बिहारी चुनाव: लट्ठ की अभिलाषा

रजनीश उर्फ़ ओशो ने कहीं कहा है की वृक्ष का चित्र बनाने के लिए खुद ही वृक्ष हो जाना होगा अन्यथा सही चित्र नही बनेगा. हां सही है! कोई भी चित्र, कलाकार के दृष्टिकोण की सीमितता के बाहर का कुछ प्रदर्शित नही कर सकता. एक पाठक अचंभित भी हो सकता है की क्या कलाकार विषय का चुनाव करता है बस अपने दृष्टिकोण से परिचित करवाने को, या परिवेश से!

माखनलाल चतुर्वेदीजी ने पुष्प की अभिलाषा नामक कविता लिखी थी जो तात्कालिक देश, काल और परिस्थिती में, जन-जन की मन:स्थिती से परिचित करवाती है, एक पुष्प के माध्यम से –

चाह नहीं मै सुरबाला के
गहनों मे गूंथा जाऊं

चाह नहीं प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के
शव पर हे हरि डाला जाऊं

चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूं भाग्य पर इतराऊं

मुझे तोड लेना बनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक

मातृभूमी पर शीश चढाने
जिस पथ जाएं वीर अनेक

भई मौसम है बिहार में चुनावों का – मतलब बिहार असेंबली इलेक्सन का और इस बार केन्द्रीय रिजर्व बल के जवान किसी किस्म की बूथ केप्चरिंग नही होने दे रहे. बिहार मे होने वाले चुनावों का सारा मजा ही फ़ीका हुआ जाता है! इस दंगाई जलसे की कितनी प्रतिक्षा थी हमें! कोई हमारा भी खयाल करो यार! हमारा दंगानुकूलित मन उदास भया है!! कैसे कहें, इन चुनावों का अर्थ हमारे लिए तो नेताओं के उस बाहू-बल का जायजा लेना है जिसके भरोसे हम उन्हे देश की कमान दिए आते हैं –

जन-भावना को ‘रिफ़्लेक्ट’ करने के लिए हम भी एक कविता पेला हूं – सो झेलो –

लट्ठ की अभिलाषा

चाह नहीं मैं ‘सुर-वाला’ की
पूंगी मे ढल जाऊं

चाह नहीं ‘प्रेमी-वाला’ की
प्रेम बंसरी बजवाऊं

चाह नहीं निर्धनों की
अर्थी मे हे हरि जल जाऊं

चाह नही अपराधी के सिर पर
चढूं भाग्य पर इतराऊं

मुझे तोड लेना बनमाली
उस पथ पर तुम देना फ़ेंक

मातृभूमी में बूथ-केप्चरिंग पर
जिस पथ जाएं ‘वीर’ अनेक

5 responses to “बिहारी चुनाव: लट्ठ की अभिलाषा”

  1. अनूप शुक्ला

    तुममें भी आ गये कविता के कीटाणु! बधाई हो।

  2. अनूप शुक्ला

    इसी को लोग कविता कहते हैँ इधर ब्लाग मँडल मेँ.

  3. आशीष

    क्या सटीक वर्णन है स्वामी जी और क्या धांसू पैरोडी अर्थात कविता है। दिनकर भी तुम्हारे चरण धोकर पियेंगे।

  4. Manral

    आशीष और सब ठीक है, लेकिन चरण धोकर पीने वाली बात कुछ ह्जम नही हुई………….

  5. Abhishek

    Acchi chah!

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