प्रति जोडें: प्रविष्टियों की | टिप्पणीयों की

गाँधीवाद बनाम कृष्णनीति

9 टिप्पणियां
Delicious

बचपन से परिवार श्रीकृष्ण का उपासक रहा है। उन श्रीकृष्ण का जिन्होनें शठे शाठ्यम समाचरेत की शिक्षा दी। जिन्होने प्रेम की शिक्षा भी दी पर साथ ही दुष्ट हनन का पाठ भी पढ़ाया। पर जिस भारत में श्रीकृष्ण की उपासना होती है वही भारत गाँधी का भी अनुयायी है जिन्होनें एक गाल पर चाँटा पड़ने पर दूसरा गाल आगे करने की सीख दी। गाँधी जी जैसे महात्मा के दर्शन की बखिया उधेड़ने का साहस मुझ जैसे छुद्र जीव में नही अलबत्ता कन्फयूजियाने का लोकताँत्रिक अधिकार तो हमें सँविधान से प्रदत्त तो है ही। अब जिस तरह से पूर्व प्रधानमँत्री और तथाकथित लौहपुरूष अडवाणी जी जिन्ना के समूचे कट्टरपँथी व्यक्तित्व से अपनी सुविधानुसार एकमात्र घड़ियाली भाषण चुन कर उन्हे धर्मनिरपेक्षी घोषित कर सकते हैं तो क्या मैं बिरला हाऊस जाकर पूरा गाँधी दर्शन वही भूलकर सिर्फ चाँटा थ्योरी की चीरफाड़ करूँ तो क्या गलत है? क्या इस चाँटा थ्योरी और “समरथ को नहीं दोष गुँसाई” का काकटेल पिलाकर पिलाकर दोसौ साल गुलाम रह चुके राष्ट्र के मानस को पिलपिला नही बना दिया गया? पहले मेरा बालक शैतान बच्चों से पिटकर आता था उसे हम सिखाते थे कि जा बेटा उस बच्चे के मम्मी पापा से शिकायत कर। हम भी उन बच्चों के मम्मी पापा की ओर याचना भरी निगाह से देखते थे कि भाई अपने गप्पों के गोलगप्पों से फुरसत निकाल कर जरा अपने नौनिहाल को सभ्यता का पाठ पढ़ा दो। पूरे साल भर गाँधीपाठ पढ़ने के बाद न हमारे बच्चे का पिटना बँद हुआ न मित्रों के बच्चे सुधरे। मजबूरन हमने बच्चे को कृष्णनीति अँग्रेजी में सिखा दी। फिर तो बच्चे ने जो मिलके दो चपाटे अपने ऊधमी साथियों को दिये तो उन बच्चों के साथ साथ उनके माँबाप के भी ज्ञानचक्षु खुल गये। पर जो सबक हमारा बच्चा साल भर में सीख गया वह हमारा देश पचास साल में भी न सीखा। बल्कि अब तो हम दूसरे गाल की जगह अपनी तशरीफ का टोकरा अपने को चाँटा मारने को आगे कर देते हैं कि ले भाई यहाँ भी लात मार ले , खुश हो जा , तेरे ही बाप का माल है। उदाहरण एक ढूढ़ों हजार मिलेगें
१. कँधार में छोड़े शोहदे आज पड़ोस में टीवी पर ईँटरव्यू देते हैं और हम बयान बाजी से खुश।
२. पिद्दी से मलेशिया ने हमारे आईटी विशेषज्ञों को अपने चीनी भाईयों के हुस्स करने पर चोरों की तरह बँद कर दिया और हम उन्हे घुड़क भी न पाये।
३. जिस मच्छर को हमने आजाद कराया वहीं बीएसएफ के जवानो को मारके जानवर की तरह लटकाकर भेजता है और क्या उखाड़ लेते हैं हम?

अब क्या क्या गिनाया जाये, इस गाँधीवाद के साथ एक और ख्याल मन में आता है। अपने देबू भाई का लेख पढ़ा, यहाँ फिर अर्थ का अनर्थ निकालने की गुस्ताखी कर रहा हूँ पर यार एक बात नही समझ आती कि अगर किसी को भारत में ढँग का काम न मिले तो क्या बाहर काम करने वाले भारत के सपूत नही रह जाते? उन्हे ईंश्योररेंस देकर वह भी उन्ही के पैसो से यह कर पल्ला झाड़ लिया जाये कि बेटा अगर बाहर तुम्हें कोई तालीबानी तुम्हारी भारतीय पहचान की वजह से मारे , या फिर एरिजोना में कोई तुम्हारी पगड़ी की वजह से तुम्हें तालीबानी समझ कर भून दे तो पलट कर हिंदुस्तान की तरफ मत देखना क्योंकि रोटी के चँद टुकड़ों की खातिर तुमने सात समुँदर पार का पानी पीने का अपराध किया है।

मेरी सपाट समझ के हिसाब से अफगानिस्तान में या फिर अपने ही काश्मीर में हो रही हत्याओ का हल मुआवजा नही है जैसा कि देबू भाई ने कहा। इसका हल कूटनीति है या कृष्णनीति ये तो इश देश के कर्णधार ही तय करेंगे , हम तो सिर्फ बुश अँकल को टापते रह कर खुश हो सकते हैं कि जवाब देना कोई इस बँदे से सीखे, दो इमारतें गिरी तो बँदे ने हजार किलो के बम फोड़ दिये बवालियों के घर में घुस कर और पूरी दुनिया कुछ न उखाड़ सकी। अब उन जनाब की नीति की उनके ही देशवालें बखिया उधेड़े वह दीगर बात है, शायद रेड कार्नर सरीखी फिल्म भी सच ही बयान करती हैं कि मुश्किल के वक्त अच्छे अच्छे साथ छोड़ देते हैं तो सरकारों का क्या भरोसा?

  1. eswami ने कहा:

    भारत के बाहर पैसा कमाने गए नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा तो एक तरफ़ यहां तो देश के अंदर रह रहे सशक्त नागरिकों को देश के नेता ही खुल्ले आम धमका रहे हैं! बाकियों की क्या बिसात!

    अब तो हाल ये है भईये की हर श्याणा अनिवासी सोचता है की बाकी परिवार को भी कैसे देश के बाहर खिंचूं! सच तो ये है की आम इमानदार आदमी के लिए भारत में जीवन जीना मतलब समस्याओं से जूझते हुए मर जाने की प्रक्रिया है! IITian Engineer की हत्या का कांड तो याद ही होगा! देश के सूर्यनारायण बाहर नहीं मरेंगे तो अंदर मरेंगे देश अंदर से भी आतंकियों की खदान है यार!

  2. सही लिखे हो भईया। शायद भारत सचमुच इतना बड़ा देश है कि इसके टुकड़े होना स्वभाविक है।

  3. बहुत अच्छा लगा पढ कर, बढियां लिखे हैं,

  4. बात सही है.. कृष्णनीति ही समस्या का हल है। रजनीश, क्यों यूरोप में बैठ कर यूरोप के टुकड़ों से तुलना कर रहे हैं? अमरीका से देखें तो भारत छोटा सा देश लगता है। और फिर टुकड़े होने से तो कोई समस्या नहीं सुलझने वाली.. वह एक चिड़िया, अनेक चिड़िया वाला गाना याद है न? जो टुकड़े हुए, उन्होंने कौन से तीर मार लिए?

  5. अतुल भाई, बिल्कुल ठीक कहा कि कृष्णनीति ही भारत की बहुतेरी समस्याओं का हल है। कृष्ण ने गीता में कायरता को छोड़ कर युद्ध करने का सन्देश दिया है। भारत का आतंकवाद जैसी समस्याओं के प्रति नर्म रुख़ कायरता ही है, न कि अहिंसा। भारत और भारतीयों को अपने अन्दर कृष्ण की कर्मण्यता और आक्रामकता पैदा करने की ज़रूरत है।

  6. १. लातो के भूत बातो से नही मानते
    २.राम भगवान जब लंका जाने के लिये समुद्र से प्रार्थना कर रहे थे तब चिढ कर लक्षमण ने कहा था
    कर्महीन नर एक ही सहारा
    दैव दैव आलसी पूकारा
    ३.अखण्ड एकछत्र भारत का सपना देखने वाले प्रथम पुरूष (श्रीकृष्ण को गिने तो द्वीतिय)चाणक्य ने भी तो साम दाम दंड भेद सभी नितियो का प्रयोग किया था.

  7. अतुलजी, पता नहीं किस चीज़ की खोज में Google पर आपके ब्लॉग की लिंक मिल गई। आपके ब्लॉग से और कडि़याँ जुड़ती गईं। आपसे ही प्रेरित होकर मैंने भी यह प्रयास किया है। अब आगे आप मार्गदर्शन करें कि अन्य ब्लॉगर बिरादरी मेरे ब्लॉग के बारे में कैसे जानेगी? और साथ ही मैं आपसे कैसे संपर्क कर सकता हूँ और कैसे? जैसे आपका कोई ई-मेल पता?

  8. Rajeev Seth ने कहा:

    कृष्ण व गाँधी में मुझे तो कोई विरोध नज़र नहीं आता. गाँधीजी ने कृष्ण की ही नीति अपनायी, जिस राह् से विजय मिले, वही अपनाया. दडं सम्भव नहीं था, तो गाल ही सही. Changed the game to play where our strength was, supreme strategist and brilliant tactician, not unlike कृष्ण.

  9. आशीष भाई
    बहुत गज़ब का लेख लिखा आपने।
    उपर आपने भारत की दरियादिली के तीन उदाहरण दिये उनमें से अगर एक भी किस्से में भारत की जगह इस्रायल होता तो इन तीनों देशों के नक्शे बिगाड़ दिये होते इस्रायल ने। पर यह तो गाँधीजी के देश भारत में हुआ है ना!
    अभी तो पता नही ऐसे कितने ज़ख्म हमें सहने होंगे अगर गांधीगिरी को नहीं छोड़ा तो।

टिप्पणीं करें

गूगल ट्रांसलिटरेशन चालू है(अंग्रेजी/हिन्दी चयन के लिये Ctrl+g दबाएं)