारे में बता भी नहीं पाये क्योंकि आप गहरी नींद में सो रही थीं।&#8217;</p>
<p>मिसेज बादल हमेशा की तरह इठलाते हुये बोली-कहाँ गाना ,अब होता नहीं भाईसाहब! गला भी खराब है ,खांसी भी आ रही है। देखिये कुछ ऐसे ही गुनगुना दूंगी ।</p>
<p>पास से गुजरती मिसेज बादल के अधमुंदी आखों वाले मुंह से निकले रियाजी शब्द इंद्रजी को आज गाये जाने वाले गाने की सूचना दे रहे थे-</p>
<blockquote><p><strong>हमरी लग गयी आँख,बलम का बिल्लो ले गयी रे।</strong></p></blockquote>
<p>भगवान इंद्र ने तुरंत <a href="http://www.akshargram.com/narad/">नारद</a> को बुलाया। बोले यार,&#8217;सावन का महीना है,पवन भी बहुत शोर कर रहा है। अब जिये को झुमाना ही पड़ेगा। लग रहा है वन में मोर भी नाचने लगे हैं। चलो हम भी कुछ मौज-मजा करते हैं। ये पानी की कहानी तो चलती ही रहेगी।</p>
<p>कुछ हो जाये सुनते ही नारद जी ने मेनका,रंभा,उर्वशी को बुलाने के लिये मोबाइल का नम्बर टटोलना शुरू किया। यह भांपकर इंद्र बोले ,&#8217;यार इनको मत बुलाओ। बोर हो गये वही चीजें देखते-देखते। कुछ नया करो यार!&#8217;</p>
<p>कुछ नया करो यार सुनते ही सुझावों की वर्षा होने लगी। सुझाव वर्षा में घण्टो भीगने के बाद तय हुआ कि कवि सम्मेलन कराया जाये। स्थापित कवियों को बुलाने की बजाय तय किया गया कि ब्लागर कवियों को बुलाया जाय। ब्लागर कवियों को बुलाने के पीछे कारण आर्थिक था। यह पता चला कि ब्लागर कवि फोकट में मिल जाते हैं। बिना पैसे केवल वाह-वाही टिप्पणी कर दो। बस उसी में गच्च हो जाते हैं।</p>
<p>कार्यक्रम तय होने के बाद नारद जी ने एक नये रंगरूट को बुलाया और कहा-&#8217;बेटा ये <strong>समीरदेव</strong> की <a href="http://udantashtari.blogspot.com/">उड़न तस्तरी </a>ले लो। जरा पृथ्वी का चक्कर लगा आओ। जितने ब्लागर हिंदी के मिलें जो कविता लिखते हैं उन सबको आदर सहित लेकर आओ। जो मना करें उनसे कहना कि अपनी रचना ही दे दें। जो दोनों में आना-कानी करें उनको जरा अदब से समझा देना कि <a href="http://www.akshargram.com/narad/">नारद</a> जी ने कहीं फीड बंद कर दी तो फिर मत शिकायत करना।समझ गये न!&#8217;</p>
<p>रंगरूट के हां में सिर हिलाने के बाद नारद जी ने उसे हड़काना भी समयानुकूल समझा। सो थोड़ा गंभीर स्वर में बोले- &#8216;ज्यादा देर मत लगाना। अफवाह की चाल<br />
 से जाना,सांसदों के वेतन-भत्ते पास होने की गति से वापस आना। ध्यान रहे कि राहत सामग्री की तरह इधर-उधर मत डोलने लगना वर्ना संसद में महिला बिल की तरह तुम्हारा अगला प्रमोशन लटकवा दूंगा।&#8217;</p>
<p>रंगरूट बिना घबराये बोला -साहब आप चिन्ता न करें। सेवा में कोई कमी नहीं आयेगी। आपको हमारा काम पसंद आयेगा। कहते हुये रंगरूट ने उड़न तस्तरी के पायलट को तस्तरी स्टार्ट करने का हुकुम दिया। </p>
<p>उड़न तस्तरी उड़ गई। इंद्र भगवान तब तक फिर से बादलों के हिसाब-किताब में जुट गये हैं। नारद उचक-उचक के धरती की तरफ देखते हुये रंगरूट के वापस लौटने की राह देख रहे हैं।</p>
<p><strong>मेरी पसंद</strong></p>
<blockquote>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://www.kavitakosh.org/kk/images/thumb/8/87/Sarveshwardayalsaxena.jpg/140px-Sarveshwardayalsaxena.jpg" /></a></div>
<p>मेघ आये बड़े बन-ठन के ,सँवर के।</p>
<p>आगे-आगे  नाचती &#8211; गाती बयार चली<br />
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगी गली-गली<br />
पाहुन ज्यों आये  हों  गाँव में शहर के।</p>
<p>पेड़ झुक  झाँकने  लगे गरदन उचकाये<br />
आँधी चली, धूल  भागी घाँघरा उठाये<br />
बाँकी चितवन उठा नदी,ठिठकी,घँघट सरके।</p>
<p>बूढ़े पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की<br />
&#8216;बरस बाद सुधि लीन्ही&#8217;<br />
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की<br />
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।</p>
<p>क्षितिज अटारी गदरायी दामिनि दमकी<br />
&#8216;क्षमा करो गाँठ खुल गयी अब भरम की&#8217;<br />
बाँध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके<br />
मेघ आये बड़े बन-ठन के ,सँवर के।</p></blockquote>
<p><strong>-<a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE ">सर्वेश्वरदयाल सक्सेना</a></strong></p>
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		<title>&#8230;खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Jul 2010 19:06:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[एक दिन हम अपनी फ़टफ़टिया पर चले जा रहे थे। चले भी जा रहे थे, सोचते भी जा रहे थे कि इसकी सर्विंस करवानी है, ब्रेक कसवाने हैं, तेल बदलवाना है। अचानक सोच को फ़ांदता हुआ एक आइडिया आया और हमारी सोच के ऊपर छा गया। सोच के ऊपर आइडिया के छा जाने वाली बात [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm5.static.flickr.com/4040/4390436711_98ca85724e_m.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5492737383438870162" /></a></div>
<p>एक दिन हम अपनी फ़टफ़टिया पर चले जा रहे थे। चले भी जा रहे थे, सोचते भी जा रहे थे कि इसकी सर्विंस करवानी है, ब्रेक कसवाने हैं, तेल बदलवाना है। </p>
<p>अचानक सोच को फ़ांदता हुआ एक आइडिया आया और हमारी सोच के ऊपर छा गया। सोच के ऊपर आइडिया के छा जाने वाली बात से भाई लोग अपने हिसाब से  भी मतलब निकाल सकते हैं इसलिये ये समझिये कि आइडिया सोच के आगे आकर खड़ा हो गया जैसे अकेले वही रूपा फ़्रंट लाइन बनियाइन पहने हो। या फ़िर ऐसे समझ लीजिये कि जैसे कोई महिला किसी टिकट खिड़की पर पुरुषों की लम्बी लाइन के साइड से निकलकर सबसे आगे खड़ी होकर टिकट लेने लगे। इससे लगा कि आइडिया मार्डन च सुसंस्कृत सा दिखने के सारे लटके-झटके जानता है और सबसे काम की बात यह कि उसको अपना काम निकालने की तरकीबें आती हैं।</p>
<p>पहली नजर में आइडिया प्यारा लग रहा था। लेकिन हम उसको जानबूझकर ज्यादा भाव नहीं दिये। भाव देने से आइडिया उचकने लगते हैं। कभी-कभी तो बेकाबू भी हो जाते हैं। दिमाग से निकलकर जबान पर, जबान से अगले के कान से होते हुये दूसरे के पास चले जाते हैं। विधायकों ने दलबदलने की कला आइडिया लोगों से ही सीखी होगी। हमारे न जाने ऐसे कितने आइडिये हमसे निकलकर दूसरों के पास चले गये। हम आइडियों की ’सरोगेट जमीन’ बनकर रह गये।</p>
<p>हम से घाघ बने आइडिये को दूर से ही देखते रहे। दूर से क्या कनखियों से समझिये। उसको भाव नहीं दे रहे थे लेकिन अर्जुन बने ताड़ उसी को रहे थे। या समझिये जैसे कोई जनप्रतिनिधि राहत सामग्री, कोई उम्रदराज महिला अपने जवान पति पर नजर रखती है उसी तरह हम आइडिये पर नजर रखे हुये थे। आइडिये को हम उसी तरह देखते जा रहे थे जैसे कोई मिष्ठान लोभी मिठाई को  खाने के पहले बहुत आराम से देखना चाहता है।</p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm2.static.flickr.com/1393/637875911_df2b32b383_m.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5492737383438870162" /></a></div>
<p>आगे जा रहा साइकिल सवार अचानक झटके से मुड़ गया। ट्रैफ़िक के नियम का सम्मान रखने के लिये मुड़ने के बाद उसने हाथ भी दे दिया। हम चौंककर अपने को बचाने में लग गये। पहले ब्रेक मारा। झटके से आगे हुये। इसके बाद न्यूटन के तीसरे नियम के प्रति सम्मान प्रकट करते हुये पीछे हुये। दोनों काम निपटा कर सीधे हो गये। फ़िर बीच सड़क पर खड़े होकर मुड़कर आराम से जाते सवार को देखा। थोड़ा फ़टेहाल सा देखकर उसको घूर भी डाला। इसके बाद वहीं खड़े-खड़े शहर, प्रदेश और देश के   ट्रैफ़िक सेंस (सड़क व्यवहार)  को कोसने की सोची लेकिन पीछे से बड़ी गाड़ी बोले तो ट्र्क के हार्न ने हमें अपनी औकात पर ला दिया और हम फ़िर किकिया के एक्सलरेटियाते हुये आगे चले दिये। </p>
<p>आगे चलते ही हमने सोचा अब आइडिये को आराम से देखा जाये, भाला जाये और संभाला जाये। लेकिन आइडिया कहीं दिखा नहीं। वह गायब हो गया था। दिमाग पर बहुत जोर डाला लेकिन याद ही नहीं आया कि कुछ देर पहले क्या सोच रहे थे। आइडिया क्या था, किस बारे में था कुछ याद ही न आ रहा था।  आइडिया कंचनमृग हो गया था। हमारी बुद्धि उसे पाने के लिये सीता सी बेचैन हो उठी।</p>
<p>बेचैनी में हमने मोटरसाइकिल तेज भगाई और कई सवारियों को ओवरटेक कर गये। कहीं आइडिया न दिखा। फ़िर लगा कि आइडिया कोई खुपड़िया खोलकर थोड़ी भागा है। वह वहीं कहीं दिमाग में छुपा होगा। थोड़ा कोशिश करने से बरामद हो जायेगा। कोशिश करने पर तमाम पुराने-धुराने आइडिये भी घपलों-घोटालों की तरह सामने आने लगे। हमने उनको नजरन्दाज सा किया और पूरी जिम्मेदारी से सद्य लापता आइडिये को खोजने लगे। इस चक्कर में हमने न जाने कितने नायाब-लाजबाब आइडियों को उठाकर दूर फ़ेंक दिया। एक से एक हसीन-डैसिंग-हैंडसम-क्यूट और खूसट भी आइडिये सामने आ रहे थे। काम के बेकाम के। लेकिन वो वाला आइडिया नहीं मिल रहा जिसकी हमें तलाश थी। </p>
<p>इस आइडिया खोज से कुछ पुराने आइडिये तो दुखी  हो रहे थे और कुछ नाराज भी थे मैं सीनियर आइडियों को छोड़कर  जूनियर आइडिये के पीछे नबाब रंगीला बना घूम रहा हूं। कुछ ने तो अप्रत्यक्ष धमकी भी दे दी कि वे सूचना के अधिकार का उपयोग करके हमारी  तमाम ऊलजलूल हरकतों के बारे में बेफ़िजूल की जानकारी मांगकर अपने अपमान का बदला वसूल करेंगे।</p>
<p>इस आइडिये को खोजने के चक्कर में मुझे लगा मैं चिल्लर की खोज में नोट फ़ेकता जा रहा हूं। रूमाल खोजने के चक्कर में कमीज/पैंट, कोट-सूट इधर-उधर फ़ेंके चला जा रहा हूं। ओसामा को खोजने के चक्कर में जैसे अमेरिका पूरी दुनिया की तलाशी लेता-घूमता है वैसे मैं अपने दिमाग के हर कोने अतरे में अपने खोये आइडिये को खोजने लगा। </p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm2.static.flickr.com/1254/4610253715_ae5e279a5a_m.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5492737383438870162" /></a></div>
<p>जब काफ़ी कोशिश करने के बाद भी आइडिया न मिला तो हम सहज बुद्धि की शरण में गये। हमें दिमाग संबंधी कोई समस्या होती है तो फ़ौरन सहज बुद्धि की शरण में चले जाते हैं। कई बार तो कई बेवकूफ़ियां इसीलिये जानबूझकर करते हैं ताकि सहजबुद्धि के पास जाने का मौका मिले। सहजबुद्धि हमारा हाईकमान है। जैसे लोग अपनी हर छोटी से छोटी बात के लिये हाईकमान की अनुमति और आदेश लेते हैं वैसे ही हम हर उलझा-सुलझा काम सहज बुद्धि की सलाह से करते हैं। कई बार तो एक ही काम कई-कई बार उलझवा-सुलझवा लेते हैं लेकिन हमारी सहजबुद्धि जी इत्ती प्यारी हैं कि वे कभी इस बात का बुरा नहीं मानतीं। हर बार वे उलझन इस तरह सुलझाती हैं जैसे लगता है कि मैं उनके पास वह समस्या पहली बार लाया हूं। कभी-कभी तो वे भी हमारी तरह हरकतें करने लगती हैं और सुलझन को उलझाने लगती हैं। जब मैं उनको टोंकने की कोशिश करता हूं तो वे मुस्कराते हुये उसे सुलझाने लगती हैं। लगता है वो भी कुछ भुलक्कड़ हैं। कित्ता तो क्य़ूट है उसका भुलक्कड़पन। कभी-कभी तो उनका भुलक्कड़पन देखकर लगता है कि किसी को अगर सहज-सुन्दरता देखनी हो तो किसी भुलक्कड़ इंसान को देखना चाहिये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जो लोग हिन्दी भाषा का प्रयोग करने में अपनी तौहीन और पिछड़ापन समझते हैं वे कॉमन सेंस की शरण में जाते हैं। लेकिन हम उस सोच और उस लाइन के नहीं हैं इसलिये हमें सहजबुद्धि का साथ ही अच्छा लगता है। </p>
<p>सहजबुद्धि ने मुस्कराते हुये हमें देखा और सवालिया चहकन के साथ पूछा- फ़िर कोई उलझन लाये हो।</p>
<p>सहज बुद्धि की चहकन और सवाल से मुझे बड़ा सुकून मिला। वर्ना आजकल तो लोग बोलना सीखना शुरू करते ही शोले उगलने लगते हैं- क्या सोच के आये थे?</p>
<p>मेरा एक आइडिया खो गया है। आधे घंटे से मिल नहीं रहा है। -मैं दिलीप कुमार की तरह खोयी-खोयी आवाज में बोला।</p>
<p>आ जायेगा आइडिया। कहीं इधर-उधर गया होगा खेलने-कूदने। हवाखोरी करने। जायेगा कहां !!  बेचैन मत हो। धीरज रखो। -सहज बुद्धि हमेशा धनात्मक सोचती हैं।</p>
<p>अरे कैसे धीरज रखूं। कहीं मेरे उस आइडिये को किसी ने प्रयोग कर लिया तो मैं तो कहीं का न रहूंगा। मेरा तो सब कुछ लुट जायेगा। -मैं उतावला हो रहा था।</p>
<p>अच्छा कैसा था आइडिया? कुछ बताओ शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं खोजने में। -सहजबुद्धि  का  सारा ध्यान अब मुझ पर था। मुझे आइडिया खोने पर अच्छा सा लगने लगा। </p>
<p>यही तो नहीं याद आ रहा है। वह बस आया मन में और झलक दिखला के चलता बना। मैं उसके साथ फ़ोटो तक न खिंचा पाया। -मैंने फ़िर अपने को बेचैन सा दिखाया।</p>
<p>अच्छा अगर वह दुबारा आये या दिखे तो पहचान लोगे? &#8211; सहज बुद्धि अब गंभीर खोजक हो उठीं।</p>
<div><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/TDofjGhh5pI/AAAAAAAABGw/2aHKDWwK1_Q/s1600/06072010946.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://farm4.static.flickr.com/3360/4598736257_4f9e777803_m.jpg" /></a></div>
<p>हां के साथ मैंने मे बि ( May be) भी कह दिया और होप सो (hope so) भी| -पहले तो सोचा आई थिंक सो ( I think so) भी कह दें लेकिन यह सोचकर कि अंग्रेजी ज्यादा हो जायेगी हम सबर कर गये। अंग्रेजी गले में दबाने के चलते खांसी सी आयी जिसे एक्स्क्यूज मीं कहकर हमने संभाल लिया। बाद में लगा कि इससे अच्छा तो आई थिंक सो बोल ही देते। कहीं सहज बुद्धि यह न समझें कि हमारा अंग्रेजी में हाथ तंग है। आजकल जो जित्ती अंग्रेजी जानता है उसका काम उत्ता ही फ़टाफ़ट होता है। अंग्रेजी हाई क्वालिटी लुबिकेंट है। कम खर्चे में फ़टाफ़ट , स्मूथ काम करवाती है। </p>
<p>इसके बाद सहज बुद्धि सवाल-जबाब करने लगीं। बहुत सारे सवाल-जबाब तो हम आइडिये की तरह ही भूल गये लेकिन जो याद हैं उनको आपको बता रहे हैं। आप किसी को बताइयेगा नहीं। ओके!!</p>
<p><strong>सवाल:</strong> क्या वह आइडिया तुम्हारे दफ़्तर के काम से संबंधित था?<br />
<strong>जबाब</strong>: न भई! मैं दफ़्तर के काम की बात दफ़्तर के बाहर नहीं सोचता। सरकारी कामकाज की गोपनीयता भंग होती है। पता चला कोई काम सोच रहे हैं बाहर खड़े होकर और किसी को पता चल जाये तो शिकायत कर दे कि ये दफ़्तर के सूचनायें और समस्यायें बाहर खड़े होकर सोचते हैं। इसलिये मुझे नहीं लगता कि आइडिया दफ़्तर के किसी काम से संबंधित होगा।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> क्या किसी की भलाई की बात सोच रहे थे तुम?<br />
<strong>जबाब</strong>: मुझे तो नहीं लगता। अगर किसी की भलाई की बात सोच रहा होता तो अब तक अपने ब्लॉग पर लिख चुका होता। मेरा पिछला रिकार्ड रहा है कि मैंने जो भी अच्छे काम किये अब तक वे किये भले बाद में हों उनके बारे में लिखा पहले। अपनी इस आदत के चलते कई बार तो ऐसा हुआ कि भलाई के कई काम मैंने लिख पहले डाले किये बाद में। कई भलाई के काम तो सिर्फ़ लिखने और करने का हिसाब बराबर करने के लिये करने पड़े। इस मामले में मेरा सिद्धान्त है <strong>नेकी कर ब्लॉग में डाल</strong> । जो भी नेकी करो उसका जिक्र अपने ब्लॉग पर अवश्य करो ताकि सनद रहे। ( <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/275 ">आलोक पुराणिक की व्यंग्य पुस्तक &#8211; नेकी कर अखबार में डाल</a>) इस लिये मुझे तो नहीं लगता कि आइडिया कोई भला आइडिया होगा!</p>
<p><strong>सवाल:</strong> आइडिये में किसी सामाजिक समस्या का निदान जैसी बात तो नहीं थी?<br />
<strong>जबाब:</strong> अरे न भाई! आप मुझे गलत समझ रही हैं। मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता जिससे समाज को किसी समस्या का सामना करना पड़े। सामाजिक समस्या का निदान करने के लिये कटिबद्ध लोग एक समस्या के समाधान करने में चार पैदा करते हैं। हमारा आइडिया भगोड़ा हो सकता है लेकिन असामाजिक नहीं। उसमें किसी समस्या का निदान जैसी बात कत्तई न होगी। मुझे पक्का भरोसा है।</p>
<p><strong>सवाल: </strong> कहीं आइडिया किसी खोज या वैज्ञानिक चेतना से संबंधित तो नहीं था? मेरा मतलब किसी समस्या के हल के बारे में सोचते-सोचते कुछ सूझा हो?<br />
<strong>जबाब:</strong> अरे नहीं भाई! क्या मैं इतना अहमक दिखता हूं? क्या मैं ऐसे बेसिर-पैर के कुतर्क करता हूं कि तुम यह सवाल पूछो!! मैं इस तरह की बातें कभी करता ही नहीं। लगता है जब वैज्ञानिक चेतना बंट रही थी तब हम इधर-उधर आवारा गर्दी कर रहे थे। लोगों ने सारी चेतना लूट ली और अपनी कुठरिया में बंदकर नंबर वाला ताला लगाकर नंबर भूल गये। लिये लाठी टहलते रहते हैं कि कोई कुठरिया की तरफ़ देख भर ले तो आंखे निकाल कर आई बैंक में जमा कर दें। हम वैज्ञानिक चेतना से उसी तरह बचते हैं जैसे अपने देश से लड़कियां लफ़ंगो, लंपटों से। हम किसी समस्या का हल सोचने में कभी यकीन नहीं रखते। समस्या अपना हल खुद खोजती हैं हम बहुत करते हैं तो उसका श्रेय ले लेते हैं।</p>
<p>इसी तरह के और तमाम सवाल-जबाब सहज बुद्धि ने किये लेकिन आइडिया देश की खोयी हुयी अस्मिता सा मिला नहीं। तरह तरह के आइडिया उसने दिखाये कि ये है, कहीं ये तो नहीं कहीं वो तो नहीं। लेकिन हमें अपना आइडिया न मिला। मजाक-मजाक में शुरू हुई खोज इत्ती सीरियस मोड पर आ गई कि हम घबराकर शेरो-शायरी की शरण में चले गये और बेचैन होकर अपने आइडिये की याद में शेर पढ़ने लगे:</p>
<blockquote><p><strong>मुझे वो मिलेगा ये मुझको यकीं है,<br />
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना(अलगाव)</strong></p></blockquote>
<p>मामला शेर तक था तब तक तो कोई बात नहीं लेकिन जहां शायरी का जिक्र आया तो सहज-बुद्धि हमारे पास से जाने लगी। मैं फ़ौरन समझ गया और शेरो-शायरी को बाद में मिलने का इशारा करके फ़िर सहज-बुद्धि के साथ मिलकर अपना खोया हुआ आइडिया खोजने लगा। सहज बुद्धि मेरे साथ लगी हुईं थी लेकिन शायरी और मेरे आइडिया मिलन के यकीं से उनका जी कुछ उचट सा गया था। वे मन लगाकर खोजने की जगह अब बला टालने लगीं थीं। </p>
<p>अचानक सहज बुद्धि ने सलाह दी क्यों न आइडिया खोने की रपट थाने में करा दो। हमने सोचा बात तो सही है लेकिन उसमें भी तो पुलिस आइडिये का  हुलिया पूछेगी। लंबाई, चौड़ाई, वजन और पहचान का निशान पूछेगी। पुलिस वाले का मूड उखड़ा हुआ तो आइडिये का हुलिया पूछते-पूंछते हमारा बिगाड़ देगी। यह सोचकर हम फ़िर उलझ गये।</p>
<p>मैंने सुझाया क्यों न पुलिस थाने में अनामी रिपोर्ट करा दी जाये। इस पर सहज बुद्धि ने बरज दिया और कहा- ऐसा कभी न करना। अनामी की आईपी पुलिस वाले नोट कर लेंगे। इसके बाद तुम्हारी रपट का स्नैप शॉट लेकर तुमको नोटिस  भेजवा देंगे। इस झमेले से बचने के आइडिये खोजते रह जाओगे।</p>
<p>अब हमको आइडिये पर गुस्सा आना लगा था। एक ससुरे आइडिये ने जीना मुहाल कर दिया। मुझे लगा कि अगर कहीं सामने दिख जाये आइडिया तो उसको झंझोड़कर पूंछूंगा- क्या समझता है अपने आपको। उसके जैसे पचासों आइडिये आगे-पीछे घूमते हैं मेरे। वही अकेला नहीं है। मैं झल्लाने लगा। </p>
<p>मेरी झल्लाहट देखकर सहजबुद्धि बिना बॉय बोले चली गयी। मुझे बाद में ध्यान आया कि गुस्सा, झल्लाहट और सहजबुद्धि की बिलकुल नहीं पटती। ये एक साथ एक जगह कभी नहीं रह सकते। </p>
<p>मैं शान्त होकर फ़िर आइडिये की खोज में जुट गया। वो वाला आइडिया तो नहीं मिला लेकिन  अचानक एक और नया आइडिया आया दिमाग में। मैंने सोचा कि ये आइडिया वाली बात पर एक लेख लिखूं तो कैसा रहेगा?</p>
<p>यह सोचते ही अचानक मुझे कुछ सूझा और मैंने  आइडिये से पूंछा कि तुम्ही तो नहीं थे जो सुबह मेरे दिमाग में आये थे और फ़ूट लिये थे। आइडिया बदमाश बेमतलब मुस्कराने लगा। वह मुस्कराये जा  रहा है। अब मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि उसकी मुस्कान का क्या अर्थ लगाया जाये। सहज बुद्धि भी  जा चुकी हैं। अब इत्ती जल्दी तो वो लौटकर आने वाले नहीं।</p>
<p>आप को कुछ समझ में आ रहा है। कोई आइडिया है इस बारे में आपके पास? </p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<div style="float:left; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style=";font-size:0.6em;color:teal;" ></span><img src="http://anubhuti-hindi.org/kavi/k/kln/kanhaiyalal_nandan.jpg" /></div>
<p>नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,<br />
मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना!</p>
<p>मुझे वो मिलेगा ये मुझको यकीं है,<br />
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना(अलगाव)।</p>
<p>मोहब्बत का अंजाम हर दम यही था,<br />
भंवर देखना, कूदना ,डूब जाना!</p>
<p>अभी मुझसे, फिर आपसे, फिर किसी से,<br />
मियां, ये मोहब्बत है कोई कारखाना!</p>
<p>परिंदे की किस्मत में उड़ना लिखा है,<br />
बना ले भले वो कहीं आशियाना!</p>
<p>अगर धूप के साथ आंखे लड़ीं हों,<br />
तो फिर ओस के घर न डेरा जमाना!</p>
<p>सफर सांस के ये कहां पर रुकेगा,<br />
करोड़ों ने पूछा किसी ने न जाना!</p>
<p>ये तन्हाइयां, याद भी, चांदनी भी,<br />
गज़ब का वजन है, संभल के उठाना!</p>
<p>डा. कन्हैयालाल नंदन</p>
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