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इसे कहते हैं ’माईंडब्लोंईंग’
इसे कहते हैं ’माईंडब्लोंईंग’
अलग अलग स्थानों पर पले बढे दो अजनबी – एक स्त्री और एक पुरुष मिलते हैं – एक दूसरे में अनोखा आकर्षण और आश्चर्यजनक समानताएं पाते हैं और शादी कर लेते हैं. बाद में उन्हें यह पता चलता है की वे तो जुडवां भाई-बहन हैं! दोनों को बचपन में अलग अलग परिवारों द्वारा गोद लिया गया था और ये सत्य उन पर कभी ज़ाहिर नहीं किया गया था की उनका कोई जुडवां भी है.
सत्य का पता चलने पर अब वे कानूनन तलाकशुदा हो गए हैं लेकिन दत्तकों से जुडी संस्था में कार्यरत लोगों नें इस प्रकार बचपन में बिछडों में मिलने का ऐसा दैव और परस्पर आकर्षण होने की और भी पूर्व घटनाओं का ब्यौरा दिया है! सत्य का पता चला कैसे यह बात और दोनो की जानकारी ब्रिटेन के अधिकारियों द्वारा गुप्त रखी गई है!
बचपन में बिछडनें वाले बताते हैं की वे यूं संयोग से अपने भाई/बहन से मिलने पर एक अभीभूत कर देने वाली भावनात्मक तीव्रता महसूस करते हैं.
लेख बताता है की प्राकृतिक रूप से जन्में भाई-बहनों में ऐसा संबंध हो जाने की सांख्यिकीय संभावना कितनी कम है. वहीं दूसरी ओर परखनली शिशु और वीर्यदान/कृत्रिम गर्भाधान द्वारा उत्पन्न बच्चों के भविष्य में अपने आधे भाई-या बहन से मिलने की संभावनाएं इसकी तुलना में सांख्यिकी के ही आधार पर उससे अधिक हो सकती हैं. इस प्रकार की घटनाओं के बाद दत्तक लिये जाने वाले बच्चों के अपने मूल माता-पिता के बारे में जानकारी होने या ना होने के अधिकारों का निर्णय कैसे हो इस पर बहस तीव्र होगी! अनुवांशिक बिमारियों के मद्दे नजर ये एक काफ़ी पेचीदा जिरह हो सकती है.
ये खबर पढ कर सोचता रहा की भाईयों बहनों से अनुवांशिक बंधन का स्तर क्या है? आत्मिक, दैविक, स्वाभाविक ये सभी या और भी क्या क्या! आजकल देसी मीडिया में ’माईंडब्लोंगिज’ विशेषण ज़रा ज्यादा खुल कर प्रयोग किया जाता है – लेख की कडी दे रहा हूं .. आप भी पढिये! ये खबर और लेख सचमूच लगा “माईंडब्लोंईंग”.


















