परिचय

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 Comments

  1. G Vishwanath

    आपके बारे में जानकर अच्छा लगा।
    आपका नाम तो बहुत पहले ही सुन चुका हूँ।
    धीरे धीरे आशा कर्ता हूँ कि परिचय बढ़ता जाएगा।
    लिखते रहिए।
    कभी यह भ्रम में मत रहिए के लोगों को आपके लेख पढ़ने के लिए फ़ुर्सत नहीं।
    हम जैसे लोग पहले आप जैसों का ब्लॉग पड़ते हैं और उसके बाद अगर फ़ुर्सत हों तो और काम निपटाते हैं।
    अगर आप जैसे लोग लिखेंगे नहीं तो हम जैसे टिप्पणीकारों का क्या होगा?
    शुभकामनाएं
    गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

  2. Dr.Arvind Mishra

    मैं हिन्दी चिट्ठाजगत में थोडा विलंब से आया और धीरे धीरे आपके अवदानों से परिचित हो रहा हूँ .हिन्दी चिट्ठाकारिता में आप सरीखे शलाका पुरुषों ने जो मजबूत नींव डाली हैं वह इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है .
    मैं तो दरसल आप सरीखे निस्पृह और अनासक्त भाव वाले प्रेरणास्पद रचनाधर्मियों के बड़े कामों से उत्प्रेरित होकर ही इस ज्ञान यग्य में अपना यथाशक्ति हविदान कर रहा हूँ .
    कृपया मुझे अपने उन चिट्ठों का लिंक भेजें जहाँ पर आप नियमित हों -कुछ भ्रम की स्थिति है -
    अरविन्द मिश्र -drarvind3@gmail.com

  3. rajesh shukla

    anup ji aap ki website dekh kar accha laga. kya hame link exchange karna chahiye?

  4. Hari Joshi

    भैय्या बड़े खलीफा हो, यहां भी चकरा रहे हो।

  5. Santosh K Aggarwal

    पिछले कुछ दिनों से हिन्दी ब्लॉग्गिंग कि “खाक” छान रहा हूँ..एक नाम “फुरसतिया” बार-बार अटक जाता है. सोच रहा था फुरसतिया है तो फुर्सत से ही पढेंगे. लेकिन क्या करे हर जगह सेंध लगाये हुए हो गुरु. अपने-आप को रोक नहीं पाए और आना ही पड़ा.. और आ के लगा कि यह लाइने इकबाल ने आपके लिए ही लिखी है…. “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी..सदियों रहा है दुशमन दौरे-जहाँ हमारा..” कितनी गहरी बात कितनी सफाई से कह जाते हो..पता ही नही चलता इस गाल पे मारा है कि उस गाल पे… खैर..मुझे आपलोगों से बहुत कुछ लेना (सीखना) है….

  6. ananyonaasti.blogspot.com

    अनूप जी , आप से मुलाकात shri हेमंत शर्मा के ” योग ब्लाग के ग़लत सीख “{ परशुराम से सम्बंधित } लेख पर हुई थी | आप की टिप्पणी पढ़ कर ही लिखने को बाध्य हुआ , आप की टिपण्णी ‘ जो पहले अनुकरणीय था वही अब विचारणीय है ” हमारा धर्म शापिंग माल के समान है ” में से पहली से कुछ सीमा तक सहमत हूँ परन्तु उसका सन्दर्भ ग़लत है : : “सम्प्रदाय” के सम्बन्ध में तो उक्त दोनों कथन पूर्णतया सही है ,परन्तु धर्म के सन्दर्भ दोनों टीप से असहमत हूँ |
    धर्म एवं सम्प्रदाय के बारे में मेरा अभी तक का अध्ययन बताता है “धर्म प्राकृतिक ,सनातन एवं शाश्वत होता है , संस्कृत निरुक्ति के अनुसार धर्म शब्द की उत्पति ” धृ” धातु से उत्पन्न धारण से हुई है धारण से धारणा अर्थात ‘धर्म वह धारणा है जो धारण करने योग्य अथवा मानने एवं अनुपालन कराने योग्य है|’ इसका कोई प्रतिपादक एवं संस्थापक नही होता |
    ” जब की सम्प्रदाय युग – काल सापेक्ष होता है , युग – काल बीतते -बीतते इस के कई अंश व नियम अप्रासंगिक हो जाते हैं ,उन्हें ढोते रहना ही रुदावादिता एवं साम्प्रदायिकता को जन्म देता है “

  7. Sunil Kumar

    Website canvasnews.com is underconstruction.
    अनूप जी, नमस्कार। आपसे पहला साक्षात्कार ब्लॉग के माध्यम से हुआ। अनजान हूं मैं आपके लिए, ब्लॉग की इंटरनेटी दुनिया के लिए सो काफी देर से कदम रखा। नया हूं। लेकिन जब पहला पोस्ट लिखा तो लगा अनजान लोगों के बारे में भी लोग सब खबर रखते हैं, कौन कहां क्या लिख रहा है। ब्लॉग काफी पहले बनाया था,हाल के समय में लिखना शुरू किया है। आपके प्रतिक्रिया भेजकर मेरा उत्हास बढाया है। जल्दी ही आपको कला पर एक साप्ताहिक वेब पत्रिका पढ़ने को मिलेगी। तब तक ब्लॉग पर आप मेरा उत्साहवर्धन करें। धन्यवाद।
    सुनील कुमार
    संपर्क: 9999024943

  8. स्वप्रेम तिवारी

    दीप जलें रोशन करें जग संसार तुम्हारा
    उजियारे के आंचल में महके आंगन सारा

    शुभ दीपावली

  9. सुलभ सतरंगी

    रेनू जी कभी भिजवाते थे सन्देश संवदिया से
    चलो आज दो बात कर ले हम फ़ुरसतिया से

  10. vinod kumar gupta

    Dear Anoop,
    If you remember ,we studied in BNSD F1 1981. I was living in Gandhi nagar kanpur.Now I am at Delhi. pl write about other friends,if you have info.

    vinod

  11. Mahfooz

    Aadarniya Anoopji…..

    kripya apni email id dijiyega mujhe….

    mera email id hai…

    mailtomahfooz@gmail.com

  12. Sharad Prakash Agarwal

    mitra anoop.
    tumhara blog padh kar kuchh samjha, kuchh jana, abhi bahut kuchh baki hai, ek aur yadgar mulakat ka intajar rahega.

    sharad agarwal
    krishna nagar,kanpur

  13. aradhana "mukti"

    मैं भी आपके पड़ोसी जिले उन्नाव में पली-बढ़ी हूँ. इसीलिये आपकी पोस्ट में कुछ अधिक अपनापन झलकता है. अवधी से भी मेरा लगाव इसी कारण है. आपके बारे में बहुत सुना था, पर ये नहीं मालूम था कि अनूप शुक्ल ही फ़ुरसतिया हैं. अजीब सी बात है न. चिट्ठाचर्चा में “टुकुर-टुकुर देउरा निहारे बेइमनवा” का लिंक पकड़कर पता चला कि आप ही फ़ुरसतिया हैं. अब तो पहचान लिया और पीछा भी करना शुरू कर दिया.

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