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	<title>फुरसतिया</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>&#8230;मगर अब साजन कैसी होली</title>
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		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1284#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 02 Mar 2010 08:18:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[पाडकास्टिंग]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[होली आवत देखकर ,ब्लागरन करी पुकार,
भूला बिसरा लिख दिया,अब आगे को तैयार।
पिचकारी ने उचक  के, रंग से कहा पुकार,
पानी संग मिल जाओ तुम, बनकर उड़ो फुहार।
कीचड़ में गुन बहुत हैं, सदा राखिये साथ,
बिन पानी बिन रंग के ,साफ कीजिये हाथ।
रंग सफेदा भी सुनो ,धांसू है औजार,
पोत सको यदि गाल पर,बाकी रंग बेकार।
वस्त्र नये सब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>होली आवत देखकर ,ब्लागरन करी पुकार,<br />
भूला बिसरा लिख दिया,अब आगे को तैयार।</p>
<p>पिचकारी ने उचक  के, रंग से कहा पुकार,<br />
पानी संग मिल जाओ तुम, बनकर उड़ो फुहार।</p>
<p>कीचड़ में गुन बहुत हैं, सदा राखिये साथ,<br />
बिन पानी बिन रंग के ,साफ कीजिये हाथ।</p>
<p>रंग सफेदा भी सुनो ,धांसू है औजार,<br />
पोत सको यदि गाल पर,बाकी रंग बेकार।</p>
<p>वस्त्र नये सब भागकर , भये अलमारी की ओट,<br />
चलो अनुभवी वस्त्रजी ,झेलिये रंगों की चोट।</strong></p>
<div style="float:left; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style=";font-size:0.6em;color:teal;"  ></span><br />
<img src="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/S4zJsQbwI4I/AAAAAAAABBw/yMA9MjxY1Bc/s400/01032010745.jpg" /></div>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1277 ">पिछली पोस्ट से आगे</a>: ब्लागाश्रम में खाने की घंटी बजते ही लोग अपनी-अपनी प्लेटे,पत्तल,दोने लिये खाने पर टूट पड़े। लोग दबा-दबाकर खाने लगे। खाने की मेज के पास भीड़ लगी थी। लोग अपनी प्लेटें भरकर आरती की थालियों की तरह घुमाते हुये ऊपर उठाकर ले जा रहे थे और अगल-बगल वालों पर थोड़ा-थोड़ा खाना गिराते जा रहे थे। जिनके ऊपर गिर रहा था वे कुछ कहें इसके पहले ही वे <strong>सॉरी</strong> और <strong>बुरा न मानो होली है</strong> फ़ेंककर आगे निकल ले रहे थे। लोगों की भरी हुई खचाखच भरी प्लेटें देखकर लग रहा था कि शायद वे अपने बच्चों को सिखाने जा रहे हैं&#8211;<strong>देखो बेटा पहाड़ ऐसे बनते हैं! </strong>जो बच्चे पहाड़ बनने की तकनीक सीख चुके और जिनको कुछ समझ में नहीं आया वे अपने दोस्तों पर धौल-धप्पा जमाते हुये कह रहे हैं- <strong>देख बे, खाना ऐसे बरबाद होता है।</strong></p>
<p>खाने के दौरान ही लोग आपस में सवाल-जबाब जारी रखे थे। एक ने अपने चेहरे पर उत्सुकता का बल्ब जलाते हुये और चेहरे पर मासूमियत कम बेवकूफ़ी ज्यादा दिखाते हुये संगीता पुरी जी से सवाल किया:</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span>: <a href=" http://gatyatmakjyotish.wordpress.com/author/gatyatmakjyotish/">संगीताजी </a>ये बताइये कि ज्योतिष के हिसाब से ब्लॉग जगत में अगली जूतम-पैजार होगी?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> संगीताजी ने मुस्कराते हुये जबाब दिया कि भाई इस बारे में तो मैं जूतों और चांद की कुंडली का अध्ययन करना होगा। जिस चांद को अपने पर जूते चलने की आशंका हो और जिस जूते को चलने की मंशा हो उसकी कुंडली लाइये तब कुछ बता सकती हूं। आप अगर अपने बारे में जानना चाहते हैं तो या तो अपनी चांद लाइये या प्रहारोद्धत पादुकायें तब ही कुछ गणना करके बताया जा सकता है। </p>
<p>पूछने वाले भाईसाहब  <span style="font-weight:bold;">मैं अपने लिये नहीं आम जनता के लिये पूछ रहा था</span> कहकर इधर-उधर हो लिये। चलते-चलते वे यह भी बता गये कि <span style="font-weight:bold;">आम जनता आम तौर पर अपनी खोपड़ी और अपनी पादुकायें अपने उपयोग के लिये अपने ही पास रखती हैं! न जाने कब उपयोग करना पड़ जाये!</span></p>
<p>इसके बाद भी तमाम सवाल-जबाब किये गये। कुछ के जबाब वहां मिल गये कुछ अभी तक अनुत्तरित हैं। जिन लोगों ने सवाल किये और जिन लोगों ने जबाब दिये वे भी कहीं भीड़ में तितर-बितर हो गये हैं। फ़िलहाल तो आप सवाल-जबाब बांचिये किसने किया किसने दिया यह सब सांसारिक लोगों के चोंचले हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> भाई साहब, <a href="http://avinashvachaspati.blogspot.com ">अविनाश वाचस्पतिजी</a> इत्ती सारी और इत्ती प्यारी आशु कवितायें लिखते हैं! लेकिन उनका कविता लिखना कब रुकेगा? क्या कविता का नोबेल प्राइज दिलाने से कुछ काम बनेगा?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> न भाई नोबेल प्राइज से काम नहीं बनेगा। उसके बाद वे जो  वक्तव्य भी आशु कविता में झाड़ देंगे। उनके लिये तो एक ठो लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार ही देना पड़ेगा। इससे कम पर बात नहीं बनेगी।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> ये मठाधीशी किस चिड़िया का नाम होता है। ये कैसे काम करती है? इसका क्या इलाज है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> ये मठाधीशी कामदेव की तरह अनंग होती है। जहां मन आता है अवैध कब्जे की तरह झोपड़ा डाल लेती है। हर एक व्यक्ति दूसरे के लिये मठाधीश का काम कर सकता है। अद्भुत भावना है यह। भांति-भांति के मठाधीश पाये जाते हैं इस दुनिया में। कविता के मठाधीश, गीत के मठाधीश, चर्चा के मठाधीश, चिरकुटई के मठाधीश, दबंगई के मठाधीश, लफ़ंगई के मठाधीश, पॉडकास्टिंग के मठाधीश, अच्छाई के मठाधीश, सच्चाई के मठाधीश, भलाई के मठाधीश। अब तो दीन,दुखी,पीड़ित,वंचित,भावुक,भूलुंठित भी अपनी मठाधीशी दिखाते हैं और मुशायरा लूट ले जाते हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span>आपने ई त  बताया ही नहीं कि यह भावना काम कैसे करती है? और इसका इलाज क्या है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span>जैसा बताया न कि यह भावना कामदेव की तरह अनंग होती है। किसी के भी दिमाग में कभी भी आ सकती है, छा सकती है। आपको घर में नाश्ता नहीं मिला क्योंकि आप समय पर दूध नहीं लाये तो आप इसे अपनी पत्नी की मठाधीशी बता सकते हैं। आपको आपने बॉस ने हड़का दिया क्योंकि आप कामचोरी नहीं कामडकैती करते हैं तो इसे आप बॉस की मठाधीशी कह सकते हैं। आप बहुत अच्छा लिखते हैं और उसके पाठक नहीं हैं तो इसे आप पाठकों की मठाधीशी कह सकते हैं। आप खराब लिखते हैं लेकिन आपकी कोई चर्चा नहीं करते तो इसे आप चर्चाकार की मठाधीशी कह सकते हैं। इसका इलाज क्या बतायें भाई! कामदेव का कोई इलाज नहीं है तो मठाधीशी का कौन इलाज हो सकता है! बस यही कहा जा सकता है सच्चरित्र बनिये। अच्छे विचार लाइये। सदाचार का ताबीज पहनिये और मस्त रहिये। </p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> ये जाकिर भाई ने इत्ते इनाम बांट दिये! जित्ते बांटे उससे कई गुना ज्यादा बांटने हैं। कब तक बंट जायेंगे? इस इनामों का समाज के लिये क्या उपयोगिता है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> ये तो जाकिर भाई को भी न पता होगा। लेकिन लगता है वे किसी  कछुआ गुरु के सच्चे चेले हैं। जीत ही उनका लक्ष्य है। शायद अगले इनामों की घोषणा से पहले ये वाले बंट जायेंगे। आराम से इनाम की घोषणा करने का कारण शायद उनके ब्लॉग का लखनऊ में होना है। हर इनाम दूसरे से कहता है- <strong>पहले आप, पहले आप</strong>! इसीलिये इनाम आगे आने में सकुचा रहे हैं। लजा रहे हैं और देरी हो रही है।</p>
<p>जहां तक सामाजिक उपयोगिता की बात है तो जिस तरह का काम जाकिर भाई ने किया उस तरह के काम करके देश के भूले-भटके लोगों को मुख्यधारा में लाया जा सकता है। उनसे सीख लेकर भारत सरकार को एक हृदय परिवर्तन मंत्रालय खोलना चाहिये। भूले-भटके युवाओं से अच्छे आचरण की कसम खिलवानी चाहिये और उनको इनाम दे देना चाहिये। झक मारकर लोग  सुधर जायेंगे। जैसे सलीम खान सुधर गये। समाज सुधार के इस तरीके का पेटेंट कराना चाहिये वर्ना कोई इस तरीके का पेटेंट कराकर नीलाम कर देगा और सब देखते रह जायेंगे।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> ये <a href="http://www.blogger.com/profile/06279925931800412557 ">अदाजी</a> के तकिया-कलाम -<strong>हां नहीं तो !</strong> का पूरा मतलब क्या है आपको पता है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> इस तकिया-कलाम की व्याख्या के लिये बहुत पसीना बहाना पड़ेगा भाई! बस  ये समझ लीजिये कि ये अदाजी की अदा है। किसी बात  में अगर वे हां <span style="font-weight:bold;">हां नहीं तो</span> लिखती हैं तो इसका तीन मतलब होते हैं-<span style="font-weight:bold;">हां </span>मतलब सहमत, <span style="font-weight:bold;">नहीं</span> मतलब असहमत और <span style="font-weight:bold;">तो</span> मतलब बूझते रह जाओगे! लेकिन बताइयेंगे नहीं!यह एक सवाल भी है और बबाल भी। कभी इस बारे में लिखा जायेगा।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> यार ये बताओ अपने <a href=" http://www.blogger.com/profile/02001201296763365195">अनिल भाई</a> रायपुर वाले की शादी में देर काहे हो रही है इत्ती!<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> असल में पहले तो कुछ पारिवारिक कारण रहे होंगे। घरेलू जिम्मेदारियों के चलते देर हुई। अब जहां बात चलती है तो लोग कुछ लोग संग-साथ देखकर कट लेते हैं और कुछ आगे की सोचकर। आजकल किसी के भी बारे में पता करना मुश्किल नहीं है न! लोग देखते हैं इसका साथ ब्लॉगरों का है, उनसे रोज का उठना-बैठना है! दूर राजस्थान के वकीलों तक से इनके संबंध हैं। फ़ुरसतिया जैसे लोगों से नियमित फ़ोनालाप होता है। सूबे के मुख्यमंत्री तक इनको इनके नाम से जानते/बुलाते हैं। इसके अलावा लोग देखते हैं बात-बात पर तो लड़के का खून खौलता है। ऐसे में तो लड़का कमजोर हो जायेगा। अब छत्तीसगढ़ में कुछ वैज्ञानिक चेतना फ़ैले तब  कुछ बात बने। अब गुरू के चक्कर में चेला <a href="http://sanjeettripathi.blogspot.com/ ">संजीत त्रिपाठी</a> भी -<span style="font-weight:bold;">कोई तो मेरी शादी करईदो वाले मोड में बैठा है।</span></p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> ये <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/ ">शिवकुमार मिश्र</a> दुर्योधन की डायरी ही क्यों लिखते हैं?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> जिस तरह <a href="http://mishraarvind.blogspot.com/ ">अरविन्द मिश्र जी</a> वैज्ञानिक चेतना से संपन्न विभूति हैं उसी तरह <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/ ">शिवकुमार मिश्र</a>  जी आर्थिक चेतना से लबालब संपन्न हैं। उनको इस बात का अंदाजा है कि आजकल की दुनिया माफ़िया लोग चला रहे हैं। इस चक्कर में माफ़िया लोगों को तमाम पराक्रम करने पड़ते हैं। लेकिन उन पराक्रमों को साहित्यिक/सांसारिक दुनिया में जगह नहीं मिल पाती। सांसारिक/साहित्यिक दुनिया के इन हाशिये के लोगों को मुख्य धारा में लाने का काम शिवकुमार जी करने में लगे हैं। जबर बरक्कत है इसमें। नमूने के लिये दुर्योधन की डायरी उन्होंने छाप दी। अब उनके पास दुनिया भर के माफ़िया लोगों के कारनामे जमा हो गये हैं। एक-एक करके उनको वे डायरी की शक्ल देने में लगे हैं। इसी चक्कर में अक्सर चिट्ठाचर्चा छोड़ देते हैं। इसी बात पर दुर्योधन उनसे खफ़ा है कि उनकी डायरी के सहारे शिवबाबू यहां पैसा पीट रहे हैं और उनका हिस्सा पहुंचा नहीं रहे हैं। संजय बेंगाणी ने इसका किस्सा बयान किया है। </p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span>ब्लॉगजगत की कविताओं की सामाजिक उपयोगिता क्या हो सकती है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> ब्लॉगजगत की कविताओं की घणी सामाजिक उप्योगिता हो सकती है। यूं तो दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसका उपयोग न किया जा सके। अरे देखिये श्लोक भी मिल गया पेश खिदमत है :<br />
<span style="font-weight:bold;">आमंत्रण अक्षरं नास्ति<br />
नास्ति मूलं अनौषधम्<br />
अयोग्य पुरुषो नास्ति<br />
योजका तत्र दुर्लभः।<br />
</span><br />
अर्थात् वर्णमाला में ऐसा कोई अक्षर नहीं, जिसका उपयोग मंत्रोच्चारण में न हो पाए, न ही कोई ऐसी जड़ी है, जिसमें औषध के गुण न हों। इसी तरह कोई मनुष्य भी ऐसा नहीं हो सकता, जो अक्षम हो—सिर्फ एक आयोजक मिलना मुश्किल होता है, जो अक्षर को मंत्र में प्रयुक्त कर ले, जड़ी को औषधि के रूप में इस्तेमाल कर ले और व्यक्ति विशेष को उसकी क्षमताओं से परिचित करा दे।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> अरे श्लोक पटककर विद्वता मत दिखाइये। उदाहरण सहित अपने कहे का मतलब बताइये।<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> अब जैसे देखिये <a href="http://udantashtari.blogspot.com ">समीरलाल</a> की ही कविताओं को देखिये। उनकी कुछ कवितायें इत्ती भावुक कर देने वाली होती हैं कि पढ़ते ही पाठक के आंसू निकल आते हैं। समीरलाल को बुंदेलखंड/बस्तर जैसे इलाकों में ले जाकर उनका कविता पाठ करवाया जा सकता है। कुछ तो उनकी कविता की ताकत और कुछ उनकी आवाज की मार के दर्द से श्रोताओं के इत्ते आंसू निकलेंगे कि सूखे इलाकों में बाढ़ आ सकती है। जिनकी ऊंगलियां चलने-फ़िरने से लाचार हो गयी हैं (ऊंगलियों में हरकत बंद हो गयी हो) उनको ब्लाग जगत की बोर  कवितायें एक-एक कर पढ़ाई जायें। कविताओं को पढ़ते ही उनसे बचने के लिये माउस स्क्राल करते-करते उनकी उंगलियां विलियम्स बहनों की तरह चपल हो जायेंगी। जिनके बच्चे पढ़ने से जी चुराते हों और पढ़ने से बचने के लिये बहाने बनाते हों उनको अपने बच्चों को -<span style="font-weight:bold;">अच्छा, बेटे आओ तुमको अच्छी कवितायें पढ़वाते हैं</span> कहकर इन कविताओं को पढ़वाना चाहिये। बच्चे सपने में भी पढ़ने से मना नहीं करेंगे। इसके अलावा कविताओं का दुश्मन और मंहगाई से मुकाबला करने जैसे वीरता पूर्ण कामों में भी किया जा सकता है।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span>कविता से दुश्मन और मंहगाई से कैसे मुकाबला हो सकता है भाई?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> अरे आपने वीर रस की कवितायें नहीं सुनी। एक-एक लड़ाई तक में हज्जारों कवितायें निकाल लेते थे लोग। अगर आप यह समझते हैं कि लड़ाइयों में सैनिक जीतते हैं तो आप भ्रम में हैं। पाकिस्तान के खिलाफ़ लड़ाइयों में धुंआधार कवितायें सुनकर ही दुश्मन ने पहले कान दिखाये फ़िर पीठ। अमेरिका वियतनाम और ईराक और लादेन के खिलाफ़ सफ़ल नहीं हो सका इसीलिये क्योंकि उनके पास उनसे निपटने के लिये मुफ़ीद कविताओं का अकाल रहा। बिना सच्ची वीररस की कविताओं के युद्ध नहीं जीते जा सकते। इसी तरह मंहगाई से निपटने के लिये भी आशु कविताओं का उपयोग किया जा सकता है!</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> आशु कविता क्यों वीर रस की कविताओं का क्यों नहीं?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span>असल में वीर रस की कविताओं में जोर बहुत लगता है। उनको पढ़ने के लिये मजबूत फ़ेफ़ड़े वाला कवि चाहिये। अब लोगों के फ़ेफ़ड़े उत्ते मजबूत नहीं। इसीलिये आशु कविता का चलन हुआ है। इसमें कम मेहनत में बहुत फ़ल निकल आता है। आशु कविताओं की उत्पादकता( प्रोडक्टिविटी) वीर रस की कविताओं के मुकाबले बहुत अधिक होती है। मंहगाई आजकल हर जगह पसरी दिखती है। हर कोने अतरे में दिखती है। भ्रष्टाचार भले एक बार मुंह छिपाता दिखे लेकिन मंहगाई बेशर्मी से मुस्कराती/खिलखिलाती रहती है। ऐसे में आशु कविता का अद्धे-गुम्मे की तरह उपयोग किया जा सकता है। जहां दिखे मंहगाई मार दिया एक आशु कविता का ढेला। मंहगाई कुतिया की तरह कुलबुलाती हुई पूंछ हिलाती हुई उस जगह से <span style="font-weight:bold;">गो वेन्ट गॉन</span> हो जायेगी। फ़ूट लेगी।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span>और ब्लॉग जगत की टिप्पणियों का क्या सामाजिक उपयोग किया जा सकता है?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span> बहुत कुछ! ब्लॉगजगत की टिप्पणियों से सामाजिकता की सीख दी सकती है। ब्लॉगजगत की टिप्पणियां सामाजिक भाईचारे की जीगता-जागता, उबलता-खौलता उदाहरण हैं। जिस पोस्ट को पढ़ते-पढ़ते दो-तीन काम्बीफ़्लेम खा जाते हैं उसके आखिर में वाह,सुन्दर,अद्भुत सरीखी सामाजिक  सद्व्यवहार वाली टिप्पणियां कर जाते हैं। सुमन जी टिप्पणी nice बार-बार इस उक्ति को सार्थक करती है -सुन्दरता देखने वाली की निगाह में होती है। इसके अलावा भी टिप्पणियों के माध्यम से ही सामाजिक जीवन के तमाम कार्य-कलाप प्रेम,दोस्ती, लड़ाई-झगड़ा, आरोप-प्रत्यारोप, धींगा-मुस्ती, ये वो न जाने क्या-क्या निपटाये जा सकते हैं। सामाजिक जीवन का ऐसा कोई काम नहीं जो टिप्पणियों के द्वारा न किया जा सकता हो।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> <a href="http://alokpuranik.com/ ">आलोक पुराणिक</a> के ब्लाग लेखन के कम होने के क्या मायने हैं?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span>व्यंग्यकार जब लिखना कम करता है तो इसका मतलब है कि समाज खुशहाल हो लिया है और समाज में विसंगतियां कम हुई हैं। लेकिन आलोक पुराणिक का लिखना कम होने का कारण दूसरा है। वे पहले स्कूल के टापरों की कापियां चुराकर उनके निबंध लिख डालते थे। लेकिन अब चोरी के लिये उनको कापियां मिलती ही नहीं। स्कूल वालों को पहले तो छठे वेतन आयोग के बकाया पैसे देने थे मास्टरों को सो वे उनको रद्दी में बेच लेते थे। बाद में जब योजना आयोग के लोगों ने स्कूलों के टापरों की कापियां मंगाकर उनमें लिखे निबंधों के अनुसार देश के लिये नीतियां बनानी शुरू कर दी हैं। दो-दो पन्ने के एक-एक निबंध ने तीन-तीन,चार-चार नीतियां निकाल ले रहे हैं नीतिनिर्धारक। शिक्षा विभाग की तमाम नीतियों में आप इन टापरों के बालपन की छटा देख सकते हैं। इसीलिये जब आलोक जी टापरों की कापियों के लिये टापते रहते हैं और हम उनके लेखन के लिये।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">सवाल:</span> <a href="http://www.kalam-e-saagar.blogspot.com/ ">सागर</a>साहब <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1264 ">कहते हैं </a>उनकी प्रेमिकायें उनकी ताकत हैं और दूसरे की प्रेमिकायें उनकी कमजोरी! आपका क्या कहना है इस बारे में?<br />
<span style="font-weight:bold;">जबाब:</span>सागर सही की कहते हैं लेकिन यह सच नहीं बताते कि दिल्ली का ऐसा कोई हकीम, वैद्य और  डाक्टर (जगह-जगह दीवार में जिनका पता लिखा होता )नहीं बचा जिससे उन्होंने अपनी कमजोरी के इलाज की दवा न ली हो। उनको  अपनी प्रेमिकाओं से ताकत मिल नहीं रही है और दूसरे की प्रेमिकायें अपने ही प्रेमियों को ताकत की सप्लाई में खुश हैं।</p>
<p>अब सवाल-जबाब के चक्कर में ब्लागजगत के किस्से रह ही गये। उनके बारे में फ़िर कभी। फ़िलहाल तो आप चंद फ़ुटकर सीन देखिये:</p>
<ol>
<li>रचना जी सीधे-सीधे अनूप शुक्ल से कह रही हैं- ब्लॉग जगत की सारी नहीं तो बहुत सारी गड़बड़ियों के पीछे आपकी मौज लेने की और हें हें हें करने की आदत का हाथ है। अनूप शुक्ल इस बात पर कोई मौज तो नहीं ले पा रहे हैं लेकिन हें  हें हें करने से बाज नहीं आ रहे हैं। </li>
<li>अरविन्द मिश्र जी भी आश्चर्यजनक किंतु सत्य रूप में इस मामले में रचना जी से सहमत हैं और कह रहे हैं ब्लॉगजगत में जित्ते जलजले आये सबके पीछे फ़ुरसतिया की इसी मौज लेने का आदत का हाथ है। </li>
<li>रश्मि रवीजा अपनी हेयर ड्रेसर के यहां अपने तेजी से कम होते बालों का कारण बताते हुये कहती हैं  कि यह सब अपने ब्लॉग पर अनूप शुक्ला की एक टिप्पणी को समझने में लगी मेहनत के कारण हुआ। वे उन ज्ञानी जनॊं के हाल सोचकर अभी तक परेशान हैं जिनसे उन्होंने उस टिप्पणी का मतलब समझा लेकिन वे भी कुछ बता न पाये। </li>
<li>इस समारोह की लाइव पाडकास्टिंग करते हुये गिरीश बिल्लौरे बार-बार कह रहे हैं- लगता है ब्लागाश्रम से संपर्क टूट गया है।</li>
<li>समारोह की रपट-रिपोर्ट की प्रूफ़रीडिंग करते हुये गिरिजेश राव वर्तनी की कमियां निकाल के धरे दे रहे हैं लेकिन हर बार कोई नयी वर्तनी नखरे कर देती है। </li>
<li> व्याकरण सुधार कार्यक्रम की जिम्मा अमरेन्द्र त्रिपाठी के पल्ले है। वे जित्ती गलतियां सही कर रहे हैं उससे अधिक दिख रही हैं। व्याकरण की गलतियां गाजर घास सरीखी हो रही हैं जित्ती उखाड़ो उससे अधिक जमती जा रही हैं।</li>
</ol>
<p>किस्से और भी बहुत से हैं लेकिन कित्ते सुनायें? आप फ़िलहाल इत्ते से ही काम चलायें। कानपुर में होली सात दिन तक चलती है। अभी तो केवल यह दूसरा दिन है। आगे भी होली के किस्से आयें तो बुरा मान लीजियेगा। लेकिन बांच लीजियेगा। ठीक है न! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  </p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<p> उर्दू के प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी ने सालों पहले शाहजहांपुर के एक  मुशायरे में होली पर एक नज्म पढ़ी थी-<span style="font-weight:bold;">मगर अब साजन कैसी होली!</span>उस  कैसेट को मैं उस दिन से याद कर रहा था जिस दिन मैंने <a href="http://ngoswami.blogspot.com/2010/02/23.html ">नीरज गोस्वामी जी के ब्लॉग पर वसीम साहब की गजलों की किताब</a> के बारे में पढ़ा। अब जब कैसेट मिला तो पता चला बेचारा खड़खड़ाने लगा है। लेकिन आवाज साफ़ समझ में आ रही है। होली के मौके पर आनन्दित होइये आप भी!</p>
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<div style="float:left; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style=";font-size:0.6em;color:teal;"  ></span><br />
<img src="http://www.kavitakosh.org/kk/images/e/e1/W.bareivi.jpg" /></div>
<p> तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली<br />
    मगर अब साजन कैसी होली!</p>
<p>    तन से सारे रंग भिखारी मन का रंग सोहाया<br />
    बाहर-बाहर पूरनमासी अंदर-अंदर आया<br />
    अंग-अंग लपटों में लिपटा बोले था एक बोली<br />
    तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली<br />
    मगर अब साजन कैसी होली!</p>
<p>    रंग बहुत पर मैं कुछ ऐसी भीगी पापी काया<br />
    तूने एक-एक रंग में कितनी बार मुझे दोहराया<br />
    मौसम आये मौसम बीते मैंने आंख न खोली<br />
    मगर अब साजन कैसी होली!</p>
<p>    रंग बहाना रंग जमाना रंग बड़ा दीवाना<br />
    रंग में ऐसी डूबी साजन रंग को रंग न जाना<br />
    रंगों का इतिहास सजाये रंगो-रंगो होली<br />
    मगर अब साजन कैसी होली।</p>
<p>    तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली<br />
    मगर अब साजन कैसी होली!</p>
<p><a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%AE_%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%80 ">वसीम बरेलवी</a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>लिखौं हाल मैं ब्लागरगण का, माउस देवता होऊ सहाय</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Feb 2010 19:31:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[सुमिरन करके ब्लागरगण को,औ चिरकुटजी के चरण नवाय,
लिखौं हाल मैं ब्लागरगण का, माउस देवता होऊ सहाय।
बीता साल पिछलका वाला, आवा नवा धरे मूंछ पर ताव,
जनवरी बीती सिकुड़-ठिठुर कर, फ़रवरीजी भी बीती जायें।
उठा-पटक और भड़भड़ के बिच,होलीजी भी पहुंचीं आये,
बंटे टाइटिल ब्लाग-ब्लाग पर,पढ़ि-पढ़ि रहे सबही मुस्काय।
चलो सुनायें ब्लागाश्रम के किस्से,यारों सुनिओ कान लगाय,
सुनवईया सब मौज करेंगे,न [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><center><strong>सुमिरन करके ब्लागरगण को,औ चिरकुटजी के चरण नवाय,<br />
लिखौं हाल मैं ब्लागरगण का, माउस देवता होऊ सहाय।<br />
बीता साल पिछलका वाला, आवा नवा धरे मूंछ पर ताव,<br />
जनवरी बीती सिकुड़-ठिठुर कर, फ़रवरीजी भी बीती जायें।<br />
उठा-पटक और भड़भड़ के बिच,होलीजी भी पहुंचीं आये,<br />
बंटे टाइटिल ब्लाग-ब्लाग पर,पढ़ि-पढ़ि रहे सबही मुस्काय।<br />
चलो सुनायें ब्लागाश्रम के किस्से,यारों सुनिओ कान लगाय,<br />
सुनवईया सब मौज करेंगे,न सुनने वाला केवल पछिताय॥</strong></center></p></blockquote>
<div style="float:left; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style=";font-size:0.6em;color:teal;"  ></span><br />
<img src="http://farm4.static.flickr.com/3662/3346032174_0abbbea229_m.jpg" /></div>
<p><a href="http://bhaikush.wordpress.com/2008/09/25/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/ ">ब्लागाश्रम</a> में सुबह से ही ब्लागरगण की भारी भीड़ इकट्ठा है। लोग एक दूसरे को धकियाते हुये, गिरे हुये को लतियाते हुये, बतिताये हुये ब्लागाश्रम के मुख्य द्वार से अंदर प्रविष्ठ हो रहे हैं। होली के मौके पर एक विशाल  ब्लागर होली  मिलन समारोह का आयोजन किया गया है। मुख्य द्वार पर सूचना पट पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा है -<span style="font-weight:bold;">कृपया अपनी बुद्धि और विवेक बाहर रख कर ही अंदर धंसे। </span> सभी ब्लॉगर पहले से ही यह अर्हता पूरी कर चुके थे अत: सब अंदर धंसे जा रहे थे। कुछ ब्लॉगर तो रूपा फ़्रंटलाइन पहने होने की धौंस दिखाकर सबसे आगे होकर अंदर जाने का प्रयास कर रहे थे।</p>
<p><a href="http://www.blogger.com/profile/09488851348723010460 ">ललित शर्माजी </a>जैसी मूछों वाले दरबान ने अंदर जाते हुये <a href="http://www.blogger.com/profile/06891135463037587961 ">विवेक सिंह</a> को रोक लिया और कहा आपका प्रवेश वर्जित है। विवेक सिंह ने अंदर घुसते हुये जबाब दिया -<span style="font-weight:bold;">अरे भाईजी, ये रोक हमारे लिये नहीं है। यह उन विवेक जी के लिये है जो बुद्धि के साथ आयेंगे। हम तो इकल्ले आये हैं।</span> दरबान मूंछों पर देकर बुद्धि के साथ आने वाले विवेक को रोकने के लिये कमर कस कर खड़ा हो गया।</p>
<p>लोगों ने देखा कि <a href="http://udantashtari.blogspot.com ">समीरलाल</a> जितनी गति से आ रहे थे उससे दुगुनी गति से वापस जाते दिखे। लोगों ने समझा कोई ब्लॉग टिपियाने से छूट गया होगा वहीं जा रहे होंगे या फ़िर लखनऊ जा रहे हैं इनाम लेने!  लेकिन उन्होंने लौटकर बताया- <span style="font-weight:bold;">भाईजी , दर असल मैं यह विनम्रता वाली चादर ओढ़ना भूल गया था। मैं एक बार अपना टिप्पणी वाला बक्सा भले  कहीं भूल जाऊं लेकिन ये विनम्रता वाली चादर हमेशा ओढे रहता हूं। इससे कोई यह आरोप नहीं लगा सकता कि मैं कठोरता का अंग प्रदर्शन करता हूं।क्यूट, कमनीय, कोमल छवि बनाये रखने में यह विनम्र चादर बहुत मुफ़ीद रहती है।</span></p>
<p>जो-जो  लोग अंदर गये उन्होंने अपने-अपने मन-मर्जी के अनुसार ब्लागाश्रम की छटा देखी। कुछ ने अपनी डायरी में लिख ली। कुछ ने वहीं खड़े-खड़े बयान करने में भलमनसाहत समझी। कुछ नमूने देखिये अंदर जाकर लोगों ने क्या देखा?</p>
<p>लोगों ने देखा कि एक कोने में <a href="http://halchal.gyandutt.com/ ">ज्ञानजी</a> बैठे हुये  बड़े-बड़े शब्दों   के किनारे तोड़कर उनको जोड़े से बांधकर एक किनारे धरते जा रहे हैं। लोगों की उत्सुकता को देखते उन्होंने बताया- <span style="font-weight:bold;">इन बड़े शब्ब्दों को छीलछालकर मैं छोटा बनाकर मियां-बीबी की तरह अपने ब्लॉग में एक साथ धर दूंगा। मियां-बीबी संस्था से बिदकने वाले इसे <strong>शब्द-युग्म</strong> बोले तो  <strong>वर्ड-कपल</strong> समझ ले। एक अंग्रेजी घराने का शब्द एक हिंदी घराने की शब्द मिलकर एक ब्लागर घराने का शब्द बन जायेगा। एक नयी  शब्दगृहस्थी बस जायेगी। </span></p>
<p><a href="http://masijeevi.blogspot.com/ ">मसिजीवी</a> एक अंग्रेजी डिक्शनरी लिये अपने सामने बैठे बच्चों से शब्दों के एक-एक करके अर्थ पूछते जा रहे हैं। पता चला कि वे अपनी क्लास के बच्चों को फ़ुसलाकर ब्लागाश्रम ले आये थे। जिन शब्दों के अर्थ बच्चे नहीं बता पा रहे थे उन शब्दों को मसिजीवी इस इरादे से अलग रखते जा रहे थे ताकि वे ब्लाग में उनका प्रयोग कर सकें। जो सरल शब्द उनको आते हैं उनके टेढ़े-मेढ़े शब्द वे खोज रहे हैं  ताकि शब्दों को फ़ैलाकर पोस्ट के रूप में सुखाया जा सके।</p>
<p>उधर से <a href=" http://mishraarvind.blogspot.com">अरविन्द मिश्र</a> आते दिखे। वे अपने कन्धे पर वैज्ञानिक चेतना लादे हुये थे। ऐसा लग रहा था कि बलदाऊ मूसल लादे चले आये हैं। एक नये ब्लागर ने किंचित उत्सुकतावस पूंछा- <span style="font-weight:bold;">सरजी, यहां इस वैज्ञानिक चेतना का क्या काम है?</span> इस पर अरविन्दजी ने संस्कृत के श्लोकों और मानस की चौपाइयों के सहारे से समझाया कि अभी तमाम तरह के नायक-नायिका वर्णन बकाया हैं। न जाने कब मन कर आये अधूरा काम पूरा करने का। इसीलिये हम जहां जाते हैं ,अपनी वैज्ञानिक चेतना साथ लेकर चलते हैं।</p>
<p>एक कोने में <a href="http://satish-saxena.blogspot.com/ ">सतीश सक्सेनाजी</a> लोगों को बडे़ प्यार से जानकारी दे रहे थे कि उन्होंने एक नया चश्मा खरीदा है। इससे उनको ब्लाग जगत की सब हरकतें एक दम साफ़-साफ़ दिखती। खासकर मठाधीश ब्लागरों की पहचान करने के मामले में तो यह चश्मा अद्भुत है। आजकल वे इसके माध्यम से रोज फ़्री-फ़ंड में मठाधीश दर्शन करते हैं।</p>
<p><a href="http://ajaykumarjha1973.blogspot.com ">अजय झा</a> बैठे पचीस-तीस पोस्टों को पोस्ट करने के पहले फ़ायनल कर रहे थे। पोस्ट करने के पहले वे पोस्टों से लिंक हटाते जा रहे थे और उन वाक्यों को सुधारकर उलझाऊ बनाते जा रहे थे जिनसे कोई मतलब निकलने की आशंका हो। <a href=" http://deshnama.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html">खुशदीप</a> से धौल-धप्पा करते हुये सागर ने कहा- यार तुम्हारी मौज है। दो-दो गुरुओं को स्लॉग ओवर सरीखा फ़ेंटते रहते हो।</p>
<p>इधर-उधर की बात करते हुये वहां <a href=" http://savysachi.mypodcast.com">गिरीश बिल्लौरे</a> भूतपूर्व ब्लॉगर च अभूतपूर्व पाडकास्टर नमूदार हुये। वे सबके सामने माइक सटा-सटाकर सवाल-जबाब करने लगे। अब आप कुछ नमूने देखिये।</p>
<p><a href="http://lal-n-bavaal.blogspot.com/ ">बवाल भाई</a> ये बताइये कि आपके ब्लॉग में समीरलाल उर्फ़ पिंटू बराबर के भागीदार हैं। वे आपके  ब्लॉग में न लिखकर इधर-उधर कहां भागते रहते हैं? आप इस बारे में उनको हड़काते क्यों नहीं!<br />
गिरीश भाई! दरअसल मैं समीर भाई को हड़काने-फ़ड़काने की सोचता हूं लेकिन ये ससुरी अलसेट के चलते कुछ हो नहीं पाता। फ़िर एक बात यह भी है कि लाल साहब का बचपने का जांधिया हमारे कने धरा है। कहीं उनकी बुद्धि सटक गयी और मांग बैठे तो हम कैसे कह पायेंगे कि ये हमारे लगोंटिया यार हैं! आजकल तो दुनिया प्रूफ़ मांगती है।</p>
<p><a href="http://swapnamanjusha.blogspot.com ">अदाजी</a>, सुना है आप चिट्ठाचर्चा से इस बात से खफ़ा थीं कि वे आपके ब्लॉग का जिक्र नहीं करते। इस बारे में क्या कहना है आपका?<br />
असल में गिरीश जी पहले मैं सोचती थी कि <a href="http://anvarat.blogspot.com/ ">चिट्ठाचर्चा </a>में अच्छी पोस्टों का जिक्र होता है इसलिये मैं कुछ बोली नहीं। लेकिन जब देखा कि सिर्फ़ अच्छी पोस्टों का ही नहीं समीरलालजी की भी पोस्टों का जिक्र होता है तो मुझे बड़ा खराब लगा। मुझे लगा कि आपको अच्छी पोस्टों/पसंदीदा पोस्टों का जिक्र करना हो तो करिये मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यह क्या कि आप समीरलालजी की पोस्टों का जिक्र करेंगे और हमारी छोड़ देंगे। ऐसे में खराब तो लगता ही है, गुस्सा आता ही है। और मैंने  गुस्सा होकर सब कुछ कह भी दिया-<strong>हां नहीं तो!</strong> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><a href="http://anvarat.blogspot.com/ ">दिनेशराय जी</a> आजकल वकील लोग मानहानि की नोटिस भिजवाने की बड़ी धमकियां देते हैं। क्या वकालत के पेशे में यह आवश्यक होता है?<br />
असल में आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। वकील को अपने पेशे की सफ़लता के लिये एकदम प्रोफ़ेशनल होना चाहिये। इत्ता कि अगर जरूरत पड़े तो बाप पर भी मुकदमा ठोंक देना पड़ता है। इसी प्रोफ़ेशनिल्ज्म के रियाज में लोग उन लोगों को भी नोटिस भेज देते हैं जिनको रात को फोन करके दो दिन पहले जीवन भर के लिये मंगलकामनायें दी होंती हैं। इसका बुरा नहीं मानना चाहिये किसी को। देश की न्याय व्यवस्था में प्रोफ़ेशनिल्ज्म के प्रसार के लिये कानूनी नोटिसों का बहुत योगदान है।</p>
<p>इस बीच एक फ़ोटोग्राफ़र लोगों की फोटो खींच खांचकर दिखाते हुये आर्डर बुक कर रहा था। एक ग्रुप फोटो बहुत नेचुरल आया था,बहुत खराब लग रहा था। लोग उसे यह मेरा नहीं, यह मेरा नहीं कहकर फ़ेंके दे रहे थे। फ़ेंका-फ़ेंकी में  फोटो बीच से फ़ट गया। <a href="http://taau.taau.in/ ">ताऊ </a>ने उसे फोटोग्राफ़र से दुगुने दाम देकर खरीद लिया। यह होते देखकर गिरीश बिल्लौरे ने माइक ताऊजी के मुंह के आगे रामपुरी चाकू की तरह अड़ा दिया और सवाल किया-<br />
ताऊ जिस फोटो को कोई नहीं ले रहा है उसके दो टुकड़े हो जाने पर आपने उसे दोगुने दाम पर खरीद लिया! ऐसा क्यों?<br />
अरे भाई इन दोनों आधी-आधी फोटो को मैं अपनी खुल्ला खेल फ़र्रखाबादी वाली प्रतियोगिता में प्रयोग करूंगा। आधी सटाकर सवाल पूछूंगा फ़िर पूरी लगाकर हल बताऊंगा।</p>
<p>आप इतनी सारी कवितायें कैसे लिख लेते हैं <a href="http://taau.taau.in/ ">अविनाश वाचस्पतिजी</a>? गिरीश बिल्लौरे ने माइक अविनाश के मुंह पर कट्टे की तरह अड़ाकर पूछा।<br />
असल में लोग मुझे बहुत भला व्यक्ति मानते हैं। अच्छा, समझदार, शान्त स्वभाव का। खुदा झूठ न बुलाये मैं ऐसा हूं भी। दुनिया में ऐसे लोगों की जिन्दगी बड़ी कठिन हो जाती है। जिसको देखो मौज लेकर चल देता है। इसीलिये मैंने अपने बचाव के लिये कविता लिखना सीखा। आशु कविता लिखता हूं। कोई भी बात हुई आशु कविता ठेल देता हूं। कोई बात नहीं हुई तब दो ठेल देता हूं।  इससे अब हमें किसी से दबने/बचने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे आशु कवि होने के चलते लोग हमसे बचते फ़िरते हैं।</p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya ">फ़ुरसतियाजी</a>, आपको इतने दिन हो गये ब्लॉग लिखते हुये आपको नहीं लगता कि आपके गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण ब्लॉगजगत में जलजला आ जाता है! हर बात में हें हें हें करते रहना भी कोई बात है! आप अपनी हरकतों में सुधार क्यों नहीं लाते।<br />
दरअसल गिरीश जी,दुनिया संतुलन की मांग करती है। ब्लॉग जगत में इत्ते जिम्मेदार टाइप के लोग मौजूद हैं कि ब्लागिंग बेचारी जिम्मेदारी की बोझ से दोहरी जाती है। जिम्मेदारी के बोझ से ब्लॉगिग को थोड़ा मुक्ति दिलाने के लिये थोड़ी गैरजिम्मेदाराना हरकते करनी पड़ती हैं। हम पहले ही <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/691 ">बता भी चुके हैं</a>:</p>
<blockquote><p>भये छियालिस के फ़ुरसतिया<br />
ठेलत अपना ब्लाग जबरिया।</p>
<p>मौज मजे की बाते करते<br />
अकल-फ़कल से दूरी रखते।<br />
लम्बी-लम्बी पोस्ट ठेलते<br />
टोंकों तो भी कभी न सुनते॥</p>
<p>कभी सीरियस ही  न दिखते,<br />
हर दम हाहा ठीठी करते।<br />
पांच साल से पिले पड़े हैं<br />
ब्लाग बना लफ़्फ़ाजी करते॥
</p></blockquote>
<p>फ़ुरसतिया की कविता पूरी होती इसके पहले ही ब्लागाश्रम में खाने की घंटी बज गयी। लोग अपनी-अपनी प्लेटे,पत्तल,दोने लिये खाने पर टूट पड़े।</p>
<p>फ़िलहाल इतना ही। ब्लागाश्रम के आगे के समाचार शीघ्र ही सुनाये जायेंगे।</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>&#8230;जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1272</link>
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		<pubDate>Sat, 27 Feb 2010 03:03:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[पाडकास्टिंग]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[

तीन दिन पहले ऑफ़िस में बैठे थे। पता चला सचिन 186 पर खेल रहे हैं। काम भर की शाम हो गयी थी। घर चले आये। टेलीविजन के सामने पसर गये। धोनी अपना बचपना दिखा रहे थे। हां यह बचपना ही है भाई! दूसरे छोर पर आपके साथी द्वारा इतिहास बनने का इंतजार सारा देश कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:center; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style=";font-size:0.6em;color:teal;"  ></span><br />
<img src="http://drop.ndtv.com/albums/SPORTS/ind-sa10-2ndodi/12.jpg" /></div>
<p>तीन दिन पहले ऑफ़िस में बैठे थे। पता चला सचिन 186 पर खेल रहे हैं। काम भर की शाम हो गयी थी। घर चले आये। टेलीविजन के सामने पसर गये। धोनी अपना बचपना दिखा रहे थे। हां यह बचपना ही है भाई! दूसरे छोर पर आपके साथी द्वारा इतिहास बनने का इंतजार सारा देश कर रहा है और आपका उसका भूगोल बिगाड़ने के लिये पसीना बहा रहे हैं। बहरहाल सचिन ने दो सौ रन पूरे किये और कमेंन्ट्रेटर ने कहा- <span style="font-weight:bold;">फ़र्स्ट टाइम इन द हिस्ट्री ऑफ़ प्लानेट!</span> इस ग्रह के इतिहास में पहली बार किसी ने एक दिवसीय इतिहास में दो सौ रन  बनाये । </p>
<p>धोनी अगर थोड़ी कम बहादुरी और थोड़ी और समझदारी दिखाते तो शायद सचिन दो सौ के पार होकर और बेहतर रिकार्ड बना पाते! </p>
<p>बाद में पता चला कि यह सच नहीं था। पता नहीं उनको पता था या नहीं लेकिन महिला क्रिकेट में यह कारनामा १३ साल <a href="http://naiebaraten.blogspot.com/2010/02/blog-post_5440.html ">पहले ही हो चुका</a> था। आस्ट्रेलिया की <a href="http://www.cricinfo.com/ci/engine/match/67194.html ">बैलिंडा क्लार्क</a> 1997 में ही डबल सैकड़ा मार चुकी हैं। इसकी किसी खिलाड़ी, एक्स्पर्ट को हवा ही नहीं है। या फ़िर है तो वह इतिहास में पहली बार कहने के लालच में बताना नहीं चाहता। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>मजे की बात है कि यह जानकारी पाने के बाद भी मीडिया में इस बात का जिक्र नहीं है। अखबार भी खामोश हैं। लगता है कुछ बोलोंगे तो सचिन का मह्त्व कम हो जायेगा।</p>
<p>इसके बाद तो शुरु हुआ जय जय कार! सचिन को लोगों ने क्या-क्या नहीं बना डाला। किसी ने कहा देवता है, किसी ने कहा कुछ है। किसी ने कहा कुछ। एक भाईसाहब अलबर्ट आइंस्टाइन और गांधीजी को एक सत्थे उठा लाये और बताइन कि जैसे गांधी जी के बारे में कहा था अलबर्ट आइंसटाईन ने कि आगे आने वाली पीढ़ियां इस बार पर हैरान होंगी कि कभी उनके बीच हाड़-मांस का इस टाइप का आदमी भी था उसी तरह सचिन भी अजायब घर की चीज हो गये हैं।</p>
<p>सचिन बहुत महान खिलाड़ी हैं। अद्भुत ! प्रतिभा, समर्पण, अनुशासन, लगन, मेहनत और विनम्रता और अन्य तमाम अनुकरणीय गुणों का जीवंत प्रतिरूप। लेकिन उनको देवता बता देना अपन को जमता नहीं। देवता बनाना मतलब अपने साथ के एक बेहतरीन इंसान को जाति बाहर कर देना। देवता कुछ करते नहीं हैं केवल मुस्कराते हैं, वरदान देते हैं और किसी की  तपस्या से खुद का सिंहासन डोलने पर धरती पर अप्सरायें भेजकर उसकी तपस्या खंडित करवाने में लग जाते हैं। देवता पसीना नहीं बहाते। सचिन पसीना बहाता है, भागकर रन लेता है, डाइव लगाकर तीन रन बचाता है और अपनी टीम को जिताने की कोशिश करता है। देवता यह सब मानवीय काम नहीं कर पाते। वे केवल लीलायें करते हैं, मेहनत नहीं।</p>
<p>वैसे भी अपने देश में करोड़ों देवता हैं। विद्या, शक्ति, धन, धान्य, जल किसके देवी-देवता नहीं हैं अपने यहां! लेकिन इन सबके बावजूद देश  न् जाने कब से निरक्षरता, कमजोरी, गरीबी, भुखमरी, अकाल की समस्याओं से जूझ रहा है। अब कुल जमा आठ-दस देशों में खेले जाने वाले खेल क्रिकेट का देवता भी बना के क्या इसकी भी ऐसी-तैसी करानी है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>सचिन सिर्फ़ सचिन है, देवता नहीं। उसे सचिन ही बने रहने दें यही उनके लिये और हमारे लिये बहुत है।</p>
<p>जब अपने बीच का कोई व्यक्ति असाधारण उपलब्धियां हासिल करता है तो हम उसको अतिमानवीय बताकर उसको अपने बीच से धकियाकर भगा देते हैं। उसे महान बना देते हैं। देवता बना देते हैं। उसको <span style="font-weight:bold;">न भूतो न भविष्यति</span> बताकर उसकी छवि कुछ ऐसी बना देते हैं गोया उस जैसा इंसान बनता नहीं है सिर्फ़ होता है। </p>
<p>सचिन के कैरियर में तमाम उतार-चढ़ाव आये। शुरुआतै चौपट हुई थी। इसके बाद जमें तो ऐसे जमे कि आज तक जम रहा है जलवा। तमाम असफ़लतायें भी मिलीं लेकिन सफ़लताओं की आंधी में वे सब तितर-बितर हो गयीं। एक सफ़ल खिलाड़ी एक असफ़ल कप्तान। एक शानदार क्रिकेट खिलाड़ी के साथ इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि पूरे बीस साल बेचारा सच्चे मन से तड़पने के बावजूद वह वह कप अपने देश के लिये नहीं ला पाया जो उसकी तमन्ना है। सचिन देवता होते तो ले आये होते अब तक कई बार यह कप। विश्वकप में पाकिस्तान के खिलाफ़ अविस्मरणीय पारी खेलने के बाद अगले मैच में आस्ट्रेलिया के खिलाफ़ उनकी पारी को हमेशा भूलना चाहता हूं लेकिन याद आता है कि उस समय सचिन अगर चल गये होते तो आज शायद कहानी कुछ और होती। लेकिन नहीं चल पाये क्योंकि वह एक खिलाड़ी है, देवता नहीं। </p>
<p>सचिन ने अपनी यह डबल सेंचुरी तमाम देश वासियों को समर्पित किया। जिस समय सचिन यह बता रहे है और कह रहे थे कि उनको पूरे देश वासियों का  प्यार मिला है उस समय मुझे लग रहा था कि वे ठाकरे जी की उस बात का माकूल जबाब दे रहे जिसमें उन्होंने सचिन की इस बात के लिये आलोचना की थी कि उन्होंने यह कहा था कि मुंबई सबकी  है! अब वे भी उनके लिये भारत रत्न की <a href="http://www.dnaindia.com/mumbai/report_sena-wants-bharat-ratna-for-sachin-tendulkar_1353108 ">मांग कर रहे </a> हैं।</p>
<p>नाना पाटेकर ने कहा कि वे अपनी आंखे दान दे जाना चाहेंगे ताकि अगर उनकी मौत हो जाये तो उनकी आंखें सचिन को खेलता हुआ देखें। नाना के इस बयान का प्रचार करके नेत्रदान के लिये लोगों को उत्साहित किया जा सकता था। लेकिन मीडिया अति की बात करना ज्यादा पसंद करता है। सचिन को भगवान बनाना चाहता है।</p>
<p>सचिन की तमाम उपलब्धियों को नमन लेकिन मुझे लगता है कि सचिन को सचिन ही रहने देना चाहिये भगवान बनाना उसके साथ अन्याय करना है।</p>
<h2>मेरी पसंद</h2>
<p>आज आपको इसमें सुनाते हैं शाहिज रजा की शायरी। शाहिद शाहजहांपुर की आर्डनेंन्स क्लॉदिंग फ़ैक्ट्री में काम करते हैं। यह बेहतरीन शायर मेरा पसंदीदा शायर है। दस पन्द्रह वर्ष पहले शाहजहांपुर में मेरे घर में एक गोष्ठी हुई थी उसमें शाहिद ने कुछ शेर और एक गजल तरन्नुम में सुनाई थी। आप भी सुनिये ये बेहतरीन शेर और लाजबाब गजल! जिनका नेट कनेक्शन धीमा है उनके लिये यहां टाइप करके भी पेश किया जा रहे हैं शेर/गजल।<br />
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<span style="font-weight:bold;">फ़ुटकर शेर</span><br />
मौसमें बेरंग को कुछ आशिकाना कीजिये,<br />
आप भी अपनी जुल्फ़ों को शायराना कीजिये।</p>
<p>दिल की ख्वाहिश है ख्यालों में तेरे डूबे रहें,<br />
जेहन कहता है कि फ़िक्रे आबोदाना कीजिये।</p>
<p>यकींन  खत्म हुआ है गुमान बाकी है,<br />
बढ़े चलो कि अभी आसमान बाकी है!</p>
<p>जरा सा पानी गिरा और जमीन जाग उठी,<br />
हमारी मिट्टी में लगता है जान बाकी है।</p>
<p>तलाश करते रहो फ़ितनागर यहीं  होगा,<br />
अभी तो बस्ती का पक्का मकान बाकी है।</p>
<p>हर एक बहाने तुझे याद करते रहते हैं<br />
हमारे गम से तेरी दस्तान बाकी है।</p>
<p>तुम उसके जुल्म से डरना ही छोड़ दो ’शाहिद’,<br />
तीर खत्म हुये बस कमान बाकी हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">गजल तरन्नुम में </span><br />
जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये,<br />
हम अपने दर्द का एक तर्जुमान छोड आये।</p>
<p>हमारी उम्र तो शायद सफर में गुजरेगी,<br />
जमीं के इश्क में हम आसमान छोड आये।</p>
<p>किसी के इश्क में इतना भी तुमको होश नहीं<br />
बला की धूप थी और सायबान छोड आये।</p>
<p>हमारे घर के दरो-बाम रात भर जागे,<br />
अधूरी आप जो वो दास्तान छोड आये।</p>
<p>फजा में जहर हवाओं ने ऐसे घोल दिया,<br />
कई परिन्दे तो अबके उडान छोड आये।</p>
<p>ख्यालों-ख्वाब की दुनिया उजड गयी &#8216;शाहिद&#8217;<br />
बुरा हुआ जो उन्हें बदगुमान छोड आये।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">&#8211;शाहिद रजा</span></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे यह संसार मिला</title>
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		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1264#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 19 Feb 2010 09:39:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[पाडकास्टिंग]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>

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		<description><![CDATA[ दो दिन पहले रमानाथ अवस्थीजी के गीतों का कैसेट मिला तो उसी के साथ एक और दुर्लभ कैसेट मिला। इस कैसेट में हमारे विवाह के अवसर पर गाया गया स्वागत गीत और साथ में कई और मंगलगीत टेप हैं। यह कैसेट कई-कई बार खोया और जितने बार खोया उतने ही बार मिल भी गया। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://3.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/St_elN2BQxI/AAAAAAAAAWk/Wv_Qou7X5CM/s320/181020091379.jpg" align="left" /> दो दिन पहले <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1257 ">रमानाथ अवस्थीजी</a> के गीतों का कैसेट मिला तो उसी के साथ एक और दुर्लभ कैसेट मिला। इस कैसेट में हमारे विवाह के अवसर पर गाया गया स्वागत गीत और साथ में कई और मंगलगीत टेप हैं। यह कैसेट कई-कई बार खोया और जितने बार खोया उतने ही बार मिल भी गया। इस बार मिला तो मैंने सोचा आपको भी इसके कुछ गीत सुनवा दूं।</p>
<p>शादी हमारी हुई थी आज से 21 साल पहले 9 फ़रवरी को। शादी ब्याह के मौके पर स्वागत गीत छपे हुये तो हम देखते-सुनते आये थे! इनमें से अधिकतर में वर-वधू पक्ष के लोगों के नाम किसी तरह लय और ताल में घुसा कर गीत बना दिये जाते हैं। लेकिन अपनी शादी में मैंने सुना जब यह गीत तो पाया कि इसके लिये बाकायदा रिकार्डिंग करके हारमोनियम,मंजीरा आदि गाने-बजाने वाले वाद्य यंत्रों को भी शामिल किया गया है। उसी दिन मैंने यह मुक्तक सुना जो कि फ़िर मेरा पसंदीदा मुक्तक बन गया:<strong><br />
जब भी महफ़िल में नजारों की बात होती है<br />
रात में चांद सितारों की बात होती है<br />
उस समय लब पर तुम्हारा ही नाम आता है<br />
जब भी गुलशन में बहारों की बात होती है।</strong></p>
<p>गीत सुनते हुये 21 साल पहले की तमाम यादें बेतरतीब स्लाइड शो सी इधर-उधर होने लगीं। हमने कसके डांटा यादों को- ज्यादा-उछल कूद न करो!जरा अनुशासित होकर रहो वर्ना की बोर्ड से बाहर कर देंगे। लेकिन यादें रूपा फ़्रंटलाइन बनियाइन धारी मॉडल की तरह उचक-उचक  सबसे आगे आती रहीं।</p>
<div style="width: 200px;margin: 10px;color:blue; font-size:12pt; text-align:center; line-height:100%;  border-top:5px #7FACDE solid; border-bottom:5px #7FACDE solid; padding-top:5px;padding-bottom:5px;float:right;">हमने कसके डांटा यादों को- ज्यादा-उछल कूद न करो!जरा अनुशासित होकर रहो वर्ना कीबोर्ड से बाहर कर देंगे। लेकिन यादें रूपा फ़्रंटलाइन बनियाइन धारी मॉडल की तरह उचक-उचक  सबसे आगे आती रहीं।</div>
<p>मुझे याद है कि उस दिन जयमाल के बाद हमारे साथ के मित्र और हमारे सीनियर कैलाश वर्मा जी देर रात तक बस अड्डे पर ठेले की एक चाय की दुकान पर चाय पीते हुये कवितापाठ करते रहे। उस दिन कैलाश वर्मा जी ने जो कविता पढ़ी वह बाद में मेरे घर में आने पर सुनाई जो कि इसी कैसेट में है शायद! इधर हम कवितापाठ कर रहे थे उधर हमें खोजा जा रहा था क्योंकि विवाह का समय हो रहा था। मोबाइल का चलन तो हुआ नहीं था उस समय जो काल करके बुला लिये जाते! भयंकर सर्दी में सड़क पर खोजे जा रहे थे हम! दूल्हा न होते तो जाड़े में गर्म कर दिये जाते। लेकिन तब फ़िर पूछता ही कौन?</p>
<p>उन्हीं दिनों की एक तुकबंदी भी याद आ रही है। एक मित्र की शादी में शुभकामना स्वरूप संदेशा लिखते हुये मैंने लिखा था:</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/St_eE1CRJqI/AAAAAAAAAWc/SAVfKHKZMF8/s320/181020091378.jpg" align="left" /><strong>उई बने रहें, उई बनीं रहैं,<br />
दोनों मिल-जुल कर चले रहैं।</p>
<p>काहे ते यौ कलयुग का संकट है<br />
उई बने रहत उई बनी रहतिं<br />
मुलु दोनों गन्ना अस तने रहत<br />
औ मिलि 36 की स्रष्टि करत!</p>
<p>ईश्वर ते यहै प्रार्थना है<br />
अल्ला ते यहै गुजारिश है<br />
ई 36 उल्टैं 63 मां<br />
और गन्ना बदलै भेली मां।</p>
<p>उई  बनी रहैं उई बने रहैं<br />
दोनों मिल-जुल कर चले रहैं।</strong></p>
<p><strong>भावार्थ:</strong> कामना है कि पति और पत्नी दोनों आपस में मिलजुल कर जीवन जीते रहें। क्योंकि यह कलयुग का संकट है कि पति और पत्नी दोनों बने रहते हैं लेकिन आपस में गन्ने की तरह तने रहते हैं। और दोनों में 36 का आंकड़ा बना रहता है। इसलिये ईश्वर से यही प्रार्थना है और अल्लाह से गुजारिश है कि यह 36 का आंकड़ा 63 के आंकड़े में बदल जाये और गन्ने जैसे तने हुये पति-पत्नी समय अपने रस को मिलकर एकाकार हो जायें जैसे अलग-अलग गन्ने से निकला रस मिलकर एकाकार होकर गुड़ की भेली बनाता है। दोनों मिल-जुलकर बनें रहें।</p>
<p><a href="http://anuragarya.blogspot.com/ ">डा.अनुराग आर्य</a> की विवाह वर्षगांठ वेलेंटाइन दिवस के दिन थी। वे मुझको अक्सर प्रेम-प्यार से रहने  और अच्छा लिखते रहने की समझाइस भी देते रहते हैं। उस दिन सोचते ही रह गये लेकिन उनको विवाह वर्षगांठ की बधाई भी न दे पाये। अब यह पोस्ट खासकर उनके लिये । शादी की सालगिरह और वेलेंटाइन दिवस की मुबारक के ! बस खाली ये करें गीत सुनते समय अनूप -सुमन के स्थान पर अनुराग-मीनाक्षी सुनें! बाकी के जोड़े भी यथानुरूप नाम परिवर्तन कर लें। सागर जैसे मुक्त सोर्स वाले बच्चे बार-बार नया-नया नाम जोड़ते हुये फ़ाइनली पसंद आने वाला नाम मिलने तक इसे मनचाहा नाम जोड़कर सुन सकते हैं! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<h2>जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे ये संसार मिला</h2>
<p><embed type="application/x-shockwave-flash" width="350" 	height="24" 	allowfullscreen="true" 	allowscriptaccess="always" 	src="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" 	w3c="true" 	flashvars='config={"key":"#$b6eb72a0f2f1e29f3d4","playlist":[{"url":"http://www.archive.org/download/JeevanPathParMileIsTarah/JeevanPathParMileIsTarah.mp3","autoPlay":false}],"clip":{"autoPlay":true},"canvas":{"backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"none"},"plugins":{"audio":{"url":"http://www.archive.org/flow/flowplayer.audio-3.0.3-dev.swf"},"controls":{"playlist":false,"fullscreen":false,"gloss":"high","backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"medium","sliderColor":"0x777777","progressColor":"0x777777","timeColor":"0xeeeeee","durationColor":"0x01DAFF","buttonColor":"0x333333","buttonOverColor":"0x505050"}},"contextMenu":[{"Listen+to+JeevanPathParMileIsTarah+at+archive.org":"function()"},"-","Flowplayer 3.0.5"]}'> </embed><br />
 <strong>जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे  ये संसार मिला,<br />
  नयन-नयन से मिले परस्पर दो हृदयों का प्यार मिला।</p>
<p> बरसों बाट जोहते बीते था नयनों को कब विश्राम ,<br />
 सहसा मिले खिला उर उपवन सुरभित वंदनवार ललाम।<br />
 वर ‘अनूप’ को ‘सुमन’ सदृश सुरभित झंकृत उर तार मिला।<br />
 जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे यह संसार मिला।</p>
<p>था निराश सागर में डूबा तिनके का न सहारा<br />
आज वही अनुकूल हो गया जो प्रतिकूल किनारा था<br />
क्योंकि भाग्यवश  आज मुझे आशाओं का अम्बार मिला<br />
जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे ये संसार मिला।</p>
<p>ये तो है पर घर की थाती माता की ममता का ज्ञान<br />
धन्य घड़ी जिस दिन होता है हाथों से क्न्या का दान<br />
आज इसे इस घर से उस घर जाने का अधिकार मिला<br />
जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे ये संसार मिला।</p>
<p> देते आशीर्वाद सुहृदजन, घर बाहर के सज्जन वृंद,<br />
 जब तक रवि, शशि रहें जगत में तब तक रहें अटल संबंध<br />
 आज सुखद बेला में प्रतिपल मित्र जनों का प्यार मिला<br />
 जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे ये संसार मिला।</p>
<p>  युग-युग अमर रहे ये जोड़ी इसको पग-पग प्यार मिले,<br />
  फूले-फले जवानी प्रतिपल नवजीवन संचार मिले,<br />
  जैसे ‘कंटक’ की बगिया में प्रिय फूलों का हार मिला,<br />
  जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे येह संसार मिला</p>
<p>  जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे ये संसार मिला,<br />
  नयन-नयन से मिले परस्पर दो हृदयों का प्यार मिला।</p>
<p> गीतकार और गायक कंटक जी</strong></p>
<p><strong>शायद ये पोस्ट भी आप पसंद करें</strong></p>
<ol>
<li><a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/01/blog-post_25.html ">ये पीला वासन्तिया चांद </a>: <a href=" http://hindini.com/eswami/"> ई-स्वामी</a> इसे मेरी आजतक की लिखी सबसे अच्छी पोस्ट बताते हैं! </li>
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</ol>
]]></content:encoded>
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		<slash:comments>25</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1257</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1257#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 18 Feb 2010 02:47:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[पाडकास्टिंग]]></category>
		<category><![CDATA[मेरी पसंद]]></category>
		<category><![CDATA[गगन]]></category>
		<category><![CDATA[गीत]]></category>
		<category><![CDATA[पंख]]></category>
		<category><![CDATA[रमानाथ अवस्थी]]></category>

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		<description><![CDATA[रमानाथ अवस्थी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; ">रमानाथ अवस्थी</span> <br /><a href="<a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/62094256/" title="Photo Sharing"><img src="http://static.flickr.com/24/62094256_45a8baa120_m.jpg" width="182" height="240" alt="रमानाथ अवस्थी" /></a> </div>
<p> <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/64 ">स्व.रमानाथ अवस्थीजी </a>मेरे प्रिय गीतकार हैं। मेरे पास उनके बीस-पचीस गीतों  के आडियो टेप हैं। मैं जब-तब उनको सुनता रहता हूं। सरल-सहज भाषा में उनके गीत अद्भुत लगते हैं।</p>
<p>दो दिन पहले <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_16.html ">चिट्ठाचर्चा</a> में जब मैं उनकी ये पंक्तियां किसी संदर्भ में लिखीं:<br />
<blockquote><strong>धरती तो बंट जायेगी<br />
पर नीलगगन का क्या होगा?<br />
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे<br />
तो महामिलन का क्या होगा?</strong></p></blockquote>
<p>तो साथी हरि  शर्मा ने कहा कि ये पंक्तियां <strong>गीतकार गोपाल दास नीरज जी की है!</strong>हमने अपने पास उपलब्ध <del datetime="2010-02-18T06:20:10+00:00">श्रोत</del> स्रोत तलाशे और इन पंक्तियों को उनकी कविता पुस्तक <strong>आखिर यह मौसम भी आया</strong> की भूमिका में पाया कि इसे उन्होंने नयी दिल्ली में हुये <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html ">एक कवि सम्मेलन </a> में पढ़ा था। संभव है कि शायद नीरज जी ने भी इसी भाव-भूमि पर कोई गीत लिखा हो! </p>
<p>बहरहाल इसी खोज-खबर के बहाने मैंने अपने पास उपलब्ध रमानाथ अवस्थीजी से संबंधित सब सामग्री एक बार फ़िर टटोल ली। इसी में एक दुर्लभ  कैसेट भी मिला मुझे जिसमें स्व.रमानाथजी के कई गीत हैं। कानपुर में एक एकल  काव्य संध्या में इसकी रिकार्डिंग हुई थी। इनमें उनके अभिन्न मित्र कवि/सांसद नरेश चंद्र चतुर्वेदी, गीतकार उपेन्द्र्जी और अन्य मित्र मौजूद थे।</p>
<p>इस गीत संध्या में गीत पढ़ते हुये रमानाथजी ने अपने मित्रों को बड़ी संजीदगी से याद किया और यह कहा कि यदि उनको मित्र न मिले होते तो वे वैसे कभी न हो पाते जैसे वे बन पाये। और भी कई संवेदनशील बातें हैं जिनको एक सहज-सरल जीवन जीने वाला संवेदनशील मन वाला व्यक्ति ही कह सकता है।</p>
<p>स्व.रमानाथजी का बचपन भावनात्मक रूप से बड़े कष्ट में बीता। उनके पिता का व्यवहार उनकी मां  के प्रति और उनके भी प्रति बड़ा खराब रहा।इलाहाबाद में रहते अपने पिता से एक दिन मार खाकर , उनकी अमानुषिकता से हमेशा के लिये पिंड छुड़ाने के संकल्प के साथ , वे एक दिन रात को घर छोड़कर अपने मित्र जगदीश के पास कानपुर आ गये। </p>
<p>रमानाथ जी ने बताया है-<strong>जगदीश की मां ने उन्हें जगदीश से ज्यादा प्यार किया क्योंकि वे जानती थीं कि जगदीश उन्हें कितना प्यार करते थे।</strong> जगदीश की मां अवस्थी शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाती ,अवर्थी कहतीं थीं। लेकिन वात्सल्य को रमानाथ जी पर उड़ेलने में उन महिला ने कभी कोई गलती नहीं की।</p>
<p>बिना टिकट ट्रेन में बैठ जाने वाले रमानाथजी उनकी वाणी की निष्कपटता और सच्चाई ने <a href="http://halchal.gyandutt.com/2010/02/blog-post_17.html ">ट्रेन निरीक्षक की कृपा</a> की वह कोर पायी जिसने उन्हें कानपुर स्टेशन पहुंचा दिया और वे वहां से पैदल चलते हुये बीएनएसडी इंटर कालेज के अपने मित्र जगदीश के पास पहुंचे! उनके मित्र जगदीश ने उन्हें संभाला और सहेजकर उन्हें एक बार फ़िर पढ़ाई पूरी करने के लिये इलाहाबाद वापस भेजा। वे वापस इलाहाबाद गये लेकिन अपनी व्यवस्थाओं के साथ। अपने पिता के साथ वे फ़िर नहीं रहे।</p>
<p>रमानाथ जी के  पिताजी ने दूसरी शादी करके उनकी माताजी का जो अपमान और तिरस्कार  किया ,उसकी फ़ांस रमानाथ जी के मन से कभी नहीं गयी। वे अपने प्रति की गयी क्रूरताओं को तो विरोहित कर गये लेकिन अपनी मां के प्रति किये गये तिरस्कार भाव को कभी नहीं भूल पाये।</p>
<p>उनकी मां को अपने बेटे पर अगाध विश्वास था और वे कहती थीं&#8211;<strong>हमार बाबू कबहूं गलत काम न करिहैं, करबै न करिहैं।</strong></p>
<p>रमानाथजी की कविता -<strong>मेरे पंख कट गये हैं/वर्ना मैं गगन को गाता </strong>मैं घर में इतनी बार गाता था कभी कि मेरे बच्चों को भी इसकी पंक्तियां याद हो गयीं। रमानाथजी एक बार हमारे घर रहे दो दिन तो उन्होंने बताया कि इस कविता की पंक्तियां:</p>
<blockquote><p><strong>वह जो नाव डूबनी है<br />
मैं उसी को खे रहा हूं,<br />
तुम्हें डूबने से पहले<br />
एक भेद दे रहा हूं।</p>
<p>मेरे पास कुछ नहीं है<br />
जो तुमसे मैं छिपाता।<br />
मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</strong></p></blockquote>
<p>सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी ने उनसे पूछा भी पूछा भी क्या ये पंक्तियां खासतौर से उनके लिये लिखीं गई हैं। बाद में उनकी सरकार गिर गई थी।</p>
<p>बहरहाल आप सुनिये इस गीत को! बताइये कैसा लगा? रिकार्डिंग करते समय शायद ट्यूबलाइट की चोक जैसी आवाज कहीं रिकार्ड हुई है लेकिन मेरे यहां गीत साफ़ सुनाई दे रहा है। आप देखिये आपको सुनाई देता है क्या!:)</p>
<h2>मेरे पंख कट गये हैं</h2>
<p><embed type="application/x-shockwave-flash" width="350" 	height="24" 	allowfullscreen="true" 	allowscriptaccess="always" 	src="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" 	w3c="true" 	flashvars='config={"key":"#$b6eb72a0f2f1e29f3d4","playlist":[{"url":"http://www.archive.org/download/MerePankhKatGayeHainVarnaaMainGaganKoGaata/MerePankhKatGayeHain.mp3","autoPlay":false}],"clip":{"autoPlay":true},"canvas":{"backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"none"},"plugins":{"audio":{"url":"http://www.archive.org/flow/flowplayer.audio-3.0.3-dev.swf"},"controls":{"playlist":false,"fullscreen":false,"gloss":"high","backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"medium","sliderColor":"0x777777","progressColor":"0x777777","timeColor":"0xeeeeee","durationColor":"0x01DAFF","buttonColor":"0x333333","buttonOverColor":"0x505050"}},"contextMenu":[{"Listen+to+MerePankhKatGayeHainVarnaaMainGaganKoGaata+at+archive.org":"function()"},"-","Flowplayer 3.0.5"]}'> </embed>मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</p>
<p>कोई मुझे सुनावो<br />
फिर से वही कहानी,<br />
कैसे हुई थी मीरा<br />
घनश्याम की दीवानी।</p>
<p>मीरा के गीत को भी<br />
कोई विष रहा सताता!<br />
मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</p>
<p>कभी दुनिया के दिखावे<br />
कभी खुद में डूबता हूं,<br />
थोड़ी देर खुश हुआ तो<br />
बड़ी देर ऊबता हूं।</p>
<p>मेरा दिल ही मेरा दुश्मन<br />
कैसे दोस्ती निभाता!<br />
मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</p>
<p>मेरे पास वह नहीं है<br />
जो होना चाहिये था,<br />
मैं मुस्कराया तब भी<br />
जब रोना चाहिये था।</p>
<p>मुझे सबने शक से देखा<br />
मैं किसको क्या बताता?<br />
मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</p>
<p>वह जो नाव डूबनी है<br />
मैं उसी को खे रहा हूं,<br />
तुम्हें डूबने से पहले<br />
एक भेद दे रहा हूं।</p>
<p>मेरे पास कुछ नहीं है<br />
जो तुमसे मैं छिपाता।</p>
<p>मेरे पंख कट गये हैं<br />
वरना मैं गगन को गाता।</p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/64 ">रमानाथ अवस्थी</a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>टुकुर-टुकुर देउरा निहारै  बेईमनवा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1253</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1253#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 15 Feb 2010 17:13:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[पाडकास्टिंग]]></category>
		<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
		<category><![CDATA[अवधी]]></category>
		<category><![CDATA[गीत]]></category>
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		<category><![CDATA[भौजी]]></category>
		<category><![CDATA[लवकुश]]></category>
		<category><![CDATA[होली]]></category>

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		<description><![CDATA[
पिछली पोस्ट में हिमांशु और अमरेन्द्र  ने गीतकार लवकुश दीक्षित का गीत टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेईमनवा  सुनाने का आग्रह किया था। मैं पहले भी इस गीत को लवकुशजी की आवाज में ही पॉडकास्ट कर चुका हूं। लेकिन उस समय जिस मुफ़्तिया साफ़्टवेयर का प्रयोग किया था वह बाद में कामर्शियल हो लिया और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:center; margin-center: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/7989550/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos5.flickr.com/7989550_f37c5ab3ba.jpg" alt="टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा" /></a></div>
<p>पिछली <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/1236 ">पोस्ट</a> में <a href="http://ramyantar.blogspot.com/ ">हिमांशु</a> और <a href="http://awadhikaiaraghan.blogspot.com/ ">अमरेन्द्र </a> ने गीतकार लवकुश दीक्षित का गीत <strong>टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेईमनवा</strong>  सुनाने का आग्रह किया था। मैं पहले भी इस गीत को लवकुशजी की आवाज में ही पॉडकास्ट <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/373 ">कर चुका हूं</a>। लेकिन उस समय जिस <a href="http://web.splashcast.net/console ">मुफ़्तिया साफ़्टवेयर</a> का प्रयोग किया था वह बाद में कामर्शियल हो लिया और हमारी पोस्ट से लवकुश जी की आवाज साफ़्टवेयर के साथ विलीन हो गयी। उसी के साथ हमारे और भी तमाम पॉडकास्ट गो,वेन्ट,गान हो लिये। फ़िलहाल इसे दुबारा <a href="http://www.archive.org/details/Tukur-tukurDevaraNiharaiBeimanava ">पॉडकास्ट</a> कर  रहा हूं इस उम्मीद के साथ कि यह गायब नहीं होगा।</p>
<p>पॉडकास्ट करने के पहले इसे टाइप करके जब मैंने पहली बार <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/03/blog-post_26.html ">पोस्ट किया था</a> तो  इस गीत के अनुरूप देवर-भाभी का चित्र भी बनवाया था। सुरेन्द्र ,जिन्होंने यह चित्र बनाया उस समय एम.ए. आर्ट्स की पढ़ाई कर रहे थे। आजकल वे कहीं स्केचिंग/पेंटिंग का अच्छा काम कर रहे हैं।</p>
<p> <strong>लवकुश दीक्षित </strong>का लिखा/गाया अवधी भाषा का यह गीत भाभी द्वारा देवर की बदमासियों ,शरारतों के जिक्र से शुरु होकर खतम होता है जहां भाभी बताती है कि देवर पुत्र के समान होता है.अपनी शैतानियां समाप्त कर दो। मैं देवरानी को बुलवा लूंगी ताकि तुम्हारी विरह की आग समाप्त हो जायेगी| यह भी कहती है कि मैं होली खेलूंगी जैसे भाई के साथ सावन मनाया जाता है। जो साथी लोग अवधी नहीं जानते उनकी सुविधा के लिये भावानुवाद दिया है।</p>
<p>इस गीत को जितनी बार सुनता हूं उतनी बार लगता है कि भारतीय समाज में ,खासकर उत्तर भारत (के अवध प्रान्त में)  स्त्रियों की स्थिति का आख्यान है यह गीत। अब तो गांवों में भी परिवार टूट रहे हैं और संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार बहुतायत में दिखते हैं। लेकिन आज से बीस-पचीस-तीस साल पहले जब अधिकांश परिवार संयुक्त हुआ करते थे उस समय परिवार में स्त्री की क्या स्थिति होती थी उसकी कहानी यह गीत कहता है।</p>
<p>इसमें देखिये कि एक स्त्री अकेली है घर में। उसको अपने देवर से डर लगता है। स्त्री को घर के काम-काज भी करने हैं, मर्यादा पूर्वक रहना भी है , देवर की नजरों से बचना भी है आगे के लिये भी खतरा न हो इसलिये देवर को यह एहसास दिलाना है कि वह (भाभी ) उसकी मां/बहन के समान है। एक ही घर में विरह की आग में जलते हुये स्त्री और पुरुष की स्थिति अलग-अलग है। स्त्री को अपनी मर्यादा भी देखनी और अपने शील की भी रक्षा करनी है। जबकि पुरुष &#8230;.? उस नठिया को तो बस टुकुर-टुकुर ताकना है! </p>
<p>बहरहाल ,इस बारे में विमर्श फ़िर कभी! फ़िलहाल तो आप यह गीत सुनिये! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><embed type="application/x-shockwave-flash" width="350" 	height="24" 	allowfullscreen="true" 	allowscriptaccess="always" 	src="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" 	w3c="true" 	flashvars='config={"key":"#$b6eb72a0f2f1e29f3d4","playlist":[{"url":"http://www.archive.org/download/Tukur-tukurDevaraNiharaiBeimanava/Nihure-nihureDevaraNiharaiBeimanava.mp3","autoPlay":false}],"clip":{"autoPlay":true},"canvas":{"backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"none"},"plugins":{"audio":{"url":"http://www.archive.org/flow/flowplayer.audio-3.0.3-dev.swf"},"controls":{"playlist":false,"fullscreen":false,"gloss":"high","backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"medium","sliderColor":"0x777777","progressColor":"0x777777","timeColor":"0xeeeeee","durationColor":"0x01DAFF","buttonColor":"0x333333","buttonOverColor":"0x505050"}},"contextMenu":[{"Listen+to+Tukur-tukurDevaraNiharaiBeimanava+at+archive.org":"function()"},"-","Flowplayer 3.0.5"]}'> </embed></p>
<p><strong>निहुरे-निहुरे कैसे बहारौं अंगनवा,<br />
          कैसे बहारौं अंगनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>भारी अंगनवा न बइठे ते सपरै,<br />
         न बइठे ते सपरै,<br />
निहुरौं तो बइरी अंचरवा न संभरै,<br />
लहरि-लहरि लहरै -उभारै पवनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>छैला देवरु आधी रतिया ते जागै,<br />
       आधी रतिया ते जागै,<br />
चढ़ि बइठै देहरी शरम नहिं लागै,<br />
गुजुरु-गुजुरु नठिया नचावै नयनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>गंगा नहाय गयीं सासु  ननदिया,<br />
           हो सासु ननदिया,<br />
घर मा न कोई मोरे-सैंया विदेसवा,<br />
धुकुरु-पुकुरु करेजवा मां कांपै परनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>रतिया बितायउं बन्द कइ-कइ कोठरिया,<br />
          बन्द कइ-कइ कोठरिया,<br />
उमस     भरी कइसे बीतै दोपहरिया,<br />
निचुरि-निचुरि निचुरै बदनवा पसीनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>लहुरे देवरवा परऊं तोरि पइयां,<br />
          परऊं तोरि पइयां,<br />
मोरे तनमन मां बसै तोरे भइया,<br />
संवरि-संवरि टूटै न मोरे सपनवां,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>माना कि मइके मां मोरि देवरनिया,<br />
             मोरि देवरनिया,<br />
बहुतै जड़ावै बिरह की अगिनिया,<br />
आवैं तोरे भइया मंगइहौं गवनवां,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।</p>
<p>तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,<br />
          मनइहौं फगुनवा,<br />
जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,<br />
भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,<br />
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा|</strong></p>
<p>&#8211;<strong>लवकुश दीक्षित </strong><br />
<strong>भावार्थ:</strong><br />
आंगन में झुके-झुके कैसे झाड़ू लगाऊं?बदमास देवर (पति का छोटा भाई )टकटकी लगाकर मुझे देख रहा है। आंगन बड़ा है। बैठकर सफाई करना मुश्किल है। अगर झुकती हूं तो मुआ आंचल सरकता है। हवा आंचल को बार-बार लहरा कर उभार देती है। शरारती देवर आधी रात से ही जाग जाता है। बेशर्म होकर देहरी पर बैठकर आंखें नचाता ताकता रहता है। सास-नंद गंगा स्नान के लिये गये हैं। पति विदेश गये है। घर में कोई नहीं है मेरे कलेजे में धुक-पुक मची है। डर लग रहा है। रात तो मैने कोठरी बंद करके बिता ली। अब दोपहर में बहुत उमस है। आंचल से पसीना छूट रहा है।</p>
<p>मेरे प्यारे देवर,मैं तेरे पांव पकड़ती हूं। मेरे तन-मन में तुम्हारे भइया बसे हैं। मैं केवल उन्हींके सपने देखती हूं। मैं जानती हूं मेरी देवरानी(देवर की पत्नी)मायके में है। विरह की आग तुमको जला रही होगी। पर जब तुम्हारे भइया आयेंगे तो मैं उसका गौना करवा कर उसको बुलवा लूंगी। मैं तुम्हारे साथ होली खेलूंगी जैसे भाइयों के साथ सावन का त्योहार मनाया जाता है। भाभी मां के समान होती है इसलिये तुम मेरे पुत्र के समान हो। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1236</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1236#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 14 Feb 2010 04:28:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
		<category><![CDATA[कली]]></category>
		<category><![CDATA[बसन्त]]></category>
		<category><![CDATA[भौंरा]]></category>
		<category><![CDATA[फ़ूल]]></category>

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		<description><![CDATA[
 हम इधर काम की कमी के चलते जरा बिजी जैसा कुछ हो गये। इस बीच देखते हैं कि ससुरा बसन्त आकर छा गया है। लोग बिना स्माइली लगाये  हंसी-मजाक की बातें करने लगे हैं। चुहलबाजी के भाव चमक गये हैं।  जैसे कोई ब्लॉगर ब्लॉगिंग छोड़ने के बाद लोगों के अपनापे के चलते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="float:left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;"></span><img src="http://farm3.static.flickr.com/2226/2057965417_6144f3541b_m.jpg"alt="बसंत"/></div>
<p> हम इधर काम की कमी के चलते जरा बिजी जैसा कुछ हो गये। इस बीच देखते हैं कि ससुरा बसन्त आकर छा गया है। लोग बिना स्माइली लगाये  हंसी-मजाक की बातें करने लगे हैं। चुहलबाजी के भाव चमक गये हैं।  जैसे कोई ब्लॉगर ब्लॉगिंग छोड़ने के बाद लोगों के अपनापे के चलते वापस आ जाता है वैसेइच सर्दी लौट-लौट के आ रही है। वापस आकर और हसीन दिख रही है। लोग अपनी और दूसरों की कवितायें धड़ल्ले से ठेल रहे हैं। कविताओं की रेलम-पेल मची है। स्टॉक क्लियरिंग सरीखी हो रही है। एक बड़ी कविता के साथ तीन पुछल्ली/टुइयां कवितायें मुफ़्त में। </p>
<p>बसन्त के पुराने बिम्ब बनन के बागन के। कुंज के ,कलीन के हैं। लगता है कि शहरों में अभी भी बसन्त की एन्ट्री बैन है। बसन्त आता है,चला जाता है।  बसन्त पंचमी तो चंचला है। कभी किसी तारीख को आती है,कभी किसी और को। नहीं चंचला कहना ठीक नहीं। बसन्त पंचमी भारतीय समाज की मेहनत कश कामगार महिला की तरह आती-जाती है। छुपके छुपाके। कहीं शोहदों की नजर उस पर न पड़ जाये। उसका जीना दूभर कर देंगे वे। वेलेन्टाइन दिवस अकेला मर्द है। मर्द की तरह हर साल चौदह फ़रवरी को आता है। मोटर साइकिलों पर धड़धड़ाते आते आवारा लड़कों की तरह। जहां जाता है हल्ला मचाता है, खर्चा करवाता है चला जाता है। </p>
<div style="float:left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;"></span><img src="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/S3eikgwcCyI/AAAAAAAABBc/RuBjR8fY3dU/s200/14022010691.jpg"alt="गेंदे के फ़ूल"/></div>
<p> बसन्त बिम्ब निहारने के लिये घर के बाहर निकलता हूं। बगल के खेत की सरसों कोहरे की चादर ओढ़े अलसाई सी ऊंघ रही है। बगीचे में गेंदे के फ़ूल सर उठाये तने खड़े हैं। लग रहा है आसमान गिरेगा तो थाम लेंगे। लगता है गेंदे के बच्चे ने मेरा लिखा बांच लिया है और उसके तेवर से लग रहा है गोया वह कह रहा हो- <em>भले ही हम थाम न पायें आसमान को लेकिन वह गिरेगा हमारे ऊपर तो उसके छेद-पंचर तो कर ही देंगे। सारी हवा निकल जायेगी! दुबारा उठने लायक न रहेगा ! एक बार गिरकर तो देखे हमारी जमीन पर!</em> टुइयां से गेंदे के पौधे का हौसला देखकर मुझे फ़िर लगा -<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/195 ">कुछ कर गुजरने के लिये मौसम नहीं मन चाहिये।</a></p>
<div style="float:right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; margin-top: 0px; chttp://www.blogger.com/post-create.g?blogID=16767459olor: teal;"></span><img src="http://2.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/S3ei2aYzB5I/AAAAAAAABBk/8O8J49lG61c/s200/20122009289.jpg"alt="मोर"/></div>
<p>उधर एक  मोर खेत में रैंप पर माडलिंग करते माडल सा टहल रहा है। हमको पास आते देखकर दूर सरक जाता है-गोया कह रहा हो कि एक खेत में एक ही रहेगा। </p>
<p>घर के बाहर से काम भर का बसन्त बटोरकर अंदर आ जाता हूं। नेट कनेक्ट करता हूं। बसन्त को खोजता हूं। 0.21 सेकेन्ड में 101,000 बसन्त अवतरित हो जाते हैं। छांट लो अपना मन चाहा बसन्त। <a herf="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A5%80 ">पहली ही कड़ी</a> बताती है :<br />
<blockquote>माघ महीने की शुक्ल पंचमी को बसन्त पंचमी के नाम से जाना जाता है। बसंत की शुरुआत इस दिन से होती है। इसको बुद्धि, ज्ञान और कला की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के दिन के रूप में मनाया जाता है। मौसमी फूलों और फलों और चंदन से सरस्वती पूजा की जाती है। सरस्वती को अच्छे व्यवहार, बुद्धिमत्ता, आकर्षक व्यक्तित्व, संगीत का प्रतीक भी माना जाता है।</p></blockquote>
<p>अब मामला अटक जाता है कि माघ माह कब आता है। यह घाघ से कितना अलग है। कितना डिफ़रेन्ट है। कुछ पता नहीं है। वैसे अब पता करने की बनती भी नहीं। टेलीविजन बता चुका है कि बसन्त आ चुका है। वेलेन्टाइन बुखार छा चुका है। एक ब्लॉगर इस हालत में और क्या कर सकता है -सिवाय एक तुकबंदी ठेलने के। सो ठेल रहे हैं। इसमें आये हुये बसन्त का आवाहन है। देखिये:</p>
<p>आओ भईया आओ बसन्त<br />
महंगाई से चहुंदिशि छाओ बसन्त!</p>
<p>दुख को दालों सा दुर्लभ कर दो,<br />
चिन्ता की खोली पर ताला जड़ दो,<br />
मनहूसियत की ऐसी तैसी कर दो,<br />
सबहन खिलखिल कर दो हसन्त!</p>
<p>आओ भैया आओ बसन्त!</p>
<p><center>पंचमी बसन्त आ चली गयी<br />
हिन्दी तिथियों सी छली गयीं<br />
अब प्रेम दिवस का छाया बुखार<br />
छा गये बुढौती में वेलेंटाइन संत!</p>
<p>आओ भैया आओ बसन्त!</center></p>
<p>आमों-बेरों का तो पता नहीं<br />
मॉलों में पसरा छलिया बसन्त<br />
सब तरफ़ सेल की रेल मची<br />
लुट रहे गृहस्थ, फ़ंस रहे संत</p>
<p>आओ भैया आओ बसन्त!</p>
<p><center>तितली ने भौंरे को छेड़ दिया<br />
भौंरा लड़कों सा शरमाय गया<br />
दोंनो एक दूजे को रहे निहार<br />
बगिया में मच गयी खिलखिल हसंत</p>
<p>आओ भैया आओ बसन्त!</center></p>
<p>पौधे पौधे पर चढ़ा खुमार<br />
कलियों-कलियों के प्रेम बुखार<br />
सब एक दूजे के बने यार<br />
इस मौज मजे का न कोई अंत।</p>
<p>आओ भैया आओ बसन्त!</p>
<p>बसन्त के नाम इत्ता कविता डिस्काउन्ट लेने के बाद  लगता है कि अब बसन्त आ ही गया है। वन,बाग,कूप,त़ड़ाग,केलि,कछार अब किताबों की बात लगते हैं। लेकिन बसन्त बहुरुपिया है। किसी न किसी बहाने आ ही जाता है। छा ही जाता है। है कि नहीं!</p>
<h2>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी </h2>
<p>यह गीत काफ़ी पहले मैंने गीतकार लवकुश दीक्षित के मुंह से सुना थी। सीतापुर के लवकुश दीक्षित अवधी के प्रसिद्ध कवि स्व.बलभद्र प्रसाद दीक्षित के पुत्र हैं। उनका एक गीत <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/03/blog-post_26.html ">टुकुर-टुकुर देवरा निहारै बेईमनवा</a> बहुत प्रसिद्ध लोकगीत है। </p>
<p>बहरहाल यह बसन्तगीत सुनिये। लवकुश दीक्षित जी की खुद आवाज में। जिन लोगों के नेट में गड़बड़ी है उनके लिये यह गीत लिखकर भी पोस्ट किया जा रहा है। </p>
<p><embed type="application/x-shockwave-flash" width="350" 	height="24" 	allowfullscreen="true" 	allowscriptaccess="always" 	src="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" 	w3c="true" 	flashvars='config={"key":"#$b6eb72a0f2f1e29f3d4","playlist":[{"url":"http://www.archive.org/download/BasantRajaFulaiToriFulvari/BasantRaja.mp3","autoPlay":false}],"clip":{"autoPlay":true},"canvas":{"backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"none"},"plugins":{"audio":{"url":"http://www.archive.org/flow/flowplayer.audio-3.0.3-dev.swf"},"controls":{"playlist":false,"fullscreen":false,"gloss":"high","backgroundColor":"0x000000","backgroundGradient":"medium","sliderColor":"0x777777","progressColor":"0x777777","timeColor":"0xeeeeee","durationColor":"0x01DAFF","buttonColor":"0x333333","buttonOverColor":"0x505050"}},"contextMenu":[{"Listen+to+BasantRajaFulaiToriFulvari+at+archive.org":"function()"},"-","Flowplayer 3.0.5"]}'> </embed></p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी<br />
बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी</p>
<p>मह-मह महकइ खेतवा कि माटी महकइ कियारी कियारी<br />
बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>गदराने गोंहुंआ सरसों ठाढी ठुमकै<br />
फ़ूली कुसुमियां पियर रंग दमकै<br />
हरी हरी मटरी की पहरी घेघरिया<br />
अरसी का गोटा किनारी!</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>महुआरी महकैं अमंवा बौराने<br />
बेर पके कचनार फ़ुलाने<br />
बेला,चमेली  औ फ़ूलइ चंदनियां<br />
लहरै उजरी कारी!</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>मदमाते भौंरा कली का मुंह चूमैं<br />
रंग रंगी तितली पराग पी झूमैं<br />
लपटी बेलि गरे बेरवा के<br />
बप्पा की बिटिया दुलारी!</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>बिखरी परी बसन्त की माया<br />
बहकैं मन औ बहकैं काया<br />
ज्ञानी गुनी बसन्त मां बहकैं<br />
बहकैं सन्त पुजारी।</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>फ़ाग धमार कबीरैं गावैं<br />
ढोल झांझ करताल बजावैं<br />
गाल गुलाल भाल बिच रोरी<br />
होरी खेलैं बनवारी।</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p>हरि गोपी संग किशन कन्हैया<br />
निरखैं ग्वाल पुकारैं गैया<br />
अन्तर्यामी जसुदा के छैया<br />
कवि लवकुश बलिहारी।</p>
<p>बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!</p>
<p><span style="font-weight:bold;">-लवकुश दीक्षित</span></p>
<p>ये भी शायद आप बांचना चाहें:<br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/584 ">वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है… </a><br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/585 "> ब्लागर का कैसा हो बसंत…</a><br />
<a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/244/comment-page-1 ">राजा दिल मांगे चवन्नी उछाल के </a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>&#8230;अथ कोलकता मिलन कथा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1227</link>
		<comments>http://hindini.com/fursatiya/archives/1227#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2010 17:00:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[बस यूं ही]]></category>
		<category><![CDATA[कोलकता]]></category>
		<category><![CDATA[प्रियंकर]]></category>
		<category><![CDATA[मनोज]]></category>
		<category><![CDATA[मृणाल]]></category>
		<category><![CDATA[शिवकुमार मिश्र]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछ्ले दिनों कोलकता जाना हुआ। हल्का सा अचानक। हल्का सा अचानक इसलिये जाने के एक हफ़्ते पहले ही दो दिन की एक ट्रेनिंग के लिये हमें सिटी ऑफ़ जॉय जाने को कहा गया। हम तुरंत तैयार हो गये। दुर्योधन के बायोग्राफ़र और चौपटस्वामी प्रियंकरजी को इत्तला दे दिये कि आ रहे हैं कलकत्ता। फ़ूट सको [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछ्ले दिनों कोलकता जाना हुआ। हल्का सा अचानक। हल्का सा अचानक इसलिये जाने के एक हफ़्ते पहले ही दो दिन की एक ट्रेनिंग के लिये हमें सिटी ऑफ़ जॉय जाने को कहा गया। हम तुरंत तैयार हो गये। <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/ ">दुर्योधन के बायोग्राफ़र</a> और <a href="http://samakaal.wordpress.com/ ">चौपटस्वामी</a> <a href="http://anahadnaad.wordpress.com/ ">प्रियंकरजी</a> को इत्तला दे दिये कि आ रहे हैं कलकत्ता। फ़ूट सको तो फ़ूट लेव। फ़िर न कहना कि बताया नहीं और अचानक धमक पड़े। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जाड़े में कोहरे भीगीं ट्रेनें उत्ता आकर्षित नहीं करतीं सो हवाई यात्रा का तय हुआ। अचानक बचत-भूत सवार हुआ और सबसे सस्ती हवाई सेवा की सबसे सस्ती टिकट खरीद कर नियत समय पर एरोड्रम की तरफ़  गम्यमान हुये। लखनऊ हवाई अड्डे तक पहुंचते-पहुंचते मोबाइल सेवा से पता चला कि जहाज एक घंटा देर से उड़ेगा। अंदर पहुंचकर हमने सोचा मोबाइल चार्ज कर लिया जाये। वहां देखा कि चार्जिंग का तार आवारा, अनुशासन हीन, बेप्लग हुआ लटका हुआ था। मन मेरा <a href="http://masijeevi.blogspot.com/2009/10/blog-post.html ">मसिजीवी हो उठा</a> और हम फ़ोटो खैंच लिये ताकि सनद रहे और वखत-जरूरत हम हवाई-अड्डों पर बरती जा रही लापरवाही पर <span style="font-weight:bold;">’सावधानी हटी-दुर्घटना घटी’</span> टाइप शीर्षक सटा कर कुछ लिख सकूं। तब तक ये आंकड़े भी जुटा लेंगे कि दुनिया में इत्ते प्रतिशत आगें शार्ट सर्किट से लगी हैं। इनमें से  इत्ते प्रतिशत शार्ट सर्किट आवारा टाइप के तार से हुये हैं।</p>
<p>लखनऊ से कोलकता की यात्रा नब्बे मिनट में सलट गई। टॉफ़ी, कम्पट, चाय-कॉफ़ी-नास्ता विहीन यात्रा से यह पुष्टि हुयी कि हमने जिस एअरलाईन का टिकट लिया था उसी से आये हैं। हवाई जहाज से उतरते ही एक सुमुखि सुन्दरी की जमुहाई देखकर ख्याल आया कि शायद यात्रा की बोरियत जम्हुआई लेते समय खुले मुंह की समानुपाती होती हो।</p>
<p>हवाई अड्डे में अपने लिये आई गाड़ी को  भूसे में सुई सरीखा खोजते रहे। लेकिन वहां भूसा ही भूसा मिला। सुई नहीं! भला हो एक और साथी का जिसके लिये आई गाड़ी में  हम लद लिये। लदान सुख अभी जरा सा ही लूटे थे कि झटका दे दिये मित्र जी। पता चला कि हम जिस सबसे सस्ती एयरयात्रा करते बचतगर्व में ऐंठे हुये थे उससे यात्रा की अनुमति नहीं है। हमसे ढाई गुना पैसा खर्च करने वाला हमको हमारी बेवकूफ़ी का एहसास करा रहा था। बहरहाल आम बेवकूफ़ की तरह हम फ़ौरन बहादुर से बन गये और फ़ोन पर ही पूछपाछ कर यात्रा के लिये जरूरी अनुमति लेने का इंतजाम करके कोलकत्ता में धंस गये! </p>
<p><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/S2Vg2JOA4JI/AAAAAAAABA0/-Z1StZ0WyMw/s1600-h/14012010628.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Fpm5WZgUMHs/S2Vg2JOA4JI/AAAAAAAABA0/-Z1StZ0WyMw/s400/14012010628.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5432855008796270738" /></a>दिन भर भारत की सबसे पुरानी फ़ैक्ट्रियों में से एक, <a href="http://ofbindia.gov.in/units/index.php?unit=gsf ">गन एंड शेल फ़ैक्ट्री काशीपुर</a>, के अतिथिगृह  में ट्रेनिंगरत रहे। जब बाहर हो तो फ़ोन करने का जी बहुत हुड़कता है। उनको भी फ़ोनिया लेते हैं जिनके नम्बर पास नहीं होते। मसिजीवी को बताये कि दो सौ नौ  साल पुरानी फ़ैक्ट्री के अतिथिगृह में धंसे हैं तो मसिजीवी ने फ़ौरन फ़ोटो-सेशन की सलाह दे दी। हम अंशत: पालन भी किये। वहीं हमारे कोर्स डायरेक्टर ने पूछा कि सुना है तुम ब्लॉग-स्लॉग भी लिखते हो। हमने पूछा कि आपसे यह चुगली किसने की? पता चला कि उनमें और <a href=" http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/">मनीष कुमार</a> में इन-लॉ घराने की रिस्तेदारी है। मनीष कुमार ने ही उनसे हमारी चुगली की थी कि हम भी ब्लॉगर हैं। वो तो अच्छा रहा कि उनकी ब्लॉग और हमारी ट्रेनिंग में बराबर की रुचि थी और उनसे आगे कोई वार्तालाप न हुआ वर्ना तो न जाने क्या गजब होता।</p>
<p>शिवकुमार मिसिरजी शाम को आये। चलने-फ़िरने में जित्ती तकलीफ़ हैं उनको उससे अब तक उनको एक पीड़ा-महाकाव्य निकाल देना चाहिये लेकिन वे दुख के व्यापारी नहीं हैं। मिले तो इधर-उधर की, न जाने किधर-किधर की बातें करते रहे। अगले दिन मिलने का तय हुआ। मनोज कुमार के आने पहले शिव कुमार निकल लिये। </p>
<p>शाम को <a href="http://manojiofs.blogspot.com/2010/01/blog-post_19.html ">लपककर मिलने का बयान</a> मनोज कुमार जारी कर चुके हैं। उसका खंडन करने का हमारा कोई मूड नहीं है। मनोजजी हमारे ही विभाग  में हैं। प्रशासनिक और राजभाषा क्रियान्वयन अधिकारी। मिलने पर ब्लॉग जगत से  संबंधित तमाम बातें हुयीं। मनोजजी को हम मनोयोग से लिंक लगाना बताये। कापी-पेन के सहारे। और बातें अगले दिन शिवकुमार मिश्र के अड्डे पर बताने का तय हुआ।</p>
<p>अगले दिन यानि 16 जवनरी को शिवकुमार जी आये और हमको उठा ले गये। ट्रेनिंग खतम हो गयी थी। सस्ती हवाई सेवा अगले दिन थी। हम फ़ुरसतिया हो लिये। शिवबाबू के अड्डे पर पहुंचे तो उन्होंने ट्रेलर दिखाया। अपने दफ़्तर के साथी को पहले फोन करके नीचे बुलाया। जब वह नीचे आ गया तो उसई को ऊपर बुला लिया। फ़िर नीचे जाकर टैक्सी से जाकर मृणाल को लाने को कहा। शायद वे यह दिखाना चाहते थे कि उनके दफ़्तर के लोग उनकी बात फ़ोन पर भी मान लेते हैं। </p>
<p>मनोज भाई हमारे इंतजार में वह बिछाये बैठे थे जिसे हिंदी में लोग पलक पांवड़ा कहते हैं। हम एक बार फ़िर लपक कर गले मिले। औकात से बाहर आते पेट ने इस गले मिलन यज्ञ में विघ्न पैदा करने की कोशिश की लेकिन उस  विघ्न को कुचल कर हमने अपनी मनमानी की। बाद में मृणाल और प्रियंकरजी के आने पर फ़िर से लपक मिलन क्रिया हुई।</p>
<p style="visibility:visible;"><object type="application/x-shockwave-flash" data="http://widget-e3.slide.com/widgets/slideticker.swf" height="320" width="426" style="width:426px;height:320px"><param name="movie" value="http://widget-e3.slide.com/widgets/slideticker.swf" /><param name="quality" value="high" /><param name="scale" value="noscale" /><param name="salign" value="l" /><param name="wmode" value="transparent"/><param name="flashvars" value="cy=ms&#038;il=1&#038;channel=1729382256935619555&#038;site=widget-e3.slide.com"/></object></p>
<p style="white-space:nowrap"><a href="http://www.slide.com/pivot?cy=ms&#038;at=un&#038;id=1729382256935619555&#038;map=1" target="_blank"><img src="http://widget-e3.slide.com/p1/1729382256935619555/ms_t000_v000_s0un_f00/images/xslide1.gif" border="0" ismap="ismap" /></a> <a href="http://www.slide.com/pivot?cy=ms&#038;at=un&#038;id=1729382256935619555&#038;map=2" target="_blank"><img src="http://widget-e3.slide.com/p2/1729382256935619555/ms_t000_v000_s0un_f00/images/xslide2.gif" border="0" ismap="ismap" /></a> <a href="http://www.slide.com/pivot?cy=ms&#038;at=un&#038;id=1729382256935619555&#038;map=E" target="_blank"><img src="http://widget-e3.slide.com/m/1729382256935619555/ms_t000_v000_s0un_f00/images/xslide9_1.gif" border="0" ismap="ismap" /></a></p>
<p><a href="http://anahadnaad.wordpress.com/ ">प्रियंकरजी</a> ने घुसते ही हम पर आरोप लगाया कि हम ब्लॉग जगत के दो शरीफ़ों को परेशान कर रहे हैं। सच तो है प्रियंकर जी कमरे में बाद में  घुसे उनका आरोप उनसे पहले घुसा और हल्का होने के कारण घुसते ही कमरे में छा गया। हम सभी लोग आरोप की आवभगत में लग गये और अपने-अपने हिसाब से उसकी देखभाल करने लगे। पहल हम खंडन करते रहे तो प्रियंकर जी उसे समर्थन देते रहे। जब हमने उससे सही मानते हुये शरीफ़ों की तारीफ़ करके आरोप को हल्का करने की कोशिश करने का प्रयास किया तो पाया कि प्रियंकरजी ने शरीफ़ो को परेशान करने के अपने आरोप से समर्थन वापस ले लिया था और जिनको वे शरीफ़ बताते हुये शुरू हुये थे उनकी ही चिरकुटईयां गिनाने लगे। मुझे एक बार फ़िर लगा कि ब्लॉग जगत का कुछ भी स्थाई नहीं है। </p>
<p>कुछ ही देर में ब्लॉगरों से कमरा खचाखच भर गया। एक व्यक्ति एक कुर्सी के सिद्धान्त का पालन करते हुये कुल जमा पांच कुर्सियों पर पांच ब्लॉगरों ने कब्जा कर लिया।</p>
<p>प्रियंकरजी ने अपने संबंध सूत्र का हवाला देते हुये बताया कि उनकी जिनसे गहरी छनती है उनसे उनकी कभी न कभी भिडंत हो चुकी होती है। कुछ इस अंदाज में कि अगर भिडंत नहीं हुई उनसे तो समझ लिये आपके उनसे संबंध स्थाई नहीं हुये हैं। हमारे तो सबंधों का <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/236 "> भिंडंतोपरान्त</a> प्रीतिकर <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/279 ">स्थाईकरण</a> हो चुका है। आप लोग अपना देख लो। अगर प्रियंकरजी से संबंध स्थाई रखना चाहते हैं तो मौका निकालकर भिड़-भिड़ा लीजिये। बवाल कटे।</p>
<p>वैसे आजकल प्रियंकरजी कोई भी मौका बहुत कम ही देते हैं। लिखना/टिपियाना ही बंद किये हैं तो आप उनसे भिड़ोगे क्या? पिछले साल जरूर लिखने का संकल्प लिये थे , लिये ही रहे। इस बार हमने उनको सुझाव दिया कि आप न लिखने का संकल्प लीजिये। टूटेगा तो मजा आयेगा और नहीं टूटेगा तो सुकून मिलेगा कि संकल्प तो पूरा हुआ।</p>
<p>अपने संबंधों का हवा-पानी दिखाने के लिये प्रियंकरजी ने बताया कि कुछ दिन पहले <a href="http://azadak.blogspot.com">प्रमोद सिंह</a> ने खुद फ़ोन करके उनको कहा कि उनको लिखते-पढ़ते रहना चाहिये। </p>
<p>ब्लॉगजगत के न जाने कौन-कौन किस्से दोहराये गये। कुछ पर इत्ते जोर के ठहाके लगे कि लगा छत हिल जायेगी। लेकिन छत भी अनामी ब्लॉगर सरीखी बेशरम चुपचाप तमाशा देखती रही। यह लिख चुकने के बाद मन बोला- <strong>भैये, छत को अनामी मत लिख! तटस्थ लिख! अनामी उखड़ जायेगा उसको तुमने बेशरम लिख दिया!</strong>। सो पूरी बात फ़िर से&#8211;<strong>छत भी तटस्थ ब्लॉगर की तरह चुपचाप तमाशा देखती रही! उसको इस बात की कौनौ चिन्ता फ़िकिर नहीं थी कि कोई उसके अपराध लिखेगा-कभी।<br />
</strong><br />
शिवकुमार मिश्र ने कई बार कहने के बावजूद अपना लैपटाप नहीं निकाला। उनको डर था कि मनोजकुमार कहीं कुछ सीख न जायें। शायद वे दुर्योधन की डायरी दिखाना नहीं चाहते होंगे। </p>
<p>किसी ब्लॉगर की अंग्रेजी कमजोर कमजोर होने की बात चली तो हमने कहा कि बात केवल अंग्रेजी की नहीं है। उनका अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार है। इस सच को सुनते ही न जाने क्यों सब हंसने लगे। </p>
<p>आजकल के तमाम छंटे हुये ब्लॉगरों के बहाने आजकल की हिन्दी ब्लॉगिंग की प्रवृत्तियों पर चिंतन टाइप हुआ। निष्कर्षत: हमारा मानना था कि फ़िलहाल हिन्दी ब्लॉगिंग  में टिप्पणियों के लिये जरूरत से ज्यादा हाहाकार है। यह भी कि टिप्पणियों को ही सब कुछ/बहुत कुछ मानने के चलते  हिन्दी का ब्लॉग तंत्र में यह स्थिति पैदा हुई है कि आम तौर पर ब्लॉग लेखन का स्तर औसत सा ही है। बीच-बीच में कुछ पोस्टें कुछ बेहतर आ जाती हैं लेकिन ज्यादातर आपसी संबंधों के आधार पर हिट होती पोस्टें। इस खतरे पर भी बात हुई कि इस तरह औसत से लेखन की बहुत वाह-वाही होने से उसमें अपने को बहुत उत्तम समझने के भाव आ जाने का खतरा बढ़ जाता है और आगे और अच्छा लिखने की संभवनायें कम हो जाती हैं।</p>
<p>बतकही के दौरान यह भी बात चर्चा में आई कि ब्लॉग जगत में सहिष्णुता की कमी होती जा रही है। जिसको देखो वही भन्नाने लगता है। लोगों का ’मान’ इत्ता छुई-मुई हो गया है कि जरा-जरा सी बात पर उसकी ’हानि’ हो जाती है। जिन लोगों ने कभी एक-दूसरे को देखा नहीं वे जरा-जरा से मुद्दे पर दूसरे को देख लेने की धमकी दे देते हैं। लोग धमकियां ऐसे देते हैं जैसे ब्लॉगर मीट के लिये अदालत में बुला रहे हैं।</p>
<p>हमें याद आया कि शिवकुमार मिश्र ने बैठने के अलावा रसगुल्ला,ढोकला,चाय,पानी का भी इंतजाम भी किया है। यह याद आते ही हमने ढोकले के नमक का हक अदा किया और पांच ब्लॉगरों से भरे खचाखच कमरे में उनके लेखन-वेखन की तारीफ़ करके वहीं डाल दी। खाली तारीफ़ करने से लोग खुश तो हो जाते हैं लेकिन सच नहीं मानते इसलिये हमने एकाध ऐसी बातें भी कहीं जिससे लगे कि हम उनकी आलोचना भी कर रहे हैं। शायद इसी का असर हुआ कि अगली चाय में से शिवकुमार मिश्र ने दूध गायब कर दिया और स्पेशल चाय का नाम लेकर हमको काली चाय पिला दी। हमें पक्का भरोसा है कि अगर कुछ देर और उनके लेखन पर पर सही बात होती तो अगली चाय से चीनी, उसकी अगली से पत्ती और उसके बाद बिना पानी की स्पेशल चाय पीना ही हमारे भाग्य में बदा होता।</p>
<p>मनोज कुमार ने बहुत कम समय में नियमित समय में ब्लॉगर साथियों में अपनी पहचान बना ली है। तीन माह में सौ पोस्टें और उसके बाद धड़ल्ले से लेखन। उनसे बतियाने के बाद पता कि वे मंगल फ़ॉन्ट में टाइपिस्टों की तरह टाइप करके पोस्ट लिखते हैं। इसको सीखने और गति आने में दो-तीन माह लग जाते हैं। हमसे बातचीत होने के बाद मनोज जी ने बाराहा पर हाथ आजमाया और तड़ से वे इसपर फ़िदा  हो गये। अब तक मेरा ख्याल है  बाराहा पर हाथ साफ़ हो गया होगा </p>
<p>मृणाल ने शुरुआत अंग्रेजी ब्लॉग से की थी। टहलते हुये <a href="http://thoughtsinhindi.blogspot.com/ ">हिन्दी ब्लॉगिंग</a> में आये थे। कुछ दिन बड़ी जबर कविताबाजी करने के बाद अब अपने ब्लॉग को कुछ दिन के लिये विराम दिये हैं। आजकल जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी समझने का प्रयास कर रहे हैं। </p>
<p>ब्लॉग जगत की सामान्य प्रवृत्तियों पर चर्चा करते-करते हमने बहाने से हिन्दी साहित्य पर भी हाथ  साफ़ कर डाला। हिन्दी साहित्य की दो पीढियों के मित्र त्रयी (डा.रामविलास शर्मा,अमृतलालनागर, केदारनाथ अग्रवाल  और मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव )का तुलनात्मक अध्ययननुमा कर डाला। प्रियंकरजी का मानना है कि मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव की मित्र त्रयी बहुत कम समय में बहुत अधिक हासिल करने की भावना से हलकान थी। मेरा मानना था कि डा.रामविलास शर्मा, अमृतलाल नागर और केदारनाथ अग्रवाल के स्थायित्व पूर्ण लेखन के पीछे इनके अपने जीवन साथी से एकनिष्ठ और स्थाई संबंधों का भी हाथ था। डा.राम विलास शर्मा की इस बात की भी चर्चा हुई कि वे अपनी रायल्टी के पैसे कम लेकर अपनी किताबों को सस्ते दामों में छपवाने का प्रयास करते रहे। पचीसो लाख के इनाम में धनराशि उन्होंने कल्याणकारी कामों के लिये वापस कर दी और केवल प्रमाणपत्र लिया।</p>
<p>जब वहां पर धड़ल्ले से साहित्यिक विमर्श जैसा चला रहा था तब हमने विमर्श के बीच अपना मोबाइल धर दिया। मोबाइल ने विमर्श लपक लिया। उसको नीचे आपकी सेवा में पेश किया गया है।</p>
<p>लगभग चार घंटे समय बेचारा स्टैचू बना खड़ा रहा। जैसे ही हमें यह ख्याल आया ,घड़ी की सुइयां सरपट दौड़ कर नौ और दस के बीच खड़ी हो गयीं। हम निकल लिये। कमरा वीरान हो गया। हमारे निकलते ही उसपर अंधेरे न कब्जा कर लिया। नीचे आये तो पता चला कि चौकीदार गेट पर ताला बंद करके कहीं चला गया था। शायद किसी को बताने गया हो कि आजकल तीन इडियट का हल्ला है, हम यहां पांच पकड़कर रखे हैं। बहरहाल जब वह आया तो शिवकुमार मिश्र ने अपने प्रभाव का उपयोग करके ताला खुलवाया और हम लोग वापस निकल लिये।</p>
<p>अगले दिन कोलकता की सड़के पर थोड़ा टहले। चाय की दुकानों पर अड्डेबाजी देखी। बस स्टॉप, सब्जी मंडी और वहां की आसपास की धजा देखी। </p>
<p>पहली बार हम कोलकता सत्ताइस साल पहले <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/187 ">साइकिल से गये थे।</a> इलाहाबाद से पहुंचने में नौ दिन में पहुंचे थे। इस बार लखनऊ से कोलकता हवाई जहाज से नब्बे मिनट में पहुंच गये।</p>
<p>लखनऊ हवाई अड्डे से <a href="http://www.blogger.com/profile/12391291933380719702 ">कंचन</a> से बतियाये। कुछ देर बतियाने के बाद फोन कट गया। कंचन ने बताया कि अच्छा ही हुआ क्योंकि जाड़े में गला खराब है और डाक्टर ने बोलने से मना किया है। हमने कहा- तबियत नासाज होने वाली जल्द ही लिख देंगे ताकि लोग समय पर हाल-चाल पूछ सकें। कंचन ने खराब गले के बावजूद तमाम हिदायतें दीं। हमें लग रहा था कि जब खराब गले के बावजूद इतनी समझाइस दे रही हैं कंचन तो अगर कहीं गला चकाचक होता तो क्या हाल होता।</p>
<p>सत्रह की शाम वापस कानपुर लौटे। पता चला कि हमारे कोलकता से चलने के कुछ पहले ही ज्योति बाबू गुजर चुके थे।</p>
<p>कोलकता में दोस्तों से मिलना बहुत खुशनुमा अनुभव रहा। बहुत दिन बाद खुलकर हंसे। खिंचाई की , करवाई। अब देखिये फ़िर कब जाना होता है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<a target="_blank" href="http://www.slide.com/s/eLuaWeEM5T-SC83_Dc61GnYXmsamn3Y0?referrer=hlnk"><img src="http://widget.slide.com/rdr/1/1/1/W/180000001ba828b7/1/0/eCSJ4lOBxj-5czMgDXxNJSkYvOP1TxuC.jpg" border="0" alt="Host unlimited photos at slide.com for FREE!" title="Host unlimited photos at slide.com for FREE!" /></a></p>
<h2>अब वो वाला साहित्यिक विमर्श भी सुन लीजिये</h2>
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		<title>बसंत पंचमी पर निराला जी के बारे में</title>
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		<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 07:11:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[[आज बसंत पंचमी को निरालाजी का जन्मदिन मनाया जाता है। इस मौके पर पहले यह लेख  फ़िर से पोस्ट कर रहा हूं- निरालाजी को विनम्रता पूर्वक याद करते हुये। मास्टर साहब की टिप्पणी  ( आज बसंत पंचमी पर सामयिक लगा यह लेख सो खिंचे चले आये !
जानकारी मिली ! आभार!) ने इसके बारे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>[आज बसंत पंचमी को निरालाजी का जन्मदिन मनाया जाता है। इस मौके पर पहले <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/232#comments ">यह लेख </a> फ़िर से पोस्ट कर रहा हूं- निरालाजी को विनम्रता पूर्वक याद करते हुये। <a href="http://hindini.com/fursatiya/archives/232#comments ">मास्टर साहब की टिप्पणी </a> ( आज बसंत पंचमी पर सामयिक लगा यह लेख सो खिंचे चले आये !<br />
जानकारी मिली ! आभार!) ने इसके बारे में याद दिलाया सो उनका भी शुक्रिया।  निरालाजी को कवि निराला बनने के लिये प्रेरित करने में उनकी जीवन संगिनी की भूमिका उल्लेखनीय थी यह भी इस संस्मरण से पता चलता है। ]</p>
<div style="float:left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 0.6em; color:teal; margin-top: 0px; "></span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/54922384/" title="Photo Sharing"><img src="http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/nirala/sktn1.jpg" alt="निराला" /></a></div>
<p>निरालाजी के बारे में लिखते हुये प्रसिद्ध आलोचक स्व.रामविलास शर्मा ने लिखा:-<br />
<blockquote><strong>यह कवि अपराजेय निराला,<br />
जिसको मिला गरल का प्याला;<br />
ढहा और तन टूट चुका है,<br />
पर जिसका माथा न झुका है;<br />
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती,<br />
लेकिन अभी संभाले थाती,<br />
और उठाये विजय पताका-<br />
यह कवि है अपनी जनता का!</strong></p></blockquote>
<p>जनता के कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी &#8216;निराला&#8217; से रामविलास शर्मा जी की जब पहली मुलाकात हुयी तो वे लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र थे। रामविलासजी &#8216;निराला&#8217;जी बहुत प्रभावित थे। निरालाजी ने भी रामविलास जी के कुछ अनुदित लेख देखे थे और अनुवाद की तारीफ़ की थी लेकिन मेल-मुलाकात यदा-कदा ही हुयी। एक साल बाद एम.ए. की परीक्षायें देने के बाद रामविलासजी निराला का कविता संग्रह &#8216;परिमल&#8217; खरीदने के लिये सरस्वती पुस्तक भंडार गये। पुस्तक लेकर वे चलने ही वाले थे कि इतने में निरालाजी आ गये। वे बैठ गये। आगे रामविलासजी बताया:-<strong><br />
<blockquote>उन्होंने पूछा- यह किताब आप क्यों खरीद रहे हैं?</p>
<p>मैंने कहा- इसलिये कि मैं इसे पढ़ चुका हूं। </p>
<p>उन्होंने आंखों में ताज्जुब भरकर कहा-तब?</p>
<p>मैंने जवाब दिया-मैं तो बहुत कम किताबें खरीदता हूं; इसकी कवितायें मुझे अच्छी लगती हैं। उन्हें जब इच्छा हो तब पढ़ सकूं ,इसलिये खरीद रहा हूं।</p>
<p>मेरे हाथ से किताब लेकर पीछे के पन्ने पलटते हुये उन्होंने कहा- शायद ये बाद की[मुक्तछन्द] रचनायें आपको न पसन्द हों। </p>
<p>मैंने कहा-वही तो मुझको सबसे ज्यादा पसन्द हैं; पता नहीं आपने तुकान्त रचनायें क्यों कीं? </p>
<p>इसके बाद वह मिल्टन, शेली, ब्राउनिंग आदि अंग्रेज कवियों के बारे में खोद-खोदकर सवाल करते रहे। बातें ज्यादातर मैंने की . वह अधिकतर सुनते रहे। </p></blockquote>
<p></strong><br />
यह वह समय समय था जब निरालाजी पर हिंदी साहित्य में चौतरफ़ा हमले हो रहे थे। रामविलासजी ने लखनऊ विश्वविद्यालय अंग्रेजी में एम.ए. किया। इसके बाद उन्होंने पी.एच.डी. की। लेकिन निरालाजी उनको डाक्टरेट की डिग्री मिलने के पहले ही डाक्टर कहने लगे थे।</p>
<p>निरालाजी रामविलास शर्मा जी के प्रिय कवि थे। उन्होंने निरालाजी के व्यक्तित्व और कृतित्व को सहेजते हुये <strong>&#8216; निराला की साहित्य साधना&#8217; </strong>किताबें लिखीं हैं। इनमें निरालाजी की खूबियों-खामियों के निर्लिप्त विवरण हैं। उनकी साहित्य साधना के विविध पक्ष हैं। निरालाजी को समझने के लिये ये पुस्तक बहुत उपयोगी है।</p>
<p>निरालाकी का जन्म तो <del datetime="2007-01-23T02:27:27+00:00">२९ फ़रवरी सन १८९९ </del>२१ फ़रवरी सन १८९६ को हुआ था लेकिन वे अपना जन्मदिन बसंत पंचमी को ही मनाते थे। आज बसंत  पंचमी है सो इसी बहाने जनता के कवि निरालाजी के बारे में कुछ चर्चा हो जाये।</p>
<p>निरालाजी के पूर्वज जिस इलाके बैसवाड़े के रहने वाले थे उसके लोगों के बारे में भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने लिखा:-<strong></p>
<blockquote><p>यहां का हर आदमी अपने को भीम और अर्जुन समझता है। इनकी भाषा भी कुछ ऐसी है कि लोग सीधे स्वभाव बात कर रहे हों तो अजनबी को लगेगा कि लड़ रहे हों।</p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>ऐसे ही बैसवाड़े के रहने वाले पंडित रामसहाय तिवारी ,जो कि गांव से आकर बंगाल के महिषादल में नौकर हो गये थे, के घर जब बच्चे का जन्म हुआ तो पंडित ने जन्मकुंडली बनायी-<strong><br />
<blockquote>लड़का मंगली है, दो ब्याह लिखे हैं; है बड़ा भाग्यवान, बड़ा नाम करेगा। इसका नाम रखो सुर्जकुमार। रामसहाय ने सोचा- दो ब्याह हमारे हुये, बेटा भी कुल-रीति निबाहेगा।</p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>सुर्जकुमार अभी बोलना सीख ही रहे थे, करीब ढाई साल के रहे होंगे कि उनकी मां इस संसार से विदा हो गयीं। उनके पिताकी सारी ममता बेटे पर केंद्रित हो गयी। वह बेटे को नहलाते-धुलाते, भोजन कराते, रात को अपने पास सुलाते। दिन में अपने मित्र के घर छोड़ जाते जहां उनको हर तरफ़ से स्नेह मिलता। स्त्रियां हाथोंहाथ रखतीं। बाप का लाड़ अलग। जो खाने-पहनने को मांगते वही मिल जाता। सुर्जकुमार स्वभाव से खिलाड़ी नटखट और जिद्दी हो चले थे। बाद में वे मुहल्ले के लड़कों के नेता हो गये। गोली खेलने में सबके उस्ताद। ज्यादा समय खेल-कूद में बीतता। पिता से कहानियां सुनते, भजन , हनुमानचालीसा, रामायण ,देवी-देवताऒं की कहानियां सुनते।</p>
<p>अपने बचपन से ही सुर्जकुमार विद्रोही तेवर के थे। जनेऊ हो जाने के बाद भी जात-पांत, ऊंच-नीच के भेदभाव की चिंता किये बिना सब जगह सब कुछ खाते पीते।</p>
<p> कुछ समय बाद उनकी शादी मनोहरा देवी से हुई। दो साल बाद गौना। गांव में प्लेग फैला था उन दिनों। लोग घरों से निकलकर बाग में झोपड़े डालकर रहते थे। महुये के एक पेड़ के नीचे सुर्जकुमार का बिस्तर लगाया। जीवन में पहलीबार उन्हें नारी-देह के स्पर्श का सुखद अनुभव हुआ। उस समय मनोहरा देवी १३ साल की थीं। </p>
<p>गांव में फैले प्लेग के कारण मनोहरा देवी के पिताजी उनको जल्दी विदा करा ले गये। इस पर भन्नाये सुर्जकुमार तिवारी के पिताजी ने बदला लेने के लिये उनको ससुराल भेजते समय ताकीद की- <strong>यहां से तिगुना खाना।</strong></p>
<p>सुर्जकुमार ने गांव में पतुरिया का श्रंगार देखा था, महिषादल में भी गायिकाऒं सुंदर स्त्रियों की कमी न थी। खुद भी इत्र-तेल-फुलेल लगाते। पैसा ससुराल का ठुकता। ऐसे ही किसी दिन बातचीत में सुर्जकुमार ने ताना मारा- &#8220;<strong>अपने बाल सूंघो? तेल की ऐसी चीकट और बदबू है कि कभी-कभी मालूम होता है कि तुम्हारे मुंह पर कै कर दूं।&#8221;</strong> मनोहरा देवी ने और तेज होकर कहा,&#8221; <strong>तो क्या मैं रण्डी हूं जो हर समय बनाव श्रंगार के पीछे पड़ी रहूं?&#8221;</strong></p>
<p>सुर्जकुमार को लग रहा था ,पत्नी उनके अधिकार में पूरी तरह नहीं आ रहीं। एक दिन उनका गाना सुना। मनोहरादेवे ने भजन गाया-<strong><br />
<blockquote>श्री रामचन्द्र क्रपालु भजु मन हरण भव भय दारुणम<br />
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनीलनीरज सुन्दरम।</p></blockquote>
<p></strong><br />
मनोहरादेवी के कंठ से तुलसीदास का यह छन्द सुनकर सुर्जकुमार के न जाने कौन से सोते संस्कार जाग उठे। सहित्य इतना सुन्दर है, संगीत इतना आकर्षक है, उनकी आंखों से जैसे नया संसार देखा, कानों ने ऐसा संगीत सुना जो मानो इस धरती पर दूर किसी लोक से आता हो। अपनी इस विलक्षण अनुभूति पर वे स्वयं चकित रह गये।अपने सौन्दर्य पर जो अभिमान था, वह चूर-चूर हो गया। ऐसा ही कुछ गायें, ऐसा कुछ रचकर दिखायें, तब जीवन सार्थक हो। पर यहां विधिवत न संगीत के शिक्षा मिली न साहित्य की। पढाई भी माशाअल्लाह-एन्ट्रेन्स फेल!</p>
<p>कुछ दिन बाद पिता के देहान्त के बाद सुर्जकुमार तिवारी को पहली बार आटे-दाल का भाव पता चला। उनको महिषादल में ही लिखा पढ़ी का काम मिल गया। इस बीच उनके यहां एक पुत्र रामकृष्ण  और एक पुत्री सरोज का जन्म हुआ। एक दिन उनको पत्नी की बीमारी का तार मिला। जब  वे महिषादल से अपनी ससुराल डलमऊ पहुंचे तब मालूम हुआ कि मनोहरा देवी पहले ही चिता में जल चुकी हैं। उनके विवाहित जीवन की जब अब  होनी चाहिये थी पर शुरू होने के बदले उसका अंत हो गया। उस समय उनकी उमर थी -बीस साल।</p>
<p>डलमऊ और उसके आस-पास इतने लोग मरे कि लाशें फूंकना असम्भव हो गया। गंगा के घाटों पर लाशों के ठट लगे थे। डाक्टरों ने जांच करके देखा कि सेर भर पानी में आधा पाव सड़ा मांस निकलता था।</p>
<p>बाद में सास ने उनकी दूसरी शादी कराने का प्रयास किया। उनकी कुंडली में भी दो विवाहों का योग था। ऐसे ही किसी दिन अपनी सास से  विवाह की ही चर्चा बात करते हुये उन्होंने अपनी कुंडली वहां खेलती हुयी अपनी पुत्री सरोज को पकड़ा दी। उसने खेल-खेल में कुंडली टुकड़े-टुकड़े कर  दी। दूसरा विवाह फिर नहीं हुआ।भाग्य के लेखे को निराला ने गलत साबित कर दिया। </p>
<p>बच्चों को सास के भरोसे छोड़कर फिर निराला महिषादल लौट आये। लेकिन वे टिक न सके। नौकरी छोड़कर धीरे-धीरे साहित्य में रमते गये। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को पत्र लिखे। बंगला भाषा का साहित्य पढ़ा। हिंदी में रचनायें लिखीं। राजनीतिक, सामाजिक समस्याऒं पर विचार करते, लेख कवितायें लिखते। साहित्य साधना प्रारंभ की। रवीन्द्र नाथ टैगोर की कवितायें उनको आकर्षित करती थीं।</p>
<p>इसी समय कलकत्ते से <strong>मतवाला</strong> का प्रकाशन शुरु हुआ। सुर्जकान्त तब तक तक सूर्यकान्त त्रिपाठी हो चुके थे। मतवाला का मोटो सूर्यकान्त ने तैयार किया-</p>
<blockquote><p><strong>अमिय गरल शशि सीकर रविकर राग विराग भरा प्याला&#8217;<br />
पीते हैं जो साधक उनका प्यारा है यह मतवाला।</strong></p></blockquote>
<p>इसी के साथ मतवाला की तर्ज पर सूर्यकांत त्रिपाठी ने उपनाम रखा- <strong>निराला</strong>। <strong>सूर्यकांत त्रिपाठी,&#8217;निराला&#8217;।</strong></p>
<p>यह निरालाजी की साहित्य साधना की सक्रिय शुरुआत थी। निराला मतवाला मंडल की शोभा थे। वे कविता लिखते। वे रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और गालिब के भक्त थे। लेकिन वे रवीन्द्रनाथ को विश्वका सर्वश्रेष्ठ कवि न मानते थे। उनकी नजरों सर्वश्रेष्ठ तो तुलसी ही थे। अपनी बात को सिद्ध करने के लिये वे रवीन्द्र काव्य में तमाम कमियां बताकर बंग भाषा के लोगों  को खिझाया करते।</p>
<p>इस समय ही निराला की लोकप्रियता बढ़ी और उन्होंने लोगों पर व्यंग्य भी कसे। उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ी। इसी समय उन पर आरोप लगा के उनकी कवितायें रवीन्द्र नाथ टैगोर के भावों पर आधारित हैं। लोगों ने सप्रमाण साबित किया कि निराला की फलानी-फलानी कविता में रवीन्द्र नाथ टैगोर की फलानी-फलानी कविता से भाव साम्य है। यह शुरुआत थी निरालाजी के खिलाफ़ साहित्य में उनको घेरने की। हालांकि कुछ बातें सहीं थीं इसमें कि कुछ कविताऒं में भाव साम्य था लेकिन प्रचार जिस अंदाज में किया जा रहा था उससे यह लग रहा था कि मानों निराला का सारा माल ही चोरी का है।</p>
<p>बहरहाल, निराला बाद में अपने को बार-बार साबित करते रहे। उनके जितने विरोधी हुये उससे कहीं अधिक उनके अनुयायी बने।<br />
यह अलग बात है कि इस नाम ने उनकी आर्थिक स्थिति कभी ऐसी न की कि वे निस्चिंत होकर लिख सकें। अभावों में भी निराला के स्वभाव का विद्रोही स्वरूप कभी दबा नहीं।</p>
<p>एक बार दुलारे लाल भार्गव के यहां ओरछा नरेश की पार्टी थी। राज्य के  भूतपूर्व दीवान शुकदेव बिहारी मिश्र तथा नगर के अन्य गणमान्य साहित्यकार उपस्थित थे। जब ओरछा नरेश आये तो सब लोग उठकर खड़े हो गये। निराला अपनी कुर्सी पर बैठे रहे। लोगों ने कानाफूसी की- कैसी हेकड़ी है निराला में!</p>
<p>रायबहादुर शुकदेव बिहारी मिश्र हर साहित्यकार से राजा का परिचय कराते हुये कहते-<strong>गरीब परवर, ये फलाने हैं।</strong></p>
<p>बुजुर्ग लेखक शुकदेवबिहारी युवक राजा को गरीबपरवर कहें, निराला को बुरा लगा। जब वह निराला का परिचय देने को हुये तो निराला उठ खड़े हुये। जैसे कोई विशालकाय देव बौने को देखे, वैसे ही राजा को देखते हुये निराला ने कहा- <strong>हम वह हैं, हम वह हैं जिनके बाप-दादों की पालकी तुम्हारे बाप-दादों के बाप-दादा उठाया करते थे।</strong></p>
<p>आशय यह है कि छ्त्रसाल ने भूषण की पालकी उठाई थी; साहित्यकार राजा से बड़ा है।</p>
<p>निरालाजी बसंत पंचमी के दिन अपना जन्मदिन मनाते थे। आज बसंत पंचमी हैं। इस अवसर मैं निरालाजी को श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं।<br />
<strong>संदर्भ: निराला की साहित्य साधना->लेखक डा. रामविलास शर्मा</strong></p>
<h2>मेरी पसंद:</h2>
<p><strong></p>
<blockquote><p>भारति, जय, विजयकरे!<br />
कनक-शस्य-कमलधरे!</p>
<p>लंका पदतल शतदल<br />
गर्जितोर्मि सागर-जल,<br />
धोता शुचि चरण युगल<br />
स्तव कर बहु अर्थ भरे।</p>
<p>तरु-तृण-वन-लता वसन,<br />
अंचल में खचित सुमन,<br />
गंगा ज्योतिर्जल-कण<br />
धवल-धार हार गले।</p>
<p>मुकुट शुभ्र हिम- तुषार,<br />
प्राण प्रणव ओंकार,<br />
ध्वनित दिशायें उदार,<br />
शतमुख-शतरव-</p></blockquote>
<p></strong>मुखरें!</p>
<p>-<strong>सूर्यकांत त्रिपाठी&#8217; निराला&#8217;</strong></p>
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		<title>नये साल में और गये साल में कुछ मुलाकातें</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Jan 2010 02:44:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

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		<description><![CDATA[
गुलाबी शहर में मिलना कुश से और लविजा के पापा से
 बीता साल मजेदार बीता। तमाम अच्छे अनुभव जुड़े। उनके बारे में फ़िर कभी विस्तार से लिखेंगे। फ़िलहाल आप गये साल और नये साल के कुछ फ़ोटो देखिये। गये साल के आखिरी दिनों में राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, अजमेर ,पुष्कर जाना हुआ। जयपुर में कुश [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
<h2><strong>गुलाबी शहर में मिलना कुश से और लविजा के पापा से</strong></h2>
<p> बीता साल मजेदार बीता। तमाम अच्छे अनुभव जुड़े। उनके बारे में फ़िर कभी विस्तार से लिखेंगे। फ़िलहाल आप गये साल और नये साल के कुछ फ़ोटो देखिये। गये साल के आखिरी दिनों में राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, अजमेर ,पुष्कर जाना हुआ। जयपुर में <a href="http://kushkikalam.blogspot.com/">कुश</a> और <a href="http://taau.taau.in/2009/03/blog-post_19.html">लविजा के पापा</a> सैयद भाई से मिले। <a href="http://coffeewithkush.blogspot.com/2009/03/2_17.html ">काफ़ी विद कुश</a> में कुश ने कई साथियों को वर्चुअल काफ़ी पिलाई है। हम जयपुर गये तो एकसाथ तीन रियल कॉफ़ी पी के आये। कॉफ़ी के साथ ब्लॉगजगत के न जाने कित्ते किस्से घुले-मिले थे। और तो सब ठीक रहा लेकिन कुश जिस तरह&#160; मोटर साइकिल चलाते हैं उससे लगता है कि जयपुर के ट्रैफ़िक आफ़ीसर ने उनको चेतावनी दे रखी होगी कि बेटा जिस दिन कायदे से गाड़ी चलाते पकड़े गये उसी दिन चालान हो जायेगा। जयपुर में मौसम खुशनुमा और कुछ हल्का गुनगुना था। हमारे लौटते ही वहां शीत लहर चलने लगी।</p>
<p>&#160;<a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009575.jpg"><img title="30122009575" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009575" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009575_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009576.jpg"><img title="30122009576" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009576" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009576_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a><a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009577.jpg"><img title="30122009577" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009577" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009577_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a><a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009578.jpg"><img title="30122009578" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009578" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009578_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009580.jpg"><img title="30122009580" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009580" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009580_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009581.jpg"><img title="30122009581" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="30122009581" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/30122009581_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a>फोटो बायें से: 1.&#160; कुश-सैयद 2.कुश-अनूप 3. अनूप,कुश और सैयद 4.अनूप,कुश और सैयद 5. सैयद-अनूप 6. कुश-अनूप<br />
<h2>दिल्ली में खुशदीप, श्रीश प्रखर और सागर से मुलाकात</h2>
<p> जयपुर से लौटे तो साल का आखिरी दिन था। जहां रुके थे वहां से पास ही <a href="http://deshnama.blogspot.com">खुशदीप</a> का घर था। उनसे मिलने गये। खुशदीप के परिवार वाले बरेली गये थे। खुशदीप पोस्ट बढ़िया लिखने के साथ चाय भी शानदार बनाते हैं। यह इसलिये बता रहे हैं कि अभी तक किसी ने शायद उनके इस हुनर की तारीफ़ नहीं की। खुशदीप ने ब्लॉग जगत में अपने आगमन के किस्से सुनाये। खुशदीप हमको <a href="http://deshnama.blogspot.com/2009/11/blog-post_3564.html ">’महागुरूदेव ’ की उपाधि </a>से विभूषित कर रखा है। हमने उनसे कहा –भैये, ब्लॉगजगत के हमारे लेख कोई सुधी पाठक पढ़ता होगा तो सोचता होगा कि ये ’महागुरुदेव’ लोग ऐसा चिरकुट लेखन करते हैं। लेकिन खुशदीप के अपने तर्क हैं लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह की अतिशयोक्ति पूर्ण आभासी उपधियां हमारे दिमाग में हवा भर देती हैं और दिमाग को हवा में उड़ा देती हैं, हवा-हवाई बना देती हैं।</p>
<p>वैसे यह बात तो लिखने की है। हमारे कानपुर  की बोली बानी के गुरु शब्द  के <a href="http://kanpurnama.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html">इतने मतलब </a>हैं कि सिर्फ कहने और सुनने वाले का संबंध ही इसके मायने तय कर सकता है। जब गुरू में इत्ता लफ़ड़ा तो महागुरू के हाल न ही पूछिये। </p>
<p>खुशदीप से मिलने के बाद फ़िर जे.एन.यू. जाना हुआ। वहां <a href="http://www.blogger.com/profile/09759596547813012220">श्रीश ’प्रखर ’</a> से मिलना हुआ। <a href="http://www.blogger.com/profile/13742050198890044426">सागर</a> को उन्होंने वहीं बुला लिया था। <a href="http://www.blogger.com/profile/15162902441907572888">अमरेन्द्र सर</a> घर गये थे। जाहिर है कि उनकी चर्चा काफ़ी हुई। उनसे फ़ोनालाप भी हुआ। </p>
<p>श्रीश हालांकि जे.एन.यू. में रिसर्च रत हैं लेकिन वे मॉडलिग में भी कैरियर आजमा सकते हैं। चाय शानदार बनाते हैं। उस दिन वहां का ऐतिहासिक गंगा ढाबा बंद था। पता चला कि बाहर के कुछ लड़के जे.एन.यू. की लड़कियों को छेड़कर चले गये थे। इसके चलते वहां का ढाबा बन्द हो गया था। ताज्जुब कि वहां की छात्राओं को बाहर के लोग छेड़कर चले जायें! सागर हड़बड़ाते हुये आये। सर्दी थी। दिल्ली में काम के चक्कर में चप्पल चटकाते हुये उनके बाल काफ़ी कम हो गये हैं। उनका खुद का मानना है कि वे धुंआधार सोचते हैं गजलों के बारे में इसीलिये उनके बालों ने समर्थन वापस ले लिया। कुश ने आज लिखा भी है <a href="http://kalam-e-saagar.blogspot.com/2010/01/blog-post.html">उनकी पोस्ट में</a>&#8211; कविताये लिखते हो या खौलते हुए तेल में तलते हो.. ? अब जहां से निकली कवितायें खौलती हुई लगें वहां बालों का टिकना कितना मुमकिन होगा?</p>
<p>ढेर सारा बतियाने के बाद जब हम लोगों श्रीश को छोड़ा इसके बाद सागर ने मुझे मेट्रो स्टेशन में विदा किया तो रात के साढ़े नौ बजे थे करीब। सर्द शाम की एक गर्मजोशी भरी मुलाकात अभी भी याद आ रही है।</p>
<p>फोटो बायें से 1. खुशदीप-अनूप 2. अनूप-सागर 3. अनूप-श्रीश प्रखर 4.सागर-श्रीश प्रखर</p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009582.jpg"><img title="31122009582" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="31122009582" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009582_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009595.jpg"><img title="31122009595" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="31122009595" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009595_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009596.jpg"><img title="31122009596" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="31122009596" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009596_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a>&#160;<a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009592.jpg"><img title="31122009592" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="184" alt="31122009592" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/31122009592_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a><br />
<h2>और कानपुर में मुलाकात मास्टरनी जी से</h2>
<p> नये साल के शुरू में कानपुर में हमारी मुलाकात <a href="http://www.blogger.com/profile/13048830323802336861">वंदनाजी</a> और <a href="http://shefalipande.blogspot.com/">शेफ़ाली पांडेय</a> से हुई। दोनों पेशे से अध्यापिका हैं। वंदना जी ने तो लिखा था कि कानपुर में हम <a href="http://wwwvandanablog.blogspot.com/2009/12/blog-post_25.html">लोगों की मुलाकात</a> न हो सकेगी लेकिन मुझे लगता था कि मिलना होगा। संयोग कि उस दिन उनकी गाड़ी 13-14 घंटे लेट हो गयी और उनको हमसे मिलने के लिये स्टेशन से वापस आना पड़ा। मुलाकात एक नर्सिंग होम में हुई जहां उनकी बहन इलाज के लिये भर्ती थीं। उनके बहनोई सुनील तिवारी को हम कमाल कानपुरी के नाम से जानते थे। लेकिन मिलना-जुलना कभी नहीं हुआ था। मिले तो उन्होंने बताया कि उन्होंने मुझे तीन बार फ़ोन भी किये थे लेकिन रास्ते में होने के कारण बात न हो सकी थी। शायद उनके पैसे बचने थे और मुलाकात का श्रेय वंदनाजी को ही मिलना था।वंदनाजी के साथ उनकी बिटिया विधु भी आई थी। बीच-बीच में विधु से भी काफ़ी बातें हुईं।</p>
<p>शेफ़ाली को जब हमने फोन किया तो पता चला कि वे उस समय पास रेव मोती से अपने घर के लिये निकल रहीं थीं। उनको भी हम वहीं ले आये और दो अध्यापिका ब्लागरों का मिलन हुआ। हम आपस में पहली बार मिले। पहले तो चाय की दुकान पर चाय-सत्रों के दौरान बातें हुईं। इसके बाद और गपशप हुई वहीं पर। फ़िर वन्दनाजी को ट्रेन पकड़ने जाना था सो हम लोग शेफ़ालीजी के यहां गये। रास्ते में उनकी बिटिया नव्या ने एक कविता सुनायी। कविता के बाद नव्या ने जो सुनाया वह आपने शायद पहले कभी न सुना हो। कैपिटल, स्माल और कर्सिव ए.बी.सी.डी. पड़ रखी होगी, लिखी भी होगी लेकिन सुनी नहीं होगी कभी आपने। लेकिन नव्या ने हमको तीनों तरह की अंग्रेजी वर्णमाला सुनाई। आप भी सुनिये नव्या की कविता और अंग्रेजी की वर्णमाला।</p>
<p>शेफ़ाली जी के घर में उनके पति श्री पांडेजी से मिलना हुआ। उन्होंने बताया कि&#160; शेफ़ाली का आत्मविश्वास&#160; ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद बढ़ा है।शेफ़ाली ने अपनी माताजी की कविताओं की किताब भी हमको भेंट की। उन्होंने अपनी पोस्टों के ड्राफ़्ट भी दिखाये। वे पोस्ट लिखने के पहले उसको अपनी कापियों&#160; में लिखती हैं तब पोस्ट करती हैं। </p>
<p>साल की शुरुआत अपने पसंदीदा ब्लॉगर साथियों से सपरिवार मुलाकात एक खुशनुमा अनुभव है।</p>
<p>फ़ोटो: 1.सुनील,अनूप, विधु, वंदना,शेफ़ाली और नव्या 2.सुनील,अनूप, विधु, वंदना,शेफ़ाली और नव्या 3.वंदना-शेफ़ाली 4..नव्या अपनी मम्मी के साथ 5.शेफ़ाली और उनके पति 6. शेफ़ाली के पोस्ट ड्राफ़्ट</p>
<p>  <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010602.jpg"><img title="02012010602" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010602" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010602_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010603.jpg"><img title="02012010603" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010603" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010603_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010604.jpg"><img title="02012010604" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010604" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010604_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010605.jpg"><img title="02012010605" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010605" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010605_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a> <a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010608.jpg"><img title="02012010608" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010608" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010608_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a><a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010606.jpg"><img title="02012010606" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="02012010606" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/02012010606_thumb.jpg" width="244" border="0" /></a>&#160;
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<h2>नव्या की तीन तरह की एबीसीडी</h2>
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<div><object width="425" height="355"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/C97QHctuF1I&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;hl=en"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/C97QHctuF1I&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" width="425" height="355"></embed></object></div>
</div>
<p>
<h2>मेरी पसंन्द</h2>
</p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/image.png"><img title="image" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="176" alt="image" src="http://hindini.com/fursatiya/wp-content/uploads/2010/01/image_thumb.png" width="144" align="left" border="0" /></a> मैं हूं अग़र चराग़ तो जल जाना चाहिये<br />
मैं पेड़ हूं तो पेड़ को फ़ल जाना चाहिये!</p>
<p>रिश्तों को क्यूं उठाये कोई बोझ की तरह<br />
अब उसकी जिन्दगी से निकल जाना चाहिये।</p>
<p>जब दोस्ती भी फ़ूंक के रखने लगे कदम<br />
फ़िर दुश्मनी तुझे भी संभल जाना चाहिये।</p>
<p>मेहमान अपनी मर्जी से जाते नहीं कभी<br />
तुम को मेरे ख्याल से कल जाना चाहिये।</p>
<p>नौटंकी बन गया हो जहां पर मुशायरा<br />
ऐसी जगह सुनाने ग़ज़ल जाना चाहिये।</p>
<p>इस घर को अब हमारी जरूरत नहीं रही<br />
अब आफ़ताबे-उम्र को ढ़ल जाना चाहिये।</p>
<p>  -<a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">मुनव्वर राना</a></p>
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