भौतिकी का २००५ नोबल पुरुस्कार

जब से मानव इस धरती पर पैदा हुआ है, वो प्रकाश से रोमांचित हुआ है, और शायद इसीलिये दीपावली मनाया जाता है। इसी रोमांच के कारण मानव ने प्रकाश से संबन्धित मुद्दों पर काम भी किया है जिसके कारण आधुनिक मानव को प्रकाश की कुछ विशेषताओं को समझने में मदद मिली है। इस वर्ष का भौतिकी का नोबल पुरुस्कार ऐसे तीन वैज्ञानिकों को दिया गया है जिन्होंने प्रकाश विज्ञान यानी ऑप्टिक्स पर कुछ बहुत ही मूलभूत शोध किया है। इन तीन वैज्ञानिकों में से अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रॉय ग्लॉबर को प्रकाशकणों के मूलभूत सिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिये आधी राशि दी गयी है और बाकी आधी राशि बांटी गयी है अमेरिका के ही कोलोरॉडो विश्वविद्यालय के जॉन हाल और जर्मनी के म्यून्शेन स्थित क्वांटमऑप्टिक मैक्स प्लैंक संस्थान के थ्योडर हांश के बीच जिन्होंने “सटीक लेज़र वर्णक्रममापन” यानी Precision Laser Spectroscopy तकनीक की खोज की थी जिसके द्वारा हम परमाणुओं और अणुओं के प्रकाश के रंग (यानी वर्ण) का लेज़र की मदद से एक दम सूक्ष्मता और सटीकता से निर्धारण सकते हैं।

ठीक रेडियो किरणों की तरह ही प्रकाश भी विद्युतचुम्बकीय (Electromagentic) विकिरण का एक रूप है जिसको कि जेम्स क्लार्क मैक्सेवेल ने सन १८५० के आसपास प्रतिपादित किया था। उनके इस सिद्धांत को ट्रांसमिटर (प्रसारण) और रिसीवर (पाने वाला) आधारित आधुनिक संवाद तकनीक में प्रचुरता से प्रयोग किया गया है जैसे कि मोबाइल फोन, टीवी, और रेडिओ। और अगर किसी ट्रांसमिटर या रिसीवर को प्रकाश को रजिस्टर या पंजीकृत करना है तो सबसे पहले उसे विकिरण ऊर्जा को अवशोषित (absrob) करना होगा और फिर सिग्नल को आगे बढ़ाना होगा। ये विकिरण ऊर्जा क्वांटा नामक एक पैकेट में रहती हैं और इसे फोटॉन भी कहते हैं। आज से करीब सौ साल पहले आइन्स्टीन ने ये दिखाया था एक क्वांटम यानी फोटॉन के अवशोषण से फोटोइलेक्ट्रान उत्पन्न होता है। यंत्र में फोटॉन के अवशोषित होने पर जो प्रकाश रजिस्टर होता है वो इसी फोटोइलेक्ट्रान के रूप में रहता है।

इस प्रकार से प्रकाश को तरंग और कण दोनों के रूप में समझा जा सकता है (Dual Nature of Light)। रॉय ग्लॉबर ने क्वॉटम प्रकाश सिद्धांत की नींव रखी है और जो प्रकाश विज्ञान के क्षेत्र को एक ठोस आधार भी प्रदान करती है। इसी सिद्धांत की वजह से उन्होंने ये साबित करने में सफलता पाई कि बल्ब से निकलने वाला कई आवृत्तियों और रूपों वाला प्रकाश लेज़र से निकलने वाले एकरूप और एकावृत्ति प्रकाश से क्यों और कैसे भिन्न होता है।

वहीं हॉल और हॉंश के काम की वजह से आज आवृत्ति की गणना दशमलव के बाद के पंद्रह अंकों तक की जा सकती है। इस कारण आज एकदम पैने रंग की लेज़रों का निर्माण किया जा सकता है और प्रकाश के सभी रंगों को सटीकता से मापा जा सकता है। इस तकनीक का प्रयोग प्रकृति से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधानों में किया जा सकता है और जीपीएस तकनीक में भी ये तकनीक सहायक है।

One response to “भौतिकी का २००५ नोबल पुरुस्कार”

  1. Anunad

    वाह भाई स्वामी, आपके लेख को पढकर मजा आ गया | जो लोग ये सोचते हैं कि वैज्ञानिक-विचार-विनिमय पर केवल अँगरेजी का एकाधिपत्य है, वे कैसे सही हो सकते है ? लेख अच्छा है , स्तरीय है |

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