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भारतीय लोग इतने बेवकूफ़ क्यों हैं?

31 टिप्पणियां
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मैं एक अनिवासी भारतीय – या जैसे की तोहमत दी जाती है एक नान-रिलाएबल इंडियन हूं. लगभग एक दशक से भारत से बाहर हूं – हिंदी में ब्लाग लिखता हूं तो कहीं खालिस भारतीय ही हूंगा ना – इसीलिये बहुत दु:ख के साथ पूछना पड रहा है अपने भारत में रहने वाले भाईयों-बहनों से की आप(और हम) इतने बेवकूफ़ क्यों हैं?

हम क्या चाहते हैं और क्यों ये हमें नही पता होता लेकिन जो भी हो रहा होता है उस पर ३६५ दिन मुहर्रम मनाना ज़ारी रहता है. फ़िर भी हमारी पश्चिमोन्मुखी नकलची प्रवृत्तियों पर कभी समझदारी की कोई नकेल नहीं डलती. abc
इन्टरनेट युग में आप पश्चिम की गलतियां क्यों दोहरा रहे हैं? आखिर क्यों? आगे क्या होगा क्या आपको इसका भान भी है?

हाल के टीवी कार्यक्रमों और ब्लाग-रंगेजीयों के मद्दे नजर दो मुद्दों पर बात करनी है – १. क्रिकेट और २. औरतें!

१. भारत की प्रोफ़ेशन क्रिकेट लीग्स के मुद्दे पर -

एक समय था जब भारतीय लोग इस बात पर रोते थे की भारत की सरकार खेलों को प्रोत्साहित नही करती. खेल सुविधाओं का अभाव, खिलाडियों की दुर्दशा जैसे मुद्दे भी पुराने पड गए. कुछ नहीं हुआ. अब बाज़रवाद का जोर है और १३ घोडों से जुती सरकार कमजोर है.

फ़िसड्डी भारत में खेल अब एशियाड या ओलम्पिक में पदक जुगाडने की चीज़ नहीं है – वो तो होने से रहा, ये मनोरंजन है – टाईमपास. जैसे राजपूत आपस में ही लडाई-लडाई खेलते थे और बाहर वाले से पंगा नहीं लेते थे वैसे ही अपन देसी क्रिकेट की टीमें बना बना के २०-२० खेलने का प्लान है! तो क्या गलत है? आन-बान भी बनी रहेगी और चैंपियन भी तो कोई अपने वाला ही बनेगा ना – कित्तों को रोजगार मिलेगा सोचो!

लेकिन छाती-कूटा लॉबी सक्रीय है – राग ये है की खेल नहीं है धंधा है – खिलाडी नहीं है उत्पाद है. खेल भी एक व्यवसाय है यह सच है तो फ़िर इतना बवाल क्यों? खिलाडियों का तो भला ही हो रहा है और खेलों का बाज़ार बढ रहा है – बिल्कुल पश्चिम की तर्ज पर. अगर कुछ नहीं बढ रहा है तो वो है राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में भारतीय खिलाडियों की विश्वस्तरीयता हां इस मुद्दे पर कोई टीवी चैनल रोता हुआ नहीं दिखता! सौ- दोसौ क्रिकेटर करोडपति हो जाएंगे इस पर हौल जरूर पड रहे हैं. टीवी चैनलों पर फ़िलासाफ़ियां दी जा रही हैं. हमारे मीडिया की प्राथमिकताएं क्या हैं? उसके ओछेपन पर हम क्यों शोर नहीं मचाते!?

हमेशा की तरह एक बार फ़िर हमारी प्राथमिकताएं बेतरतीब हैं माना लेकिन कुछ खिलाडियों का ही सही, भला तो हुआ! एक खेल का ही सही कुछ बाजार तो बढा. मुझे तो इसमें कुछ गलत नहीं दिखाता. आर्थिक दुर्दशा से जूझते खिलाडी या संपन्न खिलाडी क्या बेहतर है? और आगे दूसरे खेलों पर भी इस बाजारवाद का असर होगा ये तो खुशी की बात है! हम हर वक्त शिकायती मुद्रा में क्यों होते हैं?

२. भारतीय नारी के मुक्तिराग पर -

आजकल बहुत कुछ पेला जा रहा है इस पर. मोटे तौर पर कुछ कहना चाहता हूं – अगर मेरे हर शब्द को पकड पकड कर घसीटने के बजाय जो कह रहा हूं वो समझने का प्रयास किया जाए -

A feminist is a woman who does not allow anyone to think in her place.

लेकिन भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है! उन्ही की तर्ज पर आपको नारीवादी होने के लिये पुरुष-विरोधी होने की जरूरत क्यों पडती है?

पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया – वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है.

इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता! वैसे उसका भविष्य कितना अंधकारमय है इसकी जानकारी भी उसे नहीं है.

पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए!

आज पश्चिमी समाज में ४५% से अधिक विवाहों की परिणिती तलाक है. एकल मां-बाप की संतानें एक सुविधा संपन्न स्वार्थी समाज में अपने स्वास्थ्य और अपनी कमाई के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोचते हैं और ना किसी और पर भरोसा ही कर सकते हैं. अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है?

मेरा एक मित्र कहता है “पश्चिम की औरत, औरत नहीं है – वो मर्द की एक किस्म है चाहे कितनी नारीवादी बने!”

अपने सहज औरतपन से मर्दों को समझदारी सिखा सकने के बजाए आज भारतीय नारी भी मर्द की एक किस्म हुआ चाहती है और हो कर रहेगी! कोई शक नहीं है. लेकिन ज्वलंत विचारों वाली आपकी सफ़ल कार्पोरेट विरांगनाओं, आपकी सुपुत्रियों के लिये दुल्हे मिलना मुश्किल होंगे क्योंकी भारतीय पुरुष भी पश्चिमी पुरुषों के समान औरत को “बिच्च” कह कर बुलाएंगे और उपभोग की वस्तु समझेंगे और उनसे विवाह करने से बचना चाहेंगे! ये नंगा सच है. यह पश्चिम की त्रासदी है! और हां पश्चिम की स्त्री “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है की वो हर मामले में अपनी हांक कर पुरुष को इतना कुढा चुकी है! तो सचमुच बहुत मेहनत से पाया गया ओहदा है!!

I’m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. - Madonna Ciccone

मित्र कहते हैं की “मुद्दा ये था की  औरत फ़ेमिनिस्म के नाम पर ही सही मर्द की एक किस्म तो होना चाहती रही है लेकिन हम मर्दों की निगाह में वो अच्छे वाले मर्दों की एक किस्म नहीं हो सकीं – कुछ मिस्टिरियस मामला है!”

मुझे अमरीकी लडकियों से डील करने के सीक्रेट गुर दिये गए – “तुम किसी अमरीकी लडकी से ढंग से व्यव्हार करो तो वो तुम पर मूत कर चली जाएगी .. उसे जताओ की तुम उसे हिकारत की नज़र से देखते हो तो पीछे पीछे आएगी की मैं दूसरियों जैसी नहीं हूं!” ये मनोविज्ञान है.. मीर की गजलें सुनने वाले कानों के लिये जरा हट के ज्ञान था ये!

वैसे अगर पश्चिम का अंधानुकरण ज़ारी रहा तो आनी वाली पीढी के भारतीय बाप अपनी स्वछंद बालाओं को रईस लडके फ़ंसाने की सलाह देंगे. ऐसे में हर आदमी ये सोचेगा की औरत उससे पैसे की खातिर जुडी है और औरत ये सोचेगी की मर्द उससे देह की खातिर जुडा है. फ़िर दोनो संतुलन सिद्ध करने चल पडते हैं. ऐसे असुरक्षित समाज में औरत ये सिद्ध करना चाहती रहेगी की वो आत्मनिर्भर है और मर्द ये सिद्ध करना चाहता रहेगा की वो चिरयूवा है, तो वियाग्रा और डिप्रेशन की गोलियां बिकना लाजमी है – ये है पश्चिमी असुरक्षा – जिसकी जडें तथाकथित स्त्री सशक्तिकरण में छुपी हैं! गोलियां प्रेम और समर्पण का स्थान नहीं ले सकतीं.

आज बहुधा पश्चिमी औरतें कहती है की स्त्री सशक्तिकरण का मुद्दा आत्मघाती छलावा सिद्ध हुआ है! ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम! कुछ औरतें मानती हैं की वे अति कर चुकी हैं.

भारतीय स्त्री जिस संतुलन को साध सकती है उसे पश्चिमी स्त्री नहीं साध सकी थी – वो एक साथ भारतीय पुरुष को उसकी कुंठाओं से मुक्त कर सकती है और सहचरी भी हो सकती है – इतनी समझदारी और रचनात्मकता है उसमें – लेकिन ये तीस-चालिस साल पुरानी फ़ेमिनिस्ट लेखिकाओं के पद-चिन्हों पर चल कर नहीं होगा!

भारतीय वीरांगनाओं को सूचित कर दूं की पश्चिमी feminism वास्तविकता में औंधे मूंह गिर चुका है (यह आसान कडी बहुमूल्य है) और उसके साथ-साथ आधा समाज भी – संपन्न लेकिन मूल्यहीन हुआ समाज! ये आवलोकन एक पुरुष होने के नाते नहीं – अमरीका में एक दशक से रह रहे भारतीय होने ने नाते दे रहा हूं! जरा इन्टरनेट तो खंगालिये!

मैं सचमुच भौंचक्का हूं की अन्धानुकरण के चलते भारतीय इनकी बेवकूफ़ियों को क्यों दोहराना चाह रहे हैं रहे हैं? इत्ता कडवा सच पिला दिया - नान-रिलाएबल लग रहा हूं??

  1. राज भाटिया ने कहा:

    ई स्वामी जी,आप का *भारतीय नारी के मुक्तिराग पर * पढा,सच मे बहुत अच्छा लगा,एक नगां सच, जो हमारी आज की पीढी नही जानती,
    ओर इन सिर फ़िरो से बात करना भी अपनी बेज्जती करवाना हे.

  2. Cyril Gupta ने कहा:

    क्रिकेट के बारे में कोई ओपिनियन नहीं है, लेकिन आपकी दूसरी बात से इत्तेफाक नहीं रखते.

  3. बहुत खूब.
    जबरदस्त विश्लेषण है.
    आपकी एक-एक बात से इत्तेफाक रखता हूँ.
    आपने वास्तव मे …………. सबको सोचने के लिए नई जमीन दी है.
    समझदार होंगे तो जरुर और तुरंत उपयोग करेंगे.

  4. अच्छा लिखा है लेकिन मैं आपके कहे के अनुसार वाकिफ नही रखता. बाजार सभी का होना चाहिए मुझे इसमे कोई ग़लत नही दिखता लेकिन भारतीय समाज में आमिर और गरीब की खाई की तरह भारतीय खेल में क्रिकेट और अन्य खेलो के बीच भी यही खाई बनती जा रही है. आप सबको बढावा दे केवल उसको नही जो बिकता है अगर आप सच में खेलो को बढावा देना चाहते हैं तो. रही बात भारतीय औरतों की तो वो अपना रास्ता ख़ुद तय कर लेंगी लेकिन विरोधाभास उनमे भी हैं. कही वो कहती हैं हमे आरक्षण चाहिए कभी कहती हैं हम सभी बराबर हैं

  5. पश्चिमी नारीवाद की परिणति दिखा कर ठीक किया। नारी और नर की अपनी अपनी भूमिकाएं हैं। उन्हें तो निभाना ही होगा। हाँ सामाजिक समानता उसे हासिल करनी होगी और उस के लिए सही रास्ते का चुनाव भी।

  6. सोचने के लिये मजबूर करने वाला बेहतरीन लेख…

  7. बहुत अच्छा लिखा है आप्ने। मेन-मेन बात के लीये हेड्लाईन दी है आपने

  8. आप को एक ब्लॉगर और लेखक के नाते कुछ भी लिखने का अधिकार हैं . आप पुरुष है इस लिये आप नारी के उपर भी बहुत विस्तार से लिख सकते हैं क्योकि ९०% पुरुष नारी पर ही शोध करते हैं बचपन से लेकर बुदापे तक . जहाँ तक बात हैं पश्चिमी सभ्यता को मानने का और इसे भारत मे लाने का तो इसमे ज भी बुराई लगती हैं उन सब को फिर महात्मा गाँधी की तरह खादी पहननी चाहिये और सच बोलना चाहिये । लड़कियों को डील करने के गुर सीखना इतना जरुरी क्यो हैं ?? पश्चिम का अंधानुकरण इस लिये हो रहा है { वैसे ये आप की सोच हैं क्योंकी जो लोग पश्चिम culture मे रहे हैं उन्हे अंदर से जानते हैं वह ये नहीं मानेगे } क्योंकी भारतीया सभ्यता मे नारी का स्थान केवल पुरुष की परिचारिका का हो कर रह गया है । आप के शब्दों मे उसे माँ भी कह सकते हैं जब वह जवान बेटे को बचाती है उस नौकरानी की चप्पलो से जिसे उसने छेड़ा होता हैं , आप उसे सहचरी कहते हैं जब आप कंप्युटर पर ब्लॉग लिखते हैं { पश्चिमी सभ्यता !! } और वह रसोई मे आप के लिये छाये बनाती हेर्न और फिर मन हो ना हो आप के लिखे को सुनती भी हैं । आप उसे बेटी भी कह सकते हैं क्योंकी आप उसे दान कर मोक्ष पा सकते हैं । तो ये हैं आप की सो कॉल्ड भारतीये सभ्यता जो बची रहे इस लिये इस पीढ़ी कि आप के शब्दों मे सो कॉल्ड “भारतीय वीरांगनाओं ” ने अपने तरीके से आगे बढने का निश्चय किया है । और एक बात इतने लम्बे शोध कभी पुरुषो के ऊपर भी कर के सा उदहारण लिखे की भारतीये पुरुष नारी की तरक्की से इतने अप्रसन क्यो होते है । क्यो भारतीये पुरुषो मे इतनी इन्सेचुरिटी हैं भारतीये नारी की आगे आती सोच से । इतनी साल से सारे adjustment नारियों ने किये हैं , आगे आने वाली पीढ़ी मे शायद पुरुषो करे तो इससे हमारी सभ्यता मे कहा फरक आजयेगा । रोटी तो गेहू की ही बनेगी चाहें पुरुष बनाए या स्त्री ।

  9. आप बेशक nri हैं पर आपने लिखा हैं एक आदर्श भारतीये पुरूष की सोच की तरह

  10. eswami ने कहा:

    @रचनाजी: आप आपकी पीढी की किसी भी नारीवादी भारतीय स्त्री द्वारा रचित किसी नारीवादी पुस्तक का उल्लेख करना चाहेंगी? अंग्रेजी या किसी भी भारतीय भाषा में होगा तो भी चलेगा! कोई भी मूलभूत रूप से भारतीय विचार है ही नहीं आपके पास.. जैसे की भारतीय कम्यूनिस्टों के पास नहीं रहा. आप बस विदेशी खयालात का अधपका भारतीय संस्करण परोस दे सकते हैं वो भी बिना हश्र जानें – क्योंकी विचार पर चलने के बाद क्या हुआ वो तक आपको पता नहीं होता. आपके विचार दूसरे बनाते हैं और आप उन्हें उपर-नीचे करके सोचते रहते हो की आप बुद्धीजीवी हो.

    पश्चिम की एक समझदार नारीवादी नें कहा था की ऐसा नारीवाद किस काम का जो ये तय करने के लिय लड रहा हो की आज की रात बर्तन कौन धोयेगा? क्या अंतत: ये बर्तन कौन धोयेगा वाला मामला है? क्या आप बिना इन्टरनेट खंगाले इस लेखिका का नाम भी बता सकती हैं? आप उन हकों के लिये लड रही हैं जो आपको मिले ही हुए हैं – पूंजीवाद और महंगाई के चलते भारत में एकल आमदनी में घर नहीं चल रहे और औरतें बाहर जा कर काम करने के लिये प्रोत्साहित की जा रही हैं. अंतत: दोनो बर्तन धो रहे होते हैं और बच्चे पालने में रो रहे होते हैं या खाना बाहर से आता है और क्रेडिट कार्ड पर जीवन चल रहा होता है.. अभी तो हांक लो.. पता तो तब चलेगा जब एकल मां बन कर मां-बाप दोनो का फ़र्ज निभाने वालियों की पीढी आएगी. क्योंकी तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आंखन की देखी!

  11. eswami jii
    mae apne baare mae kuch nahin kahugee naa hee koi udhaaran dugii . aap gyaata haen aap padhey likhae haen aap intelectual haen aaur aap videsh mae basey haen itnaa kafi haen . mujeh anpadh hee samjhey to bhi koi farak nahin padega kyokii mae sab kuch paane kae baad aatm manthan nahin kartee . mae kya koi bhi stri kisi bhi hak kae liyae nahin ladtee kyoki woh hak hamey janam sae mila haen .
    bahut sae log har sukh ko bhog kar dukh kae esaas talae dabae jaatey haen

  12. Praveen ने कहा:

    Cricket ki baat to aane wala waqt hi batayega ki kya sach hai, intazaar karke dekhane me koi harz nahi hai. Aur rahi baat dusari waali to hum dekh hi rahe hai ki naari mukti ke desh me naari ki kya gati ho rahi hai, ha mukti to mili hai salse counter pe baithane ke liye, office me chhote chhote kaam karane ke liye, bus chalane ke liye.depressed hone ke liye, single mother banane ke liye. bas mujhe mukti nahi dikhati hai to unchi jagaho pe, rahi sahi kami American rashtrapati chunaw ne kar hi diya hai. Haa aabhi naam lene wale naam le lenge Pepsico ke CEO ki, lekin majedaar baat hai ki unaki jade wahi se aati hai jaha naarimukti waadiyo ko sabse jyade pareshaani dikhati hai.To shayad bharteey naariyo ko us mukti ki talash ha jisame unka jeewan American naariyo sa ho jaaye. Aur mai dil se chahta hu ki unko american naariyo type ki mukti mil hi jaaye. Ishwar kare aur Bahut jald kare.

  13. ई,
    यूँ तो मैंने टीवी देखना ही बन्द किया हुआ है पर चिट्ठे अभी भी पढ़ता हूँ। नारी के बार में – नारी का अमरीकी उद्धरण आपने जो उकेरा है, वह वास्तव में पुरुष की एक प्रजाति की तरह ही लगता है।

    पर नारी का एक उद्धरण मैंने फ़िलिपींस में देखा। उसमें शक्ति भी है, और कोमलता भी। दफ़्तरों में करीब साठ से सत्तर फ़ीसदी काम करने वाले लोग औरतें ही हैं, लेकिन उनमें वह अमरीकी मर्दानगी नहीं है जिसका आपने बखान किया।

    वेशभूषा और भाषा से फ़िलिपीना बिल्कुल पश्चिमी देशों के रंग में रंगी दिख सकती है पर वास्तव में एशियाई पारिवारिक मूल्यों के अनुरूप ही जीती है।

    शायद ऐसा ही समीकरण हिन्दुस्तान के लिए चाहिए।
    आलोक

  14. nitin ने कहा:

    ईस्वामी जी,

    पश्चिमी नारी पर लिखे लेख से मैं पूरी तरह से सहमत हूं, अंधानुकरण के कारण ही “शाईनिंग इंडिया” के गीत गाये जा रहे है, लेकिन इस शाइन का वही होगा जो आज यहां के समाज का हो रहा है।

  15. kakesh ने कहा:

    मुझे लगता है कि भारत के नारीवादी आन्दोलन (या जो भी कुछ) को अमरीकी फैमिनिज्म के समकक्ष रखना अभी जल्दीबाजी होगी. हाँ भविष्य में यदि यह अमरीकी तर्ज पर चले तो शायद इसका हश्र भी वही हो जो अमरीका में हुआ.अमरीकी फैमिनिज्म विफल रहा या विफल हो रहा है इसमें कोई दो मत नहीं हैं.किंतु भारतीय समाज व नारी की स्थिति अभी भी अमरीका वाली नहीं हुई है. हो सकता है चंद स्त्रीयां अमरीकी मॉडल को ही सामने पाती होंगी लेकिन वस्तुत: यह अपने उन अधिकारों को पाने की लड़ाई है जो पितृसत्तात्मक समाज में छीन लिये गये थे.यह एक नयी सामाजिक रचना बनाने की पहल है जहाँ प्रेम,समर्पण,कोमलता तो है ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता भी है. आज की वर्किंग बूमन घर में भी वह सब करती है या कर रही है जो एक जरूरत है लेकिन किसी डर या भय से नहीं बल्कि अपने मन से.आज भारतीय पुरुष के नजरिये में भी बदलाव आ रहा है और स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता भी इसमें एक अहम भूमिका रखती है.भारत के परिवारवाद की धारणा के साथ यदि भविष्य के स्त्री-पुरुष चलें तो शायद वह वो मुकाम पा लें जिनमें दोनों एक दूसरे के पूरक होते हुए -और बनते हुए -खुशी खुशी एक छ्त के नीचे रह सकें.यह मैं केवल ब्लॉग पर चल रहे विमर्श को लेकर नहीं कह रहा वरन पूरे नारीवादी विमर्श के सन्दर्भ में कह रहा हूँ.

    आपकी चिंता जायज हैं.

  16. राम जी लाल ने कहा:

    आपके वाकई सच को शब्द दे दिये है,१००% सत्य और इसी के पीछे भागता भारतीय स्त्रियो (समाज सुधारने के कृत्य मे लगी केवल)का समूह जो घर मे सास को धकिया कर सास से संबंध अच्छे कैसे रखे पर भाषण देने का कार्य करती है,के लिये विचारक है..:)

  17. बहुत दिनो बाद साँड अपनी माँद से निकला. :)

    सही लिखा है, विवाद की सम्भावना है. क्रिकेट के व्यवसायिकरण से अपन को तो कोई एतराज नहीं. जो विरोध कर रहें है, वे क्यों कर रहे है, उन्हे ही नहीं मालूम होगा.

  18. असहमत हूँ आपसे व आपके लहजे से ।
    घुघूती बासूती

  19. अब पता नहीं यह वहम मात्र है या इसमें परिस्तिथियाँ शामिल हैं?

  20. Riddhi ने कहा:

    shrimaan e-swamiji,

    mere parivar mein ek mahila hain, jo aapki aadarsh bhartiya nari ki paribhasha mein bilkul satik baithti hain. woh prem aur daya se paripurna, apne pati aur parivar jano ki seva ko hi apna param dharm samajhti hain. woh aaj ke is “pashchimikaran” se bilkul pare hain. aisa nahi ki woh padhi likhi nahi, vigyan mein Master’s kiya hain aur apne pati se adhik padhi hain. parantu pati nahi chahte the ki wah naukri kare, pati ke prem ke aadhin hokar aur santaano ki parvarish mein apna jivan vyatit kar diya. pati ko is baat ki koi chinta nahi ki woh kya kar rahi hain kyunki pati dusri striyo ke saath gulchharre uda raha hain. bachche puri zindagi use gaaliya khate dekh bade hue hain isliye weh khud bhi uski izzat nahi karte, ghar mein usse jyada uski naukrani izzat hoti hain. phir bhi wah uff tak nahi karti, kyon? use samaj ka bhay hain, aap jaise purusho ka bhay hain jo uski pida nahi samajhte aur wah jaanti hain ki chahe woh kitni hi ladaiya na lade, dosh hamesha striyo ka hi nikala jaayega. gharwale toh use pati ko sukhi na rakh pane ka dosh dete hi hain, samaj bhi yehi karega. aap kahenge ki yeh toh keval ek-do aurato ki kahani hain. yeh sochiye, yeh aurat, kisi gaanv ki anpadh gawaar nahi hain. ek bade mahanagar mein rehne waali padhi likhi sadhan sampanna parivaar se hain. aur aap jis america mein pichhle “10 varsho” se reh rahe hain main wahaan rehne waali aisi kain mahilao ko jaanti hoon.
    aapne apne kathor shabdo mein yeh dhindhora toh peet diya ki bhartiya naariya apne adhikaro ke liye pashcimi mahilao ke vicharo ka andha anukaran kar rahi hain. par kabhi socha hain ki wah aisa kyun kar rahi hain? sach kahu, main america mein keval pichle 10 maah se reh rahi hoon, par aurat ko devi maankar pujne waale bhartiya purusho se adhik izzat, bitch kehne waale american purush de rahe hain. Devi kehlakar bitch jaisa vyavahar sehne se behter hain bitch kehlakar divyata ki anubhuti karu. aapke vicharo ka aadar karti hoon. parantu stri purush ki bhanti banne ka prayatna tabhi karti hain jab purush ko uski raksha karne mein asamarth paati hain.

  21. Narendra ने कहा:

    दोस्तों,
    मैं अपने कठोर विचारों के लिये पहले ही सॉरी बोल देता हूँ|

    बडी अजीब बात है कि हम लोग बरसों से औरत की आज़ादी,कमज़ोरी वगैरह वगैरह विषयों पर बहस करते आ रहे हैं लेकिन कोई एक काम ऐसा नहीं करते कि ये मसले ही नहीं रहें| क्यों हम इस बात को लेकर खुद भी मर रहे हैं और लडकियों को भी चैन से नहीं जीने देते? और फिर क्या सिर्फ औरतौं की हालत ही दुनिया में बदतर है? हज़ारों मर्द भी इस दुनिया में दुखी हैं| काफी तादाद में लडके नशे के शिकार बने बैठे हैं| कम से कम औरतों में इतनी तो शर्म बची रही है कि वो आदमी पर इल्ज़ाम नहीं लगाया करती|
    अगर नारी इतनी ही कमज़ोर नज़र आ रही है तो बनाओ नारी को मज़बूत| खुद डरके जीना और दूसरे की कमज़ोरी पर आँसू बहाना कहाँ की समझदारी है| कितनी ही औरतें हैं जिन्होंने दुनिया में बडे काम किये हैं और आज भी कर रही हैं| मैं खुद काफी ऐसी लडकियों से परिचित हूँ जो मुझसे काफी समझदार और मजबूत हैं|
    सच तो ये है कि बरसों से लोगों ने अपने फायदे के लिये नारी को दबाकर रखा है| हम लोग ही पहले कोशिश करते हैं कि सुन्दर लडकी को इम्प्रैस करें और बात नहीं बने तो लडकी को कोस दो| फिल्मों में भी ज्यादातर लडकी को इस तरह के रोल दिये जा रहे हैं कि हम उन्हें देखकर और कमज़ोर बन जाते हैं| बॉलीवुड / हॉलीवुड या कहीं के भी ज्यादातर हीरो या डाइरेक्टर को ही ले लो| क्यों उन्हें इतना भरोसा नहीं है खुद कि काबिलियत पर जो वो लड्की को सिर्फ नाचने के लिये ही फिल्म में रखते हैं| अब सोचने वाली बात ये है कि दुनिया में औरत की स्थिति ज़्यादा खराब है या मर्द की|
    मैं किसी लडकी पर इल्ज़ाम लगाना नहीं चाहता लेकिन एक सलाह देना चाहूँगा| ये दुनिया सभी लोगों के लिये है| लडकियाँ अगर निर्भय होकर जीयें और कुछ बातों का खयाल रखें तो नारी-उत्थान जैसे ये सब सवाल खत्म हो जायेंगे| और क्यों तुम दूसरों की बातों से खुद को कैद कर के जीओ? अगर कोई इन्सान कमज़ोर है तो सिर्फ खुद के दिल और दिमाग से चाहे वो लडका हो या लडकी|

  22. Sunil kumar shrivastava ने कहा:

    “भारतीय लोग इतने बेवकूफ़ क्यों होते है”.क्यो कि आप जैसे लोग भारत से दुर रह कर भरतीयो के बारे मे ईतने गन्दे विचार रखते है,खुद को भारत से दुर रह कर पस्चिमी सभ्यता को अपना कर दुसरो को बेवकुफ समझते है.मुझे बदा दुख हुआ आप के ईस लेख से कि भरतीय समाज के नारी के प्रगति पर आप के बिचार कितने पुरुस प्रधान है.बुरे अछाई की ओर जना बुरा नहि है.अगर हमरे समाज मे नरी को पुरुस के बराबर समझा जता तो ईस तरह की कोई बात नहि होती और आप भि अपनी जीवन शैली और वैभवता के लालच मे अप्रवासी बने बेठे है.नारी आज के युग मे आदमी के साथ कन्धा से कन्धा मीला कर चल रहि है तो आप जेसे लोग “बिच्च” बोलने का शाहस कर रहे है मुझे आप के बीचार से तुलसी दास का दोहा याद आ रहा है. ” डोल गवार शुद्र पशु नारी ये सब तारण के अधिकारी.” तलाक का प्रतीशत बता कर प्रगति की गती बताने वालो को ये बात जरुर जाननी चाहिए की तलाक का ९० प्रतीशत कारण आदमी होता है नकी नारी.आज जीन देशो मे प्रगति दीख रहि है नारी का योगदान सराहनीय है अमेरिका ,कनाडा,ब्रीतानीया,ईनडोनेसीया,युरोप के सारे देश ओर भारत मे केरला है जहा के विकास मे नारी का योगदान शरहनीय है.आप जैसे लोगो के द्कीया नुसी बिचार भारतीय समाज मे नरी का खुला बिचार फुटी आख भी नहि भाता.ओर भारत से बहर रह कर भारतीयो को बेवकुफ बोलते है.सायद आप का ईतना गन्दा विचार आप का अनुभव है आप ने अगर भारतीय नारी से शादी की होगी तो आप के दो काम ओ जरुर आती होगी १.नैकरी करा रहे होगे या घर पर रह कर आप के लिए भोजन ओर आप के बचो को पल रहि होगी.जैसा की अमेरिका के भरतीय मुल के लोगो के बारे मे जाना जाता है ,ओर आप के गन्दे विचरो से भी लगता है.
    सुनील कुमार श्रीवास्तव
    चेक गणराज्य

  23. vinay ने कहा:

    Aap jaroor vahaan ki jindagi se tang aa gaye hoge to meri baat maaniye aur vaapas apne desh chale aaiye.aaj bhaarat ke gaanvo aur seharo me bhi striyo ki koi kadar nahi hai.purush pradhaan samaaj ne us ko hamesha aage badne se roka hai.isi kaaran kai striya purusho ke manmaane vyavhaar se aazaad hone ke liye khud apne pairo par khadi hona chaahti hai jo bilkul galat nahi hai. aatmanirbharta se hi aatmasamman badta hai.keval 2% adhunik sehro ki yuvtiya hi ameriki yuvtiyo ki burayeeyo ka anusaran kar rahi hai.jab aap yahaan aayege aur dekhege to hi aapko ye ahsaas hoga ki desh ki tarakki me mahilaao ka bhi barabar yogdan hai.

  24. सुमित ने कहा:

    मुझे आइ पी ऐल से कोई हर्ज़ नहीं है। मुझे मीडिया वालों से चिढ़ है जो ज़रूरत से ज़्यादा (और शायद पैसे खाकर) इसे तूल दे रहे हैं। मैंने ख़बर पढ़ी थी (सही है या नहीं कह नहीं सकता) कि नई फ़िल्म वाले भी इन्हें अपने प्रचार के लिए पैसे देते हैं। दैनिक भास्कर अख़बार, जो खेल पन्ने के अलावा, कभी-कभी ही पहले या और पन्नों पर क्रिकेट की ख़बरें देता था, मसलन भारत की बड़ी हार-जीतों पर। अब तक लीग के जितने भी मैच हुए हैं, उन पर अपने पहले पन्ने का एक बड़ा हिस्सा खपा रहा है।

  25. purushita Sihasan par baith kar neer kshir vivek karane vale hansji aana zara Aurat ki yoni mein. Bhrun se lekar burape tak dk yatna shivir. bhogoge to janoge.

  26. dil khol kar likha hai aur sahi likha hai, bas bhasha sudhaar len, taaki aapko uske liye maafi n maangni padey.

  27. बिल्कुल ठीक लिखा है आपने . पर मुश्किल यह है कि हम जैसे एक प्रवाह में बहे जा रहे है , विवश .

    मेरी नजर में नारी आज

    विवेक रंजन श्रीवास्तव
    विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.

    पैंट तो पहन लिया है तुमने,
    पर उतारी नहीं है पैरों की पायल .

    ओढ़ ली है
    नारी प्रगति के नाम पर
    पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर तुमने
    बाहर की जबाबदारी
    पर अब भी लदी हुई है पूर्ववत
    तुम पर घर की जिम्मेदारी .

    अच्छा लगता है जब तुम्हें देखता हूँ ,
    पुरुष साथी को साथ बैठाये
    स्कूटी या कार चलाते हुये
    पर सोचता हूँ कि
    तुम थक जाती होगी ,
    क्योंकि
    रोटियाँ तो तुमसे ही माँगते हैं बच्चे.
    थके हारे क्लाँत पुरुष को
    तुम्हारे ही अंक में मिलता है सुकून .

    तुम्हें पंख लगाकर ,
    कतर लिये हैं
    फैशन की दुनिया ने
    तुम्हारे कपड़े .

    तुम अब भी आश्रित हो
    पिता ,भाई,
    पति,पुत्र
    पर

    छद्म रावणों
    दुःशासन और दुर्योधनों की
    आँखों से घिरी हुई,
    महसूस करती हो हर तरफ
    मर्यादा का शील हरण .
    पर तुम बेबस हो .

    इस बेबसी का हल है
    मेरे पास .
    पहनो शिक्षा का गहना ,
    मत घोंटने दो
    कोख में ही गला
    अपनी अजन्मी बेटी का ,
    संसद में अक्षम नहीं होगा
    स्त्री आरक्षण का बिल
    जब सक्षम होगी स्त्री .

    और जब सक्षम होगी स्त्री
    तब तुम
    बाहर की दुनियाँ सम्भालो या नहीं
    घर , बाहर ससम्मान जी सकोगी .
    पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर .

  28. इस चर्चा में इतनी कड़वाहट घुल गयी है कि कुछ कहते डर लगता है। दोनो पक्ष चरम स्थितियों का वर्णन कर रहे हैं। मामला कुछ बीच का है। न तो सभी नारीवादी बहनें ही पश्चिमी सोच का अधकचरा अनुकरण करने वाली हैं और न ही सभी पुरुष स्त्रियों की शोषक तथाकथित पुरुषप्रधान व्यवस्था के हिमायती हैं। हर तरह के स्त्री-पुरुष भारतीय समाज में मिल जाएंगे। आवश्यकता है कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ायी जाय जो स्त्री-पुरुष के अधिकारों और अवसरों की समानता के लिए कुछ ठोस प्रयास करें।
    सबका अन्तर्मन यह जानता है कि उचित क्या है और अनुचित क्या है, भले ही तर्क और बहस के धरातल पर कुछ भी बोलता रहे। बस अपने अंदर झाँकने की ज़रूरत है। रास्ता साफ दिखायी देगा। बस अपने पूर्वाग्रहों का काला चश्मा हटाना होगा।

  29. S.C.Bhagat. ने कहा:

    Discussion is turned into neverending phage unless topics are not well defined.so ideology and goal is to be defined to find a conclusion. it’s my view.

  30. vishnu prabhakar ने कहा:

    mai apki bato se sahmat hun, per apne bharat me ab ganga ulti disha me bahne lagi hai.tathakathit budhijivi mahilaye puruso k sath kandhe se kandha mila k nahi bhidak chalna chahati hai.AAPKA DHYAN MAIDHARA 498A KI TARF DILANA CHAHTA HUN JISKE GHOOTE ILZAM ME FASAKAR VO APNE PATI,APNE BACHO AUR ANTATH KHUD SVYAM KO BARBAD KR RAHI HAI, AUR YE ANTHEEN YATRA JARI HAI…..WWW.498.ORG/

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