क्या आप अपने व्यक्तिगत शब्द-भंडार पर गर्व कर सकते हैं? हम मे से अधिकतर लोग इस हालत मे नही हैं!
हिन्दी पट्टी वालों की मुख्य समस्याएं ये हैं -
-
- कोई शब्द अंग्रेजी मे पहले सूझना और उसका हिन्दी जानने का प्रयास ही ना करना.
- हिन्ग्लिश को ही हिन्दी मान लेना और अपनी कमी को “चलता है” कह कर चलने देना.
- टीवी और समाचार पत्रों द्वारा हिन्ग्लिश मान्य होने पर अनुकूलित हो लेना.
- आसान लिखने कि कोशिश और क्लिष्टता से बचने कि कोशिश को नए शब्दों के ना सीखने से जोडना.
- अच्छा लेखन कम पढना.
- खुद को सुधारने के आग्रह मे कमी.
- वर्तनी की गलतियां
अच्छा लेखन सटीक शब्दों के चुनाव के बिना संभव नहीं है. वर्तनी की गलतियां अभ्यास से जाती हैं – चिट्ठाजगत में रमण कौल, आलोक जैसे वरिष्ठों ने इस पर काफ़ी जोर दिया है. यह कमी मुझ जैसे कई पुरानों मे भी है. वाक्य विन्यास चाहे जितना अच्छा हो, सही जगह, सही शब्द पिरोना एक कला है.
| अच्छे व्यक्तिगत शब्द-भंडार के फ़ायदे | कमजोर शब्द-भंडार के नुकसान |
| सटीक संप्रेषणसटीक अभिव्यक्ति
उन्नत भाषा बेहतर छवि आत्मविश्वास |
पठनीयता मे कमीगलत समझा जाना
आत्मविश्वास मे कमी कमतर लेखन छवि पर कुप्रभाव |
शब्दाडंबर का भय बनाम अच्छा लेखन
- हिंग्लिश ना लिखने कि गुहार को “ट्रेन के लिये लौहपथगामिनी तो प्रयोग नही कर सकते” छाप तर्कों से दबाया जाता है. हां ट्रेन को ट्रेन ही कहिये लेकिन इस्केपिस्ट को पलायनवादी ही कहिये – क्यों? आप जब पलायनवाद को इस्केपिज्म कहते हैं तो अगली पीढी कि भाषा के साथ वही करते हैं जो पिछली पीढी ने हमारी भाषा के साथ किया.
- विचारों की स्पष्टता+ सटीक शब्दों का चयन = अच्छा लेखन
- विचारों की स्पष्टता + क्लिष्ट शब्दों का चयन = शब्दाडंबर
- विचारों की स्पष्टता + कमजोर शब्दों का चयन = पठनीयता मे कमी + गलत समझे जाने की अधिक संभावना.
अपनी सहायता स्वयं करें – इस तरह -
- कई शब्दों के लिये एक शब्द ढूंढने का प्रयास – बिना क्लिष्टता या संयुक्ताक्षरों वाला.
- पर्यायवाची/समानार्थी शब्द - हिंदी/उर्दू/संस्कृत मे से ढूंढने का प्रयास.
- अच्छे शब्द्कोशों मे निवेश.
- आनलाईन शब्दकोशों का प्रयोग.
- प्रकाशन से पूर्व किसी अभिरुचिपूर्ण मित्र को लेख दिखाना.






ये सब करते आए हैं। अब तो आप ने कोड तैयार कर दिया है। करते ही रहेंगे।
आभार मार्गदर्शन का.
जो लोग कहते हैं कि हिन्दी में शुद्धता की क्या जरूरत है उन्हें इस लेख का लिंक अवश्य दूंगा। और मैं भी बार बार यहां आकर पढ़ते रहने की कोशिश करूंगा। ताकि ट्रेक पर बना रह सकूं। ट्रेक तो चल जाएगा ?
बहुत सही !!
कुछ समय पहले हिन्दी चिट्ठजगत में गलत हिन्दी लिखने पर बात चली जो मेरी समझ से बाहर थी। यह सच है कि कभी कभी लिखने में गलती हो जाती है पर इसका मतलब नहीं गलत लिखा जाय।
हांलाकि कि मैं दूसरी भाषा के शब्दों को, हिन्दी में स्वीकार करने का पक्षधर हूं।
ई अध्यापकी कब से शुरू कर दिए ?
मैं भी कोशिश करता हूं कि मेरी भाषा हिंग्लिश नहीं बने. एनडीटीवी जैसे टेलीविजन चैनल बड़े ही शातिराना तरीके से हिंदी के शब्दों का बहिष्कार करते हैं और उसमें अंग्रेजी और ऊर्दू ठूसते हैं. पर उनका काम वो जाने. मैं अपना काम जानता हूं.