प्रति जोडें: प्रविष्टियों की | टिप्पणीयों की

अपने अपने सांताक्लॉज़!

6 टिप्पणियां
Delicious


क्रिसमस के आसपास बाल-बच्चेदार वयस्कों में एक वार्तालाप आम सुनने में आता है; की उनके बच्चों में से किसे ये पता नही है की सांता एक झूठ है. क्रिसमस की सुबह जो भेंटे वो ये सोच कर खोल रहे हैं की सांता लाया वो घर का ही कोई सदस्य लाता है. माता-पिता कैसे कोशिश करते हैं की ये झूठ बना रहे, उनके बच्चे अपना बचपन जरा और जी लें.

समय के साथ बच्चे बडे होते हैं सांता का सच तो क्या जीवन के अन्य कटु सत्यों से भी परिचित होते हैं. हर बच्चे की यह नियती है पहले बडों के दिखाए परी-लोकों में अपनी तार्किकता को ताक पे रख निरीह विश्वास के सहारे विचरण और फ़िर यथार्थ का सामना – छले जाने का भाव या मूर्ख बनाये जाने का भाव जिसे खुद को यह कह कर समझा लेना की वो मेरी खुशी के लिए ही झूठ बोले थे – फ़िर यही दोहराव अगली पीढी के साथ. क्यों करते हैं हम ऐसा?

भारत में हिंदू परिवारों मे सांता वाला सुंदर झूठ तो नही बोला जाता और अगर इस प्रकार का कोई और सुंदर प्रबंधनीय झूठ अगर बोला भी जाता होता तो अपनी देसी संतानों सच पता लगने पर वो झटका नही लगता जो अन्य राज खुलने पर और जीवन से रू-ब-रू होने पर लगता है.

आज कल के समय स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों मे कितना परिवर्तन आया है पता नहीं लेकिन जब मैं स्कूल मे था गांधीवाद पाठ्यपुस्तकों का प्रमुख अंग होता था. उन आदर्शवादी संस्कारों की महानता का क्या कहना – कई साल लग जाते हैं फ़िर यथार्थ से अनुकूलन स्थापित कर लेने में. वो है झटका. स्कूल में किसी बालक की बाकी बालक पिटाई कर रहे हैं – बिना कारण की दादागिरी. वो बेचारा सविनय अवज्ञा कर रहा है, पिट रहा है. बाद में पूछने पर भी पीटने वालों का नाम नहीं बताता “उन्हें खुद शर्म आयेगी” – जो कभी नही आती! बालक अचंभित है – “अंग्रेजों तक को आ गई थी शर्म ये तो देसी हैं – इन सालों को क्यों नहीं आती, रोज रोज की हिंसा बंद क्यों नही होती!” आखिर एक दिन पिटा हुआ बालक खुन्नस मे आता है और “तेरी भैन की ..” से शुरु हो कर एक आध की महाआरती उतार देता है, मय धमकी अगर किसी को बोला तो .. आदी-इत्यादी, फ़िर सब कुछ “सेट” हो जाता है. जीवन आसान हो जाता है! पंजाबी की एक कहावत है “इत्थे थां नहीं कमजोरां नूं – ए दुनिया मनदी जोरां नूं” – तो क्या शराफ़त कमजोरी का पर्याय है और रहेगी? शरीफ़ आदमी को हमेशा हार सहनी होती है जब तक वो अपना व्यव्हार ना बदल ले!

क्या ये संस्कार ज्यादा भला है की “पिट के रो के घर आए तो और पिटोगे – अपने मामले खुद निपटाओ” – मतलब हिंसा का जवाब हिंसा से दो. मतलब गांधी को किताबों मे दफ़्न कर दो और हकीकत को समझो! मतलब क्या?? मतलब ये की दुनिया के जंगल में घास-फ़ूस मत बनों मांसाहारी बनों. – यही सीख आगे व्यवसायिक और आर्थिक सफ़लताएं पाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद समेत काम आती है! गांधीवादी बेचारा कलपता रह जाता है या पीछे पीछे!

मैंने इन सांताक्लॉज छाप अभिभावकों से निवेदन किया की आप खुद से पूछिए आज के समय में “प्रेक्टिकल” होने के लिए आपने अपने बचपन के सीखे कितने आदर्शों को घडी कर के तह से जमा दिया. या आपके जीवन मे काम आने वाली सारी “कूटनीतिक” समझ आपनें बचपन में मित्र-मंडलियों मे कितनी बदमाशियां कर कर के सीखीं. और अगर आप शरीफ़ बच्चे थे तो आपका कितना उल्लू कटा – फ़िर आप “सुधरे”.

तो हम बच्चों को अच्छा बनाते ही क्यों हैं? आदर्शवादी बनाने की बेज़ा कोशिश क्यों करते हैं? परि-लोक की सैर क्यों करवाते हैं? जबकी जानते हैं आगे किस किस्म की दुनिया मे जीना है उन्हें. तो हम खास तौर पर भारतीय जो दुनिया मे कहीं भी होते हैं अपने बच्चों को उनके लिए परेशानियों का सामान खुद दे रहे होते हैं – अच्छा बनाने की कोशिश में. अगर हम ये सोच रहे हैं की हम जब तक हो सके उन्हें दुनिया की कुरूपता से बचा लें – तो उस तत्थ्य का क्या जो कहता है “व्यक्तित्ब के विकास मे जीवन के पहले सात साल सबसे महत्व के होते हैं” फ़िर इस किये को अनकिया करने में जो टूटेगा उसका क्या? फ़िर मामला पूरा दूसरी तरफ़ जाता है – आप किसी भी समाज को देखिए उसका व्यव्हार उसके संस्कारों से सदैव उलट होगा – मसलन देवी की उपासना करने वाले भारत मे नारी का हाल और स्वतंत्रता की बात करने वाले अमरीका द्वारा दूसरों की स्वतंत्रता पर परोक्ष नियंत्रण के प्रपंच. क्या गलत कह रहा हूं मैं?

“सदा सच बोलो”, “किसी का दिल मत दुखाओ” “अपने से कमजोर पे हाथ मत उठाओ” “सब बडों का सम्मान करो” से शुरु हो कर पूरी लिस्ट होती है हमारे भारतीय संस्कारों की जो बाकायदा एक एक कर के टूटते हैं छूटते हैं अर्थहीन भी हो जाते हैं.

फ़िर वही बच्चा प्रबंधन की किताबों में डिस्टिल्ड १००% प्रूफ़ मचियावली, आर्ट आफ़ वार, चाणक्य की कूटनीति और महाभारत में कृष्ण के कारनामों से ले कर हेगेल जैसे क्लासीक चाव से पेल देता है क्योंकी अब परिकथाओं के चरित्रों से नहीं लोगों से व्यव्हार करना है और जीवन के अखाडे में फ़िर भी किसी गंवार लालू या मुलायम का “फ़्रस्ट्रेटेड” पी.ए. हो कर रह जाता है – “प्रेक्टिकल” अनुभव वाला फ़िर भी किताबी वाले पे हावी हो जाता है.

हम सब के अपने अपने संताक्लॉज हैं – जिनकी हकीकत उम्र के किसी भी पडाव पर पता चले दु:ख जरूर होता है फ़िर हम वही संता किसी और को परोस देते हैं शायद इस उम्मीद में की आने वाली पीढी को हम बेहतर दुनिया दे पाएंगे – वो कभी नही होता. अगर होता तो परिकथाओं का बाजार इतना गर्म नहीं होता – है ना?

  1. स्वामी दादा

    रात के दो बजे हैं। मिलवाकी विस्कांसिन की कड़ाके की सर्दी में बैठा हूँ और नींद नहीं आ रही। आप के विचार पढ़े और बाकी की नींद भी उड़ गई। कमाल का मुद्दा उठाए हो। कहो तो इस पर एक अनुगूँज हो जाए।

    बाकी पंजाबी की कहावत लिख कर दिल खुश कर दिया। यारां नाल बहारां मेले मित्रां दे।

    मिर्ची सेठ

  2. अतुल अरोरा ने कहा:

    गुरू तुम्हारा लेख पढ़कर तुम्हारी ही शैली में कुछ लिख मारा है अक्षरग्राम पर ।

  3. kali ने कहा:

    Swami sahi keh rahe ho. Isiliye humne apne balak ko yeh sab batein directly nahi seekhai hain. Jo seekhna hai humare wyavhar se aur apne samaj se seekh lega. Waise yehi sub batein humein bhi nahi seekhai gayi thi. Life main stick aur carrot aur everyone man for himself siddhant hi sahi baitha hai.

  4. Theluwa ने कहा:

    स्वामी जी, यहाँ मैँ सहमत नहीँ हूँ. यह एक सिद्ध तरीका है

    हम फीजिक्स पढते हैँ तो गति मँ पहले बताते हैँ कि हवा का प्रतिरोध न गिना जायॅ. आरँभिक सवालो मेँ एक्सेलरेशन निकालने मेँ फ्रिक्शन को छोडते हैँ कि नहीँ? क्योँ – जैसे – जैसे समझ विकसित होती जायेगी, आइडियल अवस्था से अलग हट के सोचने लगेँगे हम और व्यावहारिकता को भी जोडने लगँगे. हय कि नहीँ?

  5. Ritesh Shrivastava ने कहा:

    वाह आप्ने तो मेर दिन बन दीया . बहुत ही बधिय लेख

  6. anup ने कहा:

    भाईओं कोई ये बताये मुझे प्लीज़ की तुम लोग इस टूल से ड और ढ के नीचे बिंदु कैसे लगाते हो ?

उल्लेख

  1. अक्षरग्राम » Blog Archive » अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत? - [...] भाई ने इस अनुगूंज आयोजित करने जिम्मा http://hindini.com/hindini/?p=95” TARGET=_NEW>इस प्रयास को देख कर दिया है - जिसे सह [...]
  2. इधर उधर की » अनुगूंज १६: (अति) आदर्शवादी संस्कार सही या गलत? - [...] ामी जी बढ़िया रहे। इस विषय पर उन की प्रविष्टि पहले आई, और अनुगूँज बाद में घोषि [...]

टिप्पणीं करें

गूगल ट्रांसलिटरेशन चालू है(अंग्रेजी/हिन्दी चयन के लिये Ctrl+g दबाएं)