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वालमार्ट: हमारे समय की ईस्ट इंडिया कंपनी

9 टिप्पणियां
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वॉल-मार्ट विश्व की सबसे बडी किराने की दुकानों की श्रृंखाला है. रीटेल स्टोर का हिंदीकरण कर जब किराने की दुकान लिखता हूं तो नुक्कड पंसारी की गुमटिया याद आती है. आकार के हिसाब से वॉल-मार्ट की महादुकानों में हर वो चीज एक छत तले बिकती है जो अन्यथा किसी बाजार भर मे ना समायें. नई शॉपिंग-मॉल संस्कृति से ये खतरा जरा अलग है. शॉपिंग मॉल मे एकाधिक छोटी बडी दुकानें होती हैं जिनका सहास्तित्व कहीं आपसी प्रतियोगिता और कहीं अपनी अपनी विशिष्टताओं के आधार पर टिका होता है.

जब एक ही बडी दुकान चुनिंदा ब्रांड रखने लगे और अपनी हर जगह उपस्थिती के आधार पर निर्माताओं पर कीमतों के लिए दबाव बना कर अपने मुनाफ़े बढाए. दूसरी तरफ़ घरेलू और छोटे उत्पादकों को गलाकाट कीमतों के चलते प्रतिस्पर्धा से बाहर होना पडे. कल का दुकानदार अपनी दुकान बंद कर के महादुकान में कम वेतन का नौकर हो जाए, मुनाफ़ों का प्रवाह स्थानीय समाजों को छोड कर किसी कार्पोरेशन के बैंकों मे जाने लगे तो हालात कुछ कुछ ईस्ट इंडिया की शैली याद दिलाने लगते हैं.

वॉल-मार्ट का अमरीका के छोटे गांवों से ले कर विश्व के अन्य देशों मे कडा विरोध होता रहा है. कई संस्कृतियों और स्थानों में इस कार्पोरेशन को को कुटीर और घरेलू उद्योगों और छोटे कृषकों और दुकानदारों के सामूहिक विनाशक के रूप में देखा जाता है. अपने विस्तारवादी तौर-तरीकों, कर्मचारियों को कम वेतनों पर रखने और उत्पादकों पर कीमतें कम रखने का सतत दवाब बनाने के लिये यह कंपनी बदमान है. ये सब ग्राहकों को कम कीमत में माल मुहैया करवनाने के नाम पर किया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और ही है.

एक हंगामाखेज़ खबर है की वॉलमार्ट को हाल ही में जर्मनी और दक्षिणी कोरिया में मूंह की खानी पडी है – ये ऐतिहासिक बात है. वाल~मार्ट जर्मनी में स्थानीय दुकानदारों की गुणवत्ता और सेवाओं के सामने टिक नही पाई. लोगों ने कम कीमत की मार्केटिंग से चमत्कृत हो कर अपने पारंपरिक तरीकों से खरीददारी करने के तरीके नही बदले और स्थानीय खुदरा व्यापारियों की जीत हुई. यह वॉलमार्ट के लिए एक करारी हार है.

लेकिन घायल शेर नें अपने नए शिकार चुन रखे हैं – चीन और भारत.  <--ये कडी जरूर पढिये. भारत का ९७% खुदरा व्यापार पंसारीनुमा छोटी दुकानों से होता है. वॉलमार्ट को क्या ये दुकानदार वैसे ही बाहर का रस्ता दिखा पाएंगे जैसे जर्मनी और दक्षिणी कोरिया में हुआ? क्या हमारी जनता अपने देश-प्रेम को एक नया रूप दे पाएगी? क्या हम ठेले-रेहडी वालों को और नुक्कड के लाला को बडी वातानुकूलित दूकान से अधिक व्यवसाय देंगे? चाहे उसी वस्तु का वातानुकूलित दुकान मे जो भाव मिले! ये प्रतिष्ठा का नही समझ का मामला है! वालमार्ट छोटी बडी कोई भी चीज़ अपनी छत तले रखने में संकोच नही करती - और एक स्थान पर सब मिलने की सुविधा के चलते लोग एकमुश्त खरीद करते जाते हैं इस मानसिकता के चलते स्थानीय दुकानदार क्या भयंकर परिणाम भोगते हैं वो मैनें अमरीका के बहुत छोटे स्थानों पर अपनी यायावरी के दौर में होते देखा है.

यह एक बहुत बडा आर्थिक-सामाजिक मुद्दा बनने वाला है. और हमारी साझा समझदारी का नया बैरोमीटर भी. हमारे कृषी क्ष्रेत्र, स्थानीय घरेलू व्यवसाय और पूरे व्यापार तंत्र पर ऐसी हलचलों का दूरगामी प्रभाव होगा. मुद्दे का हर पक्ष इतना व्यापक है और मामला इतना महत्वपूर्ण है की इस से निपटने के लिए जन-जागरण जरूरी होगी. भूमंडलीकरण और उदारवादी बाजार नीतियों को अपनाने के बाद ये हमारी अर्थतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण ईकाई - छोटे दुकानदारों और किसानों का किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी से पहला बडा सामना होगा. 

मुझे उस्तुकता है की भारतीय अर्थशास्त्री और मीडिया वाले इस विषय में क्या राय रखते हैं. वैसे वॉलामार्ट की "तारीफ़" से तो इंटर्नेट पटा पडा है. गूगल पर इसका नाम डालने की देर है. विरोध में फ़िल्में तक बन चुकी हैं ऐसे में भारत में इसके बारे में कैसा माहौल बनता है देखने लायक होगा. हम यहां हमारी राय तो रखेंगे ही!

  1. मुक्त बाज़ार और पूंजीवाद को सही मानेंगे तो वालमार्ट का विरोध करना ग़लत है। गली कूचों के लोहारों का स्थान सी.एन.सी. मशीनों ने ले लिया है। नुक्कडों के दर्जियों से जो कमीज़े सिलती थीं, अब बड़ी फैक्ट्रियों में बनती हैं, और रेडीमेड दुकानों से खरीदी जाती हैं। बनिया जो उधार देता था, वह अब वीज़ा और मास्टरकार्ड की बपौती बन गया है। यह सब तो बाज़ार के evolution का हिस्सा हैं — इस से कुछ लोगों के नुक्सान होगा, खासकर उन लोगों को जो समय के साथ कदम मिला कर नहीं चल पाए हैं, पर आम जनता को फायदा ही होगा। मैं तो लगभग अपनी सारी शॉपिंग वाल्मार्ट से करता हूँ, और वाल्मार्ट न हो तो मेरा बजट अच्छा खासा बढ़ जाएगा। मेरे विचार से इसे ईस्ट इंडिया कंपनी कहना ग़लत है; वॉल्मार्ट रिटेलिंग के धन्धे में है, और अपने धन्धे को बढ़िया तरीके से करना जानते हैं। माइक्रोसॉफ्ट और वाल्मार्ट को कानून बना बना कर दूर रखने वाले वही हैं, जो धन्धे में उन का सामने सामना नहीं कर पाते।

  2. देखिए हिन्दुस्तान में सस्ता माल सुविधापूर्वक मिलेगा तो मुझे नहीं लगता कि उसका विरोध कोई करेगा। और हमारे किराने की दुकानों के छोटुओं को कौन सी बड़ी धाँसू सुविधाएँ मिलती हैं – घर के नौकर की तरह ही उनसे बर्ताव होता है। तो मुझे नहीं लगता कि हिन्दुस्तान में वाल मार्ट का कोई विरोध होगा। प्रेस तो वैसे ही बिकी हुई है – तो इस पर चर्चा भी नहीं होगी।

  3. eshadow ने कहा:

    रमण जी की बात से पूरणतया सहमत हूं। मै और मेरे जैसे मेरे कितने ही दोस्त अपनी सारी खरीददारी वाल-मार्ट से ही करते है। मै तो वालमार्ट के बिना इस शहर की कल्पना भी नही कर सकता। लगभग हर दूसरे तीसरे दिन मै वालमार्ट जाता हूं। कोई भी कंपनी दुनिया की सबसे बडी कंपनी ऐसे ही नही बन जाती। ग्राहक समझदार है, जहां उसका हित होगा वहां जायेगा। सारी वस्तुयें बेहद कम दामों में एक ही जगह और कहां मिल सकती हैं। भारत में वालमार्ट का जाना वहां के ग्राहकों को कितना फायदेमंद होगा इसकी कल्पना करिये। अगर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो तो ग्राहक को तो फायदा ही होगा ना। जहां सस्ता और अच्छा माल मिलेगा वहां जायेगा। डरेंगे वही हैं जो चोर हों या कमजोर।

  4. SHUAIB ने कहा:

    मैं रमण जी की टिप्पणी से सहमत हूं

  5. यार मैं नहीं समझता कि अपने यहाँ कोई बुरा असर पड़ेगा। अपने यहाँ के दुकानदार सदियों पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, समय के साथ नहीं बदलते, ग्राहक के साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे उसे सामान बेचकर उस पर एहसान कर रहे हैं, इसलिए अपने यहाँ के दुकानदारों को इसी तरह के झटके की आवश्यकता है, उनको पता चलना चाहिए कि ग्राहक वाकई भगवान होता है।

    दूसरे, मैं नहीं समझता कि वाल-मार्ट ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी है। जो वाल-मार्ट करता है(उत्पादकों पर दबाव डाल कम दाम में सामान खरीदना और कम दाम में बेचना) वह लगभग सभी करते हैं जो कर सकते हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी तो जबरन ऐसा करती थी। खुद खरीद का दाम निर्धारित करती थी और खुद बिक्री का दाम भी तय करती थी। उत्पादक और खरीददार दोनो ही को अपने कब्ज़े में रखती थी। यह असल में एक तरह की तानाशाही है, दोनों ही बाज़ारों पर कब्ज़ा और ढेर सारा मुनाफ़ा। वाल-मार्ट वाले आपकी कनपटी पर बंदूक रख तो माल नहीं बेचते ना, आपकी मर्ज़ी है कि खरीदो या ना खरीदो। :)

  6. Tarun ने कहा:

    एक जमाना होगा जब ये ही सब किसी ने बैल या घोड़ा गाड़ी के मुकाबले आती मोटरगाड़ी के लिये लिखा होगा लेकिन इतिहास गवाह है लोगों ने मोटरगाड़ी को वरियता दी। रहा सवाल जर्मन का तो भैय्या वहाँ वालमार्ट का ज्यादा फायदा भी नही होना था।

  7. kali ने कहा:

    I have 1 problem with walmart. It doesnot provide its employees with health insurance. It actually trains them how to use medicare. Effectively this means that tax payers like me have to pay for walmarts healthcare costs, in essence i am funding a portion of walmart. The significance of that cost — on walmartish salaries health insurance costs is about 30% of compensation.

    In india we already have stores like Big Bazar. That will definately be the trend.

  8. सरकारी नीतियो के कारण बेरोजगारी है और ऐसे में माता पिता सोचते हैं कि थोडी सी पूंजी लगा कर दुकान खोल दी जाए .वाल मार्ट जैसे मगरमच्छ क्या करेंगे आपने बताया है.मुकेश अंबानी का दावा है कि वे भारतीय वाल मार्ट बनना चाहते हैं.सब्जी तक अम्बानी घर तक पहुंचाएंगे.वाम फ्रन्ट सरकार ने अम्बानी को न्योता दिया है.
    दुनिया के १० सबसे बडे पैसे वालों में ५ ‘वॉल्टन’ हैं.वॉल्टन वाल मार्ट का मालिक खानदान है.इनकी कुल दौलत ९० बीलियन डौलर है यानि बिल गेट्स और वॉरन बफेट की सम्मिलित दौलत से ज्यादा तथा सिंगापुर की राष्ट्रीय आय से ज्यादा.किसी आपूर्तिकर्ता का यदि ज्यादातर माल यदि आप ही खरीदते हैं तो सौदेबाजी से आपको माल सस्ता मिलेगा.वाल मार्ट यह ही करता है.साथ साथ मजदूरों को भी चूस कर रखता है.उन्हें स्वास्थ्य आदि कि सुविधा से मरहूम रख कर दाम सस्ता रख्ता है.सस्ता होगा यह भी भ्रम है-अरकन्सास के एक दैनिक ने ६ वाल मार्ट दुकानों की तुलना अन्य दुकानों से की तो पत चला कि १९ घरेलू सामानों में वाल मार्ट मे केवल दो सामान सबसे सस्ते थे.सभी सामानों का न्यूनतम $१२.९१ था तथा अधिकतम वाल मार्ट में $ १५.८६ था.वाल मार्ट में भेद भाव के भी अध्ययन हुए हैं.

  9. अजीत कुमार मिश्रा ने कहा:

    वाल मार्ट यदि भारत में सफल होती है तो इसके पीछे शायद उसका प्रबंधन से ज्यादा यहाँ के लोगो की यह मानसिकता होगी कि जो विदेशी है वही अच्छा है. निसंदेह यदि हमारी मानसिकता बदल जाये तो वालमार्ट कहीं नहीं टिकेगी.

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