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हिंदी ब्लागजगत भी ‘ट्रैंडी’ है जी!
proBlogger के अनुसार वैश्विक ब्लागजगत में पिछले तीन महीनों में सतत परिवर्तनशील ब्लागिंग की विधा में पांच नए ट्रैंड्स स्पष्ट रूप से उभरे हैं -
१. सामूहिक ब्लाग्स
२. बहु-विषयक ब्लाग्स
३. पोर्टल्स पर ब्लाग्स को स्थान
४. पोर्टल जैसे दिखने वाले ब्लाग्स
५. व्यावसायिकरण की ओर बढता झुकाव
और ये ट्रैंड ठीक उसी तरह से हिंदी ब्लाग जगत में भी स्पष्ट आकार ले ही चुके हैं.
अच्छी बात ये है की इन नये ट्रैंड्स के चलते अकेले छोटे ब्लाग्स बना कर उन्हें चलाने वालों के लिये कोई खतरा या परेशानी नहीं है! विकल्प बढने से बल्की अपने सुभीते की चुनने के अवसर उपलब्ध हो गए हैं. कुछ भी होगा – कंटेंट विल्ल बी द किंग! चार साल पहले ब्लाग्स बनाने का शौक अपना नेट कुकुरमुत्ते उगाने जैसा लगता था – अब बाकायदा कुकुर्मुत्तों के गुलदस्ते, क्यारियां, खेत हो लिये हैं.
ये पुराना लेख उस चार साल पहले वाले वक्त की सोच का परिचायक है! कुछ चीजें हुईं कई नहीं हुईं.. सच तो ये है की जब ब्लागजगत में मात्र ३५ ब्लागर्स थे तब से ही दुनिया भर के देसी आई.टी वालों से इससे अधिक योगदान की उम्मीद करना वाजिब थी जो पूरी नहीं हुई है!
हां, इतने वर्षों के व्यक्तिगत आवलोकन के आधार पर दावे से कह सकता हूं की अंग्रेजी के अलावा और अन्य भाषाओं के ब्लागर्स की तुलना में हिंदी ब्लागजगत ब्लागिंग के अलग अलग तकनीकी पक्षों पर अपनी पकड करने के बजाय, साफ़्टवेयर्स के हिंदीकरण और आधूनिकीकरण करने के बजाय, ‘ब्लागिंग पर’ बेज़ा फ़िलोसोफ़ाईज़ करके अपने आपको समझदार सिद्ध करने में ज्यादा समय बरबाद कर रहे हैं. सच तो ये है की हिंदी ब्लागजगत से जुडे लोगों का ओपनसोर्स के प्रति बहुत स्वार्थी रवैया है – हम कुछ भी काम का जोड नहीं रहे! जबकी उपरोक्त पांचों ट्रैंड्स गहरे रूप से वेब २.० तकनीकी के चतुराईपूर्ण उपयोग से जुडे हैं और अन्य भाषाओं के ब्लागर्स नें उन तकनीकों के दोहन से अधिक उनकी ओर अपना योगदान दिया है - हर पक्ष की अधिक से अधिक समझ ही आगे बढने का सही रास्ता है और उसमें इमानदारी से सिर-खपाई वाली मेहनत लगती है.
मसलन सामूहिक ब्लाग्स की सफ़लता में संरचनात्मक स्पष्टता का बहुत बडा हाथ होता है, बहु-विषयक ब्लाग्स में संगठन क्षमता का. पोर्टल्स पर ब्लाग्स होने के लिये विचारों के और कंटेंट के व्यक्तिगत/व्यवसायिक/देय आदी का खुलासा/सेट-अप जरूरी है. पोर्टल्स जैसे दिखने वाले ब्लाग्स तो पूरी तरह नयी तकनीक में सराबोर होते हैं और अधिक तकनीकी पक्ष की दरकार करते हैं. व्यावसायिकता की तरफ़ बढता झुकाव लेखन और अपनी विषयवस्तु पर एक्स्पर्ट हो चुकने के दावे का द्योतक है लेकिन आज भी हिंदी में अलग अलग विषयों पर एक्सपर्ट स्तर के कंटेंट का टोटा है! हिंदी विकी भी इसकी शिकार है.
जब इन सभी कडे पैमानों पर एक साथ तौले जाएं तो हिंदी के ब्लाग्स अधिकतम रूप से अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के ब्लाग्स के आगे कमजोर और बौने पड जाएंगे – चूंकी आधारभूत योजना और तैयारी के बगैर एकाधिक पक्ष चूके रह जाते हैं और अधिकतर ब्लाग्स कहीं ना कहीं मार खा जा रहे हैं. मात्र ट्राई मारने या प्रयोग करने से अधिक मेहनत की जरूरत होगी और ब्लागिंग बहुत समय खाऊ शौक है – मात्र लेखन से अधिक काम करना पडता है. उदाहरण के लिये हमारे पास कोई बोईंग-बोईंग.नेट या जीनॉम, ऑटो-ब्लाग नहीं है. हां, कवि जरूर हैं ढेरों सारे, यूट्यूब पर डाले गए सुरीले गानों की कडियाँ जरूर हैं – देसीकरण इन देसी स्टाईल.. सेलिब्रेटिंग दी गोल्डन एरा स्लोली-स्लोली!
तो हिंदी ब्लाग जगत भी ट्रैंडी है - उतना ही जितना हालीवुड के आगे बालीवुड.. ज़रा पीछे-पीछे चलते हुए - हमारा अपना फ़्लेवर है जिसके अपने फ़ार्मुले उभर रहे हैं जो खालिस डबल-तडका मस्का मार के देसी है .. जैसे की हमारी फ़िल्मों के. वैचारिक दोहराव और घिसे हुए पैटर्न हमें पर्दे पर नये नये तरीके से देखने में मजा आता है – वो तो बाकायदा हो रहा है.
हो गई जी आज की .. अब गाणें-शाणें की रील का टैम ..
मेरी पसंद
तेरे मेरे होंठों पे मीठे मीठे गीत मितवा
आगे आगे चलें हम पीछे पीछे प्रीत मितवा
- श्रीदेवी (इन डिफ़्फ़रंट डिफ़्फ़रंट युनीकलर पराग साडीज़)



















हिन्दी ब्लाग्स के संबंध में आप के विचारों से सहमत हूँ। आप का http://teesarakhamba.blogspot.com/ के बारे में क्या विचार है। एक समीक्षा चाहता हूँ आप से।
बात में दम है . सटीक समीक्षा .
स्वामी की जय हो,
सत्य वचन स्वामी जी, जितेन्द्र का पन्ना देख कर हुलस कर मैं भी इस दुनिया में हुलस कर चला आया ,
लेकिन बाद में जैसे कचोट सी होनी लगी, “ये कहाँ आ गये हम-यूँ ही सर्फ़िंग करते करते ” गुनगुनाते हुये
फिर भी लगा रहा और लगा हूँ, “वह सुबह ज़रूर आयेगी…सुबह का इंतेज़ार कर” और हिंदी माता की सेवा
में लगा हुआ हूँ । कचोट की वज़ह, अंगेज़ी से यहाँ का कुल माहौल बिल्कुल अलग, कटेंट के प्रति उदासीनता
तो इतनी की पूछो ही मत । घुमा-फिरा कर एडसेंस मुझे प्रेत की तरह हर जगह मौज़ूद दिखते हैं । यह एक
अलग मुद्दा हो सकता है, अभी यहाँ नहीं और शायद कभी नहीं, क्योंकि बहुतों को तो यही बुरा लग रहा होगा ।
आप के विचारों से सहमत हूँ।
ब्लागिंग बहुत समय खाऊ शौक है। सही है!
अपनी ओर से जोड़ने का काम तो वही कर सकते हैं जिन्हें इसके बारे में पता हो। मैं जितने ब्लॉगर्स को जानता हूं उनमें से अधिकांश तो अभी सीख ही रहे हैं। मैं खुद भी अपवाद नहीं हूं। पिछले दस महीने से सीखने की प्रक्रिया चल रही है। हां ये वादा कर सकता हूं कि जब कुछ सीख जाउंगा तो ओपन सोर्स के लिए काम कर सकूंगा। फिलहाल तो कंटेट पर पूरा ध्यान दे रहा हूं। और जैसा कि आपने कहा ऑन लाइन गैजेट्स का पूरी क्षमता से दोहन कर रहा हूं। अंग्रेजी वालों से पीछे ही सही लेकिन आम आदमी का इस तकनीक से जुड़कर पूरी दुनिया से जुड़ने का जो क्रम शुरू हुआ है वह आशादायी है। कोई पहली पोस्ट में यह लिखकर कि सलाम दुनिया और कई महीनों के लिए गायब हो जाता है उसे भी मेरी ओर से तो धन्यवाद ही है। यहां बीकानेर में बहुत से लोगों को मैं ब्लॉग के बारे में बताता हूं तो उनका मुंह ऐसा खुला होता है जैसे मक्खी को आमंत्रण दें रहें हो। गरीब लोगों के मुल्क में बहुसंख्यक आबादी को जोड़ना प्राथमिकता है। आपके सवाल और विश्लेषण्ा प्रभावित करने वाले हैं।