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“ओये देसी, तेरी ऐसी की तैसी!”
भारतीय साफ़्टवेयर इंजीनियरों के बारे में देसी, विदेसी, अपनी, अनजानी और मुद्दों से बेगानी कलमें घिसती रही हैं – धिसती रहेंगी.
जर्मनी मे बनी मर्सिडीज या बी एम डब्ल्यू के बाजार को जापान मे बनी सस्ती और बेहतर लेक्षस हिला देती है. चीन मे बना सस्ता और बेहतर उत्पाद अमरीकी उत्पाद को हटा देता है – अमरीका मे बना सब्जी काटने का चाकू उंची दुकान पर १५ डालर में बिकता है और चीन का २ डालर वाला चाकू उस से हर तरह से बेहतर होता है जो चीनी स्टोर मे बिकता है. उंचे ब्रांड का माल महंगा और अनजाने ब्रांड का सस्ता – चाहे बेहतर हो. और अगर वो बेहतर नहीं है तो आप उस उत्पाद के एवज मे दे क्या रहे हो भाई?
यही चीज इंसानों पर भी लागू है क्या? भारतीय विश्व विद्यालयों से निकले छात्र अमरीकी विश्व विद्यालयों से निकले छात्रों की तुलना में कमतर हैं क्या?
हाल ही में माईक्रोसोफ़्ट के एक उपाध्यक्ष क्रेग मंडी ने कहा की देसी दिमाग थ्योरी मे अच्छा है – व्यावसायिक और तकनीकी मती कम है और इस का दोष देसी विश्वविद्यालयों को जाता है.
क्रेग की बात सही है – औसत भारतीय प्रोग्रामर्स से समय के साथ नेतृत्व और प्रबंधन की अपेक्षाएं जुड रही हैं और व्यावयायिक ज्ञान की समझ की भी – जिस पर कहीं कहीं वो खरे नही उतर पा रहे. इस की कई और भी वजहें हैं. भावनात्मक, व्यवसायिक और अन्य.
पर देसी का रोना कौन सुनेगा यार?
देसी प्रोग्रामर को एकाधिक स्तर पे मार पडती है – पहले तो वो देसी है, वो सांस्कृतिक रूप से अलग है – भई जब अमरीका मे पैदा हुआ गोरा और काला साथ साथ नही रह पाते तो फ़िर देसी तो बाहर वाला हो गया. इधर कर्पोरेट की सीढियां चढने के लिए जिस तरह से आपको दफ़्तर में घुलना-मिलना पडता है – उस के कई मौके चले जाते हैं – देसी अगर ढलने की कोशिश करे तो भी नकार दिया जा सकता है. मसलन बचपन मे क्रिकेट खेलने वाला गोल्फ़ कोर्स मे उतरते सोचता है – यार क्या बोरिंग बला है ये!
वीसा धारी आदमी का आधा ध्यान तो इस बात में होता है की वो तंत्र के अंदर है या बाहर? भाई मैं इस देश मे बसूंगा या नही? फ़िर इस कंपनी मे बसूंगा या नही? आता है तो किसी कंसल्टिंग कंपनी के लिए, घाट घाट का पानी पीता है, प्रोजेक्ट-प्रोजेक्ट भटकता है की ग्रीन कार्ड तक कोई चारा नहीं और अगर एक जगह भी टिकता है तो भी कांट्रेक्टर होता है – जब तक जमता है तब तक उम्मीदें बढ जाती हैं. किसी भी व्यवसाय की सतही जानकारियां प्रोग्रामिंग तक को चल जाती हैं उस से आगे नहीं.
तकनीकी कुशलता की बात व्यक्ति के स्तर पर अलग अलग है क्रेग से इस बात पर सहमत हूं की आज भारत में कई विश्वविद्यालय स्तरीय छात्र नही निकाल पा रहे और इसे सुधारा जाना चाहिए. पर मेरे चाचा देसी विश्व्वविद्यालय कितने सस्ते हैं तुम्हारे अमरीकी विश्वविद्यालयों की तुलना में और हमारे पोतडों मे पले और टाट-पट्टी पे जमे हुए तुम्हारी डायपर मे पली और सेक्सी स्प्रींग ब्रेक्स मे रमी औलादों से आ के भीडती हैं. मैं कोई सफ़ाई नही दे रहा पर भाई देस गरीब है म्हारा. समझ यार!
जो भारतीय व्यवसाई सफ़ल हुए हैं, पर उत्पादों के दम पर सफ़ल होने वाली कंपनियां नगण्य हैं और बाडी-शाप कर के कमाने वाली अधिक हैं. ठेके पर काम उठा कर काम करने वाली अधिक हैं. जिनमे से एक बडा प्रतिशत अपने उपभोक्ताओं को खुश नही कर सका है.
विदेशों मे आ कर बसने और कमाने की चाह इतनी बलवती होती है की अघपके, अधूरे और अनुभवहीन प्रोग्रामर्स भी पहुंचते हैं – कई जम जाते हैं कई नहीं – पूरे समुदाय की छवि पर असर आता है. छोटा और अल्पसमय के लिए बाडी-शाप करने वाली कंपनी तो मुर्गे फ़ांसती है और हलाल करने के चक्कर मे लगी रहती है – गुणवत्ता पर असर आता है.
मगर क्रेग जैसे “आईवरी टावर्स” या उंची मिनारों पर बैठे लोग जमीनी स्तर की दिक्कतों को क्या खाक समझेंगे?
इस पर भी भारतीय कामगार किफ़ायती हैं और काम के हैं तभी तो भारत मे भर्तियां बढ रही हैं – मतलब क्रेग की ख्वाहिश ये की हमें हमारे स्तर के लोग नही मिल रहे, प्रशिक्षित कर लें तब भी सस्ते ही पडेंगे. पर काश ये काम भी भारतीय विश्व विद्यालय ही कर देते – हम वो पैसा भी बचा लेते! चल ठीक है बबुआ ऐसा ही सही. पर भारतीय भी एक गलती करे आ रहे हैं – जिस पर क्रेग ने भी कहा की हम अपने उत्पाद नही बना रहे और अपना शोध नहे कर रहे. उस ने अपने स्वार्थ के चलते कहा पर सही ही कहा है.
हम अपने उत्पाद बनाने के बजाए हरे चारागाहों मे जा कर दोयम काम करते रह जाते हैं. वो आसान राह दिखती है क्योंकि तंत्र, आधारभूत संरचना और उपभोक्ता अभी तैयार नही हुआ है और नीतिगत जोर बाह्योन्मुखी विस्तार पर रहा है- बाजार भी बाहरी उत्पाद से ही भरे जायेंगे ना. हमने वो जोखिम नही लिया की उत्पाद मुहैया कर दो उपभोक्ता अपने आप बनेगा आज नही तो कल – हमारे पास वो जोखिम लेने का धन या मन नही रह होगा या जो भी वजह रही होंगी.
फ़िर जब हमारे नेता लालू की जय और जयललिता हैं और ५१ प्रतिअशत पिछेडे वर्ग का कोटा है – भाईये एक रोना नही नही ना है.
इस पेल में मै कार्पोरेट राजनीति और उस में छुपे अमरीकी आपसी भाई-भतिजावाद पर भी कुछ पेराग्राफ़ जोड सकता था, अमरीकी गोरे अमरीकी कालों की तुलना मे ज्यादा उंची शिक्षा क्यों पाते हैं उस पर भी और अन्य कई फ़ोडू-फ़ाडू चीजों पर मगर उस पर अलग से – फ़िर कभी, मूड बना के.

















“हम अपने उत्पाद नही बना रहे और अपना शोध नहीँ कर रहे”
यही तो अपने महामहिम राष्ट्रपति कलाम साहब कहते हैँ.
धाँसू लेख पर प्रवासी-देशी अपने विचार बेहतर बता सकते हैँ.
हम तो ठहरे देशी-देशी.
“हम अपने उत्पाद नही बना रहे और अपना शोध नहीँ कर रहे”
कुछ ऐसी ही चिन्ता कल महामहिम रास्ट्रपति कलाम साहब ने
इलाहाबाद मेँ प्रकट की.अब बाकी प्रवासी-देसी विचार,सहमति,असहमति
प्रकट करेँ. हम तो ठहरे देसी-देसी.लेख मुझे तो धाँसूँ लगा.बधाई हो
स्वामीजी को.
सही नब्ज़ पकड़ी है आपने रोग की। हम बस किसी भी तरह की ट्रेनिंग में विश्वास करते हैं न कि गुणवत्ता युक्त ट्रेनिंग में। और एक और बड़ी कमी है भारतीयों की हाथ से काम या प्रयोग न कर पाने की कमी। बकर करने को बोलो तो पचास घंटे भी कम होंगे लेकिन कुछ करने या बनाने को बोलो तो मजदूर ढूंढे जाते हैं।
जब नब्ज़ पकड ही लिया है तो दवा भी बता दो स्वामीजी. खैर आज भले दवा का नाम न सुझता हो पर रोग को पहचानने की काबिलियत देसियों में आ ही गई है… देर सवेर इलाज भी ढूंढ ही लेंगे.
हम अपने उत्पाद क्योँ नही बना रहे है? यही बात जब विप्रो के एक कार्यक्रम मे मैने अजीम प्रेमजी से पूछी थी.
उनका जवाब था, कि “हम अपने साफ्टवेयर उत्पाद बना सकते है लेकिन उनकी व्यव्सायिक विपणन करना भारतिय कँपनीयो के लिये आसान काम नही है.”
हमारे साफ्टवेयर उत्पाद पर जब IBM या Microsoft का लेबल लग जाये वह व्यव्सायिक विपणन आसानी से कर सकते है.
कुल मिलाकर Made in India का आज की तारीख मे वही हाल है जो १९४०-१९५० मे Made in Japan का होता था मतलब खराब गुणवत्ता .(Made in Japan लेखक अकी मारीतो सोनी के संस्थापक ने कहा था कि इसी कारण से वह शुरूवाती दिनो मे Made in Japan काफी छोटे प्रिन्ट मे लिखते थे )
बस लगे रहो ,जब Made in Japan खराब गुणवत्ता से उत्तम गुणवत्ता मे बदल सकता है, तो Made in India क्यों नही.