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स्तंभन-वटी, अंधन-वटी और गालिब!
देस मे जिस काम के लिए मकरध्वज, अश्वगंधा, शिलाजित होती थी इधर विआग्रा, सियालिस, लेविट्रा आदी दवाएं हैं. इनके प्रभाव से तत्काल स्तंभन लाभ होता है और घंटों तक क्षय नही होता, कुछ प्रयोगकर्ताओं को स्लखन के पश्चात भी नही.
तो प्र-ताप हुआ, बासी कढियों मे ऐसे उबाल आए, अनेक शष्ठीपूर्ती उपरान्त अनचाहे पुनः पिता बन गए. viagra generation जैसे जुमले उछले!
हाल ही मे पता चला है की कुछ प्रयोगकर्ता अपनी नेत्र-ज्योती इन दवाओं के सह-प्रभाव से खोने लगे, शोधों ने उनकी धारणा को सिद्ध नही किया और विवाद बना हुआ है.
अब प्रशासनिक दबाव मे, इन दवाओं पर अंधत्व से संबंधित चेतावनी चेप दी जाएगी पर पब्लिक-डिमांड की वजह से ये बाजार मे बनी रहेंगी.
गालिब का एक शेर है –
गर हाथों में जुम्बिश नहीं आंखो मे तो दम है
रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे
नए जमाने मे सब उलट है, काश गलिब के जमाने मे विआग्रा होती, उस्तादजी कैसा लाजवाब उलट शेर पेलते .. सोचो .. 













गालिब चचा शायद कहते:-
जवानी ढल गयी तो क्या हुआ,हाथ में पु्डिया तो है,
न सही हूरेँ जन्नत की , साथ में मेरी बुढिया तो है.
मुलाहिज़ा फरमाएँ -
क्या हर्ज है नज़रों के जो आगे है अन्धेरा,
आज पहली दफा खुश हैं महबूबा मेरे आगे।
हा हा हा वाह वाह बहुत खूब! .. बहुत खूब!!
हटा जुल्फों की घटा वैसे ही छाया है अन्धेरा
पर वायेगरा से हुआ है अपनी रातों में सवेरा.
बेयाग्गारा खाने के वास्ते bani है खाओ खूब खाओ पर हमारी एक सलाह है
यादगार के लिए एक बड़ा सा फोटो फ्रेम मे लगवा लो
शायद मेरी गोली का कमाल उनको आया है ,
इसी लिए बीबी भी मेरी हर वक़्त सताया है !
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