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	<title>फुरसतिया</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>सदी का सर्वश्रेष्ठ हिदी ब्लॉगर सम्मान</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 02:42:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[अगले कुछ सालों में ही हिन्दी ब्लॉगिंग सौ साल पूरे करने वाली है। इस मौके पर सोचता हूं कि सदी के सर्वश्रेष्ठ हिदी ब्लॉगर का इनाम बांट दूं। कुछ दोस्तों ने सुझाया कि ब्लागिंग के सौ साल होनें में तो अभी नब्बे-इक्यानबे साल बाकी हैं। अभी से काहे हड़बड़ाये हुये हो। आराम से बांटना। फ़ुरसत [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm5.staticflickr.com/4066/4263233813_f2f289382a_m.jpg"><img src="http://farm5.staticflickr.com/4066/4263233813_f2f289382a_m.jpg" alt="" title=" हिदी ब्लॉगर"  class="alignleft" /></a><br />
अगले कुछ सालों में ही हिन्दी ब्लॉगिंग सौ साल पूरे करने वाली है। इस मौके पर सोचता हूं कि सदी के सर्वश्रेष्ठ हिदी ब्लॉगर का इनाम बांट दूं। कुछ दोस्तों ने सुझाया कि ब्लागिंग के सौ साल होनें में तो अभी नब्बे-इक्यानबे साल बाकी हैं। अभी से काहे हड़बड़ाये हुये हो। आराम से बांटना। फ़ुरसत निकालकर! लेकिन फ़िर उन्हीं लोगों ने सुझाया कि देरी नहीं करनी चाहिये। पता चला कि आप जरा सा चूके और कोई और बांट के चला गया इनाम। आप देखते रह जाओगे। अपना सा और उनका सा मुंह लेकर। अपनी बेवकूफ़ी को तर्क के कपड़े पहनाते हुये एकाध लोगों ने कहा कि जब <a href="http://www.parikalpnaa.com/2012/05/blog-post_732.html">दशक का ब्लॉगर पुरस्कार</a> एकाध साल पहले बंट सकता है तो सदी का इनाम तो नब्बे साल पहले बंटना ही चाहिये। कुछ लोगों ने ज्यादा सच्चा तर्क देते हुये कहा- वैसे भी लिखने-पढ़ने वालों को कौन याद रखता है। इनाम-उनाम दोगे तो याद भी रखेंगे- <strong>ये है वो जिगरे वाला ब्लॉगर जिसने सदी के ब्लागरों को इनाम बांटे। जहां खड़ा हो जाता है, इनाम बांटना शुरु कर देता है। </strong></p>
<p>बहरहाल, आगे बिना कुछ सोचे-समझे हम <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ हिदी ब्लॉगर सम्मान</strong> की बाकायदा घोषणा कर रहे हैं। इनाम की मुख्य नियम और शर्ते निम्न हैं:</p>
<ol>
<li>सबसे पहली शर्त तो यही है इनाम के लिये कोई शर्त नहीं है। इनाम जिसको मन आयेगा दे दिया जायेगा। किसी को इनाम देने में अगर कोई शर्त बाधा बनती है तो उस शर्त को बदल दिया जायेगा। </li>
<li> सदी का ब्लॉगर सम्मान मिलने के लिये वैसे तो ब्लॉगर को सौ साल तक ब्लॉगिंग करनी चाहिये! लेकिन इनाम के लिये ऐसा कोई बंधन नहीं है। कोई ब्लॉगर अपनी पहली पोस्ट लिखने के बाद भी अपना इनाम का दावा ठोंक सकता है। </li>
<li> जिसने अभी ब्लॉगिंग शुरु नहीं की है वे भी अगर इनाम पाना चाहते हैं तो एक ठो शपथ पत्र जमा कर दें कि इनाम की घोषणा के पहले तक वे कम से कम एक पोस्ट तो लिख ही लेंगे।</li>
<li>अनामी ब्लॉगर जैसे किलर झपाटा,हलकान विद्रोही,  ब्लॉगवकील आदि भी इस इनाम के लिये दावेदारी पेश कर सकते हैं। उनको इनाम मिलने की दशा में वे जिसे बतायेंगे उसको सम्मानित कर दिया जायेगा।  </li>
<li> सदी के ब्लॉगर सम्मान में कितने लोगों को सम्मानित किया जायेगा यह भी तय नहीं है। वैसे प्रयास किया जायेगा कि कुल सम्मानित होने वाले ब्लॉगरों की संख्या कुल नामित होने वाले ब्लॉगरों से कम ही रहे। लेकिन फ़ैशन के दौर में कोई गारण्टी नहीं दी जा सकती। </li>
<li> इनाम की राशि अभी तय नहीं है। चन्दे की बात सोची जा रही है। जित्ता चन्दा हुआ उसमें से समारोह का पैसा काटकर बाकी बचे पैसे इनाम में बांट दिये जायेंगे। </li>
<p><a href="http://farm2.staticflickr.com/1315/756588350_4f06712c03_m.jpg"><img src="http://farm2.staticflickr.com/1315/756588350_4f06712c03_m.jpg" alt="" title=" हिदी ब्लॉगर"  class="alignleft" /></a>
<li> जो लोग इनाम लेने किसी कारणवश नहीं आ पाते हैं उनके इनाम के पैसे सम्मान समारोह में किसी भी कारण से मौजूद लोगों में बराबरी से बांट दिये जायेंगे। किसी का यह तर्क नहीं सुना जायेगा कि वे तो  ब्लॉगिंग नहीं करते इसलिये इनाम नहीं लेंगे।  </li>
<li> सम्मान समारोह में सम्मानित होने के लिये आने-जाने, ठहरने-खाने-पीने का खर्चा सम्मानित होने वाले ब्लॉगर को खुद वहन करना होगा। </li>
<li> चंदे की ठीक-ठाक व्यवस्था होने की स्थिति में सम्मान समारोह में स्वल्पाहार की भी की जा सकती है। कम लोगों के आने पर यही व्यवस्था दीर्घाहार में तब्दील हो जायेगी। ज्यादा लोगों के आने पर हो सकता है कुछ लोग भूखे-प्यासे रह जायें। इसलिये बेहतर यही है कि खाने-पीने का अपना इंतजाम करके आयें। खाने-पीने का अपना इंतजाम करके आने वाले ब्लॉगर आते ही <strong>समझदार ब्लॉगर सम्मान समारोह</strong> का भी फ़ार्म भर दें। </li>
<li> सम्मान समारोह में बैठने- ऊठने की व्यवस्था की जायेगी। लेकिन अगर आपको खचाखच भीड़ के चलते कोई बैठने का इंतजाम न मिले तो आप जैसा मन कर वैसा करियेगा। मन करे तो जाते-जाते <strong>सदी का दुखी/निराश/उदास ब्लागर</strong> का फ़ार्म आन लाइन भर दीजियेगा। प्रमाणपत्र आपके घर पहुंच जायेगा। </li>
<li>ब्लॉगिंग के लिये लेखन कैसा इसका कोई बंधन नहीं है। इनाम ऐसे लेखन पर भी मिलेगा, वैसे पर भी मिलेगा। कविता, कहानी, लेख, उपन्यास, पाडकास्ट, वीडियो, फोटोग्राफ़ी किसी पर भी दिया जा सकता है। इनाम मिलने पर अगर आपको कोई झटका सदमा लगता है तो उसके लिये आप स्वयं जिम्मेदार  होंगे। </li>
<li> इनाम के निर्धारण में लिखने की गुणवत्ता कोई पैमाना नहीं होगी। अच्छे और  खराब लिखने वालों एक नजर से देखा जायेगा। </li>
<li>इनाम के लिये वोटिंग होगी। आप अपना नाम चाहे यहां नीचे कमेंट बाक्स में दे दें या फ़िर मुझे मेल कर दें। आपके नाम का गोला बनवाकर फ़िर जल्दी ही वोटिंग शुरु करवा दी जायेगी। </li>
<li>आप जित्ती बार मन कर उत्ती बार अपने को वोट दे सकते हैं। कोई बंधन नहीं है। खुद को ज्यादा बार वोट देने के प्रयास के चलते संभव है आपको <strong>सदी का सबसे मेहनती  ब्लॉगर</strong> का इनाम भी लेना पड़े। </li>
<li>चूंकि सदी के ब्लॉगरों की संख्या काफ़ी होगी इसलिये आप लोग इनाम के लिये नये-नये नाम भी सुझा सकते हैं। सबसे ज्यादा इनाम के नाम सुझाने वाले को <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ इनाम सुझावकार सम्मान</strong> मिल सकता है।</li>
<li> आप अगर तय  कर चुके हैं कि अपने ब्लॉग पर सम्मान समारोह की बुराई करेंगे तो इस आशय का शपथपत्र जमा करा देने पर आपको <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार</strong> मिल सकता है। अगर आप बुराई करने के अपने वायदे से मुकरते हैं तो आपको <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ सद्भावना  ब्लॉगर सम्मान</strong> भेज दिया जायेगा।  </li>
<li>आप ब्लॉगर सम्मान की घोषणा होने के बाद यदि सम्मान न लेने की घोषणा करते हैं तो आपको <strong>सदी का सर्वेश्रेष्ठ निर्लिप्त ब्लॉगर सम्मान</strong> दिया जा सकता है। </li>
<p><a href="http://farm1.staticflickr.com/149/423901456_d7de7b8990_m.jpg"><img src="http://farm1.staticflickr.com/149/423901456_d7de7b8990_m.jpg" alt="" title=" हिदी ब्लॉगर"  class="alignleft" /></a>
<li>आप अगर अपने किसी दोस्त को इनाम दिलाना चाहते हैं तो उसका नाम भेजिये। अगर आप चाहते हैं कि किसी को इनाम न मिले तो उसका भी नाम भेजिये। हम कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेंगे कि आपके मन की होकर रहे। </li>
<li> इनाम की घोषणा और उसके बंटने की घोषणा अलग से की जायेगी। कब की जायेगी इसका खुलासा उचित मौका आने पर किया जायेगा। </li>
<li>इनाम पाने वाले अगर चाहे तो अपने इनाम मिलने के मौके पर दिये जाने वाले वक्तव्य मुझे भेज दें। अगर किसी का वक्तव्य पसंद आ गया तो उसको <strong>सदी का सर्वेश्रेष्ठ पुरस्कार वक्तव्य</strong> सम्मान दे दिया जायेगा। कई वक्तव्य आने की दशा में उसको किसी और नाम से <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ</strong>( ओजस्वी/झिलाऊ/रुलाऊ वक्तव्य) करके इनाम दे दिया जायेगा। आप यह समझ लीजिये कि जो होगा सदी का होगा। सदी के नीचे कुच्छ नहीं होगा।   </li>
<li> आप चाहते हैं कि आपको/या किसी अन्य को इनाम उसके लेखन के लिये नहीं उसके गुणों के लिये मिले तो उसके लिये भी नाम भेज सकते हैं। लेकिन उसमें शर्त यह है कि आप दूसरे के अच्छे गुणों के लिये ही उसे नामित कर सकते हैं। उदाहरण के लिये आप अपने को  सदी का <strong>सर्वश्रेष्ठ चिरकुट ब्लॉगर, खुराफ़ाती ब्लॉगर</strong> आदि कहकर नामांकित कर सकते हैं लेकिन किसी दूसरे   ब्लॉगर के लिये नामांकित करने के लिये आपको <strong>सदी का सर्वश्रेष्ठ भला मानस/ ईमानदार/ साहसी/ उदीयमान/उदित/प्रस्फ़ुटित/पल्लवित ब्लॉगर/ </strong>जैसे विशेषण ही चुनने होंगे।  </li>
</ol>
<p> सूचनायें, नियम और शर्ते तो और न जाने कित्ती हैं। लेकिन वे सब अभी तय नहीं हैं। उनको सोचकर लिखने का समय भी नहीं है। इनाम देने की हड़बड़ी है इसलिये अभी फ़िलहाल यही घोषणा किये दे रहे हैं। जरा कहीं चूके तो कोई और घोषणा कर देगा <strong>सदी के सर्वश्रेष्ठ हिदी ब्लॉगर सम्मान</strong> की तो हम ताकते रह जायेंगे। </p>
<p>आप अब सोच क्या रहे हैं जी। फ़ौरन भेजिये नामांकन अपना <strong>सदी के सर्वेश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर सम्मान</strong>  के लिये।</p>
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		<title>एक सामान्य रेल यात्रा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/2965</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/2965#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 09 May 2012 03:06:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[कानपुर से जबलपुर अपन ट्रेन से आते हैं। कानपुर से जबलपुर के लिये सीधी ट्रेन एक्कै है -चित्रकूट एक्सप्रेस। बड़ी भली ट्रेन है। रिजर्वेशन आराम से मिल जाता है। इस बार कराया जनरल में तो एक दिन पहले वेटिंग में 13 नंबर था। अगले दिन हो पक्का जाता लेकिन निश्चिंत होने के फ़ेर में तत्काल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm7.staticflickr.com/6107/6292056138_c8c492ab3b_m.jpg"><img src="http://farm7.staticflickr.com/6107/6292056138_c8c492ab3b_m.jpg" alt="" title=" रेल यात्रा"  class="alignleft" /></a>कानपुर से जबलपुर अपन ट्रेन से आते हैं। </p>
<p>कानपुर से जबलपुर के लिये सीधी ट्रेन एक्कै है -चित्रकूट एक्सप्रेस। बड़ी भली ट्रेन है। रिजर्वेशन आराम से मिल जाता है। </p>
<p>इस बार कराया जनरल में तो एक दिन पहले वेटिंग में 13 नंबर था। अगले दिन हो पक्का जाता लेकिन निश्चिंत होने के फ़ेर में तत्काल की शरण में गये और नीचे की बर्थ पाकर प्रसन्न चित्त हो गये। </p>
<p>समय पर स्टेशन पहुंचे। गाड़ी टाइम पर। ट्रेन में चढ़कर सीट पर पहुंचकर उसके पास सामान धरा। ट्रेन चली नहीं थी तो मन किया कन्फ़र्म किया जाये कि सही ट्रेन / डिब्बे में चढ़े हैं कि नहीं। वो भी कन्फ़र्म कर लिया तो मन किया देख लें चार्ट में नाम है कि नहीं। लेकिन ट्रेन सीटी बजा दिहिस। मन मारकर डब्बे में वापस आ गये। </p>
<p>वापस आने पर देखा कि हमारी नीचे वाली बर्थ पर एक महिला अपने बच्चों समेत विराज रही थीं। उनके इरादे सहज थे। उनके साथ कुल जमा चार बच्चे थे। दो आधी टिकट वाली उमर के और दो बिना टिकट वाली उमर के। पांच लोगों को कुल जमा दो सीट चाहिये थीं। नीचे वाली  हमारी बर्थ पर वे अपने बिना टिकट की उमर वाले बच्चों के साथ बैठ ही चुकी थीं। बीच वाली बर्थ पर आधी टिकट वाली बच्चियां लेट गयीं थीं।</p>
<p>हमने सहमते हुये डिब्बे में जाहिर किया कि नीचे वाली बर्थ हमारी थी। इससे  स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। बीच की सीट वाली बच्चियों ने बिना झिझके जो कुछ कहा उसका मतलब यह था कि मैं ऊपर की सीट पर चला जाऊं। </p>
<p>बच्चियों के आग्रह में स्वाभाविकता कुछ ज्यादा थी। सामने वाले साहब को लगा कि शायद इससे मैं बुरा न मान जाऊं। सो उन्होंने बच्चियों को समझाते हुये कहा- <strong>ऐसे नहीं कहा जाता बेटे। कहो कि अंकलजी आप ऊपर की सीट पर चले जाइये। </strong></p>
<p>बच्चियों को शायद लगा हो कि उन्होंने क्या गलत कह दिया। अपने मन की बात ही तो कही। वे मारे गुस्से के चुप हो गयीं। </p>
<p><a href="http://farm6.staticflickr.com/5082/5341231883_9a8bc9eabb_m.jpg"><img src="http://farm6.staticflickr.com/5082/5341231883_9a8bc9eabb_m.jpg" alt="" title=" रेल यात्रा"  class="alignleft" /></a>फ़िर भाई साहब ने मुझसे कहा देख लीजिये -<strong>साथ में बच्चे हैं। हो सके तो आप ऊपर की बर्थ पर चले जाइये। </strong></p>
<p>हमें बड़ा वैसा सा लगा। लगा कि बताओ बर्थ हमें छोड़ना है। कब्जा दूसरे को करना है। लेकिन आवाहन ये तीसरा आदमी कर रहा है।</p>
<p>हमें लगा कि यह हमारे त्याग में भांजी मार रहा है। बर्थ का त्याग हम करें और श्रेय कोई और ले यह अच्छा नहीं न लगता जी। मन किया तो कि अगर ये दुबारा कहेंगे तो उनसे कहेंगे कि आप काहे नहीं अपना नीचे का बर्थ छोड़कर ऊपर स्थापित हो जाते हैं। लेकिन मौका आया नहीं। वे भाईसाहब मोबाइल पर जोर-जोर से बतियाने में व्यस्त हो गये। वो महिलाजी अपने बच्चे के साथ गुन्न-मुन्न ऊंघती हमारी तथाकथित बर्थ पर अपने बच्चों के साथ बैठी रहीं। </p>
<p>थोड़ी देर बाद हम अपनी बर्थ का त्याग करके ऊपर वाली बर्थ पर आ गये। इस त्याग के लिये हम तैयार तो बच्चों समेत महिला की स्थिति को देखते ही हो गये थे। लेकिन सोच रहे थे कि महिला आग्रह करेगी। फ़िर हम बर्थ छोड़ेगे। फ़िर वह हमको भलामानस समझेंगी/कहेगी। फ़िर हम कहेंगे कि अरे इसमें क्या। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पहले हमें भाई साहब पर झुल्लाहट हुई कि हमारे त्याग में भांजी मार दी। इसके बाद महिला ने खास अनुरोध नहीं किया। इस सबके चलते हुआ यह कि बर्थ त्याग का पूरा श्रेय हमें नहीं मिला। भलेमानस होने का तो खैर पूरा पत्ता ही गोल हो गया।</p>
<p>बाद में ऊपर की बर्थ पर आराम से लेटते हुये सोचा तो हमारे मन ने हम पर चिरकुटई का इल्जाम लगा दिया। कैसे चिरकुट मनई हो जी। एक ठो बर्थ जरूरतमंद यात्री को देने को बड़का त्याग बताते हो। </p>
<p>बाद में पता चला कि वे भाईसाहब भी कोई शुकुलजी ही थे। फ़िर लगा कि सारी चिरकुटई शुकुलजी लोग ही करते हैं क्या।</p>
<p>सामने वाली बर्थ पर एक बाबाजी नुमा आदमी एक लुटिया टाइप की छोटे थैली में हाथ घुसाये माला टाइप जप रहे थे। मुंह से बुदबुदाते भी जा रहे थे। लगा कि गिनती सीख रहे हैं। कुछ देर में उनका खाने का बुलौवा हुआ। वे माला समेट के अपनी थैलिया में समेट के थैली को गोलिया के अपनी बनियाइन के अन्दर घुसा के खाना खाने चले गये।</p>
<p>डिब्बे में एक पुलिस वाला 303 वाली बन्दूकें लिये पहरा टाइप दे रहा था। कुछ देर बगल वाली बर्थ पर लेटे हुये गाना सुनता रहा। मोबाइल पर कौनौ तेज गाना चल रहा था।  थोड़ी देर में वो ऊंघने लगा। मोबाइल को शायद यह अच्छा न लगा हो। मोबाइल नीचे गिरा भाड़ से। तेज आवाज हुई। लगा बम फ़टा। अब जमाना ऐसा ही हो गया है जी। हर तेज आवाज बम सरीखी लगती है। दो भले मानुषों ने एक साथ उसका मोबाइल उठाने की कोशिश की। टकराते हुये बचे। अंतत: एक ने उसका मोबाइल उठाकर उसे दिया। गाना फ़िर चालू। वो सिपाही मोबाइल को सीने में धरकर ऊंघने लगा। थका लग रहा था।</p>
<p>कुछ देर बाद देखा कि बासबेसिन के पास एक सिपाही ने एक लड़के को धमकियाने की कोशिश की। कहां है टिकट कहकर। जब यह तय हो गया कि लड़का टिकटधारी था तो उसकी आवाज मुलायम हो गयी। वह समझाने लगा उधर दरवज्जे के पास न खड़े हो। एक्सीडेंट हो सकता है। अपनी सीट पर जाकर बैठो।</p>
<p>पिछली यात्रा में मैंने देखा कि ऐसे ही एक यात्री से, जो रात को रिजर्व डिब्बे में आ गया था, सिपाही ने पचास रुपये ऐंठ लिये थे। फ़िर कहा- <strong>जहां मन आये सो जाओ।</strong> सिपाही को यह बर्दास्त नहीं हुआ कि कोई सरकार को चूना लगाकर मुफ़्त में रिजर्व डिब्बे में यात्रा करे। न सही सरकार के खजाने में लेकिन पैसा सरकारी मुलाजिम के पास तो पहुंचा।</p>
<p>इस बीच अचानक ट्रेन की चेन खिंची। पता चला कि एक महिला अपने बच्चे के साथ चढ़ रही थी। महिला चढ़ गयी लेकिन बच्चा रह गया। वह दौड़कर ट्रेन पकड़ने लगा। गाड़ी तेज हो गयी थी। किसी ने चेन खींच दी थी। दोनों लोग गाड़ी में आ गये। घटना किसी और डिब्बे में हुई थी। लेकिन कुछ ही देर में हमारे डिब्बे तक भी खबर आ गयी। हमारे यहां भी तमाम लोगों ने चैन की सांस ले ली। कई लोगों ने सांस लेने के बाद करवट भी बदल ली। </p>
<p>सुबह ऊपर वाली बर्थ से नीचे अवतरित हुये तो पता चला कि ट्रेन जबलपुर पहुंचने वाली थी। एक छोटे स्टेशन पर गाड़ी रुकी। एक बालिका सामने वाली बर्थ पर बैठते ही आंखे मूंदकर ऊंघने लगी। उसके हाथ में एक रजिस्टर था। फ़ाइल थी। उसको और उसकी फ़ाइल को देखकर लगा कि वह शायद जबलपुर से बी.एड. कर रही होगी। सुबह जल्दी उठकर स्कूल के लिये निकली होगी। ट्रेन में जगह मिलते ही ऊंघने लगी होगी।</p>
<p>कुछ ही देर में ट्रेन जबलपुर के प्लेटफ़ार्म नंबर दो पर रुकी। हम खरामा-खरामा चलते हुये प्लेटफ़ार्म नंबर एक पर आये। वहां लिखा था &#8211; <strong>गर्व करिये कि आप संस्कारधानी में हैं।</strong></p>
<p>जबलपुर को संस्कारधानी नाम विनोबा जी ने दिया था। सुना है कभी किसी सांप्रदायिक दंगे के भड़कने पर नेहरू जी ने जबलपुर को गुंडों का शहर कहा था। हमें समझ में नहीं आया कि किस महापुरुष की बात सही माने। हमारे लिये तो दोनों आदरणीय व वंदनीय हैं।</p>
<p>दुविधा के मारे हम बिना गर्व या शर्म किये अपने ठिकाने की तरफ़ चल दिये।</p>
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		<title>घूस देने वाले की उलझनें</title>
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		<pubDate>Fri, 04 May 2012 14:24:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[दुनिया में करप्शन का चलन शुरु से रहा है। अगर सृष्टि की शुरुआत के लिये बड़े धमाके वाले सिद्धांत को ही सही मान लिये जाये तो देखिये कि जरा सी जगह से निकला हुआ मसाला पूरी दुनिया में फ़ैलता जा रहा है। बिना रजिस्ट्री कराये सितारे, आकाशगंगायें, ब्लैकहोल, धूमकेतु, अलाय-बलाय बनते चले गये। जहां जगह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm5.staticflickr.com/4071/4488770609_cdbcc589b9_m.jpg"><img src="http://farm5.staticflickr.com/4071/4488770609_cdbcc589b9_m.jpg" alt="" title=" घूस"  class="alignleft" /></a>दुनिया में करप्शन का चलन शुरु से रहा है। </p>
<p>अगर सृष्टि की शुरुआत के लिये <strong>बड़े धमाके वाले सिद्धांत</strong> को ही सही मान लिये जाये तो देखिये कि जरा सी जगह से निकला हुआ मसाला पूरी दुनिया में फ़ैलता जा रहा है। बिना रजिस्ट्री कराये सितारे, आकाशगंगायें, ब्लैकहोल, धूमकेतु, अलाय-बलाय बनते चले गये। जहां जगह मिली अपना तम्बू तान दिया। न किसी रजिस्ट्रार के यहां रजिस्ट्री कराई। न स्टैम्प ड्यूटी जमा की। ये करप्शन नहीं तो और क्या? </p>
<p>कभी-कभी तो यह भी लगता है कि ये जो प्रकाश की गति से सितारे, आकाशगंगायें, ग्रह-नक्षत्र, हेन-तेन एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं प्रकाश की गति से वो अपराधियों की ’घपला करके फ़ूट लो’ के सिद्धांत के अनुसार है। घपले की जगह टिके तो पकड़े जाओगे।</p>
<p>जिस किसी दिन भी ये घपला किसी की निगाह में आ गया तो दुनिया भर के सारे घपले-घोटाले इसके सामने बौने हो जायेंगे। लेकिन किसको पड़ी है इन सबकी जांच करने की। </p>
<p>करप्शन में घूस का भी चलन भी शुरु से ही रहा है। तमाम तरह के करप्शनों में घूस को वही प्रतिष्ठा प्राप्त है जैसे सौंन्दर्य में गोरेपन का। अगर गोरापन है तो सौंन्दर्य है। उसई तरह लोग मानते हैं कि अगर घूस का लेन-देन हुआ तो भ्रष्टाचार हुआ। बाकी तरह के भ्रष्टाचार को लोग शिष्टाचार, भाई-भतीजावाद कहकर टरका देते हैं। </p>
<p>हमारे समाज में घूस लेने वालों की तो बड़ी चर्चायें होती हैं। उनकी हरकतों का विस्तार से सौंन्दर्य वर्णन होता है। लेकिन बेचारे घूस देने वाले को वो प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त है जिसका वो हकदार है। घूस देने वाले को घूस देने में बहुत पापड़ क्या रोटी, सब्जी तक बेलनी पड़ती है। न जाने कित्ती मेहनत करता है फ़िर भी उसके कारनामें उजागर नहीं हो पाते। भ्रष्टाचार के महल की नींव की ईंट बनकर रह जाता है घूस देने वाला।</p>
<p>घूस देने वाले को हजार बवाल झेलने पड़ते हैं। </p>
<p>शुरुआत तो इस बात से करनी पड़ती है कि काम घूस से होगा या चापलूसी से ही बात बन जायेगी। कई बार वह सोचता है चापलूसी से बात बन जायेगी और बाद में पता चलता है कि उसका रकीब घूस देकर काम करवा ले गया। उसकी चापलूसी ईमानदारी की तरह उपेक्षित रह गयी।</p>
<p><a href="http://farm4.staticflickr.com/3277/2778838356_7dc7f964f6_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3277/2778838356_7dc7f964f6_m.jpg" alt="" title=" घूस"  class="alignleft" /></a>कई बार उलटा भी होता है। वो समझता है कि खाली घूस से काम चल जायेगा। लेकिन बाद में असलियत खुलती है कि उस काम के लिये घूस के साथ-साथ थोड़ी चापलूसी की भी जरूरत थी जैसे कि  कभी-कभी जनप्रतिनिधि के लिये जनता की भलाई के जज्बे के साथ-साथ गुंडागीरी का फ़्लेवर भी जरूरी होता है।</p>
<p>जहां घूस का चलन है वहां तो मामला ठीक रहता है। रेट खुले हैं। पेमेन्ट किया काम हुआ। साल-दो साल में डी.ए. की तरह रेट बढ़ा। उसका भी भुगतान किया फ़िर काम हो गया।</p>
<p>समस्या वहां होती है जहां घूस का चलन नहीं होता। चलन नहीं होता मतलब रेट फ़िक्स नहीं होते। घूस देने वाले की एड़ियां घिस जाती हैं पता करने में कि काम पैसे से होगा, चापलूसी से या पक्की ईमानदारी से। </p>
<p>बेचारी घूस देने वाला नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे पता करता रहता है- काम कौन करेगा, किसको साधने से सब सधेंगे, कितना साधना पड़ेगा। मामला साहब तय करेंगे कि उसका बाबू कि उनकी बीबी या कि उनकी वो। उनकी वो वाली बात भी अनिश्चित रहती है। किसी की कई ’वो’ होती हैं। तब बवाल कि कौन ’वो’ सबसे पक्की ’वो’ हैं। (जिनका यह मत है कि  मैडमें इस मामले में पीछे नहीं होती हैं वे साहब की जगह या साथ में  मैडम भी पढ़ लें।)</p>
<p>घूस का आंकलन भी बड़ा ऊंचे दर्जे का काम होता है। कित्ते में काम होगा यह अनुमान लगाना बड़ी कलाकारी का काम है। कभी लगता है कि सस्ते में निपट गये। कभी पता चलता है कि ज्यादा दे आये। सस्ते में निपटने का सुख और चपत लगने की चोट कभी एक साथ ही पड़ती है। पता चला कि एक काम सस्ते में निपटा पर तीन काम में ज्यादा दे आये। इससे कभी-कभी जी धक्क से रह जाता है। एक दिन की बात हो तो कोई झेल भी। जब अक्सर इस तरह होने लगता है तो घूस देने वाला सदमें में आ जाता है। </p>
<p>इस समस्या से निपटने के लोग तरह-तरह के उपाय सोचते हैं। कुछ लोगों का तो मानना है कि बैंक में लोन देने के पहले जिस तरह रिस्क आंकलन करने के लिये गणित के जानकार ड्यूटी बजाते हैं वैसे ही घूस देने में रिस्क का आंकलन करने वाले भी होने चाहिये। पैसे डूबेगा कि काम हो जायेगा। बाजिब घूस कितनी होगी। इस सबके आंकलन की भी व्यवस्था होनी चाहिये।</p>
<p>घूस काम होने के पहले दी जाये या बाद में लफ़ड़ा दोनों में होता है। एडवांस देने में पैसा फ़ंसता है। बाद में देने का मन नहीं करता। जहां रेट बंधा होता है वहां कोई खतरा नहीं होता। ऐसे लेने वाले ईमानदार टाइप के होते हैं। मान लो खर्चा भी हो गये पैसे तो कहते हैं- <strong>अगली घूस मिलते ही आपने पैसे वापस कर देंगे।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>घूसवालों के सामने सबसे ज्यादा चुनौती का काम होता है ईमानदार माने जाने वाले को घूस का प्रस्ताव देना। सर्टिफ़ाइड ईमानदार माना जाने वाला व्यक्ति भी यह इच्छा रखता है कि उसको कोई घूस का आफ़र दे और वह उसे मना कर सके। ईमानदार माने जाने वाले व्यक्ति की खुशी इसी भावना में होती है कि वह बिका नहीं। उसने घूस का प्रस्ताव ठुकरा दिया।  घूस का प्रस्ताव को नकारना उसकी ईमानदारी की बिल्डिंग पर रंग रोगन की तरह होता है। वह चमकने लगता है कि उसे कोई खरीद नहीं सका।</p>
<p>ईमानदार माने जाने वाले को घूस का प्रस्ताव देना बड़ा बवालिया काम होता है। कुछ लोग मुस्कराकर मना करते हैं। कुछ गुस्से में। कुछ लोगों की कामना होती है कि उनको अकेले में आफ़र किया जाये ताकि वे विनम्रता किन्तु दृढ़ता से मना कर सकें और बाद में अपने संस्मरणों में लिख सकें। कुछ लोग सरे आम मना करने के इच्छुक होते हैं। अलग-अलग तरह के ईमानदार होते हैं। घूस देने वाला कितना जी अनुभवी क्यों न हो लेकिन किसी ईमानदार माने जाने को घूस देने में हिचकता है यह सोचकर कि न जाने क्या हरकत कर बैठे अगला। </p>
<p>ईमानदार व्यक्ति को घूस देने का प्रस्ताव देना किसी उम्रदराज व्यक्ति से प्रेम प्रस्ताव रखना सरीखा होता है- कहीं अगला उखड़ न जाये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>कहां तक गिनायें घूस देने वालों की उलझने। एक सोचो हजार होती हैं। लेकिन क्या करे बेचारा वो भी। काम कराने के लिये जमाने का चलन तो नहीं बदल सकता है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>सचिन राज्यसभा में- कुछ सीन</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Apr 2012 04:09:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[पता चला कि सचिन रमेश तेंडुलकर का नाम राज्यसभा के लिये प्रस्तावित हो गया। अलग-अलग लोग इस पर अलग-अलग बयान जारी कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि सचिन को वहां जाना चाहिये कोई कह रहा है कत्तई नहीं जाना चाहिये। अब लोगों को कौन समझाये कि सचिन अपनी मर्जी से कहां जा पाते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm7.staticflickr.com/6145/6004724057_c0312aeed6_m.jpg"><img src="http://farm7.staticflickr.com/6145/6004724057_c0312aeed6_m.jpg" alt="" title=" सचिन"  class="alignleft" /></a>पता चला कि <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/2742">सचिन रमेश तेंडुलकर </a>का नाम राज्यसभा के लिये प्रस्तावित हो गया। अलग-अलग लोग इस पर अलग-अलग बयान जारी कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि सचिन को वहां जाना चाहिये कोई कह रहा है कत्तई नहीं जाना चाहिये।</p>
<p>अब लोगों को कौन समझाये कि सचिन अपनी मर्जी से कहां जा पाते हैं कहीं। शुरु में वे टेनिस खिलाड़ी बनना चाहते थे लेकिन आ गये क्रिकेट में। क्रिकेट में भी वे तेज बालर बनना चाहते थे लेकिन बनना पड़ा बल्लेबाज। बूस्ट और तमाम चीजें बेचने का काम कौन वे अपने मन से करना चाहते होंगे लेकिन कर रहे हैं। राज्यसभा लिये भी कौन उन्होंने इस्टाम्प पेपर पर लिख कर दरखास्त दी होगी कि हमें बनाओ मेम्बर। अब जब लोगों ने नामित कर दिया तो बनना पड़ेगा।  देश के लिये क्या-क्या त्याग नहीं करने पड़ते हैं लोगों को। मजबूरी जो न कराये। </p>
<p>सचिन के राज्यसभा मेम्बर बनने से क्या फ़ायदे-नुकसान होंगे इसका आंकड़ा तो सचिन के स्कोरर रखेंगे। लेकिन कुछ सीन इस तरह के बन सकते हैं:</p>
<ol>
<li>सचिन के राज्यसभा में पहुंचने से जनप्रतिनिधियों को नयी प्रेरणा मिलेगी। सचिन पहले ही बयान जारी कर चुके हैं कि उनको जब तक मजा आयेगा क्रिकेट खेलते रहेंगे। उनसे प्रेरणा लेकर बुजुर्ग जनप्रतिनिधि बयान जारी कर सकते हैं- <strong>जब तक देश सेवा में मजा आता रहेगा, अपन देश सेवा करते रहेंगे। खबरदार जो किसी ने मेरे रिटायरमेंट की बात चलाई।</strong> </li>
<li>सचिन अपने ऊपर लगाये हर सवाल का जबाब बल्ले से देते आये हैं। वैसे तो वे अपना राज्य सभा का कार्यकाल इंशाअल्ला क्रिकेट खेलते ही गुजार देंगे लेकिन  अगर कभी कोई सवाल उनसे पूछा भी गया तो वे कह देंगे कि मैं हर सवाल का जबाब अपने से देता हूं। मेरा बल्ला मंगाइये तो जबाब दूं। सुरक्षा कारणों से ऐसा होगा नहीं और वे बयान देने से बच जायेंगे। </li>
<li> सचिन के राज्य सभा में पहुंचने से सबसे ज्यादा परेशानी अन्ना की टीम को होगी। वे अब एक सांस में नहीं कह सकेंगे कि सदन में सब भ्रष्टाचारी हैं। उनको सचिन को अपवाद में डालने के लिये अपना आरोप-नारा  लम्बा करना पड़ेगा। और यह तो आपको भी पता है कि जब आरोप-नारा लम्बा हो जाता है तो उसकी ताकत कम हो जाती है। </li>
<li>सचिन खुदा न खास्ता कभी सदन गये भी तो वहां से नये शाट सीख कर बाहर आयेंगे। जिस तरह आरोपों के जबाब में प्रत्यारोप लगाये जाते हैं। ईरान की बात को तूरान से जोड़ा जाता है उससे सचिन को कोई न कोई नया शाट लगाने का तरीका  जरूर सीखने को मिलने। कालान्तर में वह शॉट राज्यसभा शॉट के नाम से जाना जायेगा। </li>
<li>क्या पता सचिन के सदन में पहुंचने से वहां के लोग विज्ञापन की दुनिया में आने लगें। इससे हो सकता है पैसे लेकर सवाल पूछने जैसी चिल्लर हरकतें करने के लिये मजबूर होने वाले जनप्रतिनिधियों का जीवन स्तर कुछ सुधर जाये। हो सकता है कि विज्ञापन की कमाई के चलते ही आगे चलकर छोटे-मोटे घपले कम हो जायें।  </li>
</ol>
<p>सीन तो रेखाजी के राज्यसभा का मेंबर बनने से भी कई खिंचते हैं। लेकिन एक  रेखा जी एक तो भली हीरोइन हैं और दूसरे हम आजकल उनके संपर्क में नहीं है इसलिये उनके बारे में हमारा कुछ कहना शोभा नहीं देता। इसलिये उनके बारे में सीन आप अपनी कल्पनाशीलता से खैंचिये। </p>
<h2>चलते-चलते</h2>
<p> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2012/04/मानसिक-अपघात.jpg"><img src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2012/04/मानसिक-अपघात-300x225.jpg" alt="" title="ऋषिकुमार" width="300" height="225" class="alignleft size-medium wp-image-2921" /></a>दो दिन पहले ज्ञानजी ने फ़ेसबुक पर अपने <a href="http://www.facebook.com/gyandutt">पुत्र की सगाई </a>की मंगलमय सूचना दी। कई सालों पहले एक ट्रेन दुर्घटना में उनके पुत्र के सिर में चोट लगने से पूरा परिवार परेशान था। ज्ञानजी का ब्लागजगत से भी जुड़ने का एक कारण हिंदी में शिराघात की जानकारी देने वाली साइट बनाने का उद्देश्य था। समय और उपचार के बाद धीरे-धीरे ज्ञानजी का पुत्र ठीक हुआ। एक <a href="http://halchal.gyandutt.com/2009/11/blog-post_02.html">पोस्ट में</a> ज्ञानजी ने अपने लड़के के गंगा-सफ़ाई अभियान पर जाने की सूचना दी। अब इसके बाद ज्ञानजी के पुत्र की सगाई का सुखद समाचार सुनकर बहुत अच्छा लगा। पूरे परिवार  को इस मंगलमय अवसर पर बधाई। कामना है कि बच्चों का वैवाहिक जीवन मंगलमय हो।</p>
<p>वैसे ससुर  बनने के बाद ज्ञानजी के लिये चुनौतियां बढ़ जायेंगी। उनके ऊपर सतीश सक्सेना जी जैसा <a href="http://satish-saxena.blogspot.in/2012/04/blog-post_27.html">अच्छा/भला ससुर</a> बनने का दबाब होगा। अपने सतीश जी जितने अच्छे ससुर साबित हो रहे हैं उससे लगता है कि ताज्जुब नहीं कि  नेट/ब्लागजगत से जुड़ी बच्चियां जो उनकी पोस्टें पढ़ती हैं  वे कल को कहने लगें-<strong>हमारा फ़ादर इन लॉ कैसा हो, सतीश सक्सेना जैसा हो।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Apr 2012 04:09:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[दो दिन पहले अन्ना कमेटी की मीटिंग के दौरान एक साहब मीटिंग की कार्यवाही मोबाइल में नोट करते पकड़े गये। कमेटी के लोगों ने उनको मोबाइल पकड़कर बाहर कर दिया। बाहर होते ही वे साहबान अपना मुंह लेकर मीडिया चैनल की तरफ़ भागे। कैमरे के सामने जाकर बयान जारी कर दिया- कमेटी में भेदभाव है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm7.staticflickr.com/6091/6262543149_de26ac853d_m.jpg"><img src="http://farm7.staticflickr.com/6091/6262543149_de26ac853d_m.jpg" alt="" title=" टीवी चैनल"  class="alignleft" /></a>दो दिन पहले अन्ना कमेटी की मीटिंग के दौरान एक साहब मीटिंग की कार्यवाही मोबाइल में नोट करते पकड़े गये। कमेटी के लोगों ने उनको मोबाइल पकड़कर बाहर कर दिया। </p>
<p>बाहर होते ही वे साहबान अपना मुंह लेकर मीडिया चैनल की तरफ़ भागे। कैमरे के सामने जाकर बयान जारी कर दिया- <strong>कमेटी में भेदभाव है। तानाशाही है। मनमानी है। कमेटी छोड़ दी हमने।</strong></p>
<p>कमेटी के लोग भी अपना-अपना मुंह बयानों से लैस कर चैनलों की तरफ़ भागे। चैनलों पर पहुंचकर <strong>बयान-गोले</strong> दागने लगे। जानकारी दी कि वे साहबान मीटिंग की गुप्त कार्यवाही लीक कर रहे थे। मना किया गया तो माने नहीं। निकाल दिया तो चैनल पर आकर बयान देने लगे।</p>
<p><strong>चैनल-चौपाल</strong> पर बहस छिड़ गयी। साहबान कमेटी की एक महिला को सरे कैमरा हड़काते हुये कह रहे थे- <strong>तुम होती कौन हो ये सवाल करने वाली। </strong> [ हम सोचने लगे कि क्या यहां मैथिली दद्दा को याद करना ठीक होगा- <a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_/_%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A4%A3_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4">हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी</a>]</p>
<p>करप्शन कमेटी के प्रवक्ताजी, जो श्रंगार के भीषण कवि भी हैं , उन साहबान के लिये अंगार बरसा रहे थे- <strong>इन्होंने कमेटी का विश्वास भंग किया।</strong></p>
<p>विश्वास जी लम्बे-लम्बे बयान ऐसे जारी करते हैं जैसे बच्चे लोग लम्बी-लम्बी कवितायें रटकर सुना देते हैं। श्रंगार का यह दुलारा कवि बयान जारी करते समय बेइंतहा अश्रंगारिक लगता है। </p>
<p>साहबजी कमेटी के लोगों के बारे में देश की जनता को बताने लगे- <strong>ये लोग मनमानी करते हैं। हम शुरु से कोर कमेटी में हैं फ़िर भी आजतक हमको कभी बयान जारी करने का मौका नहीं दिया।</strong></p>
<p>क्लास गोल करके पिक्चर देखने वाली आदत की तरह <strong>करप्शन विरोधी कमेटी</strong> के लोग मीटिंग छोड़कर चैनल की तरफ़ भगे चले आये।</p>
<p><a href="http://farm2.staticflickr.com/1037/5187483740_f12171970d_m.jpg"><img src="http://farm2.staticflickr.com/1037/5187483740_f12171970d_m.jpg" alt="" title=" टीवी चैनल"  class="alignright" /></a>भ्रष्टाचारियो के खिलाफ़ मोर्चा खोलने वालों ने एक दूसरे के खिलाफ़ गले खोल दिये। चैनलों पर बयान युद्ध शुरु हो गया। एक-दूसरे पर वक्तव्य के गोले दगने लगे।</p>
<p><strong>वक्तव्य वासना </strong> के वसीभूत होकर लोग अपने-अपने हिस्से की <strong>सदाचार तपस्या</strong> खर्च करने लगे। टीवी चैनल पर आकर बयान जारी करने की इच्छा बड़ी जालिम इच्छा होती है। यह मुई जो न कराये। </p>
<p>चैनल पर फ़ुर्ती से बयान जारी हो रहे थे। लोग एक-दूसरे का बयान नोच रहे थे। </p>
<p>चैनल पर दूरी के चलते लोग मारपीट करने में असमर्थ थे। लेकिन बयान हिंसा में कोई ऐसा कोई पत्थर नहीं छूटा जिसे पलटा न गया हो [left no stone unturned]</p>
<p>हमें लगा कि देश में भयंकर हिंसा के इस माहौल में भी चैनलों पर अहिंसा बची हुई है।</p>
<p>इस पवित्र टीम से जुड़े लोगों ने देश के लिये सूचना का अधिकार जैसा पवित्र अधिकार लागू करने में पसीना बहाया है। गुप्त से गुप्त दस्तावेज की फ़ोटोकापी दस रुपये का पोस्टल आर्डर में लेने का अधिकार। उसी टीम के लोगों में इस बात पर <strong>बयान-नुचव्वल</strong> हो रही है कि मीटिंग की सूचना लीक करने का प्रयास किया गया। कल शायद यह भी तय हुआ कि मीटिंग में शामिल लोगों की तलाशी ली जायेगी। मोबाइल की अनुमति न होगी।</p>
<p>अब इन तपस्वियों को कौन समझाये कि मोबाइल आये तो अभी कुछ साल हुये। आदमी अपना मन तो साथ लिये पैदा होता है। क्या उसकी भी तलाशी होगी। मीटिंग में शामिल होने वालों से कहा जायेगा- <strong>कृपया अपना दिल,दिमाग स्विच आफ़ करके मीटिंग में भाग लें।</strong></p>
<p>जब जनता के लिये काम करने करने वालों की मीटिंगें भी गुप्त होने लगीं तब तो हो चुका। जनता के लिये लड़ाई के एजेंडे भी अगर स्विस बैंक के एकाउंट की तरह गुप्त रखे जायेंगे तो फ़िर क्या फ़ायदा। मजा नहीं आया भाई इस नाटक में। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जिस तेजी से इस घटना के मसले पर चैनलबाजी हुई उसका अगर नाट्य रूपान्तर किया जाये तो शायद इस तरह होगा:</p>
<p><strong>भाई जान:</strong> ये भाईजी आप ये क्या टेप कर रहे हैं मोबाइल में। बंद करिये इसे। मीटिंग की कार्यवाही टेप मत करिये।<br />
<strong>साहेबान:</strong> जनाब मैं तो बस ऐसे ही खेल रहा हूं मोबाइल से। मुझे तो इसे आपरेट करना नहीं आता।<br />
<strong>भाईजान</strong>: मोबाइल आपरेट नहीं कर पाते तो एनजीओ कैसे चलायेंगे आगे चलकर?<br />
<strong>साहेबान: </strong>अपन को एनजीओ की जरूरत नहीं। नेताजी ने अपन को पद देने का वायदा किया है।<br />
<strong>भाईजान:</strong> तो फ़िर जाइये आप नेता जी के पास। यहां हमारा टाइम काहे को खोटा कर रहे हैं। चलिये निकलिये।<br />
<strong>साहेबान:</strong> आप हमारी इस तरह बेइज्जती मत खराब करिये। मैंने शुरु से ये दुकान जमाने में पसीना बहाया है।<br />
<strong>भाईजान:</strong> आप तो जनता की सेवा का सारा मौका हड़पना चाहते हैं। ऐसे नहीं चलेगा। अब आप निकलिये।<br />
<strong>साहेबान:</strong> जा रहे हैं। मेरा भी परता नहीं पड़ता अब यहां। न कोई बयान न वक्तव्य। ऐसे कब तक कोई खटता रहेगा।<br />
<strong>भाईजान:</strong> अरे जाइये, जाइये। बड़े आये बयान देने वाले। कोई चैनल वाला आपके सामने माइक तक नहीं डालेगा।<br />
<strong>साहेबान:</strong> जा रहा हूं। और मैं भी देखता हूं कि कैसे चैनल वाले माइक नहीं लगाते मेरे सामने। मैं भी दिखा दूंगा कि कैसे बयान जारी किया है।<br />
<strong>भाई जान:</strong> चलिये देखते हैं। हिम्मत है आ जा टीवी चैनल पर। सिट्टी-पिट्टी न गुम कर दी तो असल प्रवक्ता नहीं।</p>
<p>इसके बाद कमेटी के लोग मीटिंग समेटकर बाहर निकल लिये। बाहर ही चैनल वालों ने कमेटी वालों को उसई तरह घेर लिया जैसे रेलवे स्टेशन से निकलते यात्री को आटो वाले  घेर लेते हैं।</p>
<p>इसके बाद टीवी चैनल वाले मीटिंग से निकले लोगों  से सारे बयान चूस कर <strong>टीवी- थाली</strong> में रखकर हमारे सामने पेश करता है। हम चाय की चुस्की लेते हुये लोगों के बयान सुनते हैं। कल तक हाथों में हाथ लिये फोटो खिंचाते मुस्कराते लोग  बयान जारी करते दीखते हैं- <strong>हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर। तुझे समाज सेवा का दूध न याद दिला तो नाम नहीं।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><strong>सूचना:</strong>फ़ोटो फ़्लिकर से साभार। ऊपर वाली फ़ोटों में हाथ ऊपर करके खड़े लोगों का हाथ नीचे करके खड़े साहब से बयानबाजी हो गयी। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<img src="http://hindini.com/fursatiya/?ak_action=api_record_view&id=2894&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<title>अमेरिका के कुत्ते और दुनिया के गरीब</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/2876</link>
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		<pubDate>Thu, 19 Apr 2012 02:52:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सबेरे-सबेरे टेलीविजन देख रहे थे। तीन खबरें याद रहीं। 1. अमेरिका में कुत्तों के लिये एक टेलीविजन चैनल खुला। 2. भारत में अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण आज होगा। 3. कानपुर में एक प्रिंसिपल पर जान लेवा हमला। टीवी चैनल के बारे में बताया गया कि ये फ़ालतू की टीआरपी दौड़ के चक्कर में नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm4.staticflickr.com/3507/3984125703_4022b1f772_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3507/3984125703_4022b1f772_m.jpg" alt="" title=" कुत्ते"  class="alignleft" /></a><br />
आज सबेरे-सबेरे टेलीविजन देख रहे थे। तीन खबरें याद रहीं।<br />
1. अमेरिका में कुत्तों के लिये एक टेलीविजन चैनल खुला।<br />
2. भारत में अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण आज होगा।<br />
3. कानपुर में एक प्रिंसिपल पर जान लेवा हमला। </p>
<p>टीवी चैनल के बारे में बताया गया कि ये फ़ालतू की टीआरपी दौड़ के चक्कर में नहीं फ़ंसेगा। न ही इसमें विज्ञापन होंगे। पांच डालर का यह चैनल उन कुत्तों के मनोरंजन के लिये होगा जिनके मालिकों के पास उनकी देखभाल का समय नहीं है। वे दफ़्तर चले जायेंगे तो उनके कुत्ते अपना टीवी चैनल देखकर मजे करेंगे। इस खबर का लोग अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण करेंगे। सबसे पहले तो यही लगा कि अमेरिका के कुत्तों की क्या ऐश है। या कहें कि अमेरिका में कुत्तों तक की ऐश है। क्या पता कोई चिढ़ा हुआ अमेरिकी कहे- अमेरिका में केवल कुत्तों की ही ऐश है। उनके मनोरंजन के लिये टीवी का भी इंतजाम है। पांच डालर मतलब अपने देश के पांच गरीबी रेखा वालों की दिहाड़ी( 30-32 रुपये बताई गयी थी न कुछ दिन पहले)। </p>
<p>हमें कोई अमेरिकी कुत्तों से जलन नहीं है। सबका अपना-अपना भाग्य है। भारत में भी ऐसे कुत्तों की कमी नहीं है। बस चैनल चालू होना है। होगा भी जल्दी ही। अमेरिकी फ़ैशन भारत आने में ज्यादा समय नहीं लेता। आ ही जायेगा जल्द ही। जब तक आयेगा तब तक लोग उसकी <a href="http://www.telegraph.co.uk/family/pets/9211063/DOG-TV-Television-for-dogs-launches-in-the-US.html">रिकार्डिंग से काम चलायेंगे</a>। कुत्ता सबसे सम्माननीय पालतू जानवर माना जाता है। कुत्तों के बाद फ़िर बिल्लियों और दूसरे पालतू जानवरों का नम्बर आयेगा।</p>
<p>अग्नि-5 मिसाइल के बारे में बताया गया कि यह बहुत दूर तक मार कर सकती है। निशाना अचूक है। आप इसको बेफ़ालतू की ही बात मानेंगे लेकिन खुदा झूठ न बुलाये एक बार सोचा कि अपने यहां की तमाम चिरकुटैयां भी एक निशाना होंती। घपला/घोटाला, भुखमरी, करप्शन, गैरबराबरी और तमाम नीचतायें। उन पर दो चार मिसाइल छोड़ देते। कुछ तो कीमत वसूल होती इन मिसाइलों की। </p>
<p>कीमत वसूल होने की बात इसलिये कही कि दुनिया में सबसे ज्यादा पैसा हथियार बनाने पर खर्चा होता है। लेकिन सबसे कम उपयोग इनका ही होता है। कास्ट इफ़ेक्टिवनेस इंडेक्स के मामले में दुनिया के हथियार सबसे लचर साबित होंगे।</p>
<p><a href="http://farm2.staticflickr.com/1327/810820502_470686d42b_m.jpg"><img src="http://farm2.staticflickr.com/1327/810820502_470686d42b_m.jpg" alt="" title="गरीब"  class="alignright" /></a>उधर  नसरुद्दीन शाह जी टीवी पर बता रहे थे कि भारत में ’बहुत से लोगों’ को पीने के लिये साफ़ पानी भी नहीं मिलता। पानी बचेगा तो हम बचेगा। </p>
<p>अब भाई लोगों को पीने का साफ़ पानी न मिले न मिले लेकिन अग्नि मिसाइल तो मिल रही है। ’बहुत से लोग’ कोई अमेरिका के कुत्ते सरीखे भाग्यवान तो हैं नहीं जो उनके लिये विज्ञापन बनाने से ज्यादा परेशान हुआ जाये।</p>
<p>आखिरी खबर के बारे में बताया गया कि कानपुर में कुछ लोगों ने एक प्रिसिपल पर गोली चलाई। पहले गोली ड्राइवर को लगी। फ़िर प्रिंसिपल को। ड्राइवर मर भी गया। प्रिसिपल जिन्दा हैं। </p>
<p>खबर के शीर्षक में प्रिंसिपल पर हमले का जिक्र है। प्रिंसिपल घायल है लेकिन जिन्दा है। उस पर बाद में गोली लगी। ड्राइवर पर पहले गोली लगी और वह मारा भी गया। लेकिन खबर के शीर्षक से गायब है। शीर्षक में आने के लिये आदमी का प्रिसिंपल होना जरूरी है। ड्राइवर का मरना प्रिंसिपल के घायल होने के मुकाबले महत्वहीन है। </p>
<p>वैसे तो मनुष्य का जीवन अमूल्य होता है। जीवन का सम्मान किया जाना चाहिये। लेकिन भारत में (शायद अमेरिका में भी) करोड़ों लोग ऐसे होंगे जिन्होंने कुत्तों के लिये टीवी चैनल वाली खबर देखकर बिना कुछ सोचे कहा होगा- <strong>काश हम भी अमेरिका के कुत्ते होते।<br />
</strong></p>
<p>बात बेवकूफ़ी ही है लेकिन मुझे ऐसा ही लग रहा है। आप पता नहीं क्या सोचें इस बारे में। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>फ़ोटो फ़्लिकर से साभार। </p>
<h2>अपडेट:</h2>
<p>दो दिन पहले फ़ुरसतिया पर लिखे इस लेख को देखिये अखबार वालों किस बेदर्दी से अखबार में ठूंसा है। लेख के कई हिस्से मेले में भाई-बहनों की तरह बिछुड़ गये हैं। पहले <a href="http://amit-nivedit.blogspot.in">अमित</a> ने इसकी सूचना दी और बाद में ये फ़ोटो <a href="http://www.santoshtrivedi.com">संतोष त्रिवेदी</a> ने भेजी।<br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2012/04/फ़ुरसतिया.jpg"><img src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2012/04/फ़ुरसतिया-225x300.jpg" alt="" title="फ़ुरसतिया" width="225" height="300" class="alignleft size-medium wp-image-2891" /></a></p>
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		<title>चलो अपन भी बोल्ड हो जायें</title>
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		<pubDate>Fri, 13 Apr 2012 13:26:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[भाईसाहब अब आप भी ’बोल्ड’ हो जाइये। हमारे एक दोस्त ने फ़ोन पर आग्रह किया। (वैसे हम लिखना इसरार चाह रहे थे लेकिन इस्पेलिंग में कन्फ़्यूज हो गये एन टाइम कि इशरार लिखें कि इसरार तो मटिया दिये और आग्रह की शरण में आ गये) हां तो बात दोस्त के आग्रह की हो रही थी। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm4.staticflickr.com/3159/2985549583_ca8d76a2a8_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3159/2985549583_ca8d76a2a8_m.jpg" alt="" title=" गरीबी"  class="alignleft" /></a>भाईसाहब अब आप भी ’बोल्ड’ हो जाइये। हमारे एक दोस्त ने फ़ोन पर आग्रह किया। (वैसे हम लिखना <strong>इसरार</strong> चाह रहे थे लेकिन इस्पेलिंग में कन्फ़्यूज हो गये एन टाइम कि <strong>इशरार</strong> लिखें कि <strong>इसरार </strong> तो मटिया दिये और आग्रह की शरण में आ गये)<br />
हां तो बात दोस्त के आग्रह की हो रही थी। दोस्त बोला बोल्ड हो जाइये। आग्रह इतना तेज था कि उसका अंग्रेजी उल्था किया जाये तो कुछ ऐसा बनेगा- <strong>नत्थिंग डूइंग! बी क्विक। बी बोल्ड!</strong><br />
अपन ने सोचा शरमा के कह दें &#8211; <strong>अब इस उमर में क्या बोल्ड होंगे। </strong><br />
लेकिन फ़िर सोचा अब क्या शर्माना। सो बोल्डली कह दिये- <strong>हम तो पैदाइसी बोल्ड हैं! पैदा ही नंगे हुये थे।</strong><br />
दोस्त बोला-<strong> मजाक नहीं यार! देख ही रहे होगे सब लोग बोल्ड हो रहे हैं! तुम काहे को पीछे रहो। मौका है बोल्ड हो जाओ। </strong><br />
हमने कहा -<strong>अबे बोल्ड होना क्या दफ़्तर जाना है। कि पहन के कपड़े निकल लिये। बोल्ड होने के लिये  कविता लिखनी पड़ती है। गुंडागिरी करनी पड़ती है। मां-बहन करनी पड़ती है। रिश्तों की और अकल दोनों की। इत्ती बोल्डनेस कहां से लायें।</strong><br />
दोस्त ने समझाया कि कविता की जिद हम थोड़ी कर रहे हैं। तुम लेख में बोल्ड हो जाओ। सब धर दो खोल के। एकदम नख सिख वर्णन कर दो। एकदम इरोटिक। उत्तेजक। जैसे उत्पादन शालाओं  में किसी आपरेशन का फ़्लोचार्ट होता है वैसे ही तुम <strong>’काम’ </strong>का फ़्लोचार्ट बना दो। बस हो गयी बोल्डनेस। या फ़िर किसी के लिये अलबेली बहुआयामी गालियां लिख डालो। हो गयी बोल्डनेस। </p>
<p>हम सहम गये। बोले इत्ते बोल्ड हम कहां। लेकिन दोस्त जिद किये हुये था कि बोल्ड बन के दिखाना है। कह भी दिया उसने- <strong>बोल्ड बने बिना तेरी खैर नहीं।</strong></p>
<p>फ़िर अपन नेट पर पसरी तमाम बोल्डनेस का जायजा लेते रहे। कविताओं में इशारे-इशारे में बातें होती हैं। लेखों में तो एकदम खुल्ला बोल्डनेस मौजूद है। खुल्लाखेल फ़र्रखाबादी। </p>
<p>कालेज के जमाने में हास्टल में घर से पहली बार बाहर आये लड़के बोल्ड होना सीख रहे थे। अश्लील साहित्य को इज्जत से पढ़ते हुये और बहुआयामी गालियां देते हुये। कालेज से निकलकर वो सब खुशनुमा यादें होकर रह गयीं। खुशनुमा इसलिये कि जो बीत जाता है वो खुशनुमा होकर ही याद आता है। बुरा बीता तो इसलिये खुशनुमा कि बीत गया। अच्छा बीता तो डबल खुशनुमा।</p>
<p>जब नेट से जुड़े तो कुछ दिन बाद ही ब्लॉगिंग शुरु कर दी। आठ साल होने को आये। शुरू में बहुत कम हिंदी थी नेट पर। आज जो हिंदी है नेट पर उसमें हिंदी ब्लॉगिंग का भी काम भर का योगदान है। </p>
<p><a href="http://farm1.staticflickr.com/162/404983069_8f27eff425_m.jpg"><img src="http://farm1.staticflickr.com/162/404983069_8f27eff425_m.jpg" alt="" title=" गरीबी"  class="alignright" /></a>नेट पर हिन्दी आने के बाद यौन सामग्री भी आई नेट पर। वह सब भी जिसे लोग उत्तेजक और अश्लील मानते हैं लेकिन छिपकर पढ़ते हैं। <strong>उत्तेजक</strong> में भी कुछ इतना <strong>उत्तेजक</strong> हो जाता है कि पढ़ने वाला <strong>बोल्ड</strong> हो जाता है और कहता है -<strong>ये तो अश्लील है।</strong></p>
<p>ऐसा न जाने कितना लेखन समाज में मौखिक/लिखित मौजूद है। रोज रचा जा रहा है। उसको दोहराकर न अपन पहले हो जायेंगे न आखिरी। क्या फ़ायदा ऐसा बोल्ड होने से। </p>
<p> आज समाज में कित्ती गैरबराबरी है। कित्ती परेशानियां हैं।  लोगों का जिन्दा रहना मुश्किल है। समर्थ लोग न लोगों को होश नहीं न जाने किधर भागे जा रहे हैं। </p>
<p>हाल ये है जनाबे अली कि दूसरे की समस्या पर किसी को सोचने का समय नहीं है। ऐसा माफ़िक हम न जाने किधर जायेंगे कुछ समझ नहीं आता। कभी-कभी लगता है ये अपने आपमें एक अश्लीलता है कि इस सबसे कन्नी काटे असहाय जिये जा रहे हैं। </p>
<p>इसी तरह की न जाने क्या-क्या बातें मैं दोस्त को बोलता रहा। मेरे शान्त होने के बाद दोस्त बोला &#8211; <strong>तेरे साथ यही समस्या है। जब देखो गाड़ी पटरी से उतारकर  बाबागीरी बनने करने लगते हो। तू छोड़ तुझसे नहीं होने सकता बोल्ड लेखन! </strong></p>
<p>दोस्त अपना मुंह  झोला माफ़िक लटका के चला गया और अपन सोच रहे हैं कि बेमतलब की भावुकता भी  कभी-कभी कवच का काम करती है। है न! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<h2>चलते-चलते</h2>
<p>पिछले दिनों एक  महिला ब्लागर की  कविता पर आई टिप्पणियों के बाद एक ब्लागर ने मर्दानगी दिखाते हुये टिप्पणी करने वाले ब्लागर को जिस तरह मां-बहन की गालियां वर्तनी उलटी करके लिखीं उससे मुझे रवीन्द्र कालिया के उपन्यास <strong>खुदा सही सलामत है</strong> की महिला पात्र (नाम शायद हसीना  बी) याद आयीं जो गालियां उल्टी करके बकतीं थीं ताकि लोग समझ भी लें और गाली भी न कह सकें। जो काम तीस साल पहले कालिया जी के उपन्यास की महिला पात्र ने तीस साल पहले कर डाला वो काम अबके मर्द कर रहे हैं। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>एक और बात याद आयी। लगभग पांच साल पहले एक ब्लागर ने संजय बेंगानी के लिये आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। टिप्पणी आपत्तिजनक थी उसमें गालियां नहीं। उसके ब्लाग को उस समय के सबसे सक्रिय संकलक नारद से बाहर कर दिया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस प्रतिबंध के पक्ष-विपक्ष में बहुत बहस हुई । शायद इतनी बहस उसके बाद ब्लागजगत में फ़िर नहीं हुई। लेकिन उसका ब्लाग दोबारा वापस नहीं शामिल हुआ।</p>
<p>इस बार  एक महिला ब्लागर की पोस्ट पर बेहूदी टिप्पणियां हुईं उसके बाद खुले आम गाली गलौज होने हुआ। इसके बावजूद इस मसले पर ज्यादा हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ। इसका मतलब क्या समझा जाये- <strong>ब्लाग जगत परिपक्व हुआ है या फ़िर समझदार और संवेदनहीन।</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>तमाम साथी उस समय ब्लागजगत से जुड़े नहीं होंगे इसलिये उसका लिंक दे रहा हूं- <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/288">नारद पर ब्लाग का प्रतिबंध – अप्रिय हुआ लेकिन गलत नहीं हुआ</a> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>पूड़ियां तेल में गदर नहाई  हुई हैं</title>
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		<pubDate>Tue, 10 Apr 2012 16:36:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[कविता सिखाते हुये गुरुजी से अनौपचारिक बाते होंने लगीं। बोले कि पुराने जमाने में लोग लय,ताल,छंद में कविता लिखते थे। इस तरह की कवितायें देखने में ऐसे लगतीं थीं जैसे स्कूल ड्रेस में बच्चे। देखने में खूबसूरत। एक लाइन में खड़े बच्चे जैसे देखने में सुन्दर लगते हैं वैसे ही लय ताल में लिखी कवितायें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm5.staticflickr.com/4093/4924780671_472c54e23b_m.jpg"><img src="http://farm5.staticflickr.com/4093/4924780671_472c54e23b_m.jpg" alt="" title=" स्कूल ड्रेस में बच्चे"  class="alignleft" /></a><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/2809">कविता सिखाते हुये</a> गुरुजी से अनौपचारिक बाते होंने लगीं। बोले कि पुराने जमाने में लोग लय,ताल,छंद में कविता लिखते थे। इस तरह की कवितायें देखने में ऐसे लगतीं थीं जैसे स्कूल ड्रेस में बच्चे। देखने में खूबसूरत। एक लाइन में खड़े बच्चे जैसे देखने में सुन्दर लगते हैं वैसे ही लय ताल में लिखी कवितायें लगतीं थीं। अरे लिखी नहीं भाई रची हुई! कवि कभी कविता लिखता नहीं है वो हमेशा कविता रचता है। इस बात पर ही कवि और लेखक की परिभाषायें भी तय हुई हैं <strong>किसी लेखक की लिखी हुई चीज को जब बराबर-बराबर खानों में लिखकर छाप दिया जाता है तो वह कविता बन जाती है। </strong></p>
<div style="width: 150px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%; font-weight:bold; border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;"><center>किसी लेखक की लिखी हुई चीज को जब बराबर-बराबर खानों में लिखकर छाप दिया जाता है तो वह कविता बन जाती है। </center></div>
<p>लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे जमाना आधुनिक होता गया लोगों की सोच में बदलाव आया। जैसे पहले लोग शराफ़त और शालीनता की इज्जत करते थे। लेकिन आज के जमाने में शरीफ़ और सज्जन को लोग लप्पूझन्ना टाइप मानते हैं। गुंडई और उजड्डता को ज्यादा भाव देते हैं। इसी तरह लोगों के कविता के बारे में भी विचार बदले। अब तुकांत कविताओं भी लोग जान-बूझकर अतुकांत बनाकर पेश करते हैं। </p>
<p>बकौल परसाईजी- <strong>मरघटी कवितायें सुनाकर वाह-वाही पाने वाले घंटों तक अपना श्रृंगार करके अपने चेहरे बहदवास और लुटे-पिटे बनाते थे।</strong> उसई तरह अतुकांत कविता लिखने वाले अपनी कवितायें तुक में लिखकर मेरा मतलब रचकर फ़िर उनको बेतुका बनाते हैं। इसके बाद जनता के सामने पेश करते हैं और ज्ञानी कवि कहलाते हैं।</p>
<div style="width: 150px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%; font-weight:bold; border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;"><center>कविता लिखने के लिये सबसे जरूरी तत्व आपका आत्मविश्वास है। आपको हिचकना नहीं चाहिये। </center></div>
<p>एक चेले ने सवाल किया कि गुरुजी और सब तो ठीक लेकिन कविता की रचना के सबसे जरूरी तत्व क्या है?</p>
<p>गुरुजी ने समझाया कि कविता लिखने के लिये सबसे जरूरी तत्व आपका आत्मविश्वास है। आपको हिचकना नहीं चाहिये। जो समझ में आ रहा है उसे तुरंत लिख डालना चाहिये। आई मीन रच डालना चाहिये। जो न समझ में आये उसे तो उससे और  पहले रच डालना चाहिये। पहले मसाला तैयार करो इसके बाद कुछ न कुछ तो बनेगा ही। बस उसी को श्रोता/पाठक के सामने परस दो।</p>
<p>एक चेले ने गुरुजी से उदाहरण सहित व्याख्या करने को कहा। गुरुजी के सामने तब तक नाश्ता आ गया था। नाश्ते में गरमा-गरम पूरियां थीं। गुरुजी<del datetime="2012-07-08T01:43:28+00:00"> ने </del>तुरंत कविता रचने लगे। मजाक-मजाक में गुरुजी ने छह फ़ुटकर बंद रच डाले। आप भी वो फ़रमायें जिसे शाइर लोग मुलाहिजा के नाम से जानते हैं <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<ol><a href="http://farm4.staticflickr.com/3173/2657034179_37f3e991c0_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3173/2657034179_37f3e991c0_m.jpg" alt="" title=" पूड़ियां"  class="alignleft" /></a>
<li><strong>पूड़ियां तेल में गदर नहाई  हुई हैं,<br />
क्या बन-ठन के  प्लेट में आई हुई हैं,<br />
आलू्-सब्जी का भी साथ है सुंदर,<br />
खाने को तबियत ललचाई हुई है।</strong></li>
<p></p>
<li><strong>गई थीं कढाही में तो बहुत दुबली थीं,<br />
जैसे किसी गरीब की सूखी लुगाई हो,<br />
कढ़ाही से  तो कुछ ऐसे फ़ूलकर निकली,<br />
जैसे किसी नेता की काली कमाई हो।</strong></li>
<p>
<a href="http://farm4.staticflickr.com/3335/3453849707_07df4dc91b_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3335/3453849707_07df4dc91b_m.jpg" alt="" title=" फ़ेसबुक"  class="alignright" /></a>
<li><strong>देश में बहुत सी समस्यायें हैं भैये,<br />
सबसे जालिम उनमें से ये मंहगाई है,<br />
सैकड़ों अप्सराओं से घिरे थे जो कभी,<br />
एक से निभाने में कांख निकल आई है।</strong></li>
<p></p>
<li><strong>फ़ेसबुक के भी मजे यारों क्या कहिये,<br />
दोस्ती-दुश्मनी खूब मजे में निभाई है,<br />
खुश हुये तो लाइक करके फ़ूट लिये ,<br />
अन्फ़्रेंड करके दुश्मनी भी खूब निभाई है।</strong></li>
<p><a href="http://farm6.staticflickr.com/5030/5672748656_fc7a3074da_m.jpg"><img src="http://farm6.staticflickr.com/5030/5672748656_fc7a3074da_m.jpg" alt="" title=" दोस्ती "  class="alignleft" /></a>
<li><strong>एक टिप्पणी मिली पोस्ट को अकेले में,<br />
पोस्ट ने उसको छाती से सटा सा लिया,<br />
कहां घूमती फ़िरी थी बावली आज तक,<br />
तेरी याद में ब्लॉग की जान पे बन आई है।</strong></li>
<p></p>
<li> <strong>अक्ल की बात से बड़ा डर लगता है<br />
अंदर जरूर कोई घपला है, हमेशा लगता है,<br />
कुछ न कुछ बेवकूफ़ी हमेशा करते रहना<br />
दोस्ती निभाते रहो जैसे अब तक निभाई है। </strong> </li>
</ol>
<p>गुरुजी की बात लगता है चेलों के समझ में अच्छे से आ गयी। वे सब अपने-अपने लैपटाप खोलकर अपने ब्लॉग/फ़ेसबुक/टिवटर पर तुकबंदियां ठेलने में मशगूल हो गये। </p>
<p>इधर गुरुजी अपने खाते पर व्यस्त का स्टेटस लगाकर और सरदर्द की गोली पानी से निगलकर  अपने पुराने  चेलों की कवितायें दुरस्त करने लगे। </p>
<p>आप क्या कर रहे हैं। आप भी कुछ आशु काव्य रच डालिये। जो होगा देखा जायेगा। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><strong>सूचना:</strong> फोटो <a href="http://www.flickr.com">फ़्लिकर </a>से साभार! कविता कहां से चुराई ऊ हम न बतायेंगे। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<img src="http://hindini.com/fursatiya/?ak_action=api_record_view&id=2831&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>गुंडा पहचानने के फ़ायदे</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/2823</link>
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		<pubDate>Mon, 09 Apr 2012 04:21:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[कल खबर आई कि अमेरिकाजी ने हाफ़िज भाई पर पचास करोड़ का इनाम घोषित कर दिया। आगे कुछ कहने के पहले साफ़ कर दें आतंकवादी हाफ़िज भाई को हाफ़िज भाई इसलिये लिखा कि अपने पाकिस्तान में गुंडो/आतंकवादियों को भी भाई कहने का रिवाज है। वैसे साझा संस्कृति के चलते यह परंपरा अपने यहां भी है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm5.staticflickr.com/4017/4396957742_5b9507f63d_m.jpg"><img src="http://farm5.staticflickr.com/4017/4396957742_5b9507f63d_m.jpg" alt="" title=" अपराध"  class="alignleft" /></a>कल खबर आई कि अमेरिकाजी ने हाफ़िज भाई पर पचास करोड़ का इनाम घोषित कर दिया।</p>
<p>आगे कुछ कहने के पहले साफ़ कर दें आतंकवादी हाफ़िज भाई को हाफ़िज भाई इसलिये लिखा कि अपने पाकिस्तान में गुंडो/आतंकवादियों को भी भाई कहने का रिवाज है। वैसे साझा संस्कृति के चलते यह परंपरा अपने यहां भी है। अपने यहां परंपरा से ज्यादा यह दूरंदेशी के चलते भी होता है जैसा कि पॉपुलर मेरठी साहब ने <a href="http://shiv-gyan.blogspot.in/2008/11/blog-post_10.html">लिखा भी</a> है-</p>
<blockquote><p><strong> मवालियों को न देखा करो हिकारत से<br />
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए</strong></p></blockquote>
<p>रही बात अमेरिकाजी की तो उनको अपन अमेरिकाजी इसलिये कहते हैं  कि उनके लिये अपन के मन में काफ़ी इज्जत है। वे पूरी दुनिया में लोकतंत्र की हिफ़ाजत इस तरह करते हैं जैसे कोई बड़ा भाई अपनी छोटी बहन की रक्षा मोहल्ले के लफ़ंगों से करता है। अब यह अलग बात है कि बड़े भाई की पाबंदियों से आजिज आकर कभी-कभी बहन सोचती है कि इस भाई से अच्छे तो वे लफ़ंगे हैं जो उसको इंसान तो समझते हैं।</p>
<p>हां तो जब खबर आई तो लगा कि अपन को फ़िर करोड़ों का चूना लग गया। अब आप पूछोगे कि लाख रुपये की औकात नहीं, करोड़ों का चूना कैसे?</p>
<p>हुआ कुछ ऐसा कि जैसे ही अमेरिकाजी ने हाफ़िज भाई पर पचास करोड़ का इनाम घोषित किया वैसे ही अपन को लगा कि अगर अपन पहले ही एक करोड़ का इनाम उन पर घोषित किये होते तो उनचास करोड़ का फ़ायदा हो जाता। हाफ़िज भाई को जो पकड़ के लाता उससे कहते जरा एक मिनट ठहरो। उधर अमेरिकन एम्बेसी में जाकर उनको हाफ़िज भाई को थमाकर पचास करोड़ रुपये वसूल लेते। एक करोड़ रुपये पकड़कर लाने वाले को थमा देते। उनचास करोड़ पर जो इनकम टैक्स बनता वो कटवा के साल के आखिर में रिटर्न दाखिल कर देते। बाद में कौन बनेगा करोड़पति के विजेताओं की तरह इंटरव्यू देते हुये बताते कि अपन ऐसे बने करोड़पति। </p>
<p>आज नहीं तो देखियेगा कल यह धन्धा बहुत चलन में आयेगा। लोग उभरते हुये गुंडों पर इनाम घोषित करेंगे। बाद में जब उनपर बड़ा इनाम घोषित होगा तो दोनों के अंतर के बराबर पैसे कमाकर मालामाल हो जायेंगे। जितनी जल्दी लोग गुंडों की काबिलियत पहचान लेंगे उतना ही उनके मालामाल होने की गुंजाइश बढेगी। जिस तरह आज शेयर पर पैसा लगाने वाले ढेर सलाहकारों की भीड़ रहती है वैसे ही आने वाले समय में गुडों के एक्सपर्ट होने लगेंगे। वे आपको बतायेंगे –<strong>इस गुंड़े पर पैसे लगा दो भाई। उभरता हुआ गुंडा है। दो साल में पैसे वसूल हो जायेंगे। </strong></p>
<p>ताज्जुब नहीं कि बैंके हाउस बिल्डिंग एडवांस की तरह गुंडा आइडेंटीफ़िकेशन एडवांस भी देने लगें। </p>
<p><a href="http://farm3.staticflickr.com/2222/2495404978_661419ab59_m.jpg"><img src="http://farm3.staticflickr.com/2222/2495404978_661419ab59_m.jpg" alt="" title=" अपराध"  class="alignleft" /></a>अब आप कहोगे कि भाई जब इनाम ही घोषित हुआ तो लोग आपको क्यों गुंडा सौंपेगे। वे बड़ी रकम वाले को ही गुंड़ा सौंपेगे। उससे पैसे कमायेंगे। तो अपन का कहना है कि जब इस मामले में नियम बनेंगे तो अपन यह व्यवस्था देंगे कि गुंडों के मामले में सीनियारिटी का ख्याल रखा जायेगा। पकड़े जाने पर गुंडे पर पहला हक उसका होगा जो पहले उस पर इनाम घोषित करेगा। </p>
<p>क्या पता कि आगे चलकर गुंड़ों बदमाशों पर इनाम की घोषणाओं के पेटेण्ट होने लगें। पहली घोषणा करने वाले को बाद की घोषणा वालों से रायल्टी मिले। तमाम देशों में सेना के  रिटायर्ड आफ़ीसर हथियार विक्रेताओं के बिक्री सलाहकार बन जाते हैं। वैसे ही हो सकता है कि गुंडे लोग कुछ दिन गुंडागीरी करने के बाद राजनीति में जाने के लिये हुड़कने की बजाय गुंडा पहचानने का अपना काम शुरु कर दें। कुल मिलाकर मामला समाज के हित में रहेगा। साल भर में दस-पांच गुंडे पहचान लिये बस काम बन गया। खाली समय में उपदेश वगैरह देकर टाइम पास कर सकता है अगला।</p>
<p>आपको लगता होगा कि यह सब बेवकूफ़ी की बातें हैं। हम आपकी बात से इंकार कहां कर रहे हैं। बल्कि हम तो खुदै कह रहे हैं कि यह बात परम बेवकूफ़ी की है कि लेकिन हमें फ़िर भी पता नहीं क्यों यह लग रहा है कि अपन को एक ठो गुंडा पहचान दल बनाना चाहिये। गुंडागीरी जब समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त है तो उसकी अपन को उपेक्षा नहीं बल्कि इज्जत करनी चाहिये। उसके बारे में गंभीरता से शोध करना चाहिये।</p>
<p>गुंडागीरी वैसे भी अब उतना खतरनाक धंधा नहीं रहा। पहले डर था गुंडों को कि पकड़े गये तो जिंदगी भर के लिये जेल में सड़ना पड़ेगा। अब तो गुंडों को यह सुविधा हो गयी है कि पकड़े जाओ तो एकाध वी.आई.पी. लोगों का अपहरण करके बंधक बना लो और फ़िरौती के रूप में अपने सब साथियों को छुड़ा लो। दल में एक भी कायदे का गुंडा हुआ तो पूरा दल जेल से बाहर हो सकता है। जेल पिकनिक टाइप हो गयी है। </p>
<p>और भी तमाम बातें सोची थी कहने को लेकिन दिमाग उनचास करोड़ के नुकसान के बारे में सोच-सोचकर हलकान है। इसलिये आगे फ़िर कभी।  <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<h2>&#8230;चलते-चलते</h2>
<p>गुंडों को भी अपनी पब्लिसिटी की जरूरत होती है। जैसे गब्बर भाई खुद कहा करते थे -<strong>पचास-पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जायेगा। </strong>इसी तरह उदीयमान गुंडे भी अपने बारे में खुद कहानियां गढ़ते सुनाते हैं। इसी पर बात करते हुये एक दोस्त ने खुशवंत सिंह की एक कहानी के बारे में सुनाया जिसमें एक लड़की अपनी यौन सक्रियता के बारे में डींगे हांका करती थी कि उसको कोई मर्द संतुष्ट नहीं कर सकता। जो मिला उससे पराजित होकर लौटा। लड़की मर्दों के बीच आतंक के रूप में कुख्यात हो गयी थी। भले मर्द उससे बचते कि कहीं उनकी मर्दानगी भी ने टेस्ट हो जाये।</p>
<p>एक दिन ऐसे ही नये लड़के ने मजाक-मजाक में उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों कमरे में गये। लड़के ने जैसे ही लड़की को छुआ वह बेहोश हो गयी। उसको फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया।</p>
<p>बाद में पता चला कि वह लड़की चिर कुंआरी थी। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>चित्र <a href="http://www.flickr.com/">फ़्लिकर </a>से साभार। </p>
<img src="http://hindini.com/fursatiya/?ak_action=api_record_view&id=2823&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<title>आन लाइन कविता स्कूल</title>
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		<pubDate>Thu, 05 Apr 2012 16:40:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[गुरुजी आन लाइन कविता लिखना सिखा रहे हैं। हर रस की कविता लिखना सिखाते हैं गुरुजी। श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत रस। सब रसों का पैकेज है गुरुजी का पास। इन मूल रसों के अलावा वे रसों का फ़्यूजन भी सिखाते हैं। रसों का फ़्यूजन मतलब कि एक रस में दूसरे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://farm4.staticflickr.com/3441/3995368504_d5c9e05ee4_m.jpg"><img src="http://farm4.staticflickr.com/3441/3995368504_d5c9e05ee4_m.jpg" alt="" title=" कविता"  class="alignleft" /></a>गुरुजी आन लाइन कविता लिखना सिखा रहे हैं। </p>
<p><a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%B8_%28%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%29#.E0.A4.B0.E0.A4.B8.E0.A5.8B.E0.A4.82_.E0.A4.95.E0.A4.BE_.E0.A4.B0.E0.A4.BE.E0.A4.9C.E0.A4.BE_.E0.A4.95.E0.A5.8C.E0.A4.A8_.E0.A4.B9.E0.A5.88.3F">हर रस </a>की कविता लिखना सिखाते हैं गुरुजी। श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत रस। सब रसों का पैकेज है गुरुजी का पास। इन मूल रसों के अलावा वे रसों का फ़्यूजन भी सिखाते हैं। रसों का फ़्यूजन मतलब कि एक रस में दूसरे की ब्लेंडिंग करके कविता लिखना। जैसे पालिएस्टर कपड़े में सूती/टेरीकाट का अलग-अलग अनुपात होता है (67:33, 70:30,50:50) वैसे ही  वीभत्स श्रृंगार रस, भयानक करुण रस, अद्भुत हास्य रस, भयानक शांत रस, रौद्र श्रृंगार रस, करुण वीर रस और आदि-इत्यादि रस अलग-अलग मात्रा में मिलाकर कविता लिखना सिखाते हैं  गुरुजी । आदि-इत्यादि रस वो रस है जो आप इन रसों के तालमेल से बना सकते हैं। आपको पूरी छूटी है कोई भी नया रस सोचने की। <strong>आदि-इत्यादि रस</strong> को आप <strong>विकिपीडिया रस</strong> कहना चाहें तो हम एतराज नहीं करेंगे। </p>
<p>आज गुरुजी श्रृंगार रस की कविता लिखना सिखा रहे हैं।  गुरुजी का मानना है कि आज की दुनिया में श्रृंगार रस के बिना किसी रस की नैया पास नहीं लगती। श्रृंगार रस गठबंधन सरकार के अनिवार्य घटक की तरह है।  किसी भी रस की सरकार श्रृंगार रस के  समर्थन के बिना खतरे में पड़ सकती है।</p>
<p>श्रृंगार का मतलब गुरुजी बताते हैं -सजावट/बनावट/दिखावा। जो है उसको खूबसूरत बताकर पेश करना। नाटक श्रृंगार रस की जान है। वीर रस तक बिना दिखावे के नहीं जमता आजकल। वीर रस के कवि को भी अपने चेहरे पर क्रोध का श्रृंगार करना पड़ता है। </p>
<p>हां तो गुरुजी बता रहे हैं कि श्रृंगार रस में आम तौर पर लड़के लोग लड़कियों की खूबसूरती की तारीफ़ करते हुये कविता लिखते हैं। इसमें सिद्ध होने के लिये खूब झूठ बोलना और झांसा देना आना चाहिये। उपमा ऐसी होनी चाहिये कि सीधे सुनने वाला लहालोट हो जाये। </p>
<p>एक छात्र व्यग्र हो रहा था। बोला गुरुजी झांसा देने में हमें कोई एतराज नहीं है। आजकल तो हर विज्ञापन में इसकी विजुअल ट्रेनिंग मिल जाती है।  लेकिन आप ये थ्योरी रहन दें। सीधे उदाहरण देकर समझाइये। </p>
<p>गुरुजी बोले- अब मानो आपको किसी लड़की की तारीफ़ करनी है तो यह तो कह नहीं सकते कि सीता तुम राधा की तरह सुन्दर हो। इससे  सीता डबल नाराज हो जायेगी। एक तो इसलिये कि राधा उसकी माफ़िक कैसे सुन्दर हो गयी दूसरी इससे यह भी डाउट होता है तुम राधा से भी इस तरह का वार्तालाप करते होगे। </p>
<p>इसलिये फ़्राम द वेरी बिगनिंग कवि लोग  श्रृंगार वर्णन में हमेशा सुरक्षित मार्ग अपनाते आये हैं। कभी सुन्दरता की सीधे तारीफ़ नहीं की। घुमा फ़िराकर बात कही। पूरे शरीर को टुकड़ों में बांटकर ऐसा माफ़िक बना दिया जैसे कि चोरी की कार को खोलकर कबाड़ी मार्केट वाले बना देते हैं। फ़िर हर अंग की तुलना इधर-उधर की चीजों से कर दी। आंखे मछली जैसी, कान हिरणी जैसे, चेहरा चांद जैसा, होंठ कमल जैसे, गरदन सुराही दार, ये इस तरह, वो उस तरह। अब सुनने वाला गच्च। लेकिन अगर कोई भला आदमी मछली, हिरणी, चांदनी, कमल, सुराही को जोड़ जाड़कर लाये तो अगला कहेगा -<strong>हटाओ यार ये कूड़ा सामने से। </strong></p>
<p><a href="http://farm1.staticflickr.com/208/460022382_6d85091700_m.jpg"><img src="http://farm1.staticflickr.com/208/460022382_6d85091700_m.jpg" alt="" title=" कविता"  class="alignright" /></a>छात्रों की कसमसाहट देखकर गुरुजी ने सीधे बताना शुरु किया। बताया मान लो तुमको किसी कन्या की चेहरे की चमक का बयान करना है तो क्या कहोगे उससे? बताओ , बताओ, शरमाओ मत। कवि होने के लिये शर्म से निजात पाना पहली आवश्यकता होती है।</p>
<p>मैं कहूंगा कि तुम्हारा चेहरा ऐसे चमक रहा है लक्में की क्रीम लगाकर आयी हो! -एक उत्साही छात्र ने कहा। </p>
<p>गुरुजी ने कहा इसमें खतरा है कि वह लक्मे की क्रीम बिल्कुलै पसंद न करती हो। किसी और मेक की लगाती हो तब! </p>
<p>फ़िर आपै बताइये गुरुजी। बच्चे बेताब हो रहे थे।</p>
<p>गुरुजी बोले -पुराने जमाने से चेहरे की हमेशा चांद से तुलना की जाती थी। जैसे वीरता के लिये हम लोग पाकिस्तान को खाक में मिटाने की बात करते हैं वैसे ही चेहरे की सुन्दरता के लिये चांद बेस्ट आइटम है। मुझे लगता है कि अगर चांद न होता तो संसार भर की तमाम सुन्दरियां बिना खूबसूरती की तारीफ़ सुने दुनिया से निकल लेतीं। चांद दुनिया भर की सुन्दरियों के लिये परमानेंट सब्सिडी आइटम है। </p>
<p>वैसे आजकल चेहरे पर चांदनी बिखेरने का चलन है। दैट आलसो यू कैन ट्राई।- गुरुजी ने अंग्रेजी में अपना आत्मविश्वास प्रकट किया।</p>
<p>ये चांदनी किधर मिलेगी गुरुजी ? एक जिज्ञासु छात्र च्युंगम चबाते हुये बोला।</p>
<p>चांदनी तो सारी दुनिया में इफ़रात में मिलती है। वैसे तो हर जगह मिलती है चांदनी लेकिन कवि लोग सबसे ज्यादा छत की चांदनी का इस्तेमाल करते हैं कविता में। अभी जाकर देखो छत पर टहल रही होगी। चांदनी को छत पर टहलने की आदत है।</p>
<p>गुरुजी इधर छत कहां? पांचवे तल्ले के फ़्लैट में रहते हैं अपन। छत पन्द्रहवें माले पर है। वो भी रात को बंद कर देता है चौकीदार ताला जीने में कि कोई वहां जाकर कोई कुछ कर न बैठे। </p>
<p>फ़िर टैरेस की चांदनी से काम चलाओ- गुरुजी ने विकल्प सुझाया!</p>
<p>इधर चांद दिखता किधर है जी। बगल की बिल्डिंग तो इत्ती सटी है कि सिवा चोर के और कुछ उधर से आ नहीं सकता।</p>
<p>फ़िर सड़क की चांदनी पर आओ। गुरुजी ने अंतिम विकल्प बताया।</p>
<p>गुरुजी सड़क की चांदनी को न जाने कित्ती तो भारी गाड़ियां कुचलती रहती हैं। कुचली हुई चांदनी से लड़की के चहरे की चमक की तुलना करेंगे तो भड़क न जायेगी-  एक ने मासूमियत से पूछा!</p>
<p>हो सकता है ऐसा हो लेकिन आमतौर पर कोई इतना ध्यान नहीं देता। जहां तुमने कहा चेहरे से चांदनी छिटकने की बात कही वहां सूरज दमकने लगेगा। </p>
<p>सड़क की चांदनी का जिक्र करते हुये गुरुजी उपमाओं को आधुनिक जमाने में खैंच ले गये। बोले- आजकल के लोग जीवन से जुड़ी उपमायें पेश करने में ज्यादा भरोसा करते हैं। सड़क के चिकनेपन की तुलना एक हीरोइन के गाल से चिकनेपन की बात तो आप लोग जानते ही हैं। इसी तरह कुछ आधुनिक लोग हंसने पर गाल पर पड़ जाने वाले गड्ड़े की तुलना सड़क पर भारी वाहनों के चलने से हो जाने वाले गड्ड़े से करते हैं। </p>
<p><a href="http://farm7.staticflickr.com/6129/5951773317_a359b872c4_m.jpg"><img src="http://farm7.staticflickr.com/6129/5951773317_a359b872c4_m.jpg" alt="" title=" कविता"  class="alignleft" /></a>इससे तो मोहब्बत का मसला ऊबड़-खाबड़ हो सकता है गुरुजी-  एक छात्र ने भविष्य की सोचते हुये कहा।</p>
<p>हां हो सकता है। लेकिन अलग हटकर लिखने वाले कवि इस सब की चिंता नहीं करते। वे लोग मानते हैं कि उपमा नई होनी चाहिये। भले ही ऊट-पटांग हो लेकिन अलग दिखे। इस घराने के लोग सीधी-साधी और प्रचलित उमपाओं से उसी तरह बिदकते हैं जैसे केजरीवालजी से जनप्रतिनिधि। </p>
<p>ये तो आप रोचक बात बताये गुरुजी। कुछ उदाहरण बताइये इन ऊटपटांग उपमाओं के।</p>
<p>अब उदाहरण तो याद नहीं लेकिन कुछ याद आ रहा है सो सुनो:</p>
<p>1. तुम्हारी झील सरीखी आंखों में मैं यादों की नाव खे रहा हूं। नाव में अचानक छेद हो गया है। मैं तैरना भी नहीं जानता। लगता है डूब ही जाऊंगा।<br />
2. मैं तुमको हमेशा याद रखूंगा। विश्व बैंक के कर्जे की किस्त की बेचैनी <del datetime="2012-07-04T01:14:29+00:00">बड़ती</del> बढती जायेगी।<br />
3. मुझे पता है कि तुम्हारे पापा मुझको तुमसे उसी तरह छुटकारा दिलाना चाहते हैं जिस तरह वित्त मंत्री रसोई गैस को सब्सिडी से लेकिन मैं भी तुमसे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरह जुड़ा रहूंगा।<br />
4. यहां जाड़ा बहुत पड़ रहा है। रजाई बहुत पतली है। काश यह कम से कम तुम्हारे चेहरे पर पाउडर की परत जितनी मोटी होती।<br />
5. तुम्हारे दांत देखकर लग रहा है कि एयरफ़ोर्स के जवान अपना अनुशासन भूलकर टेढ़ी लाइन में खड़े हो गये हों।</p>
<p>इन उपमाओं सुनकर छात्र गण ने तमाम सवाल किये। किसी ने कहा कि यह तो गद्य है कविता कहां? किसी ने कहा कि आप केवल कवियों की कोचिंग कर रहे हैं कवियत्रियों के साथ भेदभाव क्यों। वीर रस/वीभत्स/रौद्र रस वाले छात्र इस बात से नाराज से उनकी क्लास क्यों नहीं ली गयी। हास्य रस वाले छात्रों का कहना था कि जो आपने यह सब पढ़ाया वह सब तो हास्य रस में आता है। यही आपने हास्य रस की क्लास में पढ़ाया था। ऐसा माफ़िक नहीं चलेगा।</p>
<p>गुरुजी ने आनलाइन स्कूल के चपरासी इशारा किया। चपरासी ने घंटा बजाकर क्लास खतम होने की सूचना दी। </p>
<p>गुरुजी भी ने -<strong>आज के लिये इतना ही शेष अगली क्लास में</strong> कहते हुये अपने छात्रों से विदा ली। </p>
<h2>सूचना</h2>
<p> चित्र फ़्लिकर से साभार। पोस्ट लिखने के लिये मसाले की प्रेरणा देवांशु की कालजयी पोस्ट से <a href="http://agadambagadamswaha.blogspot.in/2012/03/blog-post_26.html">आलू कोई मसाला नहीं होता….</a> से</p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<p><a href="http://3.bp.blogspot.com/-r3b5JFa0oz4/TZ9tOYQIdOI/AAAAAAAADw0/CqPzfhmJfg0/s220/39282_1525596453969_1056363804_31524681_1158973.jpg"><img src="http://3.bp.blogspot.com/-r3b5JFa0oz4/TZ9tOYQIdOI/AAAAAAAADw0/CqPzfhmJfg0/s220/39282_1525596453969_1056363804_31524681_1158973.jpg" alt="" title=" पंकज "  class="alignleft" /></a>जब वो हंसती थी, तो<br />
मैं श्रृंगार लिखता था,<br />
रोती थी, तो मेरी<br />
कविता भी रोती थी<br />
मेरे शब्द उसके साथ<br />
नाचते थे, खेलते थे<br />
और बातें करते थे।</p>
<p>वो कितना रोयी थी, जब<br />
मैंने उसे अपनी पहली कविता<br />
सुनाई थी, बोलती थी &#8220;तुम मुझसे<br />
कितना प्यार करते हो, बेवकूफ!!&#8221;<br />
और मैं सिर्फ़ उसके<br />
आँसू गिनता रहा था।</p>
<p>वो लाल सूट और दूधिया<br />
दुपट्टा, और वो अच्छे से बंधे हुए बाल,<br />
वो आँखें जिनमें मेरा ह्रदय दीखता था,</p>
<p>वो भरे हुए गाल जो ठण्ड में<br />
लाल हो जाते थे, और में उसे<br />
&#8216;टमाटर&#8217; बुलाता था।</p>
<p>वो उसकी उँगलियाँ जो<br />
हर वक्त मेरे बालों को<br />
ही ठीक करती रहती थीं,</p>
<p>उसकी बिंदी के तो हिलने का<br />
मैं इंतज़ार करता था, की कब वो<br />
हल्का सा हिले और मैं बोलूँ<br />
की &#8220;रुको! बिंदी ठीक करने दो&#8221;।</p>
<p>उसको याद भर करने से,<br />
मुस्कराहट लबों पे अपने आप<br />
आ जाती है,<br />
इस सूखे फूल में वो मुझे दिखती है&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p>लोग मुझसे पूछते हैं, की मैं क्यूँ<br />
नहीं लिखता?,<br />
मैं सिर्फ़ इतना कहता हूँ की<br />
मेरी कविता ही नहीं है।। </p>
<p><a href="http://pupadhyay.blogspot.in/2008/12/blog-post_24.html">पंकज उपाध्याय संयोग से आज उनका जन्मदिन भी है</a></p>
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