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क्या आपका ब्लॉग ‘ऑर्गेनिक’ है?
खुशी है की चिट्ठाकारी पर लिखे लेखों की प्रतिक्रिया में नए ब्लागर्स ई-मेल भेज रहे हैं, मिलते जुलते सवाल पूछ रहे हैं. पिछले लेख पर मिली मेल कहती है ” विषय के अनुरूप मेरे ब्लाग की थीम चुनना एक चुनौती भरा काम लगता है, क्या करूं – विषय रोज बदल जाते हैं!”
हर ब्लाग की एक जलवायू होती है और कई मौसम होते है. फ़ोटोग्राफ़ी वाले ब्लाग पर चाहे जो हो मुख्य खाका संकरा नहीं चलेगा – फ़ोटो अलग अलग हो सकती हैं – लैंडस्केप या पोर्ट्रेट. ठीक वैसे ही किसी गंभीर कंपनी के व्यवसायिक ब्लाग पर कार्टून नहीं चलेंगे. यह सहज-ज्ञान की बात है और निर्णय आसान है.
लेकिन किसी व्यक्तिगत ब्लाग की जलवायू और उसका मौसम ज्यादा परिवर्तनशील होता है – आज मन किया लेख लिखें कल मन किया फ़ोटो दिखाएं तीसरे दिन कुछ और! भईये ये परेशानी की नहीं खुशी की बात है! आपका ब्लॉग जीवंत है परिवर्तनशील है – ठीक आप ही की तरह और अपने ब्लाग को एक जीवंत ऑर्गेनिक कृति बनाए रखना और साथ ही पठनीय भी – एक जिम्मेदारी वाला काम तो है! बहुत बडी बात है की आपका ब्लाग मात्र आपके व्यक्तित्व का एक ही पहलू दिखाने से अधिक कर रहा है तो तो भई मुद्दा दर-असल ये है की आपके ब्लाग के बदलते स्वरूप को झेल सकने की क्षमता वाली थीम कैसी हो. ऐसे में थीम का लचीलापन काफ़ी महत्व रखता है और महत्व रखती हैं कुछ टिप्स -
१. सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है की एकाधिक पोस्ट एक के नीचे एक दिखाने से बचें. जब भी कोई पोस्ट लिखी गई थी – वो अपने आप में अलग थी लेकिन उन्हें पढने के लिये की गई स्क्रोलिंग आंखों के आगे से एक औगढ और असंतुलित बिंब गुज़ारती है. अपने ब्लाग पर आप को सब अच्छा लगता है .. लग रहा है विषयों, चित्रों और मूड का कोलाज बन गया लेकिन ऐसा है नहीं – पाठक को कनेक्शन और स्पष्टता चाहिए. कुछ दिन बात बात समझ में आने लगती है की कुछ गडबड है.
२. उपरोक्त वजह से, एक कडी पर एक लेख हो और वो तार्कित तरीके से दूसरे लेखों से जुडा हुआ हो.. हर एक का मसौदा और मूड भिन्न होने पर भी खास फ़र्क नहीं पडेगा.
३. फ़्ल्यूइड थीम कब प्रयोग करें? फ़्ल्यूईड थीम अपने मुख्य बीच वाले बडे सेक्षन का आकार ब्राऊजर की विंडो के आकार के हिसाब से खुद ब खुद जमा लेती है – इसका फ़ायदा ये होता है की पाठक को अधिक नियंत्रण मिलता है. लेकिन जब आप इसका प्रयोग करें तो लेख को लिख कर उसकी जमावट को छोटे और बडे विंडो और कम ज्यादा रिज़ाल्यूशन पर ज़रा चला कर देख लें की लेख की जमाव्ट ठीक तो लग रही है – यह २ मिनट की मेहनत आपके सभी पाठकों को खुश रख सकती है!
४. गर्मियों में सूती कपडे पहने जाते हैं और सर्दियों में गरम वस्त्र. उसी तरह थीम का भी एक मौसम है और समय है. नये फ़ीचर्स आएंगे जो थीम को बदलने के लिये बाध्य करेंगे लेकिन थीम आपके लेखन के मूड को प्रभावित ना करे यह ध्यान रहे. मसलन कोई गॉथ थीम लगा कर आप दिवाली का लेख नहीं लिख सकते – वो हार्ड-रॉक बैंड समूह के लिये ही उचित है – इसलिये आम नीयम है की अगर अलग अलग विषयों पर लिखना है तो सेफ़ चलें .. ऐसी थीम चुनने से बचें जो किसी खास बडे फ़ोटो वाले बैकग्राऊंड पर आधारित हो.
५. अगर आप एक ही थीम से जल्दी-जल्दी बोर हो जाते हैं तो मध्यम मार्ग चुनें – थीम का खाका वही रखें लेकिन उसके कलर–कांबिनेशन की विविधता चुनने की सुविधा हो. आप भी खुश और पाठक भी.
६. अपना [चुराया हुआ] आईडिया है की नवीनता बनाए रखने का जिम्मा थीम के बजाए चित्रों पर डालें लेकिन चित्रों का चुनाव और आकार युक्तिसंगत हो. उदाहरण के लिये हिंदिनी पर हम फ़्लिकर से फूलों वाले फ़ोटो की फ़ीड ले कर दिखाते हैं – लेकिन हर फ़ीड अलग अलग टैग्स पर आधारित हैं. चूंकी फ़ोटो का आकार कभी नहीं बदलता दृष्यावली संतुलित लगती है.
तो अब मामला जमा कुछ? ![]()
इससे बढिया भी कुछ मिला?



















फ़्ल्यूइड थीम पर एक अलग आल्र्ख की आवश्यकता है, स्वामी जी !
आल्र्ख को आलेख तो पढ़ ही लिया गया होगा । फिर भी बताये देता हूँ कि आलेख पढ़ें ।
lage rahiye sar ji,hamara gyanvardhan ho raha hai.